बालकाण्ड
दोहा 272
5 पद
Chaupai1 / 5
लखन कहा हँसि हमरें जाना। सुनहु देव सब धनुष समाना।।
का छति लाभु जून धनु तौरें। देखा राम नयन के भोरें।।
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(लक्ष्मण ने हँसकर कहा) हमारे जाने — सुनो, देव! सब धनुष समान। जून (पुराना) धनुष तोड़ने में क्या छति (हानि)-लाभ? राम ने नयन (आँखों) के भोरे (भोलेपन) से देखा।
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Lakshmana laughed and said, 'In our view — listen, my lord — all bows are alike. What gain or loss in breaking an old bow? Rama merely glanced at it with his innocent eyes.'
Chaupai2 / 5
छुअत टूट रघुपतिहु न दोसू। मुनि बिनु काज करिअ कत रोसू ।
बोले चितइ परसु की ओरा। रे सठ सुनेहि सुभाउ न मोरा।।
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(लक्ष्मण ने कहा) छूते टूट गया — रघुपति का भी दोष नहीं। मुनि! बिना काज (कारण) क्यों करो रोष (क्रोध)? (परशुराम ने) परसु (फरसा) की ओर देखकर बोले — रे सठ (मूर्ख)! मेरा स्वभाव नहीं सुना?
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'It broke at his mere touch — Raghupati is not at fault. O sage, why be angry without cause?' Parashurama looked menacingly at his axe and said, 'You impudent fool, have you not heard my nature?'
Chaupai3 / 5
बालकु बोलि बधउँ नहिं तोही। केवल मुनि जड़ जानहि मोही।।
बाल ब्रह्मचारी अति कोही। बिस्व बिदित छत्रियकुल द्रोही।।
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(परशुराम ने कहा) बालक समझकर तुझे नहीं मारता — केवल मुनि (संन्यासी) जड़ (मूर्ख) मत जानो मुझे। बाल-ब्रह्मचारी, अत्यन्त कोही (क्रोधी) — विश्व-विदित (संसार-प्रसिद्ध) क्षत्रियकुल-द्रोही।
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'I do not kill you, calling you a mere child; but know me not merely as a mild sage. I am a lifelong celibate, exceedingly wrathful, known throughout the world as the scourge of the Kshatriya race.'
Chaupai4 / 5
भुजबल भूमि भूप बिनु कीन्ही। बिपुल बार महिदेवन्ह दीन्ही।।
सहसबाहु भुज छेदनिहारा। परसु बिलोकु महीपकुमारा।।
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(परशुराम ने कहा) भुजबल से भूमि भूप (राजा)-रहित की — विपुल (अनेक) बार महीदेवों (ब्राह्मणों) को दी। सहस्रबाहु (कार्तवीर्य) की भुज छेदने वाला — परसु (फरसा) देखो, महीपकुमार (राजकुमार)!
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'By the strength of my arms I cleared the earth of kings and gave it to the Brahmins many times over. Behold this axe that severed the thousand arms of Sahasrabahu, O prince!'
Doha5 / 5
मातु पितहि जनि सोचबस करसि महीसकिसोर।
गर्भन्ह के अर्भक दलन परसु मोर अति घोर।।272।।
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(परशुराम ने कहा) माता-पिता को सोचवश (चिन्तित) मत करो, महीसकिसोर (राजकुमार)! गर्भों के अर्भक (शिशु) दलन (नष्ट) करने वाला — मेरा अत्यन्त घोर परशु (फरसा)।
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'Do not cause your mother and father grief, O young prince. My terrible axe has destroyed even the unborn children within wombs.'