बालकाण्ड

दोहा 273

5 पद

Chaupai1 / 5
बिहसि लखनु बोले मृदु बानी। अहो मुनीसु महा भटमानी।। पुनि पुनि मोहि देखाव कुठारू। चहत उड़ावन फूँकि पहारू।।
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लक्ष्मण हँसकर मृदु (कोमल) वाणी बोले — (कहा) अहो मुनीश! महा भटमानी (गर्वीले योद्धा)! बार-बार मुझे कुठार (फरसा) दिखाते — फूँककर पहाड़ उड़ाना चाहते?
अंग्रेज़ी अनुवाद देखें
Lakshmana laughed and replied gently, 'Ah, great sage, what a proud warrior you are! Again and again you show me your axe — do you hope to blow away a mountain with your breath?'
Chaupai2 / 5
इहाँ कुम्हड़बतिया कोउ नाहीं। जे तरजनी देखि मरि जाहीं।। देखि कुठारु सरासन बाना। मैं कछु कहा सहित अभिमाना।।
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(लक्ष्मण ने कहा) यहाँ कुम्हड़बतिया (कद्दू की बेल) कोई नहीं — जो तर्जनी (उँगली) देखकर मर जाए। कुठार (फरसा), सरासन (धनुष), बाण देखकर — मैंने कुछ अभिमान सहित कहा।
अंग्रेज़ी अनुवाद देखें
'There are no pumpkin-vines here that would wilt at the pointing of a finger. Seeing your axe, bow, and arrows, I did speak with some pride.'
Chaupai3 / 5
भृगुसुत समुझि जनेउ बिलोकी। जो कछु कहहु सहउँ रिस रोकी।। सुर महिसुर हरिजन अरु गाई। हमरें कुल इन्ह पर न सुराई।।
हिन्दी अर्थ देखें
(लक्ष्मण ने कहा) भृगुसुत (भृगुवंशी) समझकर, जनेऊ देखकर — जो कुछ कहो — रिस (क्रोध) रोककर सहता हूँ। सुर (देवता), महीसुर (ब्राह्मण), हरिजन (भक्त) और गाय — हमारे कुल में इन पर शूरता (वीरता) नहीं।
अंग्रेज़ी अनुवाद देखें
'Recognizing you as a son of the Bhrigu clan and seeing your sacred thread, I suppress my anger and endure whatever you say. Gods, Brahmins, devotees of Hari, and cows — our clan does not make war upon these.'
Chaupai4 / 5
बधें पापु अपकीरति हारें। मारतहूँ पा परिअ तुम्हारें।। कोटि कुलिस सम बचनु तुम्हारा। ब्यर्थ धरहु धनु बान कुठारा।।
हिन्दी अर्थ देखें
(लक्ष्मण ने कहा) मारने में पाप — हारने में अपकीर्ति (बदनामी)। मारते भी हों — आपके पैर पड़ते हैं। कोटि (करोड़ों) कुलिश (वज्र)-सम आपका वचन — व्यर्थ धरो धनुष-बाण-कुठार (फरसा)।
अंग्रेज़ी अनुवाद देखें
'Killing them would be sinful; losing to them would be disgraceful. Even if you strike us, we touch your feet. Your every word strikes like a million thunderbolts — you carry your bow, arrows, and axe in vain.'
Doha5 / 5
जो बिलोकि अनुचित कहेउँ छमहु महामुनि धीर। सुनि सरोष भृगुबंसमनि बोले गिरा गभीर।।273।।
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(लक्ष्मण ने कहा) यदि अनुचित देखकर कुछ कहा — क्षमा करें, महामुनि धीर (धैर्यवान)! सुनकर सरोष (क्रोधपूर्वक) भृगुवंशमणि (परशुराम) बोले — गम्भीर गिरा (वाणी)।
अंग्रेज़ी अनुवाद देखें
'If I have said anything improper, please forgive me, O great and patient sage.' Hearing this, the scion of the Bhrigu clan spoke in a deep, resonant voice.

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