बालकाण्ड
दोहा 270
5 पद
Chaupai1 / 5
समाचार कहि जनक सुनाए। जेहि कारन महीप सब आए।।
सुनत बचन फिरि अनत निहारे। देखे चापखंड महि डारे।।
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जनक ने समाचार कह-सुनाए — जिस कारण सब महीप (राजा) आए। वचन सुनते फिरकर अन्यत्र निहारा — चापखण्ड (धनुष-टुकड़े) मही (पृथ्वी) पर डाले देखे।
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Janaka told him the full story — the reason why all the kings had assembled. Hearing the words, Parashurama looked around and saw the pieces of the broken bow lying on the ground.
Chaupai2 / 5
अति रिस बोले बचन कठोरा। कहु जड़ जनक धनुष कै तोरा।।
बेगि देखाउ मूढ़ न त आजू। उलटउँ महि जहँ लहि तव राजू।।
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अत्यन्त क्रोध से कठोर वचन बोले — (कहा) कहो, जड़ (मूर्ख) जनक! धनुष किसने तोड़ा? शीघ्र दिखाओ, मूढ़! नहीं तो आज — उलट दूँगा पृथ्वी — जहाँ तक तुम्हारा राज्य।
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In extreme fury, he spoke harsh words, 'Tell me, fool Janaka, who broke the bow? Show me quickly, you dolt, or I shall turn the earth upside down as far as your kingdom extends!'
Chaupai3 / 5
अति डरु उतरु देत नृपु नाहीं। कुटिल भूप हरषे मन माहीं।।
सुर मुनि नाग नगर नर नारी।।सोचहिं सकल त्रास उर भारी।।
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अत्यन्त डर से नृप (जनक) उत्तर नहीं देता। कुटिल (दुष्ट) भूप (राजा) मन में हर्षित। सुर (देवता), मुनि, नाग, नगर नर-नारी — सब सोचते — उर (हृदय) में भारी त्रास (भय)।
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The king was too terrified to answer. The wicked kings secretly rejoiced in their hearts. Gods, sages, nagas, and the men and women of the city — all were worried, with a heavy dread in their hearts.
Chaupai4 / 5
मन पछिताति सीय महतारी। बिधि अब सँवरी बात बिगारी।।
भृगुपति कर सुभाउ सुनि सीता। अरध निमेष कलप सम बीता।।
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सीता-महतारी (माता) मन पछतातीं — (सोचतीं) विधि (ब्रह्मा) ने अब सँवरी (बनी) बात बिगाड़ी। भृगुपति (परशुराम) का स्वभाव सुनकर सीता — अर्ध-निमेष (आधा पलक का समय) कल्प-सम बीता।
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Sita's mother bitterly repented in her mind, 'The Creator has now ruined what was going so well.' Hearing of Parashurama's nature, Sita grew anxious — each half-moment felt like an age.
Doha5 / 5
सभय बिलोके लोग सब जानि जानकी भीरु।
हृदयँ न हरषु बिषादु कछु बोले श्रीरघुबीरु।।270।।
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सभय (भयभीत) सब लोग देखते — जानकी को भीरु (डरपोक) जानकर। हृदय में न हर्ष, न विषाद — कुछ (भी नहीं) — श्रीरघुवीर बोले।
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All the people looked on in fear; knowing Janaki's terror, the hero of the Raghus — with neither joy nor sorrow in his heart — spoke thus.