बालकाण्ड
दोहा 290
5 पद
Chaupai1 / 5
पहुँचे दूत राम पुर पावन। हरषे नगर बिलोकि सुहावन।।
भूप द्वार तिन्ह खबरि जनाई। दसरथ नृप सुनि लिए बोलाई।।
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दूत राम-पुर (अयोध्या) पावन (पवित्र) पहुँचे — सुहावन (सुन्दर) नगर देखकर हर्षित। भूप-द्वार (राजद्वार) पर उन्होंने खबर जनाई — दशरथ नृप (राजा) ने सुनकर बुलवाया।
अंग्रेज़ी अनुवाद देखेंअंग्रेज़ी अनुवाद
The messengers arrived at the sacred city of Rama and were delighted to see the beautiful town. They brought the news to the king's gate, and King Dasharatha, hearing of them, summoned them.
Chaupai2 / 5
करि प्रनामु तिन्ह पाती दीन्ही। मुदित महीप आपु उठि लीन्ही।।
बारि बिलोचन बाचत पाँती। पुलक गात आई भरि छाती।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
प्रणाम करके उन्होंने पाती (पत्र) दी — मुदित (प्रसन्न) महीप (राजा) ने आपु (स्वयं) उठकर ली। बिलोचन (नेत्रों) में बारि (जल) — पाँती (पंक्तियाँ) पढ़ते। पुलकित शरीर — छाती भरकर आई (हर्ष से)।
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After bowing, they presented the letter. The joyful king himself rose to receive it. His eyes filled with tears as he read it, his body thrilled and his heart overflowed with emotion.
Chaupai3 / 5
रामु लखनु उर कर बर चीठी। रहि गए कहत न खाटी मीठी।।
पुनि धरि धीर पत्रिका बाँची। हरषी सभा बात सुनि साँची।।
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राम-लक्ष्मण उर (हृदय) में — कर (हाथ) में श्रेष्ठ चिट्ठी। रह गए (स्तब्ध) — कहते न खाटी (कड़वी) मीठी (मीठी)। फिर धीरज धरकर पत्रिका (पत्र) पढ़ी — सभा हर्षित — साँची (सच्ची) बात सुनकर।
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Holding Rama and Lakshmana in his heart and the precious letter in his hand, he stood speechless, unable to express his feelings. Then composing himself, he read the letter aloud, and the whole court rejoiced at the true news.
Chaupai4 / 5
खेलत रहे तहाँ सुधि पाई। आए भरतु सहित हित भाई।।
पूछत अति सनेहँ सकुचाई। तात कहाँ तें पाती आई।।
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खेलते रहे — वहाँ सुधि (सूचना) पाकर — भरत हित (प्रिय) भाई (शत्रुघ्न) सहित आए। अत्यन्त स्नेह से सकुचाकर पूछते — (पूछा) तात (पिता)! कहाँ से पाती (पत्र) आई?
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Bharata, who had been playing there, received the news and came with his dear brother. With great affection and shy hesitation, he asked: "Father, from where has this letter come?"
Doha5 / 5
कुसल प्रानप्रिय बंधु दोउ अहहिं कहहु केहिं देस।
सुनि सनेह साने बचन बाची बहुरि नरेस।।290।।
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(भरत ने पूछा) कुशल (हैं)? प्राणप्रिय दोनों बन्धु (भाई)? कहो — किस देश में हैं? स्नेह-साने (भीगे) वचन सुनकर — नरेश (राजा) ने फिर पत्र पढ़ा।
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"Are my two beloved brothers well? Tell me, in which land are they?" Hearing these words steeped in love, the king read the letter once more.