बालकाण्ड
दोहा 301
5 पद
Chaupai1 / 5
गरजहिं गज घंटा धुनि घोरा। रथ रव बाजि हिंस चहु ओरा।।
निदरि घनहि घुर्म्मरहिं निसाना। निज पराइ कछु सुनिअ न काना।।
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गज (हाथी) गरजते — घण्टा-ध्वनि घोर। रथ-रव (शब्द), बाजि (घोड़ों) की हिनहिनाहट — चारों ओर। घन (बादलों) को निदरकर (तुच्छ कर) निशान (नगाड़े) गम्भीर। अपनी-पराई — कुछ कानों में सुनाई नहीं।
अंग्रेज़ी अनुवाद देखेंअंग्रेज़ी अनुवाद
Elephants trumpeted and bells clanged fearfully; the din of chariots and neighing of horses resounded everywhere. Drums thundered so loud they shamed the clouds; no one could hear anything, their own or others'.
Chaupai2 / 5
महा भीर भूपति के द्वारें। रज होइ जाइ पषान पबारें।।
चढ़ी अटारिन्ह देखहिं नारीं। लिंएँ आरती मंगल थारी।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
भूपति (राजा) के द्वार पर भारी भीड़। पत्थर पबारे (रौंदे जाकर) रज (धूल) हो जाएँ। अटारियों (छतों) पर चढ़कर नारियाँ देखतीं — आरती-मंगल-थाल लिए।
अंग्रेज़ी अनुवाद देखेंअंग्रेज़ी अनुवाद
There was a great crush at the king's gate; even stones would turn to dust under the trampling. Women watched from the rooftops, holding auspicious trays and lamps for the ceremony.
Chaupai3 / 5
गावहिं गीत मनोहर नाना। अति आनंदु न जाइ बखाना।।
तब सुमंत्र दुइ स्पंदन साजी। जोते रबि हय निंदक बाजी।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
नाना मनोहर गीत गातीं — अत्यन्त आनन्द — वर्णन नहीं हो सकता। तब सुमन्त्र ने दो स्पन्दन (रथ) सजाए — रवि (सूर्य) के अश्वों को निन्दक (लजाने वाले) घोड़े जोते।
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They sang many delightful songs; the joy was beyond description. Then Sumantra prepared two chariots, yoking horses that put the sun's steeds to shame.
Chaupai4 / 5
दोउ रथ रुचिर भूप पहिं आने। नहिं सारद पहिं जाहिं बखाने।।
राज समाजु एक रथ साजा। दूसर तेज पुंज अति भ्राजा।।
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दोनों रुचिर (सुन्दर) रथ भूप (राजा) के पास लाए — शारदा (सरस्वती) के पास भी वर्णन नहीं जाता। एक रथ में राज-समाज (राजसी सामान) सजाया — दूसरा तेजपुञ्ज (तेज-राशि) — अत्यन्त दीप्तिमान।
अंग्रेज़ी अनुवाद देखेंअंग्रेज़ी अनुवाद
He brought both splendid chariots before the king; even Sharada could not describe them. One chariot was fitted out with royal regalia; the other blazed with brilliant splendor.
Doha5 / 5
तेहिं रथ रुचिर बसिष्ठ कहुँ हरषि चढ़ाइ नरेसु।
आपु चढ़ेउ स्पंदन सुमिरि हर गुर गौरि गनेसु।।301।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
उस रुचिर (सुन्दर) रथ पर वसिष्ठ को — हर्षित होकर नरेश (राजा) ने चढ़ाया। आपु (स्वयं) स्पन्दन (रथ) पर चढ़े — हर (शिव), गुर (गुरु), गौरी (पार्वती), गणेश का स्मरण करके।
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On that resplendent chariot, the king joyfully seated Vasishtha. He himself mounted his chariot, invoking Shiva, Guru, Gauri, and Ganesha.