बालकाण्ड
दोहा 307
5 पद
Chaupai1 / 5
निज निज बास बिलोकि बराती। सुर सुख सकल सुलभ सब भाँती।।
बिभव भेद कछु कोउ न जाना। सकल जनक कर करहिं बखाना।।
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अपना-अपना वास (निवास) देखकर बाराती — सुर (देवता)-सुख सकल सुलभ, सब भाँति। विभव-भेद (ऐश्वर्य का अन्तर) कुछ कोई नहीं जाना — सब जनक का बखान (प्रशंसा) करते।
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Surveying their quarters, the wedding guests found all heavenly comforts easily available in every way. No one could tell the difference from reality; everyone sang praises of Janaka.
Chaupai2 / 5
सिय महिमा रघुनायक जानी। हरषे हृदयँ हेतु पहिचानी।।
पितु आगमनु सुनत दोउ भाई। हृदयँ न अति आनंदु अमाई।।
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सीता-महिमा रघुनायक ने जानी — हृदय में हर्षित — हेतु (कारण) पहचानकर। पिता-आगमन सुनकर दोनों भाई — हृदय में अत्यन्त आनन्द — अमाई (समाता) नहीं।
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The Lord of the Raghus knew it was Sita's glory; he rejoiced in his heart, recognizing the cause. Hearing of their father's arrival, both brothers could not contain the immense joy in their hearts.
Chaupai3 / 5
सकुचन्ह कहि न सकत गुरु पाहीं। पितु दरसन लालचु मन माहीं।।
बिस्वामित्र बिनय बड़ि देखी। उपजा उर संतोषु बिसेषी।।
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सकुचाते — गुरु-पास नहीं कह सकते। पिता-दर्शन की लालसा मन में। विश्वामित्र ने बड़ी विनय (विनम्रता) देखी — उर (हृदय) में विशेष सन्तोष उपजा।
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They felt shy and could not speak of it before the guru, yet their hearts longed to see their father. Seeing Vishwamitra's great humility, special satisfaction arose in his heart.
Chaupai4 / 5
हरषि बंधु दोउ हृदयँ लगाए। पुलक अंग अंबक जल छाए।।
चले जहाँ दसरथु जनवासे। मनहुँ सरोबर तकेउ पिआसे।।
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हर्षित होकर दोनों बन्धुओं (भाइयों) को हृदय से लगाया — पुलकित अंग, अम्बक (नेत्रों) में जल छाया। चले — जहाँ दशरथ जनवासे (अतिथि-गृह में) — मानो प्यासे ने सरोवर ताका।
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Joyfully, the sage embraced both brothers to his heart; their bodies thrilled and their eyes filled with tears. They went to where Dasharatha was in the guest quarters, like thirsty men rushing toward a lake.
Doha5 / 5
भूप बिलोके जबहिं मुनि आवत सुतन्ह समेत।
उठे हरषि सुखसिंधु महुँ चले थाह सी लेत।।307।।
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जब भूप (राजा) ने देखा — मुनि आते, पुत्रों समेत। हर्षित उठे — सुखसिन्धु (सुख-सागर) में — मानो थाह (तल) लेते चले।
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When the king saw the sage approaching with his sons, he rose in joy—as if finding firm ground in an ocean of happiness.