बालकाण्ड
दोहा 310
5 पद
Chaupai1 / 5
जनक सुकृत मूरति बैदेही। दसरथ सुकृत रामु धरें देही।।
इन्ह सम काँहु न सिव अवराधे। काहिं न इन्ह समान फल लाधे।।
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(नगरवासी कहते) जनक-सुकृत (पुण्य)-मूर्ति बैदेही (सीता)। दशरथ-सुकृत (पुण्य) राम — देह धारे। इन-सम किसी ने शिव नहीं आराधे (पूजे)। किसी को इन-समान फल नहीं मिले।
अंग्रेज़ी अनुवाद देखेंअंग्रेज़ी अनुवाद
Vaidehi is the embodiment of Janaka's merit; Rama is Dasharatha's merit incarnate. No one has worshipped Shiva as these have; none has obtained such fruit as these have gained.
Chaupai2 / 5
इन्ह सम कोउ न भयउ जग माहीं। है नहिं कतहूँ होनेउ नाहीं।।
हम सब सकल सुकृत कै रासी। भए जग जनमि जनकपुर बासी।।
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(नगरवासी कहते) इन-सम जग (संसार) में कोई न हुआ — न है कहीं — न होगा। हम सब — सकल सुकृत (पुण्य) की राशि — जग में जन्मकर जनकपुर (मिथिला) वासी हुए।
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None like them has been in the world, nor is there anywhere, nor ever will be. We ourselves are the sum of all our good deeds, having been born in this world as residents of Janakpur.
Chaupai3 / 5
जिन्ह जानकी राम छबि देखी। को सुकृती हम सरिस बिसेषी।।
पुनि देखब रघुबीर बिआहू। लेब भली बिधि लोचन लाहू।।
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(नगरवासी कहते) जिन्होंने जानकी-राम-छबि (सौन्दर्य) देखी — कौन सुकृती (पुण्यवान) हमसे विशेष (अधिक)? फिर रघुवीर-विवाह देखेंगे — भली विधि (अच्छी तरह) लोचन (नेत्रों) का लाभ लेंगे।
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We who have beheld the beauty of Janaki and Rama—who is more fortunate than us? We shall yet see the wedding of Raghubira and fully reap the reward of our eyes.
Chaupai4 / 5
कहहिं परसपर कोकिलबयनीं। एहि बिआहँ बड़ लाभु सुनयनीं।।
बड़ें भाग बिधि बात बनाई। नयन अतिथि होइहहिं दोउ भाई।।
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परस्पर कोकिलवयनी (कोयल-जैसी वाणी वाली) कहतीं — (कहतीं) इस विवाह में बड़ा लाभ, सुनयनी (सुन्दर नेत्रों वाली)! बड़े भाग्य से विधि (ब्रह्मा) ने बात बनाई — नयन-अतिथि (आँखों के मेहमान) होंगे दोनों भाई।
अंग्रेज़ी अनुवाद देखेंअंग्रेज़ी अनुवाद
The sweet-voiced women say to each other: "In this wedding, there is great gain, O bright-eyed one! By great good fortune, Brahma has arranged things so that both brothers will be guests to our eyes."
Doha5 / 5
बारहिं बार सनेह बस जनक बोलाउब सीय।
लेन आइहहिं बंधु दोउ कोटि काम कमनीय।।310।।
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(नारियाँ कहतीं) बार-बार स्नेहवश जनक सीता को बुलाएँगे। लेने दोनों बन्धु आएँगे — कोटि (करोड़ों) काम (कामदेव) कमनीय (सुन्दर)।
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"Again and again, out of affection, Janaka will summon Sita, and both brothers—lovely as ten million Kamadevas—will come to fetch her."