बालकाण्ड
दोहा 311
6 पद
Chaupai1 / 6
बिबिध भाँति होइहि पहुनाई। प्रिय न काहि अस सासुर माई।।
तब तब राम लखनहि निहारी। होइहहिं सब पुर लोग सुखारी।।
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(नारियाँ कहतीं) विविध भाँति पहुनाई (अतिथि-सत्कार) होगी — ऐसी सासुर-माई (सास-ससुराल) किसे प्रिय नहीं? तब-तब राम-लक्ष्मण को निहारकर — सब पुर (नगर) लोग सुखी होंगे।
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"There will be hospitality of many kinds; who does not love such in-laws? Whenever they gaze upon Rama and Lakshmana, all the people of the city will be delighted."
Chaupai2 / 6
सखि जस राम लखनकर जोटा। तैसेइ भूप संग दुइ ढोटा।।
स्याम गौर सब अंग सुहाए। ते सब कहहिं देखि जे आए।।
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(नारियाँ कहतीं) सखि! जैसी राम-लक्ष्मण की जोड़ी — वैसे ही भूप (राजा) के संग दो ढोटा (पुत्र)। श्याम (साँवले)-गौर (गोरे) — सब अंग सुहावने — जो आकर देखे — वे सब कहते।
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"Friend, just as Rama and Lakshmana are a perfect pair, so the king has two similar boys with him." All who came and saw them said: "Dark and fair, beautiful in every limb."
Chaupai3 / 6
कहा एक मैं आजु निहारे। जनु बिरंचि निज हाथ सँवारे।।
भरतु रामही की अनुहारी। सहसा लखि न सकहिं नर नारी।।
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(एक नारी ने कहा) आज मैंने जो निहारे — मानो विरञ्चि (ब्रह्मा) ने निज (अपने) हाथ सँवारे। भरत — राम ही की अनुहारी (अनुसरण करने वाले = सदृश)। सहसा (अचानक) लखकर नर-नारी नहीं पहचान सकते।
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One said: "I have seen them today—as if Brahma fashioned them with his own hands. Bharata resembles Rama so closely that men and women cannot tell them apart at a glance."
Chaupai4 / 6
लखनु सत्रुसूदनु एकरूपा। नख सिख ते सब अंग अनूपा।।
मन भावहिं मुख बरनि न जाहीं। उपमा कहुँ त्रिभुवन कोउ नाहीं।।
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(नारी ने कहा) लक्ष्मण-शत्रुसूदन (शत्रुघ्न) एकरूप (एक-जैसे)। नख (पैर) से शिख (शिखा) तक — सब अंग अनूप (अनुपम)। मन भावते — मुख से वर्णन नहीं। उपमा (तुलना) कहूँ — त्रिभुवन (तीनों लोकों) में कोई नहीं।
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"Lakshmana and Shatrughna are identical in form; from head to toe, every limb is incomparable. They please the mind but cannot be described by mouth; there is no comparison for them in the three worlds."
Chhand5 / 6
उपमा न कोउ कह दास तुलसी कतहुँ कबि कोबिद कहैं।
बल बिनय बिद्या सील सोभा सिंधु इन्ह से एइ अहैं।।
पुर नारि सकल पसारि अंचल बिधिहि बचन सुनावहीं।।
ब्याहिअहुँ चारिउ भाइ एहिं पुर हम सुमंगल गावहीं।।
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(तुलसीदास कहते हैं) उपमा (तुलना) कोई नहीं — कहीं कवि-कोविद (विद्वान) कहें। बल, विनय, विद्या, शील, शोभा — सिन्धु (सागर) — इन-से ये ही हैं। पुर (नगर) नारियाँ सकल — अंचल (पल्लू) पसारकर — विधि (ब्रह्मा) को वचन सुनातीं। (प्रार्थना) चारों भाई इसी पुर (नगर) में ब्याहें — हम सुमंगल गाएँ।
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Says the servant Tulasidas, there is no comparison—let poets and scholars say what they will. These are the very oceans of strength, humility, learning, virtue, and beauty. All the women of the city spread their garment-ends and address their prayer to Brahma: "May all four brothers be married in this city, and we shall sing songs of joy!"
Soratha6 / 6
कहहिं परस्पर नारि बारि बिलोचन पुलक तन।
सखि सबु करब पुरारि पुन्य पयोनिधि भूप दोउ।।311।।
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परस्पर नारियाँ कहतीं — बारि (जल) बिलोचन (नेत्रों में), पुलकित तन (शरीर)। (कहतीं) सखि! सब करेंगे पुरारि (शिवजी) — पुण्य-पयोनिधि (पुण्य-सागर) दोनों भूप (राजा)।
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The women say to one another, with tears in their eyes and bodies thrilling with joy: "Friend, Lord Shiva will arrange everything; both kings are oceans of merit."