बालकाण्ड
दोहा 326
9 पद
Chaupai1 / 9
जसि रघुबीर ब्याह बिधि बरनी। सकल कुअँर ब्याहे तेहिं करनी।।
कहि न जाइ कछु दाइज भूरी। रहा कनक मनि मंडपु पूरी।।
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जैसी रघुवीर-विवाह-विधि वर्णी — सकल कुँवर (राजकुमार) उसी करनी (रीति) से ब्याहे। कुछ कहा नहीं जाता — भूरी (बहुत) दहेज। कनक (सोना)-मणि से मण्डप पूरा भरा।
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As the wedding rites of Rama were described, exactly the same were performed for all the princes. The dowry was immense beyond words; the pavilion was filled with gold and gems.
Chaupai2 / 9
कंबल बसन बिचित्र पटोरे। भाँति भाँति बहु मोल न थोरे।।
गज रथ तुरग दास अरु दासी। धेनु अलंकृत कामदुहा सी।।
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कम्बल, वसन (वस्त्र), विचित्र पटोरे (बहुमूल्य वस्त्र) — भाँति-भाँति, बहुत — मोल (मूल्य) कम नहीं। गज (हाथी), रथ, तुरग (घोड़े), दास और दासी — धेनु (गाय) अलंकृत — कामधेनु-सी।
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Blankets, garments, exquisite brocades—costly in many ways and varieties. Elephants, chariots, horses, male and female servants, and bejeweled cows like the wish-fulfilling Kamadhenu.
Chaupai3 / 9
बस्तु अनेक करिअ किमि लेखा। कहि न जाइ जानहिं जिन्ह देखा।।
लोकपाल अवलोकि सिहाने। लीन्ह अवधपति सबु सुखु माने।।
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अनेक वस्तुएँ — लेखा (गिनती) कैसे करें? कहा नहीं जाता — जिन्होंने देखा, वे जानते। लोकपाल (इन्द्रादि) देखकर सिहाने (ईर्ष्या करते)। अवधपति (दशरथ) ने सब सुखपूर्वक लिया।
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How can one count the countless articles? They cannot be described; only those who saw them know. Even the world-guardians gazed with envy. The King of Ayodhya accepted everything graciously.
Chaupai4 / 9
दीन्ह जाचकन्हि जो जेहि भावा। उबरा सो जनवासेहिं आवा।।
तब कर जोरि जनकु मृदु बानी। बोले सब बरात सनमानी।।
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याचकों को जो जिसे भाया — वह दिया। उबरा (बचा) जनवासे (अतिथि-गृह) में आया। तब हाथ जोड़कर जनक मृदु (कोमल) वाणी — सब बारात सम्मानकर बोले।
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He gave to each supplicant whatever they desired; the surplus went back to the guest quarters. Then Janaka, with folded hands, spoke gentle words, honoring the entire wedding party.
Chhand5 / 9
सनमानि सकल बरात आदर दान बिनय बड़ाइ कै।
प्रमुदित महा मुनि बृंद बंदे पूजि प्रेम लड़ाइ कै।।
सिरु नाइ देव मनाइ सब सन कहत कर संपुट किएँ।
सुर साधु चाहत भाउ सिंधु कि तोष जल अंजलि दिएँ।।1।।
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सकल बारात सम्मान — आदर-दान-विनय-बड़ाई करके। प्रमुदित महामुनिवृन्द (समूह) वन्दे (नमस्कार किए) — पूजकर प्रेम लड़ाकर (जताकर)। सिर नवाकर, देव मनाकर — सबसे कर-सम्पुट (हाथ जोड़कर) कहते। (जनक ने कहा) सुर-साधु चाहते भाव (प्रेम) — सिन्धु (सागर) को क्या तोष (सन्तुष्टि) — जल-अंजलि दिए? हाथ जोड़कर जनक फिर बन्धु (भाई कुशध्वज) समेत कोसलराज (दशरथ) से — मनोहर वचन बोले — स्नेह-शील-सुभाव से सने। (जनक ने कहा) सम्बन्ध, राजन्! आपसे — हम बड़े — अब सब विधि हुए। यह राज-साज (वैभव) समेत सेवक जानें — बिना गथ (सम्पत्ति) लिए। ये दारिका (पुत्रियाँ) — परिचारिका (सेविका) करके — करुणा नई (नयी) — पालना। अपराध क्षमा करना — बहुत मैंने ढीठाई (धृष्टता) की — कहकर भेजा। फिर भानुकुलभूषण (सूर्यवंश-भूषण दशरथ) ने — सकल सम्मान-निधि समधी (ससुर जनक) किए। विनती परस्पर — कहा नहीं जाती — प्रेम-परिपूर्ण हृदय। वृन्दारका-गण (देवता-समूह) सुमन (फूल) बरसाते — राजा जनवास चले। दुन्दुभी (नगाड़े), 'जय' ध्वनि, वेद-ध्वनि — नभ-नगर में भले कौतूहल। तब सखियों ने मंगल-गान करते — मुनीश-आज्ञा पाकर — दूल्हा-दुल्हनियों सहित — सुन्दरियाँ कोहबर (कोहबर = गृहप्रवेश-कक्ष) ले गईं।
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Having honored the entire wedding party with respect, gifts, humility, and praise, he joyfully bowed to the great sages, worshipping them with overflowing love. Bowing his head, he propitiated the gods and addressed everyone with palms joined: "Can gods and saints be pleased with a mere handful of water offered to the ocean of goodwill?" With folded hands, Janaka again addressed the King of Kosala along with his kinsmen, in charming words steeped in affection, virtue, and grace: "O King, by your alliance I have become great in every way. Please consider this kingdom, its wealth, and me as your servant, freely taken without price." "These girls—please treat them as maidservants and raise them with fresh compassion. Forgive their faults; I have been very presumptuous in sending them forth." Then the Ornament of the Solar Race treated his in-law with every honor. The mutual courtesies cannot be told; both hearts were brimming with love. Hosts of gods showered flowers as the king proceeded to the guest quarters. Drums, victory-cries, Vedic chanting, and festive excitement filled the sky and city. Then the friends, singing auspicious songs on the sage's command, led the grooms together with their brides to the nuptial chamber.
Chhand6 / 9
कर जोरि जनकु बहोरि बंधु समेत कोसलराय सों।
बोले मनोहर बयन सानि सनेह सील सुभाय सों।।
संबंध राजन रावरें हम बड़े अब सब बिधि भए।
एहि राज साज समेत सेवक जानिबे बिनु गथ लए।।2।।
Chhand7 / 9
ए दारिका परिचारिका करि पालिबीं करुना नई।
अपराधु छमिबो बोलि पठए बहुत हौं ढीट्यो कई।।
पुनि भानुकुलभूषन सकल सनमान निधि समधी किए।
कहि जाति नहिं बिनती परस्पर प्रेम परिपूरन हिए।।3।।
Chhand8 / 9
बृंदारका गन सुमन बरिसहिं राउ जनवासेहि चले।
दुंदुभी जय धुनि बेद धुनि नभ नगर कौतूहल भले।।
तब सखीं मंगल गान करत मुनीस आयसु पाइ कै।
दूलह दुलहिनिन्ह सहित सुंदरि चलीं कोहबर ल्याइ कै।।4।।
Doha9 / 9
पुनि पुनि रामहि चितव सिय सकुचति मनु सकुचै न।
हरत मनोहर मीन छबि प्रेम पिआसे नैन।।326।।
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बार-बार राम को सीता देखतीं — सकुचातीं — मन सकुचाता नहीं। मनोहर मीन (मछली)-छबि (शोभा) हरते — प्रेम-प्यासे नैन (नेत्र)।
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Again and again Sita gazed at Rama, shy yet her heart not shy at all. Her love-thirsty eyes, stealing the beauty of lovely fish, could not look away.