बालकाण्ड
दोहा 332
5 पद
Chaupai1 / 5
जनक सनेहु सीलु करतूती। नृपु सब भाँति सराह बिभूती।।
दिन उठि बिदा अवधपति मागा। राखहिं जनकु सहित अनुरागा।।
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जनक का स्नेह, शील (सदाचार), करतूती (कर्म) — नृप (दशरथ) सब भाँति विभूति (वैभव) सराहते। दिन उठकर (रोज) अवधपति (दशरथ) विदा माँगते — जनक अनुराग (प्रेम) सहित रोकते।
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The king praised Janaka's affection, virtue, and munificence in every way. Each day, the King of Ayodhya would ask leave to depart, but Janaka would lovingly hold him back.
Chaupai2 / 5
नित नूतन आदरु अधिकाई। दिन प्रति सहस भाँति पहुनाई।।
नित नव नगर अनंद उछाहू। दसरथ गवनु सोहाइ न काहू।।
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नित नूतन (रोज नया) आदर अधिकाई (बढ़ता) — दिन-प्रति सहस (हजारों) भाँति पहुनाई (अतिथि-सत्कार)। नित नव (रोज नया) नगर-आनन्द-उछाह (उत्साह) — दशरथ का जाना किसी को सोहाता (अच्छा लगता) नहीं।
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Each day brought new and greater hospitality, with a thousand forms of entertainment daily. Each day brought new joy and celebration to the city; no one wanted Dasharatha to leave.
Chaupai3 / 5
बहुत दिवस बीते एहि भाँती। जनु सनेह रजु बँधे बराती।।
कौसिक सतानंद तब जाई। कहा बिदेह नृपहि समुझाई।।
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बहुत दिवस इस भाँति बीते — मानो स्नेह-रज्जु (प्रेम-रस्सी) से बाराती बँधे। कौशिक (विश्वामित्र)-शतानन्द तब जाकर — विदेह (जनक) नृप को समझाकर कहा।
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Many days passed in this manner; the wedding party seemed bound by cords of affection. Then Kaushika and Shatananda went and counseled King Videha.
Chaupai4 / 5
अब दसरथ कहँ आयसु देहू। जद्यपि छाड़ि न सकहु सनेहू।।
भलेहिं नाथ कहि सचिव बोलाए। कहि जय जीव सीस तिन्ह नाए।।
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(मुनियों ने कहा) अब दशरथ को आज्ञा दो — यद्यपि स्नेह छोड़ नहीं सकते। (जनक ने कहा) भलेहीं, नाथ! — सचिव (मन्त्री) बुलाए — 'जय-जीव' कहकर उन्होंने सिर नवाया।
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"Now give Dasharatha leave to depart, though you cannot let go of your love." "Very well, my lord," said the king, and summoned his ministers. They came and bowed, saying "Victory and long life!"
Doha5 / 5
अवधनाथु चाहत चलन भीतर करहु जनाउ।
भए प्रेमबस सचिव सुनि बिप्र सभासद राउ।।332।।
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(जनक ने सचिवों से कहा) अवधनाथ (दशरथ) चलना चाहते — भीतर (अन्तःपुर में) जनाओ (सूचित करो)। प्रेमवश हुए — सुनकर सचिव, विप्र (ब्राह्मण), सभासद (दरबारी) और राजा।
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"The Lord of Ayodhya wishes to depart; make the announcement within." Hearing this, the ministers, the Brahmins, the courtiers, and the king himself became overwhelmed with emotion.