बालकाण्ड
दोहा 333
5 पद
Chaupai1 / 5
पुरबासी सुनि चलिहि बराता। बूझत बिकल परस्पर बाता।।
सत्य गवनु सुनि सब बिलखाने। मनहुँ साँझ सरसिज सकुचाने।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
पुरवासी (नगरवासी) सुनकर — बारात चलेगी — परस्पर व्याकुल बात पूछते। सत्य गमन (जाना) सुनकर सब बिलखाए (दुखी) — मानो साँझ (सन्ध्या) में सरसिज (कमल) सकुचाए (मुरझाए)।
अंग्रेज़ी अनुवाद देखेंअंग्रेज़ी अनुवाद
The citizens, hearing the wedding party would depart, anxiously asked each other. When the departure was confirmed, all were grieved—like lotuses wilting at dusk.
Chaupai2 / 5
जहँ जहँ आवत बसे बराती। तहँ तहँ सिद्ध चला बहु भाँती।।
बिबिध भाँति मेवा पकवाना। भोजन साजु न जाइ बखाना।।
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जहाँ-जहाँ आकर बाराती बसे — वहाँ-वहाँ बहुत भाँति सिद्ध (सामान) भेजा। विविध भाँति मेवा-पकवान — भोजन-साज वर्णन नहीं हो सकता।
अंग्रेज़ी अनुवाद देखेंअंग्रेज़ी अनुवाद
Wherever the wedding guests had stayed, provisions of many kinds were sent. All manner of sweets and delicacies were prepared; the feast arrangements defy description.
Chaupai3 / 5
भरि भरि बसहँ अपार कहारा। पठई जनक अनेक सुसारा।।
तुरग लाख रथ सहस पचीसा। सकल सँवारे नख अरु सीसा।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
अपार कहार (बोझा ढोने वाले) भर-भरकर बसहँ (बोझ ले चले) — जनक ने अनेक सुसार (श्रेष्ठ सामान) भेजा। लाख तुरग (घोड़े), पच्चीस हजार रथ — सकल नख (पैर) से सीस (सिर) तक सँवारे।
अंग्रेज़ी अनुवाद देखेंअंग्रेज़ी अनुवाद
Countless porters carried loads on shoulder-poles; Janaka sent abundant supplies. A hundred thousand horses, twenty-five thousand chariots—all decorated from hoof to head.
Chaupai4 / 5
मत्त सहस दस सिंधुर साजे। जिन्हहि देखि दिसिकुंजर लाजे।।
कनक बसन मनि भरि भरि जाना। महिषीं धेनु बस्तु बिधि नाना।।
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दस हजार मत्त (मस्त) सिन्धुर (हाथी) सजाए — जिन्हें देखकर दिशिकुंजर (दिशाओं के हाथी) लजाए। कनक (सोना), वसन (वस्त्र), मणि भर-भरकर जान (वाहन)। महिषी (भैंसें), धेनु (गाय), नाना विधि वस्तु।
अंग्रेज़ी अनुवाद देखेंअंग्रेज़ी अनुवाद
Ten thousand stately elephants were caparisoned, whose sight put the elephants of the quarters to shame. Carriages filled with gold, garments, and gems; buffaloes, cows, and goods of every kind.
Doha5 / 5
दाइज अमित न सकिअ कहि दीन्ह बिदेहँ बहोरि।
जो अवलोकत लोकपति लोक संपदा थोरि।।333।।
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अमित (अपार) दहेज — कहा नहीं जा सकता — विदेह (जनक) ने फिर दिया। जिसे देखते लोकपति (इन्द्रादि) — लोक (अपनी) सम्पदा थोड़ी (तुच्छ मानें)।
अंग्रेज़ी अनुवाद देखेंअंग्रेज़ी अनुवाद
Immeasurable dowry that cannot be described—Videha gave yet more. Looking at it, even the world-guardians would consider their own wealth insignificant.