बालकाण्ड
दोहा 349
5 पद
Chaupai1 / 5
करहिं आरती बारहिं बारा। प्रेमु प्रमोदु कहै को पारा।।
भूषन मनि पट नाना जाती।।करही निछावरि अगनित भाँती।।
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बार-बार आरती करतीं — प्रेम-प्रमोद (आनन्द) — कौन पार (सीमा) कहे? भूषण (आभूषण), मणि, पट (वस्त्र) — नाना जाति (प्रकार) — अगणित भाँति निछावरी (न्योछावर) करतीं।
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They waved the arati again and again; who can describe the extent of their love and delight? They showered gifts of ornaments, gems, garments, and countless other things in many ways.
Chaupai2 / 5
बधुन्ह समेत देखि सुत चारी। परमानंद मगन महतारी।।
पुनि पुनि सीय राम छबि देखी।।मुदित सफल जग जीवन लेखी।।
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बधुओं (बहुओं) समेत चारों सुत देखकर — माताएँ परमानन्द-मग्न। बार-बार सीता-राम-छबि (सौन्दर्य) देखकर — मुदित (प्रसन्न) — सफल (सार्थक) जग-जीवन मानतीं।
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Seeing the four sons with their brides, the mothers were immersed in supreme bliss. Gazing again and again at Sita and Rama's beauty, they considered their lives in this world truly fulfilled.
Chaupai3 / 5
सखीं सीय मुख पुनि पुनि चाही। गान करहिं निज सुकृत सराही।।
बरषहिं सुमन छनहिं छन देवा। नाचहिं गावहिं लावहिं सेवा।।
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सखियाँ सीता-मुख बार-बार देखतीं — गान करतीं — निज सुकृत (पुण्य) सराहतीं। क्षण-क्षण देवता सुमन (फूल) बरसाते — नाचते-गाते — सेवा लाते (अर्पित करते)।
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The friends gazed at Sita's face again and again, singing songs and praising their own good fortune. Every moment the gods showered flowers; they danced, sang, and rendered service.
Chaupai4 / 5
देखि मनोहर चारिउ जोरीं। सारद उपमा सकल ढँढोरीं।।
देत न बनहिं निपट लघु लागी। एकटक रहीं रूप अनुरागीं।।
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चारों मनोहर जोड़ियाँ देखकर — शारदा (सरस्वती) ने सकल उपमाएँ ढँढोरीं (खोजीं)। देने में बनती नहीं — निपट (अत्यन्त) लघु (छोटी) लगीं। एकटक (निमिष-रहित) रहीं — रूप-अनुरागी (सौन्दर्य-मग्न)।
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Seeing the four enchanting couples, Sharada searched through all her comparisons. None would do—they all seemed utterly inadequate. She remained gazing, single-eyed, captivated by their beauty.
Doha5 / 5
निगम नीति कुल रीति करि अरघ पाँवड़े देत।
बधुन्ह सहित सुत परिछि सब चलीं लवाइ निकेत।।349।।
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निगम (वेद)-नीति, कुल-रीति करके — अर्घ्य-पाँवड़े (कालीन) देतीं। बधुओं (बहुओं) सहित सुत (पुत्रों) की परिछन (आरती) कर — सब निकेत (घर) लवाकर (साथ ले) चलीं।
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Following Vedic and family customs, offering arghya and spreading carpets, the mothers welcomed the brides with the sons and led them all inside the house.