बालकाण्ड
दोहा 357
5 पद
Chaupai1 / 5
मुनि प्रसाद बलि तात तुम्हारी। ईस अनेक करवरें टारी।।
मख रखवारी करि दुहुँ भाई। गुरु प्रसाद सब बिद्या पाई।।
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(राम ने कहा) मुनि-प्रसाद (कृपा) — बलि (बलिहारी), तात! आपकी। ईश (ईश्वर) ने अनेक कर-वरे (आपत्तियाँ) टारीं (दूर कीं)। मख (यज्ञ)-रखवारी दोनों भाइयों ने की — गुरु-प्रसाद (कृपा) से सब विद्या पाई।
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"By the sage's grace and your own valor, dear son, the Lord warded off many calamities. Guarding the sacrifice, both brothers received all knowledge by the guru's grace."
Chaupai2 / 5
मुनितय तरी लगत पग धूरी। कीरति रही भुवन भरि पूरी।।
कमठ पीठि पबि कूट कठोरा। नृप समाज महुँ सिव धनु तोरा।।
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(राम ने कहा) मुनि-तिय (मुनि-पत्नी अहल्या) — पग (पैर)-धूलि लगते तरी (मुक्त हुई)। कीर्ति (यश) — भुवन (लोकों) भरकर पूरी रही। कमठ (कछुए)-पीठ, पवि (वज्र)-कूट (शिखर)-जैसा कठोर — नृप-समाज में शिव-धनु तोड़ा।
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"By the touch of your foot-dust, the sage's wife Ahalya was liberated; your fame has spread through all the worlds. On Shiva's bow, hard as the back of a tortoise or the edge of a thunderbolt, you exerted your might in the assembly of kings."
Chaupai3 / 5
बिस्व बिजय जसु जानकि पाई। आए भवन ब्याहि सब भाई।।
सकल अमानुष करम तुम्हारे। केवल कौसिक कृपाँ सुधारे।।
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(राम ने कहा) विश्वविजय-यश — जानकी पाई। सब भाई ब्याहकर भवन (घर) आए। सकल अमानुष (अलौकिक) कर्म आपके — केवल कौशिक (विश्वामित्र)-कृपा से सुधारे।
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"Having won world-conquering glory and won Janaki, all the brothers came home married. All your superhuman deeds were accomplished solely by the grace of Kaushika."
Chaupai4 / 5
आजु सुफल जग जनमु हमारा। देखि तात बिधुबदन तुम्हारा।।
जे दिन गए तुम्हहि बिनु देखें। ते बिरंचि जनि पारहिं लेखें।।
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(राम ने कहा) आज सफल जग-जन्म हमारा — तात! तुम्हारा विधुबदन (चन्द्रमुख) देखकर। जो दिन तुम्हें बिना देखे बीते — वे विरञ्चि (ब्रह्मा) लेखे (गिनती) में न डालें।
अंग्रेज़ी अनुवाद देखेंअंग्रेज़ी अनुवाद
"Today our birth in this world is truly rewarded, seeing your moon-like face, dear son. The days that passed without seeing you—may Brahma never count them."
Doha5 / 5
राम प्रतोषीं मातु सब कहि बिनीत बर बैन।
सुमिरि संभु गुर बिप्र पद किए नीदबस नैन।।357।।
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राम ने सब माताओं को सन्तुष्ट किया — विनीत (विनम्र) श्रेष्ठ वचन कहकर। शम्भु (शिव), गुरु, विप्र (ब्राह्मण)-पद स्मरण करके — नींद-वश नयन (आँखें) बन्द किए।
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Rama pleased all his mothers with humble and gentle words. Then, meditating upon Shambhu, the guru, and the Brahmins, he closed his eyes in sleep.