बालकाण्ड
दोहा 90
5 पद
Chaupai1 / 5
सुनि बोलीं मुसकाइ भवानी। उचित कहेहु मुनिबर बिग्यानी।।
तुम्हरें जान कामु अब जारा। अब लगि संभु रहे सबिकारा।।
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सुनकर मुस्कुराकर भवानी (पार्वती) बोलीं — (कहा) उचित कहा, मुनिवर विज्ञानी! (जो तब कहा — वह सत्य)।
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Hearing this, Bhavani smiled and spoke: 'You speak rightly, O most wise sages. In your understanding, Kamadeva has only now been burnt, meaning that until now Shambhu was subject to passion.'
Chaupai2 / 5
हमरें जान सदा सिव जोगी। अज अनवद्य अकाम अभोगी।।
जौं मैं सिव सेये अस जानी। प्रीति समेत कर्म मन बानी।।
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(पार्वती ने कहा) हमारे जानने में सदा शिव — योगी। अज (अजन्मा), निर्दोष, निष्काम, निर्भोगी। यदि मैं (ऐसा मानती)।
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'But as I understand it, Shiva is ever a yogi — unborn, faultless, desireless, and beyond enjoyment. If I have served Shiva knowing him as such, with love in my actions, mind, and speech —'
Chaupai3 / 5
तौ हमार पन सुनहु मुनीसा। करिहहिं सत्य कृपानिधि ईसा।।
तुम्ह जो कहा हर जारेउ मारा। सोइ अति बड़ अबिबेकु तुम्हारा।।
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(पार्वती ने कहा) तो हमारा प्रण (व्रत) सुनो, मुनीश! कृपानिधि ईश (शिव) सत्य करेंगे। तुम (देखना)।
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'Then hear, O great sages — the compassionate Lord will make my vow come true. What you said about Hara burning Kamadeva — that itself shows your great lack of understanding.'
Chaupai4 / 5
तात अनल कर सहज सुभाऊ। हिम तेहि निकट जाइ नहिं काऊ।।
गएँ समीप सो अवसि नसाई। असि मन्मथ महेस की नाई।।
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(पार्वती ने कहा) हे तात! अग्नि का सहज स्वभाव (गर्म) — हिम (बर्फ) उसके निकट कभी नहीं जाती। गई (तो पिघल जाती)।
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'Dear sages, it is the natural property of fire that ice can never approach it. If it goes near, it is inevitably destroyed — such is the relationship between Kamadeva and Maheshwara.'
Doha5 / 5
हियँ हरषे मुनि बचन सुनि देखि प्रीति बिस्वास।।
चले भवानिहि नाइ सिर गए हिमाचल पास।।90।।
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मुनियों ने हृदय में हर्षित होकर (पार्वती के) वचन सुने — प्रीति-विश्वास देखकर। भवानी को (आशीर्वाद देकर) चले।
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The sages were delighted at heart upon hearing her words and seeing her faith and love. Bowing their heads to Bhavani, they departed and went to Himachala.