बालकाण्ड
दोहा 246
5 पद
Chaupai1 / 5
ब्यर्थ मरहु जनि गाल बजाई। मन मोदकन्हि कि भूख बुताई।।
सिख हमारि सुनि परम पुनीता। जगदंबा जानहु जियँ सीता।।
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(बुद्धिमान राजाओं ने कहा) व्यर्थ मरो — मत गाल (डींग) बजाओ। मन के मोदकों (लड्डुओं) से क्या भूख बुझती? हमारी परम पुनीत (पवित्र) शिक्षा सुनो — जगदम्बा (जगत-माता) जानो जी में सीता को।
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'Do not die in vain boasting empty words; can imaginary sweets satisfy hunger? Hear our supremely holy advice: know in your heart that Sita is the Mother of the Universe.'
Chaupai2 / 5
जगत पिता रघुपतिहि बिचारी। भरि लोचन छबि लेहु निहारी।।
सुंदर सुखद सकल गुन रासी। ए दोउ बंधु संभु उर बासी।।
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(बुद्धिमान राजाओं ने कहा) जगत-पिता रघुपति (श्रीराम) को विचारकर — लोचन (आँखें) भरकर छबि (सौन्दर्य) निहारो (देखो)। सुन्दर, सुखद, सकल गुण-राशि — ये दोनों बन्धु शम्भु (शिव) के उर (हृदय) में बसने वाले।
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'Consider Raghupati as the Father of the World, and fill your eyes beholding his beauty. These two brothers are beautiful, bliss-giving, repositories of all virtues, and they dwell in Shambhu's heart.'
Chaupai3 / 5
सुधा समुद्र समीप बिहाई। मृगजलु निरखि मरहु कत धाई।।
करहु जाइ जा कहुँ जोई भावा। हम तौ आजु जनम फलु पावा।।
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(बुद्धिमान राजाओं ने कहा) सुधा (अमृत)-समुद्र समीप छोड़कर — मृगजल (मरीचिका) निरखकर (देखकर) क्यों मरते दौड़े? जाओ, जिसे जो भाए — वह करो। हमने तो आज जन्म-फल पाया।
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'Having the ocean of nectar nearby, why do you run toward a mirage to your death? Let each one go and do as he pleases — as for us, today we have found the fruit of our lives.'
Chaupai4 / 5
अस कहि भले भूप अनुरागे। रूप अनूप बिलोकन लागे।।
देखहिं सुर नभ चढ़े बिमाना। बरषहिं सुमन करहिं कल गाना।।
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ऐसा कहकर भले भूप (राजा) अनुरागे (प्रेम-मग्न) — अनूप (अनुपम) रूप देखने लगे। देवता नभ (आकाश) में विमानों पर चढ़कर देखते — सुमन (फूल) बरसाते, कल (मधुर) गान करते।
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So saying, the good kings, filled with devotion, began gazing at Rama's matchless beauty. The gods watched from their celestial chariots in the sky, showering flowers and singing melodious songs.
Doha5 / 5
जानि सुअवसरु सीय तब पठई जनक बोलाई।
चतुर सखीं सुंदर सकल सादर चलीं लवाईं।।246।।
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सुअवसर (शुभ अवसर) जानकर सीता को तब — जनक ने बुलवा भेजा। चतुर सखियाँ — सब सुन्दर — सादर लवाकर (साथ लेकर) चलीं।
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Recognizing the auspicious moment, Janaka then sent for Sita. Surrounded by clever, beautiful companions, she was led forth with great respect.