बालकाण्ड
दोहा 275
5 पद
Chaupai1 / 5
तुम्ह तौ कालु हाँक जनु लावा। बार बार मोहि लागि बोलावा।।
सुनत लखन के बचन कठोरा। परसु सुधारि धरेउ कर घोरा।।
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(लक्ष्मण ने कहा) तुम तो काल (मृत्यु) को हाँक (पुकारकर) मानो बुलाते। बार-बार मुझसे लग बोलाते (ललकारते)। लक्ष्मण के कठोर वचन सुनकर — परसु (फरसा) सुधारकर (सँभालकर) घोर हाथ में धरा।
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'You have been beckoning Death itself, calling out to me again and again.' Hearing Lakshmana's harsh words, Parashurama gripped his terrible axe firmly in his hand.
Chaupai2 / 5
अब जनि देइ दोसु मोहि लोगू। कटुबादी बालकु बधजोगू।।
बाल बिलोकि बहुत मैं बाँचा। अब यहु मरनिहार भा साँचा।।
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(परशुराम ने कहा) अब लोग मुझे दोष न दें — कटुवादी (कड़वा बोलने वाला) बालक वधयोग्य। बाल (बालक) देखकर बहुत बार मैंने बाँचा (बचाया) — अब यह सचमुच मरने वाला हुआ।
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'Now let no one blame me — this sharp-tongued boy deserves to be killed. I spared him many times seeing he is a child, but now he truly courts death.'
Chaupai3 / 5
कौसिक कहा छमिअ अपराधू। बाल दोष गुन गनहिं न साधू।।
खर कुठार मैं अकरुन कोही। आगें अपराधी गुरुद्रोही।।
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कौशिक (विश्वामित्र) ने कहा — अपराध क्षमा करो। बाल-दोष-गुण साधु (सज्जन) नहीं गिनते। (परशुराम ने कहा) खर (तीखा) कुठार (फरसा) — मैं अकरुण (निर्दय), कोही (क्रोधी)। आगे अपराधी — गुरुद्रोही।
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Kaushika (Vishwamitra) said, 'Forgive his offense; the wise do not count the faults and virtues of children.' 'But my sharp axe is merciless and wrathful, and before me stands one who offends his guru.'
Chaupai4 / 5
उतर देत छोड़उँ बिनु मारें। केवल कौसिक सील तुम्हारें।।
न त एहि काटि कुठार कठोरें। गुरहि उरिन होतेउँ श्रम थोरें।।
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(परशुराम ने कहा) उत्तर देते छोड़ता हूँ बिना मारे — केवल कौशिक! आपके शील (सदाचार) के कारण। नहीं तो इसे काटकर कठोर कुठार (फरसे) से — गुरु (परशुराम के गुरु शिव) से उऋण होता — थोड़े श्रम में।
अंग्रेज़ी अनुवाद देखेंअंग्रेज़ी अनुवाद
'I release him without striking only because of your gentle nature, Kaushika. Otherwise, with this harsh axe I would have cut him down and easily repaid my debt to my guru.'
Doha5 / 5
गाधिसूनु कह हृदयँ हँसि मुनिहि हरिअरइ सूझ।
अयमय खाँड न ऊखमय अजहुँ न बूझ अबूझ।।275।।
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गाधिसूनु (विश्वामित्र) ने हृदय में हँसकर (सोचा) — मुनि को हरियरई (हरियाली = सरलता) सूझती। अयमय (लोहे की) खाँड (तलवार) — ऊखमय (गन्ने की) नहीं — अभी भी नहीं बूझता (समझता), अबूझ (मूर्ख)।
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The son of Gadhi (Vishwamitra) laughed inwardly and thought, 'The sage sees only green all around. This is a blade of steel, not of sugarcane — the foolish one still does not understand.'