बालकाण्ड
दोहा 330
5 पद
Chaupai1 / 5
नित नूतन मंगल पुर माहीं। निमिष सरिस दिन जामिनि जाहीं।।
बड़े भोर भूपतिमनि जागे। जाचक गुन गन गावन लागे।।
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नित नूतन (रोज नया) मंगल पुर (नगर) में — निमिष (पलक)-सरिस (समान) दिन-रात जातीं। बड़े भोर (सवेरे) भूपतिमणि (राजाओं में रत्न दशरथ) जागे — याचक (माँगने वाले) गुणगण (गुणगान) गाने लगे।
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Every day brought new festivities in the city; days and nights passed like moments. In the early morning, the jewel among kings awoke; supplicants began singing praises of his virtues.
Chaupai2 / 5
देखि कुअँर बर बधुन्ह समेता। किमि कहि जात मोदु मन जेता।।
प्रातक्रिया करि गे गुरु पाहीं। महाप्रमोदु प्रेमु मन माहीं।।
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कुँवर (राजकुमारों) को श्रेष्ठ बधुओं (बहुओं) समेत देखकर — मन का मोद (आनन्द) कैसे कहें! प्रातःक्रिया (सुबह के कर्म) करके गुरु-पास गए — महाप्रमोद (अत्यन्त आनन्द), प्रेम मन में।
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Seeing the princes with their brides, how can one express the joy in his heart? After completing his morning duties, he went to the guru with great delight and love.
Chaupai3 / 5
करि प्रनाम पूजा कर जोरी। बोले गिरा अमिअँ जनु बोरी।।
तुम्हरी कृपाँ सुनहु मुनिराजा। भयउँ आजु मैं पूरनकाजा।।
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प्रणाम-पूजा करके हाथ जोड़कर — मानो अमृत में बोरी (डुबोई) गिरा (वाणी) बोले। (दशरथ ने कहा) आपकी कृपा से — सुनो, मुनिराज! — आज मैं पूर्णकाज (सफल) हुआ।
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Bowing and joining his palms, he spoke in words drenched in nectar: "By your grace, listen O King of Sages, today I have become one whose purpose is fully accomplished."
Chaupai4 / 5
अब सब बिप्र बोलाइ गोसाईं। देहु धेनु सब भाँति बनाई।।
सुनि गुर करि महिपाल बड़ाई। पुनि पठए मुनि बृंद बोलाई।।
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(दशरथ ने कहा) अब सब विप्र (ब्राह्मण) बुलाकर, गोसाईं! — सब भाँति सजाकर धेनु (गाय) दो। गुरु ने सुनकर महीपाल (राजा) की बड़ाई (प्रशंसा) की — फिर मुनिवृन्द (समूह) बुलवा भेजे।
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"Now, my lord, summon all the Brahmins and give them cows fully adorned." Hearing this, the guru praised the king and then sent word summoning the assembly of sages.
Doha5 / 5
बामदेउ अरु देवरिषि बालमीकि जाबालि।
आए मुनिबर निकर तब कौसिकादि तपसालि।।330।।
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वामदेव और देवर्षि (नारद), वाल्मीकि, जाबालि — तब मुनिवर-निकर (समूह) आए — कौशिक (विश्वामित्र) आदि तपस्वी।
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Vamadeva, the divine sage Narada, Valmiki, Jabali—then came a host of great sages, including Kaushika and other ascetics.