बालकाण्ड
दोहा 341
5 पद
Chaupai1 / 5
मुनि मंडलिहि जनक सिरु नावा। आसिरबादु सबहि सन पावा।।
सादर पुनि भेंटे जामाता। रूप सील गुन निधि सब भ्राता।।
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मुनि-मण्डली (समूह) को जनक ने सिर नवाया — सबसे आशीर्वाद पाया। सादर फिर जामाता (दामादों) से भेंटे (मिले) — रूप-शील-गुण-निधि सब भ्राता (भाई)।
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Janaka bowed before the assembly of sages and received blessings from all. Then he affectionately embraced his sons-in-law—all four brothers, treasuries of beauty, virtue, and goodness.
Chaupai2 / 5
जोरि पंकरुह पानि सुहाए। बोले बचन प्रेम जनु जाए।।
राम करौ केहि भाँति प्रसंसा। मुनि महेस मन मानस हंसा।।
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पंकरुह (कमल) पाणि (हाथ) सुहावने जोड़कर — प्रेम से मानो जन्मे वचन बोले। (जनक ने कहा) राम! किस भाँति प्रशंसा करूँ? मुनि-महेश (शिव)-मन-मानस (सरोवर) के हंस!
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With beautiful lotus-hands joined together, he spoke words as if born of pure love: "O Rama, how can I praise you—you, the swan in the lake of Shiva's mind?"
Chaupai3 / 5
करहिं जोग जोगी जेहि लागी। कोहु मोहु ममता मदु त्यागी।।
ब्यापकु ब्रह्मु अलखु अबिनासी। चिदानंदु निरगुन गुनरासी।।
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(जनक ने कहा) जिनके लिए योगी योग करते — क्रोध-मोह-ममता-मद त्यागकर। व्यापक ब्रह्म — अलख (अदृश्य), अविनाशी। चिदानन्द — निर्गुण — गुणराशि (गुणों के भण्डार)।
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"For whose sake yogis practice yoga, renouncing anger, delusion, attachment, and pride. The all-pervading Brahman, invisible and imperishable—pure consciousness and bliss, formless yet the treasure of all virtues."
Chaupai4 / 5
मन समेत जेहि जान न बानी। तरकि न सकहिं सकल अनुमानी।।
महिमा निगमु नेति कहि कहई। जो तिहुँ काल एकरस रहई।।
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(जनक ने कहा) मन समेत जिन्हें वाणी नहीं जानती — तर्क नहीं कर सकते सकल अनुमानी (तर्कशास्त्री)। महिमा — निगम (वेद) 'नेति' कहकर कहते। जो तीनों काल (भूत-वर्तमान-भविष्य) में एकरस (अपरिवर्तनीय) रहते।
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"Whom even the mind combined with speech cannot know, whom all logic and inference cannot fathom. Whose glory even the Vedas describe only by saying 'not this, not this'; who remains the same through all three times."
Doha5 / 5
नयन बिषय मो कहुँ भयउ सो समस्त सुख मूल।
सबइ लाभु जग जीव कहँ भएँ ईसु अनुकुल।।341।।
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(जनक ने कहा) नयन-विषय (आँखों का विषय = दृश्य) मेरे लिए हुए — वही समस्त सुख-मूल (सुख का कारण)। जग (संसार) में जीव को सब लाभ — ईश (ईश्वर) अनुकूल होने पर।
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"That Supreme Being has become visible to my eyes—the root of all happiness. All gain in the world comes to a soul when the Lord becomes favorable."