बालकाण्ड
दोहा 342
5 पद
Chaupai1 / 5
सबहि भाँति मोहि दीन्हि बड़ाई। निज जन जानि लीन्ह अपनाई।।
होहिं सहस दस सारद सेषा। करहिं कलप कोटिक भरि लेखा।।
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(जनक ने कहा) सब भाँति मुझे बड़ाई (सम्मान) दी — निज जन जानकर अपनाया। सहस (हजारों) दस (दस) शारदा (सरस्वती)-शेष हों — कोटिक (करोड़ों) कल्प भर लेखा (गिनती) करें —
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"You have honored me in every way, accepting me as your own servant. Even if a thousand Sharadas and Sheshas were to write for tens of millions of kalpas,"
Chaupai2 / 5
मोर भाग्य राउर गुन गाथा। कहि न सिराहिं सुनहु रघुनाथा।।
मै कछु कहउँ एक बल मोरें। तुम्ह रीझहु सनेह सुठि थोरें।।
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(जनक ने कहा) मेरा भाग्य और आपकी गुण-गाथा — सुनो, रघुनाथ! — कहने से सिराती (समाप्त) नहीं। मैं कुछ कहता हूँ — एक बल मेरा — आप रीझते (प्रसन्न होते) अत्यन्त थोड़े स्नेह से।
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"my good fortune and the saga of your virtues, O Lord of the Raghus, could never be fully told. I dare to speak only because of one strength of mine: you are pleased with even the slightest love."
Chaupai3 / 5
बार बार मागउँ कर जोरें। मनु परिहरै चरन जनि भोरें।।
सुनि बर बचन प्रेम जनु पोषे। पूरनकाम रामु परितोषे।।
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(जनक ने कहा) बार-बार हाथ जोड़कर माँगता हूँ — मन (मेरा मन) चरणों को भूलकर भी न छोड़े। सुन्दर वचन — प्रेम से मानो पोषित (भरे) — सुनकर पूर्णकाम (सर्वसिद्ध) राम सन्तुष्ट हुए।
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"Again and again, with folded hands, I beg: may my mind never stray from your feet, even in forgetfulness." Hearing these excellent words, nurtured as if by love itself, Rama was gratified, his purpose fulfilled.
Chaupai4 / 5
करि बर बिनय ससुर सनमाने। पितु कौसिक बसिष्ठ सम जाने।।
बिनती बहुरि भरत सन कीन्ही। मिलि सप्रेमु पुनि आसिष दीन्ही।।
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श्रेष्ठ विनय करके ससुर (जनक) को सम्मानित किया — पिता, कौशिक (विश्वामित्र), वसिष्ठ-समान जाना। विनती फिर भरत से की — सप्रेम मिलकर फिर आशीर्वाद दिया।
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With fine courtesy, Rama honored his father-in-law, regarding him as equal to his father, to Kaushika, and to Vasishtha. Then he made humble entreaty to Bharata; meeting with affection, he again gave blessings.
Doha5 / 5
मिले लखन रिपुसूदनहि दीन्हि असीस महीस।
भए परस्पर प्रेमबस फिरि फिरि नावहिं सीस।।342।।
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लक्ष्मण-रिपुसूदन (शत्रुघ्न) से मिले — महीश (राजा जनक) ने आशीष दी। परस्पर प्रेमवश हुए — फिर-फिर सिर नवाते।
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He met Lakshmana and Shatrughna; the king gave blessings. Overcome with mutual love, they bowed their heads to each other again and again.