किष्किन्धाकाण्ड
श्रीरामचरितमानस — हिन्दी अर्थ और अंग्रेज़ी अनुवाद सहित
30 दोहे · 190 पद
किष्किन्धाकाण्ड में श्रीराम का हनुमान एवं सुग्रीव से मिलन, बालि वध, वानर सेना से मैत्री और सीता की खोज हेतु चारों दिशाओं में दूतों के प्रस्थान का वर्णन है।
मंगलाचरण
कुन्देन्दीवरसुन्दरावतिबलौ विज्ञानधामावुभौ
दोहा 1
आगें चले बहुरि रघुराया। रिष्यमूक परवत निअराया।।
दोहा 2
कोसलेस दसरथ के जाए । हम पितु बचन मानि बन आए।।
दोहा 3
जदपि नाथ बहु अवगुन मोरें। सेवक प्रभुहि परै जनि भोरें।।
दोहा 4
देखि पवन सुत पति अनुकूला। हृदयँ हरष बीती सब सूला।।
दोहा 5
कीन्ही प्रीति कछु बीच न राखा। लछमिन राम चरित सब भाषा।।
दोहा 6
नात बालि अरु मैं द्वौ भाई। प्रीति रही कछु बरनि न जाई।।
दोहा 7
जे न मित्र दुख होहिं दुखारी। तिन्हहि बिलोकत पातक भारी।।
दोहा 8
अस कहि चला महा अभिमानी। तृन समान सुग्रीवहि जानी।।
दोहा 9
परा बिकल महि सर के लागें। पुनि उठि बैठ देखि प्रभु आगें।।
दोहा 10
सुनत राम अति कोमल बानी। बालि सीस परसेउ निज पानी।।
दोहा 11
राम बालि निज धाम पठावा। नगर लोग सब ब्याकुल धावा।।
दोहा 12
उमा राम सम हित जग माहीं। गुरु पितु मातु बंधु प्रभु नाहीं।।
दोहा 13
सुंदर बन कुसुमित अति सोभा। गुंजत मधुप निकर मधु लोभा।।
दोहा 14
घन घमंड नभ गरजत घोरा। प्रिया हीन डरपत मन मोरा।।
दोहा 15
दादुर धुनि चहु दिसा सुहाई। बेद पढ़हिं जनु बटु समुदाई।।
दोहा 16
बरषा बिगत सरद रितु आई। लछिमन देखहु परम सुहाई।।
दोहा 17
सुखी मीन जे नीर अगाधा। जिमि हरि सरन न एकउ बाधा।।
दोहा 18
बरषा गत निर्मल रितु आई। सुधि न तात सीता कै पाई।।
दोहा 19
इहाँ पवनसुत हृदयँ बिचारा। राम काजु सुग्रीवँ बिसारा।।
दोहा 20
चरन नाइ सिरु बिनती कीन्ही। लछिमन अभय बाँह तेहि दीन्ही।।
दोहा 21
नाइ चरन सिरु कह कर जोरी। नाथ मोहि कछु नाहिन खोरी।।
दोहा 22
बानर कटक उमा में देखा। सो मूरुख जो करन चह लेखा।।
दोहा 23
सुनहु नील अंगद हनुमाना। जामवंत मतिधीर सुजाना।।
दोहा 24
कतहुँ होइ निसिचर सैं भेटा। प्रान लेहिं एक एक चपेटा।।
दोहा 25
दूरि ते ताहि सबन्हि सिर नावा। पूछें निज बृत्तांत सुनावा।।
दोहा 26
इहाँ बिचारहिं कपि मन माहीं। बीती अवधि काज कछु नाहीं।।
दोहा 27
एहि बिधि कथा कहहि बहु भाँती गिरि कंदराँ सुनी संपाती।।
दोहा 28
अनुज क्रिया करि सागर तीरा। कहि निज कथा सुनहु कपि बीरा।।
दोहा 29
जो नाघइ सत जोजन सागर । करइ सो राम काज मति आगर ।।
दोहा 30
अंगद कहइ जाउँ मैं पारा। जियँ संसय कछु फिरती बारा।।