अरण्यकाण्ड
श्रीरामचरितमानस — हिन्दी अर्थ और अंग्रेज़ी अनुवाद सहित
46 दोहे · 328 पद
अरण्यकाण्ड में श्रीराम का दण्डकवन में ऋषियों से मिलन, शूर्पणखा प्रसंग, मारीच का स्वर्ण मृग, रावण द्वारा सीताहरण, जटायु का बलिदान तथा शबरी पर कृपा का वर्णन है।
मंगलाचरण
मूलं धर्मतरोर्विवेकजलधेः पूर्णेन्दुमानन्ददं
दोहा 1
पुर नर भरत प्रीति मैं गाई। मति अनुरूप अनूप सुहाई।।
दोहा 2
प्रेरित मंत्र ब्रह्मसर धावा। चला भाजि बायस भय पावा।।
दोहा 3
रघुपति चित्रकूट बसि नाना। चरित किए श्रुति सुधा समाना।।
दोहा 4
नमामि भक्त वत्सलं। कृपालु शील कोमलं।।
दोहा 5
अनुसुइया के पद गहि सीता। मिली बहोरि सुसील बिनीता।।
दोहा 6
सुनि जानकीं परम सुखु पावा। सादर तासु चरन सिरु नावा।।
दोहा 7
मुनि पद कमल नाइ करि सीसा। चले बनहि सुर नर मुनि ईसा।।
दोहा 8
कह मुनि सुनु रघुबीर कृपाला। संकर मानस राजमराला।।
दोहा 9
अस कहि जोग अगिनि तनु जारा। राम कृपाँ बैकुंठ सिधारा।।
दोहा 10
मुनि अगस्ति कर सिष्य सुजाना। नाम सुतीछन रति भगवाना।।
दोहा 11
कह मुनि प्रभु सुनु बिनती मोरी। अस्तुति करौं कवन बिधि तोरी।।
दोहा 12
एवमस्तु करि रमानिवासा। हरषि चले कुभंज रिषि पासा।।
दोहा 13
तब रघुबीर कहा मुनि पाहीं। तुम्ह सन प्रभु दुराव कछु नाही।।
दोहा 14
जब ते राम कीन्ह तहँ बासा। सुखी भए मुनि बीती त्रासा।।
दोहा 15
थोरेहि महँ सब कहउँ बुझाई। सुनहु तात मति मन चित लाई।।
दोहा 16
धर्म तें बिरति जोग तें ग्याना। ग्यान मोच्छप्रद बेद बखाना।।
दोहा 17
भगति जोग सुनि अति सुख पावा। लछिमन प्रभु चरनन्हि सिरु नावा।।
दोहा 18
नाक कान बिनु भइ बिकरारा। जनु स्त्रव सैल गैरु कै धारा।।
दोहा 19
प्रभु बिलोकि सर सकहिं न डारी। थकित भई रजनीचर धारी।।
दोहा 20
तब चले जान बबान कराल। फुंकरत जनु बहु ब्याल।।
दोहा 21
जब रघुनाथ समर रिपु जीते। सुर नर मुनि सब के भय बीते।।
दोहा 22
सुनत सभासद उठे अकुलाई। समुझाई गहि बाहँ उठाई।।
दोहा 23
सुर नर असुर नाग खग माहीं। मोरे अनुचर कहँ कोउ नाहीं।।
दोहा 24
सुनहु प्रिया ब्रत रुचिर सुसीला। मैं कछु करबि ललित नरलीला।।
दोहा 25
दसमुख सकल कथा तेहि आगें। कही सहित अभिमान अभागें।।
दोहा 26
जाहु भवन कुल कुसल बिचारी। सुनत जरा दीन्हिसि बहु गारी।।
दोहा 27
तेहि बन निकट दसानन गयऊ। तब मारीच कपटमृग भयऊ।।
दोहा 28
खल बधि तुरत फिरे रघुबीरा। सोह चाप कर कटि तूनीरा।।
दोहा 29
हा जग एक बीर रघुराया। केहिं अपराध बिसारेहु दाया।।
दोहा 30
रघुपति अनुजहि आवत देखी। बाहिज चिंता कीन्हि बिसेषी।।
दोहा 31
तब कह गीध बचन धरि धीरा । सुनहु राम भंजन भव भीरा।।
दोहा 32
गीध देह तजि धरि हरि रुपा। भूषन बहु पट पीत अनूपा।।
दोहा 33
कोमल चित अति दीनदयाला। कारन बिनु रघुनाथ कृपाला।।
दोहा 34
सापत ताड़त परुष कहंता। बिप्र पूज्य अस गावहिं संता।।
दोहा 35
पानि जोरि आगें भइ ठाढ़ी। प्रभुहि बिलोकि प्रीति अति बाढ़ी।।
दोहा 36
मंत्र जाप मम दृढ़ बिस्वासा। पंचम भजन सो बेद प्रकासा।।
दोहा 37
चले राम त्यागा बन सोऊ। अतुलित बल नर केहरि दोऊ।।
दोहा 38
बिटप बिसाल लता अरुझानी। बिबिध बितान दिए जनु तानी।।
दोहा 39
गुनातीत सचराचर स्वामी। राम उमा सब अंतरजामी।।
दोहा 40
बिकसे सरसिज नाना रंगा। मधुर मुखर गुंजत बहु भृंगा।।
दोहा 41
देखि राम अति रुचिर तलावा। मज्जनु कीन्ह परम सुख पावा।।
दोहा 42
सुनहु उदार सहज रघुनायक। सुंदर अगम सुगम बर दायक।।
दोहा 43
अति प्रसन्न रघुनाथहि जानी। पुनि नारद बोले मृदु बानी।।
दोहा 44
सुनि मुनि कह पुरान श्रुति संता। मोह बिपिन कहुँ नारि बसंता।।
दोहा 45
सुनि रघुपति के बचन सुहाए। मुनि तन पुलक नयन भरि आए।।
दोहा 46
निज गुन श्रवन सुनत सकुचाहीं। पर गुन सुनत अधिक हरषाहीं।।