Kishkindha Kanda

Sarga 33: Lakshmana enters Sugriva's palace -- Sugriva requests Tara to pacify Lakshmana.

किष्किन्धाकाण्डम् · सर्ग 33

55 shlokas

ShlokaShloka 1
अथ प्रतिसमादिष्टो लक्ष्मणः परवीरहा। प्रविवेश गुहां घोरां किष्किन्धां रामशासनात्।।4.33.1।।
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किष्किन्धा के द्वार पर जो विशाल शरीरवाले महाबली वानर थे, वे सब लक्ष्मण को देख हाथ जोड़कर खड़े हो गये
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Instructed by Rama, and having been permitted, Lakshmana, the slayer of enemies entered the frightful cave of Kishkinda.
ShlokaShloka 2
द्वारस्था हरयस्तत्र महाकाया महाबलाः। बभूवुर्लक्ष्मणं दृष्ट्वा सर्वे प्राञ्जलय स्थिताः।।4.33.2।।
हिन्दी अर्थ देखें
किष्किन्धा के द्वार पर जो विशाल शरीरवाले महाबली वानर थे, वे सब लक्ष्मण को देख हाथ जोड़कर खड़े हो गये
Show English Translation
Seeing Lakshmana, the huge and mighty monkey gatekeepers stood at the entrance and greeted him with folded hands.
ShlokaShloka 3
निश्वसन्तं तु तं दृष्ट्वा क्रुद्धं दशरथात्मजम्। बभूवुर्हरयस्त्रस्ता न चैनं पर्यवारयन्।।4.33.3।।
हिन्दी अर्थ देखें
दशरथनन्दन लक्ष्मण को क्रोधपूर्वक लंबी साँस खींचते देख वे सब वानर अत्यन्त भयभीत हो गये थे। इसलिये वे उन्हें चारों ओर से घेरकर उनके साथसाथ नहीं चल सके
Show English Translation
The monkeys kept away out of fear to see the son of Dasaratha, who was angry and sighing deeply.
ShlokaShloka 4
स तां रत्नमयीं श्रीमान्दिव्यां पुष्पितकाननाम्। रम्यां रत्नसमाकीर्णां ददर्श महतीं गुहाम्।।4.33.4।।
हिन्दी अर्थ देखें
हों (धनियों की अट्टालिकाओं) तथा प्रासादों (देवमन्दिरों और राजभवनों) से वह पुरी अत्यन्तघनी दिखायी देती थी। नाना प्रकार के रत्न उसकी शोभा बढ़ाते थे। सम्पूर्ण कामनाओं को पूर्ण करने वाले फलों से युक्त खिले हुए वृक्षों से वह पुरी सुशोभित थी
Show English Translation
Lakshmana, the bestower of fortune, saw the mammoth cave inlaid with gems and precious stones and forests full of delightful flowers.
ShlokaShloka 5
हर्म्यप्रासादसम्बाधां नानापण्योपशोभिताम्। सर्वकामफलैर्वृक्षैः पुष्पितैरुपशोभिताम्।।4.33.5।।
हिन्दी अर्थ देखें
हों (धनियों की अट्टालिकाओं) तथा प्रासादों (देवमन्दिरों और राजभवनों) से वह पुरी अत्यन्तघनी दिखायी देती थी। नाना प्रकार के रत्न उसकी शोभा बढ़ाते थे। सम्पूर्ण कामनाओं को पूर्ण करने वाले फलों से युक्त खिले हुए वृक्षों से वह पुरी सुशोभित थी
Show English Translation
The palace was thronged with elevated mansions and illumined with jewels of all kinds. The trees were in bloom and the fruits satisfied every one's wish.It was splendid.
ShlokaShloka 6
देवगन्धर्वपुत्रैश्च वानरैः कामरूपिभिः। दिव्यमाल्याम्बरधरै श्शोभितां प्रियदर्शनैः।।4.33.6।।
हिन्दी अर्थ देखें
वहाँ दिव्य माला और दिव्य वस्त्र धारण करने वाले परम सुन्दर वानर, जो देवताओं और गन्धर्वो के पुत्र तथा इच्छानुसार रूप धारण करने वाले थे, निवास करते हुए उस नगरी की शोभा बढ़ाते थे
Show English Translation
The inhabitants of Kishkinda being sons of gods and gandharvas, were of beautiful appearance wearing wonderful garlands. They could change their form at their free will. They were delightful.
ShlokaShloka 7
चन्दनागरुपद्मानां गन्धैस्सुरभिगन्धिनाम्। मैरेयाणां मधूनां च सम्मोदितमहापथाम्।।4.33.7।।
हिन्दी अर्थ देखें
वहाँ चन्दन, अगर और कमलों की मनोहर सुगन्ध छा रही थी। उस पुरी की लंबी-चौड़ी सड़कें भी मैरेय तथा मधु के आमोद से महक रही थीं
Show English Translation
The royal roads were filled with fragrant unguents, like sandal, agaru and lotus incenses, finesmelling honey of several kinds and happy inhabitants.
ShlokaShloka 8
विन्ध्यमेरुगिरिप्रख्यै: प्रासादैर्नैकभूमिभिः। ददर्श गिरिनद्यश्च विमलास्तत्र राघवः।।4.33.8।।
हिन्दी अर्थ देखें
उस पुरी में विन्ध्याचल तथा मेरु के समान ऊँचे ऊँचे महल बने थे, जो कई मंजिलके थे। लक्ष्मण ने उस गुफा के निकट ही निर्मल जल से भरी हुई पहाड़ी नदियाँ देखीं
Show English Translation
Lakshmana saw tall buildings comparable to Vindhya and Meru mountains and pure water flowing from the mountain streams.
ShlokaShloka 9
अङ्गदस्य गृहं रम्यं मैन्दस्य द्विविधस्य च। गवयस्य गवाक्षस्य गजस्य शरभस्य च।।4.33.9।। विद्युन्मालेश्च सम्पाते स्सूर्याक्षस्य हनूमतः। वीरबाहो स्सुबाहोश्च नलस्य च महात्मनः।।4.33.10।। कुमुदस्य सुषेणस्य तारजाम्बवतोस्तथा। दधिवक्त्रस्य नीलस्य सुपाटलसुनेत्रयोः।।4.33.11।। एतेषां कपिमुख्यानां राजमार्गे महात्मनाम्। ददर्श गृहमुख्यानि महासाराणि लक्ष्मणः।।4.33.12।।
हिन्दी अर्थ देखें
उन्होंने राजमार्ग पर अङ्गद का रमणीय भवन देखा साथ ही वहाँ मैन्द, द्विविद, गवय, गवाक्ष, गज, शरभ, विद्युन्माली, सम्पाति, सूर्याक्ष, हनुमान्, वीरबाहु, सुबाहु, महात्मा नल, कुमुद, सुषेण, तार, जाम्बवान्, दधिमुख,नील, सुपाटल और सुनेत्र–इन महामनस्वी वानरशिरोमणियों के भी अत्यन्त सुदृढ़ श्रेष्ठ भवन लक्ष्मण को दृष्टिगोचर हुए वे सब-के-सब राजमार्ग पर ही बने हुए थे
Show English Translation
On the royal road, Lakshmna saw beautiful homes of monkeychiefs Angada, Mainda, Dwivida, Gavaya, Gavaksha, Gaja, Sarabha, Vidyunmalin, Sampati, Suryaksha, Hanuman, Veerabahu, Subahu, the great Nala, Kumuda and Sushena. Similarly he saw the homes of Tara and Jambavan, Dadhivaktra, Nila, Supatala and Sunetra. (Tara mentioned here is a male monkey.)
ShlokaShloka 10
पाण्डुराभ्रप्रकाशानि दिव्यमाल्ययुतानि च। प्रभूतधनधान्यानि स्त्रीरत्नै श्शोभितानि च।।4.33.13।।
हिन्दी अर्थ देखें
उन्होंने राजमार्ग पर अङ्गद का रमणीय भवन देखा साथ ही वहाँ मैन्द, द्विविद, गवय, गवाक्ष, गज, शरभ, विद्युन्माली, सम्पाति, सूर्याक्ष, हनुमान्, वीरबाहु, सुबाहु, महात्मा नल, कुमुद, सुषेण, तार, जाम्बवान्, दधिमुख,नील, सुपाटल और सुनेत्र–इन महामनस्वी वानरशिरोमणियों के भी अत्यन्त सुदृढ़ श्रेष्ठ भवन लक्ष्मण को दृष्टिगोचर हुए वे सब-के-सब राजमार्ग पर ही बने हुए थे
Show English Translation
These homes were shining like white clouds, with wonderful garlands hung on, filled with abundance of wealth, grains and best of females.
ShlokaShloka 11
पाण्डुरेण तु सालेन परिक्षिप्तं दुरासदम्। वानरेन्द्रगृहं रम्यं महेन्द्रसदनोपमम्।।4.33.14।। शुक्लैः प्रासादशिखरैः कैलासशिखरोपमैः। सर्वकामफलैर्वृक्षैः पुष्पितैरुपशोभितम्।।4.33.15।। महेन्द्रदत्तैश्श्रीमद्भिर्नीलजीमूतसन्निभैः। दिव्यपुष्पफलैर्वृक्षैशीतच्छायैर्मनोरमैः।।4.33.16।। हरिभिस्संवृतद्वारं बलिभिश्शस्त्रपाणिभिः। दिव्यमाल्यावृतं शुभ्रं तप्तकाञ्चनतोरणम्।।4.33.17।। सुग्रीवस्य गृहं रम्यं प्रविवेश महाबलः। अवार्यमाणस्सौमित्रिर्महाभ्रमिव भास्करः।।4.33.18।।
हिन्दी अर्थ देखें
उन्होंने राजमार्ग पर अङ्गद का रमणीय भवन देखा साथ ही वहाँ मैन्द, द्विविद, गवय, गवाक्ष, गज, शरभ, विद्युन्माली, सम्पाति, सूर्याक्ष, हनुमान्, वीरबाहु, सुबाहु, महात्मा नल, कुमुद, सुषेण, तार, जाम्बवान्, दधिमुख,नील, सुपाटल और सुनेत्र–इन महामनस्वी वानरशिरोमणियों के भी अत्यन्त सुदृढ़ श्रेष्ठ भवन लक्ष्मण को दृष्टिगोचर हुए वे सब-के-सब राजमार्ग पर ही बने हुए थे
Show English Translation
The abode of Sugriva was encircled by a white rampart and unapproachable.It was enchanting like the abode of Indra. The mansion tops were like the white peaks of Kailas mountain filled with blossoming trees which could yield all kinds of fruits to suit one's taste. The trees were huge like dark clouds, cool and shady with wonderful flowers in full bloom, the riches gifted by Indra, were delightful. The entrance was guarded by mighty monkeys holding weapons in hand. It had a golden archway at the entrance decorated with wonderful garlands and strings of golden flowers. Saumitri of great prowess entered the rich abode of Sugriva just as the Sun enters huge clouds unobstructed.
ShlokaShloka 12
स सप्त कक्ष्या धर्मात्मा नानाजनसमाकुलाः। प्रविश्य सुमहद्गगुप्तं ददर्शान्तःपुरं महत्।।4.33.19।। हैमराजतपर्यङ्कैर्बहुभिश्च वरासनैः। महार्हास्तरणोपेतैस्तत्र तत्रोपशोभितम्।।4.33.20।।
हिन्दी अर्थ देखें
उन्होंने राजमार्ग पर अङ्गद का रमणीय भवन देखा साथ ही वहाँ मैन्द, द्विविद, गवय, गवाक्ष, गज, शरभ, विद्युन्माली, सम्पाति, सूर्याक्ष, हनुमान्, वीरबाहु, सुबाहु, महात्मा नल, कुमुद, सुषेण, तार, जाम्बवान्, दधिमुख,नील, सुपाटल और सुनेत्र–इन महामनस्वी वानरशिरोमणियों के भी अत्यन्त सुदृढ़ श्रेष्ठ भवन लक्ष्मण को दृष्टिगोचर हुए वे सब-के-सब राजमार्ग पर ही बने हुए थे
Show English Translation
Righteous Lakshmana crossed the seven enclosures filled with different kinds of people and saw a great harem full of several bright gold and silver cots, excellent seats here and there with best of cushions spread.
ShlokaShloka 13
प्रविशन्नेव सततं शुश्राव मधुरस्वरम्। तन्त्रीगीतसमाकीर्णं समगीतपदाक्षरम्।।4.33.21।।
हिन्दी अर्थ देखें
वानरराज सुग्रीवका सुन्दर भवन इन्द्रसदनके समान रमणीय दिखायी देता था। उसमें प्रवेश करना किसीके लिये भी अत्यन्त कठिन था। वह श्वेत पर्वतकी चहार-दीवारीसे घिरा हुआ था
Show English Translation
As he entered, he heard melodious sounds of string instruments and music worded to metre with different kinds of tunes.
ShlokaShloka 14
बह्वीश्च विविधाकारा रूपयौवनगर्विताः। स्त्रियस्सुग्रीवभवने ददर्श सुमहाबलः।।4.33.22।।
हिन्दी अर्थ देखें
वानरराज सुग्रीवका सुन्दर भवन इन्द्रसदनके समान रमणीय दिखायी देता था। उसमें प्रवेश करना किसीके लिये भी अत्यन्त कठिन था। वह श्वेत पर्वतकी चहार-दीवारीसे घिरा हुआ था
Show English Translation
Powerful Lakshmana saw many females of different forms proud of their youth and charm at the palace of Sugriva.
ShlokaShloka 15
दृष्ट्वाऽभिजनसम्पन्नाश्चित्रमाल्यकृतस्रजः। फलमाल्यकृतव्यग्रा भूषणोत्तमभूषिताः।।4.33.23।। नातृप्तान्नापि चाव्यग्रान्नानुदात्तपरिच्छदान्। सुग्रीवानुचरांश्चापि लक्षयामास लक्ष्मणः।।4.33.24।।
हिन्दी अर्थ देखें
वहाँ इन्द्र के दिये हुए दिव्य फल-फूलों से सम्पन्न मनोरम वृक्ष लगाये गये थे, जो परम सुन्दर, नीले मेघ के समान श्याम तथा शीतल छाया से युक्त थे
Show English Translation
Lakshmana saw women with a good lineage adorned with colourful flower garlands and choicest ornaments engaged in making garlands and arranging fruits. He also saw at Sugriva's palace attendants, gentle, welldressed, contented and not too busy.
ShlokaShloka 16
कूजितं नूपुराणां च काञ्चीनां निनदं तथा। सन्निशम्य तत श्रीमान्सौमित्रिर्लज्जितोऽभवत्।।4.33.25।।
हिन्दी अर्थ देखें
वहाँ इन्द्र के दिये हुए दिव्य फल-फूलों से सम्पन्न मनोरम वृक्ष लगाये गये थे, जो परम सुन्दर, नीले मेघ के समान श्याम तथा शीतल छाया से युक्त थे
Show English Translation
Illustrious Lakshmana felt abashed on hearing the jingling of girdle bells and tinkling of the women's anklets.
ShlokaShloka 17
रोषवेगप्रकुपितशश्रुत्वा चाभरणस्वनम्। चकार ज्यास्वनं वीरो दिशश्शब्देन पूरयन्।।4.33.26।।
हिन्दी अर्थ देखें
अनेक बलवान् वानर हाथों में हथियार लिये उसकी ड्योढ़ी पर पहरा दे रहे थे। वह सुन्दर महल दिव्य मालाओं से अलंकृत था और उसका बाहरी फाटक पक्के सोने का बना हुआ था।
Show English Translation
On hearing the sounds of ornaments (of females), heroic Lakshmana lost his temper quickly. He pulled his bowstring forcefully in wrath producing frightening sound filling all quarters.
ShlokaShloka 18
चारित्रेण महाबाहुरपकृष्ट स्सलक्ष्मणः। तस्थावेकान्तमाश्रित्य रामकोपसमन्वितः।।4.33.27।।
हिन्दी अर्थ देखें
महाबली सुमित्राकुमार लक्ष्मण ने सुग्रीव के उस रमणीय भवन में प्रवेश किया। मानो सूर्यदेव महान् मेघ के भीतर प्रविष्ट हुए हों। उस समय किसी ने रोक टोक नहीं की
Show English Translation
Aware of the anger of Rama (who likes it not), the longarmed Lakshmana moved away from the spot (abstained from entering private apartments) as per tradition, receded to a lonely place and stood.
ShlokaShloka 19
तेन चापस्वनेनाथ सुग्रीवः प्लवगाधिपः। विज्ञायाऽगमनं त्रस्त स्सञ्चचाल वरासनात्।।4.33.28।।
हिन्दी अर्थ देखें
धर्मात्मा लक्ष्मण ने सवारियों तथा विविध आसनों से सुशोभित उस भवन की सात ड्योढ़ियों को पार करके बहुत ही गुप्त और विशाल अन्तःपुर को देखा
Show English Translation
Then, sensing the arrival of Lakshmana, by the sound of his bow string, Sugriva the lord of vanaras, alighted at once from the throne.
ShlokaShloka 20
अङ्गदेन यथा मह्यं पुरस्तात्प्रतिवेदितम्। सुव्यक्तमेष सम्प्राप्त स्सौमित्रिर्भ्रातृवत्सलः।।4.33.29।।
हिन्दी अर्थ देखें
उसमें जहाँ-तहाँ चाँदी और सोने के बहुत-से पलंग तथा अनेकानेक श्रेष्ठ आसन रखे हुए थे और उन सब पर बहुमूल्य बिछौने बिछे थे। उन सबसे वह अन्तःपुर सुसज्जित दिखायी देता था
Show English Translation
'Truly Saumitri, the loving brother of Rama has arrived as announced by Angada earlier'.
ShlokaShloka 21
अङ्गदेन समाख्यातं ज्यास्वनेन च वानरः। बुबुधे लक्ष्मणं प्राप्तं मुखं चास्यव्यशुष्यत।।4.33.30।।
हिन्दी अर्थ देखें
उसमें प्रवेश करते ही लक्ष्मण के कानों में संगीत की मीठी तान सुनायी पड़ी, जो वहाँ निरन्तर गूंज रही । थी। वीणा के लय पर कोई कोमल कण्ठ से गा रहा था। प्रत्येक पद और अक्षर का उच्चारण सम* ताल का प्रदर्शन करते हुए हो रहा था
Show English Translation
As proclaimed by Angada and also from the sound of the twang, Sugriva knew about the arrival of Lakshmana. His mouth parched (with fear).
ShlokaShloka 22
ततस्तारां हरिश्रेष्ठस्सुग्रीवः प्रियदर्शनाम्। उवाच हितमव्यग्रस्त्रास सम्भ्रान्तमानसः।।4.33.31।।
Show English Translation
Then Sugriva, the best of monkeys got agitated at heart out of fear. He saw the pleasing Tara and said to her these good words clearly:
ShlokaShloka 23
किन्नु तत्कारणं सुभ्रु प्रकृत्या मृदुमानसः। सरोष इव सम्प्राप्तो येनायं राघवानुजः।।4.33.32।।
हिन्दी अर्थ देखें
वे सब-की-सब उत्तम कुल में उत्पन्न हुई थीं, फूलों के गजरों से अलंकृत थीं, उत्तम पुष्पहारों के निर्माण में लगी हुई थीं और सुन्दर आभूषणों से । विभूषित थीं। उन सबको देखकर लक्ष्मणने सुग्रीवके सेवकोंपर भी दृष्टिपात किया, जो अतृप्त या असंतुष्ट नहीं थे। स्वामी के कार्य सिद्ध करने के लिये अत्यन्तफुर्ती की भी उनमें कमी नहीं थी तथा उनके वस्त्र और आभूषण भी निम्न श्रेणी के नहीं थे
Show English Translation
'O Tara with beautiful eyebrows this younger brother of Rama is normally softhearted. But today he arrived here angry. What could be the reason?
ShlokaShloka 24
किं पश्यसि कुमारस्य रोषस्थानमनिन्दिते। न खल्वकारणे कोपमाहरेन्नरसत्तमः।।4.33.33।।
हिन्दी अर्थ देखें
वे सब-की-सब उत्तम कुल में उत्पन्न हुई थीं, फूलों के गजरों से अलंकृत थीं, उत्तम पुष्पहारों के निर्माण में लगी हुई थीं और सुन्दर आभूषणों से । विभूषित थीं। उन सबको देखकर लक्ष्मणने सुग्रीवके सेवकोंपर भी दृष्टिपात किया, जो अतृप्त या असंतुष्ट नहीं थे। स्वामी के कार्य सिद्ध करने के लिये अत्यन्तफुर्ती की भी उनमें कमी नहीं थी तथा उनके वस्त्र और आभूषण भी निम्न श्रेणी के नहीं थे
Show English Translation
'O blemishless Tara What is the cause of young Lakshmana's anger? Great men do not display anger without reason.
ShlokaShloka 25
यदस्य कृतमस्माभिर्बुध्यसे किञ्चिदप्रियम्। तदबुद्ध्या सम्प्रधार्याशु क्षिप्रमर्हसि भाषितुम्।।4.33.34।।
हिन्दी अर्थ देखें
नूपुरों की झनकार और करधनी की खनखनाहट सुनकर श्रीमान् सुमित्राकुमार लज्जित हो गये (परायी स्त्रियों पर दृष्टि पड़ने के कारण उन्हें स्वभावतः संकोच हुआ)
Show English Translation
'If anything displeasing has been done by us, you should know and tell me quickly. You ought to speak to him at once.
ShlokaShloka 26
अथवा स्वयमेवैनं द्रष्टुमर्हसि भामिनि। वचनै स्सान्त्वयुक्तैश्च प्रसादयितुमर्हसि।।4.33.35।।
हिन्दी अर्थ देखें
तत्पश्चात् पुनः आभूषणों की झनकार सुनकर वीर लक्ष्मण रोष के आवेग से और भी कुपित हो उठे और उन्होंने अपने धनुष पर टंकार दी, जिसकी ध्वनि से समस्त दिशाएँ गूंज उठीं
Show English Translation
'O lovely lady or else, you should see him personally and propitiate him with your soothing words.
ShlokaShloka 27
त्वद्दर्शन विशुद्धात्मा न स कोपं करिष्यति। न हि स्त्रीषु महात्मानः क्वचित्कुर्वन्ति दारुणम्।।4.33.36।।
हिन्दी अर्थ देखें
रघुकुलोचित सदाचार का खयाल करके महाबाहु लक्ष्मण कुछ पीछे हट गये और एकान्त में जाकर खड़े हो गये। श्रीरामचन्द्रजी के कार्य की सिद्धि के लिये वहाँ कोई प्रयत्न होता न देख वे मन-ही-मन कुपित हो रहे थे
Show English Translation
'Lakshmana will be clear of all doubts on seeing you and will not be angry. Great men are not harsh to women.
ShlokaShloka 28
त्वया सान्त्वैरुपक्रान्तं प्रसन्नेन्द्रियमानसम्। ततः कमलपत्राक्षं द्रक्ष्याम्यहमरिन्दमम्।।4.33.37।।
हिन्दी अर्थ देखें
धनुष की टंकार सुनकर वानरराज सुग्रीव समझ गये कि लक्ष्मण यहाँ तक आ पहुँचे हैं। फिर तो वे भय से संत्रस्त होकर अपना सिंहासन छोड़कर खड़े हो गये
Show English Translation
'Start talking to him with pleasing words and make him happy. Then I shall see Lakshmana with eyes like lotuspetals, a subduer of enemies'.
ShlokaShloka 29
सा प्रस्खलन्ती मदविह्वलाक्षी प्रलम्बकाञ्चीगुण हेमसूत्रा। सलक्षणा लक्ष्मणसन्निधानं जगाम तारा नमिताङ्गयष्टिः।।4.33.38।।
हिन्दी अर्थ देखें
वे मन-ही-मन सोचने लगे कि अङ्गद ने पहले मुझे जैसा बताया था, उसके अनुसार ये भ्रातृवत्सल सुमित्राकुमार लक्ष्मण अवश्य ही यहाँ आ गये
Show English Translation
Tara, whose eyes were drowsy with drink, whose long gold string of the girdle was hanging loose appeared before Lakshmana with faltering steps and bent low, bashful of her appearance. (It suggests a state of exhaustion after sexual pleasures).
ShlokaShloka 30
स तां समीक्ष्यैव हरीशपन्तीं तस्थावुदासीनतया महात्मा। अवाङ्मुखोऽभून्मनुजेन्द्रपुत्रः स्त्रीसन्निकर्षाद्विनिवृत्तकोपः।।4.33.39।।
हिन्दी अर्थ देखें
अङ्गद के द्वारा उनके आगमन का समाचार तो उन्हें पहले ही मिल गया था। अब धनुष की टंकार से वानर सुग्रीव को इस बात का प्रत्यक्ष अनुभव हो गया कि लक्ष्मण ने अवश्य यहाँ पदार्पण किया है। फिर तो उनका मुख सूख गया
Show English Translation
Since prince Lakshmana is a great man, he stood with his face down and showing no reaction, controlled his anger due to the presence of a female standing close by.
ShlokaShloka 31
सा पानयोगाद्विनिवृत्तलज्जा दृष्टिप्रसादाच्च नरेन्द्रसूनोः। उवाच तारा प्रणयप्रगल्भं वाक्यं महार्थं परिसान्त्वपूर्वम्।।4.33.40।।
हिन्दी अर्थ देखें
भय के कारण वे मन-ही-मन घबरा उठे (लक्ष्मण के सामने जाने का उन्हें साहस न हुआ।)तथापि किसी तरह धैर्य धारण करके वानरश्रेष्ठ सुग्रीव परम सुन्दरी तारा से हित की बात बोले-
Show English Translation
Setting aside her shyness for being in a drunken state, and observing Lakshmana's favourable disposition, she spoke meaningful words in a pleasing manner with friendly eloquence:
ShlokaShloka 32
किं कोपमूलं मनुजेन्द्रपुत्र कस्ते न सन्तिष्ठति वाङ्निदेशे। क श्शुष्कवृक्षं वनमापतन्तं दवाग्निमासीदति निर्विशङ्कः।।4.33.41।।
हिन्दी अर्थ देखें
‘सुन्दरि! इनके रोष का क्या कारण हो सकता है? जिससे स्वभावतः कोमल चित्त होने पर भी ये श्रीरघुनाथजी के छोटे भाई रुष्ट-से होकर यहाँ पधारे हैं
Show English Translation
'O noble prince what is the cause of your anger? Who has disrespected your command? Who can approach without fear forest fire rushing towards a thicket of dried pieces of wood?'
ShlokaShloka 33
स तस्या वचनं श्रुत्वा सान्त्वपूर्वमशङ्कितम्। भूयः प्रणयदृष्टार्थं लक्ष्मणो वाक्यमब्रवीत्।।4.33.42।।
हिन्दी अर्थ देखें
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के किष्किन्धाकाण्ड में तैंतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ
Show English Translation
Having heard Tara's unhesitant submission spoken in a pleasant and friendly manner, Lakshmana replied:
ShlokaShloka 34
किमयं कामवृत्तस्ते लुप्तधर्मार्थसङ्ग्रहः। भर्ता भर्तृहिते युक्ते न चैनमवबुद्ध्यसे।।4.33.43।।
हिन्दी अर्थ देखें
‘यदि हमलोगों ने इनका कोई अपराध किया हो और तुम्हें उसका पता हो तो अपनी बुद्धि से विचारकर शीघ्र ही बताओ
Show English Translation
'O lady, your husband engrossed in sensual pleasures, has lost sight of dharma and artha. Why don't you understand it in the interest of your husband whose wellwisher you are?
ShlokaShloka 35
न चिन्तयति राज्यार्थं नास्मान् शोकपरायणान्। सामात्यपरिषत्तारे पानमेवोपसेवते।।4.33.44।।
हिन्दी अर्थ देखें
‘अथवा भामिनि! तुम स्वयं ही जाकर लक्ष्मण को देखो और सान्त्वनायुक्त बातें कहकर उन्हें प्रसन्न करने का प्रयत्न करो
Show English Translation
'O Tara that we are in grief Sugriva does not realize. He is not attending to state affairs. He is only enjoying drinking in the company of ministers.
ShlokaShloka 36
स मासांश्चतुरः कृत्वा प्रमाणं प्लवगेश्वरः। व्यतीतां स्तान्मदव्यग्रो विहरन्नावबुध्यते।।4.33.45।।
हिन्दी अर्थ देखें
‘जब तुम उनके पास जाकर मीठे वचनों से उन्हें शान्त कर दोगी और जब उनका मन स्वस्थ एवं इन्द्रियाँ प्रसन्न हो जायँगी, उस समय मैं उन शत्रुदमन कमलनयन लक्ष्मण का दर्शन करूँगा’
Show English Translation
'The king of monkeys has already spent four months, enjoying drinks. He does not realize that he has flouted his promise.
ShlokaShloka 37
न हि धर्मार्थसिद्ध्यर्थं पानमेवं प्रशस्यते। पानादर्थश्च धर्मश्च कामश्च परिहीयते।।4.33.46।।
हिन्दी अर्थ देखें
‘जब तुम उनके पास जाकर मीठे वचनों से उन्हें शान्त कर दोगी और जब उनका मन स्वस्थ एवं इन्द्रियाँ प्रसन्न हो जायँगी, उस समय मैं उन शत्रुदमन कमलनयन लक्ष्मण का दर्शन करूँगा’
Show English Translation
'Drinking this way does not help accomplishment of dharma and artha. It destroys wealth, ambition and righteousness.
ShlokaShloka 38
धर्मलोपो महांस्तावत्कृते ह्यप्रतिकुर्वतः। अर्थलोपश्च मित्रस्य नाशे गुणवतो महान्।।4.33.47।।
हिन्दी अर्थ देखें
सुग्रीव के ऐसा कहने पर शुभलक्षणा तारा लक्ष्मण के पास गयी। उसका पतला शरीर स्वाभाविक संकोच एवं विनय से झुका हुआ था। उसके नेत्र मद से चञ्चल हो रहे थे, पैर लड़खड़ा रहे थे और उसकी करधनी के सुवर्णमय सूत्र लटक रहे थे
Show English Translation
'Dharma is violated when we help not one who has helped. Loss of a virtuous friend leads to great loss of wealth. It results in destruction.
ShlokaShloka 39
मित्रं ह्यर्थगुणश्रेष्ठं सत्यधर्मपरायणम्। तद्द्वयं तु परित्यक्तं न तु धर्मे व्यवस्थितम्।।4.33.48।।
हिन्दी अर्थ देखें
वानरराज की पत्नी तारा पर दृष्टि पड़ते ही राजकुमार महात्मा लक्ष्मण अपना मुँह नीचा करके उदासीन भाव से खड़े हो गये। स्त्री के समीप होने से उनका क्रोध दूर हो गया
Show English Translation
ShlokaShloka 40
तदेवं प्रस्तुते कार्ये कार्यमस्माभिरुत्तरम्। यत्कार्यं कार्यतत्त्वज्ञे तदुदाहर्तुमर्हसि।।4.33.49।।
हिन्दी अर्थ देखें
मधुपान के कारण तारा की नारीसुलभ लज्जा निवृत्त हो गयी थी। उसे राजकुमार लक्ष्मण की दृष्टि में कुछ प्रसन्नता का आभास मिला। इसलिये उसने स्नेहजनित निर्भीकता के साथ महान् अर्थ से युक्त यह सान्त्वनापूर्ण बात कही—
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'You have a strong sense of duty. You ought to tell him his duty and what we should do in this situation.
ShlokaShloka 41
सा तस्य धर्मार्थसमाधियुक्तं निशम्य वाक्यं मधुरस्वभावम्। तारा गतार्थे मनुजेन्द्रकार्ये विश्वासयुक्तं तमुवाच भूयः।।4.33.50।।
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‘राजकुमार! आपके क्रोध का क्या कारण है?कौन आपकी आज्ञा के अधीन नहीं है? कौन निडर होकर सूखे वृक्षों से भरे हुए वन के भीतर चारों ओर फैलते हुए दावानल में प्रवेश कर रहा है ?’
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Tara heard the sweet words of Lakshmana which showed his good understanding of dharma and artha. What she said to him in reply reflects her faith in Sugriva's effort to help Rama's cause:
ShlokaShloka 42
न कोपकालः क्षितिपालपुत्र न चाति कोप स्स्वजने विधेयः। त्वदर्थकामस्य जनस्य तस्य प्रमादमप्यर्हसि वीर सोढुम्।।4.33.51।।
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तारा के इस वचन में सान्त्वना भरी थी। उसमें अधिक प्रेमपूर्वक हृदय का भाव प्रकट किया गया था। उसे सुनकर लक्ष्मण के हृदय की आशङ्का जाती रही। वे कहने लगे—
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'O prince this is not the time to get angry with your own people. He (Sugriva) is your friend and wishes to do your work. You should bear with him even if he makes a mistake.
ShlokaShloka 43
कोपं कथं नाम गुणप्रकृष्टः कुमार कुर्यादपकृष्टसत्त्वे। कस्त्वद्विधः कोपवशं हि गच्छे त्सत्त्वावरुद्धस्तपसः प्रसूतिः।।4.33.52।।
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‘तारे! सुग्रीव अपने राज्य की स्थिरता के लिये ही प्रयास करता है। हमलोग शोक में डूबे हुए हैं, परंतु हमारी इसे तनिक भी चिन्ता नहीं होती है। यह अपने मन्त्रियों तथा राज-सभा के सदस्योंसहित केवल विषय-भोगों का ही सेवन कर रहा है
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'O prince how can you, richly endowed with virtues be angry with an inferior person? How can a person like you, preeminent in virtues,and a source of great penance fall a victim to anger?
ShlokaShloka 44
जानामि रोषं हरिवीरबन्धो र्जानामि कार्यस्य च कालसङ्गम्। जानामि कार्यं त्वयि यत्कृतं न स्तच्चापि जानामि यदत्र कार्यम्।।4.33.53।।
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‘तारे! सुग्रीव अपने राज्य की स्थिरता के लिये ही प्रयास करता है। हमलोग शोक में डूबे हुए हैं, परंतु हमारी इसे तनिक भी चिन्ता नहीं होती है। यह अपने मन्त्रियों तथा राज-सभा के सदस्योंसहित केवल विषय-भोगों का ही सेवन कर रहा है
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'I know about the anger of (Rama), the friend of Sugriva. I am aware of the time limit set for his work. I am aware of our omissions in this regard. I also know about the mission.
ShlokaShloka 45
तच्चापि जानामि यथविषह्यं बलं नरश्रेष्ठ शरीरजस्य। जानामि यस्मिंश्च जनेऽवबद्धं कामेन सुग्रीवमसक्तमद्य।।4.33.54।।
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‘धर्म और अर्थ की सिद्धि के निमित्त प्रयत्न करने वाले पुरुष के लिये इस तरह मद्यपान अच्छा नहीं माना जाता है; क्योंकि मद्यपान से अर्थ, धर्म और काम तीनों का नाश होता है
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'O Lakshmana I am aware of the irresistible strength of lust born out of the body. I am aware of Sugriva's indifference to his duty due to his passion with whomsoever it be.
ShlokaShloka 46
न कामतन्त्रे तव बुद्धिरस्ति त्वं वै यथा मन्युवशं प्रपन्नः। न देशकालौ हि न चार्थधर्मा ववेक्षते कामरतिर्मनुष्यः।।4.33.55।।
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‘धर्म और अर्थ की सिद्धि के निमित्त प्रयत्न करने वाले पुरुष के लिये इस तरह मद्यपान अच्छा नहीं माना जाता है; क्योंकि मद्यपान से अर्थ, धर्म और काम तीनों का नाश होता है
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'You are under the grip of anger and your mind is not involved in carnal desire. One who is engaged in sensual pleasures does not reckon time and place, nor does he consider artha and dharma.
ShlokaShloka 47
तं कामवृत्तं मम सन्निकृष्टं कामाभियोगाच्च निवृत्तलज्जम्। क्षमस्व तावत्परवीरहन्त स्त्वद्भ्रातरं वानरवंशनाथम्।।4.33.56।।
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‘मित्र दो प्रकार के होते हैं—एक तो अपने मित्र के अर्थसाधन में तत्पर होता है और दूसरा सत्य एवं धर्म के ही आश्रित रहता है। तुम्हारे स्वामी ने मित्र के दोनों ही गुणों का परित्याग कर दिया है। वह न तो मित्र का कार्य सिद्ध करता है और न स्वयं ही धर्म में स्थित है
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'O slayer of enemy heroes pardon Sugriva, the lord of vanara clan, who is to you a brother. He is here indulging in sports of love with me. He has no sense of shame about his passion.
ShlokaShloka 48
महर्षयो धर्मतपोऽभिकामाः कामानुकामाः प्रतिबद्धमोहाः। अयं प्रकृत्या चपलः कपिस्तु कथं न सज्जेत सुखेषु राजा।।4.33.57।।
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‘मित्र दो प्रकार के होते हैं—एक तो अपने मित्र के अर्थसाधन में तत्पर होता है और दूसरा सत्य एवं धर्म के ही आश्रित रहता है। तुम्हारे स्वामी ने मित्र के दोनों ही गुणों का परित्याग कर दिया है। वह न तो मित्र का कार्य सिद्ध करता है और न स्वयं ही धर्म में स्थित है
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'Even sages committed to piety and austerity are sometimes deluded by sensual gratification. He is a king and a monkey who is fickle by nature. How can he be not tempted by sensual pleasures'?
ShlokaShloka 49
इत्येवमुक्त्वा वचनं महार्थं सा वानरी लक्ष्मणमप्रमेयम्। पुन स्सखेदं मदविह्वलञ्च भर्तुर्हितं वाक्यमिदं बभाषे।।4.33.58।।
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लक्ष्मण का वचन धर्म और अर्थ के निश्चय से संयुक्त था। उससे उनके मधुर स्वभाव का परिचय मिल रहा था। उसे सुनकर तारा भगवान् श्रीरामचन्द्रजी के कार्य के विषय में, जिसका प्रयोजन उसे ज्ञात हो चुका था, पुनः लक्ष्मण से विश्वास के योग्य बात बोली-
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Overcome by drunkenness, Tara once again spoke to Lakshmana of unfathomable prowess, in a meaningful way keeping in view the welfare of her playful and drunken lord:
ShlokaShloka 50
उद्योगस्तु चिराज्ञप्त स्सुग्रीवेण नरोत्तम। कामस्यापि विधेयेन तवार्थप्रतिसाधने।।4.33.59।।
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लक्ष्मण का वचन धर्म और अर्थ के निश्चय से संयुक्त था। उससे उनके मधुर स्वभाव का परिचय मिल रहा था। उसे सुनकर तारा भगवान् श्रीरामचन्द्रजी के कार्य के विषय में, जिसका प्रयोजन उसे ज्ञात हो चुका था, पुनः लक्ष्मण से विश्वास के योग्य बात बोली-
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'O best of men although overpowered by sense pleasures, Sugriva has already initiated efforts for the accomplishment of your work.
ShlokaShloka 51
आगता हि महावीर्या हरयः कामरूपिणः। कोटीशतसहस्राणि नानानगनिवासिनः।।4.33.60।।
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‘वीर राजकुमार! यह क्रोध करने का समय नहीं है। आत्मीय जनों पर क्रोध करना भी नहीं चाहिये। सुग्रीव के मन में सदा आपका कार्य सिद्ध करने की इच्छा बनी रहती है। अतः यदि उनसे कोई भूल भी हो जाय तो उसे आपको क्षमा करना चाहिये
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'O great warrior monkeys residing at different mountains who can assume any form they like have arrived in hundreds and thousands of crores.
ShlokaShloka 52
तदागच्छ महाबाहो चारित्रं रक्षितं त्वया। अच्छलं मित्रभावेन सतां दारावलोकनम्।।4.33.61।।
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‘वानरवीर सुग्रीव के मित्र भगवान् श्रीराम के क्रोध का कारण मैं जानती हूँ। उनके कार्य में जो विलम्ब हुआ है, उससे भी मैं अपरिचित नहीं हूँ। सुग्रीव का जो कार्य आपके अधीन था और जिसे आपलोगों ने पूरा किया है, उसका भी मुझे पता है तथा इस समय जो आपका कार्य प्रस्तुत है, उसके विषय में हमलोगों का क्या कर्तव्य है, इसका भी मुझे अच्छी तरह ज्ञान है
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'O longarmed one come in. You have been standing out guarding your character. It is not a mistake to see the wife of a pious person with a friendly feeling.
ShlokaShloka 53
तारया चाभ्यनुज्ञातस्त्वरया चापि चोदितः। प्रविवेश महाबाहुरभ्यन्तरमरिन्दमः।।4.33.62।।
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‘वानरवीर सुग्रीव के मित्र भगवान् श्रीराम के क्रोध का कारण मैं जानती हूँ। उनके कार्य में जो विलम्ब हुआ है, उससे भी मैं अपरिचित नहीं हूँ। सुग्रीव का जो कार्य आपके अधीन था और जिसे आपलोगों ने पूरा किया है, उसका भी मुझे पता है तथा इस समय जो आपका कार्य प्रस्तुत है, उसके विषय में हमलोगों का क्या कर्तव्य है, इसका भी मुझे अच्छी तरह ज्ञान है
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Strongarmed Lakshmana, a subduer of enemies, permitted by Tara entered the harem immediately (thinking of the urgency of the task).
ShlokaShloka 54
तत स्सुग्रीवमासीनं काञ्चने परमासने। महार्हास्तरणोपेते ददर्शादित्यसन्निभम्।।4.33.63।। दिव्याभणचित्राङ्गं दिव्यरूपं यशस्विनम्। दिव्यमाल्याम्बरधरं महेन्द्रमिव दुर्जयम्।।4.33.64।। दिव्याभरणमालाभिः प्रमदाभि स्समावृतम्। संरब्धतररक्ताक्षो बभूवान्तकसन्निभः।।4.33.65।।
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‘नरश्रेष्ठ! इस शरीर में उत्पन्न हुए काम का जो असह्य बल है, उसको भी मैं जानती हूँ तथा उस काम द्वारा आबद्ध होकर सुग्रीव जहाँ आसक्त हो रहे हैं, वह भी मुझे मालूम है। साथ ही इस बात से भी मैं परिचित हूँ कि कामासक्ति के कारण ही इन दिनों सुग्रीव का मन दूसरे किसी काम में नहीं लगता
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Lakshmana saw famous Sugriva, difficult to be conquered, seated on a golden throne strewn around with cushions, decorated with ornaments of different colours, endearing in appearance, decked with beautiful garlands and clothes. He was surrounded by women adorned with most fascinating ornaments and garlands. Bewildered at the sight, Lakshmana's eyes turned red in anger. He appeared like Yama, lord of death.
ShlokaShloka 55
रुमां तु वीर परिरभ्य गाढं वरासनस्थो वरहेमवर्णः। ददर्श सौमित्रिमदीनसत्त्वं विशालनेत्रस्सुविशालनेत्रम्।।4.33.66।।
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‘आप जो क्रोध के वशीभूत हो गये हैं, इससे जान पड़ता है कि काम के अधीन हुए पुरुष की स्थिति का आपको बिलकुल ज्ञान नहीं है, वानर की तो बात ही क्या है ? कामासक्त मनुष्य को भी देश, काल, अर्थ और धर्म का ज्ञान नहीं रह जाता—उनकी ओर उसकी दृष्टि नहीं जाती है।
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The largeeyed warrior Sugriva of golden complexion was seated on an excellent throne embracing Ruma tightly.He saw largeeyed Saumitri in a jovial mood. इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे त्रयस्त्रिंशस्सर्गः।। Thus ends the thirtythird sarga in Kishkindakanda of the first epic, the Holy Ramayana compsed by sage Vamiki.