Kishkindha Kanda
Sarga 45: Sugriva once again addresses all troops -- the vanaras departRama and Lakshmana return to Prasravana mountain
किष्किन्धाकाण्डम् · सर्ग 45
16 shlokas
ShlokaShloka 1
सर्वांश्चाहूय सुग्रीवः प्लवगान् प्लवगर्षभः।
समस्तानब्रवीद्भूयो रामकार्यर्थसिद्धये।।4.45.1।।
एवमेतद्विचेतव्यं यन्मया परिकीर्तितम्।
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तदनन्तर वानरशिरोमणि राजा सुग्रीव अन्य समस्त वानरों को बुलाकर श्रीरामचन्द्रजी के कार्य की सिद्धि के लिये उन सबसे बोले-
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Summoning the entire body of vanaras, Sugriva, the bull among monkeys, said, 'Go to the places I have described and look for Sita in order to fulfil Rama's objective'.
ShlokaShloka 2
तदुग्रशासनं भर्तुर्विज्ञाय हरिपुङ्गवाः।।4.45.2।।
शलभा इव सञ्छाद्य मेदिनीं सम्प्रतस्थिरे।
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Having understood Sugriva's strict orders, the forces of monkeys started moving. They spread like locusts all over the earth.
ShlokaShloka 3
रामः प्रस्रवणे तस्मिन्यवसत्सहलक्ष्मणः।।4.45.3।।
प्रतीक्षमाणस्तं मासं यस्सीताधिगमे कृतः।
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Rama accompanied by Lakshmana stayed back at Prasravana mountain looking forward for the expiry of the month fixed for the monkeys to trace Sita's whereabouts.
ShlokaShloka 4
उत्तरां तु दिशं रम्यां गिरिराजसमावृताम्।।4.45.4।।
प्रतस्थे सहसा वीरो हरिश्शतवलिस्तदा।
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Then the monkey warrior Satavali departed for the north, surrounded by kings of mountains.
ShlokaShloka 5
पूर्वां दिशं प्रतिययौ विनतो हरियूथपः।।4.45.5।।
ताराङ्गदादिसहितः प्लवङ्गो मारुतात्मजः।
अगत्याचरितामाशां दक्षिणां हरियूथपः।।4.45.6।।
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वानर-यूथपति विनत पूर्व दिशा की ओर गये। कपिगणों के अधिपति पवनकुमार वानर हनुमान जी तार और अङ्गद आदि के साथ अगस्त्यसेवित दक्षिण दिशा की ओर प्रस्थित हुए तथा वानरेश्वर कपिश्रेष्ठ सुषेण ने वरुण द्वारा सुरक्षित घोर पश्चिम दिशा की यात्रा की
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Vinata, leader of the monkeys, set out for the eastern direction.The troop leader, son of the Windgod along with Angada and Tara left for the south inhabited by Agastya.
ShlokaShloka 6
पश्चिमां तु भृशं घोरां सुषेणः प्लवगेश्वरः।
प्रतस्थे हरिशार्दूलो दिशं वरुणपालिताम्।।4.45.7।।
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वानर-यूथपति विनत पूर्व दिशा की ओर गये। कपिगणों के अधिपति पवनकुमार वानर हनुमान जी तार और अङ्गद आदि के साथ अगस्त्यसेवित दक्षिण दिशा की ओर प्रस्थित हुए तथा वानरेश्वर कपिश्रेष्ठ सुषेण ने वरुण द्वारा सुरक्षित घोर पश्चिम दिशा की यात्रा की
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'The chieftain Sushena, tiger among the monkeys, started quickly for the fearsome western direction ruled by Varuna.
ShlokaShloka 7
ततस्सर्वा दिशो राजा चोदयित्वा यथातथम्।
कपिसेनापतीन्मुख्यान्मुमोद सुखितस्सुखम्।।4.45.8।।
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वानर-यूथपति विनत पूर्व दिशा की ओर गये। कपिगणों के अधिपति पवनकुमार वानर हनुमान जी तार और अङ्गद आदि के साथ अगस्त्यसेवित दक्षिण दिशा की ओर प्रस्थित हुए तथा वानरेश्वर कपिश्रेष्ठ सुषेण ने वरुण द्वारा सुरक्षित घोर पश्चिम दिशा की यात्रा की
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Sugriva, chief of the army of monkeys, having sent the leaders to all quarters felt relieved and rejoiced.
ShlokaShloka 8
एवं सम्बोधितास्सर्वे राज्ञा वानरयूथपाः।
स्वां स्वां दिशमभिप्रत्त्य त्वरिता सम्प्रतस्थिरे।।4.45.9।।
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वानर-सेना के स्वामी वीर राजा सुग्रीव सम्पूर्ण दिशाओं में यथायोग्य वानरों को भेजकर बहुत सुखी हुए और मन-ही-मन हर्ष का अनुभव करने लगे
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Addressed thus by the king, all the monkeys departed quickly from there for their respective directions with all enthusiasm.
ShlokaShloka 9
नदन्तश्चोन्नदन्तश्च गर्जन्तश्च प्लवङ्गमाः।
क्ष्वेलन्तो धावमानाश्च विनदन्तो महाबलाः।।4.45.10।।
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इस तरह राजा की आज्ञा पाकर समस्त वानरयूथपति बड़ी उतावली के साथ अपनी-अपनी दिशा की ओर प्रस्थित हुए
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The powerful monkeys went gallopping and chattering, leaping and screaming.
ShlokaShloka 10
एवं सम्बोदितास्सर्वे राज्ञा वानरयूथपाः।
आनयिष्यामहे सीतां हनिष्यामश्च रावणम्।।4.45.11।।
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वे समस्त महाबली वानर और उनके यूथपति अपने राजा के द्वारा इस प्रकार प्रेरित हो भाँति-भाँति के शब्द करते, उच्च स्वर से गर्जते, दहाड़ते, किलकारियाँ मारते, दौड़ते और कोलाहल करते हुए कहने लगे—’राजन् ! हम सीता को साथ लायेंगे और रावण का वध कर डालेंगे। युद्ध में यदि रावण मेरे सामने आ जाय तो मैं अकेला ही उसे मार गिराऊँगा। तत्पश्चात् उसकी सारी सेना को मथकर कष्ट एवं भय से काँपती हुई जानकी जी को सहसा यहाँ उठा लाऊँगा। आप लोग यहीं ठहरें। मैं अकेला ही पाताल से भी जनककिशोरी को निकाल लाऊँगा, वृक्षों को उखाड़ फेकूँगा, पर्वतों के टुकड़े-टुकड़े कर डालूँगा, पृथ्वी को विदीर्ण कर दूँगा और समुद्रों को भी विक्षुब्ध कर डालूँगा। मैं सौ योजनतक कूद सकता हूँ, इसमें संशय नहीं है। मैं सौ योजन से भी अधिक दूरतक जा सकता हूँ। पृथ्वी, समुद्र, पर्वत, वन और पाताल में भी मेरी गति नहीं रुकती’
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Thus addressed by the king, the leaders of the monkeys shouted, 'We will kill Ravana and get back Sita'.
ShlokaShloka 11
अहमेको हनिष्यामि रावणं प्राप्तमाहवे।
ततश्चोन्मथ्य सहसा हरिष्ये जनकात्मजाम्।।4.45.12।।
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वे समस्त महाबली वानर और उनके यूथपति अपने राजा के द्वारा इस प्रकार प्रेरित हो भाँति-भाँति के शब्द करते, उच्च स्वर से गर्जते, दहाड़ते, किलकारियाँ मारते, दौड़ते और कोलाहल करते हुए कहने लगे—’राजन् ! हम सीता को साथ लायेंगे और रावण का वध कर डालेंगे। युद्ध में यदि रावण मेरे सामने आ जाय तो मैं अकेला ही उसे मार गिराऊँगा। तत्पश्चात् उसकी सारी सेना को मथकर कष्ट एवं भय से काँपती हुई जानकी जी को सहसा यहाँ उठा लाऊँगा। आप लोग यहीं ठहरें। मैं अकेला ही पाताल से भी जनककिशोरी को निकाल लाऊँगा, वृक्षों को उखाड़ फेकूँगा, पर्वतों के टुकड़े-टुकड़े कर डालूँगा, पृथ्वी को विदीर्ण कर दूँगा और समुद्रों को भी विक्षुब्ध कर डालूँगा। मैं सौ योजनतक कूद सकता हूँ, इसमें संशय नहीं है। मैं सौ योजन से भी अधिक दूरतक जा सकता हूँ। पृथ्वी, समुद्र, पर्वत, वन और पाताल में भी मेरी गति नहीं रुकती’
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'I shall kill Ravana singlehanded in war and quickly get back Janaka's daughter churning (the enemy army).' (said one)
ShlokaShloka 12
वेपमानां श्रमेणाद्य भवद्भिः स्थीयतामिति।
एक एवाहरिष्यामि पातालादपि जानकीम्।।4.45.13।।
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वे समस्त महाबली वानर और उनके यूथपति अपने राजा के द्वारा इस प्रकार प्रेरित हो भाँति-भाँति के शब्द करते, उच्च स्वर से गर्जते, दहाड़ते, किलकारियाँ मारते, दौड़ते और कोलाहल करते हुए कहने लगे—’राजन् ! हम सीता को साथ लायेंगे और रावण का वध कर डालेंगे। युद्ध में यदि रावण मेरे सामने आ जाय तो मैं अकेला ही उसे मार गिराऊँगा। तत्पश्चात् उसकी सारी सेना को मथकर कष्ट एवं भय से काँपती हुई जानकी जी को सहसा यहाँ उठा लाऊँगा। आप लोग यहीं ठहरें। मैं अकेला ही पाताल से भी जनककिशोरी को निकाल लाऊँगा, वृक्षों को उखाड़ फेकूँगा, पर्वतों के टुकड़े-टुकड़े कर डालूँगा, पृथ्वी को विदीर्ण कर दूँगा और समुद्रों को भी विक्षुब्ध कर डालूँगा। मैं सौ योजनतक कूद सकता हूँ, इसमें संशय नहीं है। मैं सौ योजन से भी अधिक दूरतक जा सकता हूँ। पृथ्वी, समुद्र, पर्वत, वन और पाताल में भी मेरी गति नहीं रुकती’
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'I will alone restore Sita, exhausted and trembling (in fear), even from the nether world. Wait here' (said another leader).
ShlokaShloka 13
वधिष्याम्यहं वृक्षान् दारयिष्याम्यहं गिरीन्।
धरणीं दारयिष्यामि क्षोभयिष्यामि सागरान्।।4.45.14।।
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वे समस्त महाबली वानर और उनके यूथपति अपने राजा के द्वारा इस प्रकार प्रेरित हो भाँति-भाँति के शब्द करते, उच्च स्वर से गर्जते, दहाड़ते, किलकारियाँ मारते, दौड़ते और कोलाहल करते हुए कहने लगे—’राजन् ! हम सीता को साथ लायेंगे और रावण का वध कर डालेंगे। युद्ध में यदि रावण मेरे सामने आ जाय तो मैं अकेला ही उसे मार गिराऊँगा। तत्पश्चात् उसकी सारी सेना को मथकर कष्ट एवं भय से काँपती हुई जानकी जी को सहसा यहाँ उठा लाऊँगा। आप लोग यहीं ठहरें। मैं अकेला ही पाताल से भी जनककिशोरी को निकाल लाऊँगा, वृक्षों को उखाड़ फेकूँगा, पर्वतों के टुकड़े-टुकड़े कर डालूँगा, पृथ्वी को विदीर्ण कर दूँगा और समुद्रों को भी विक्षुब्ध कर डालूँगा। मैं सौ योजनतक कूद सकता हूँ, इसमें संशय नहीं है। मैं सौ योजन से भी अधिक दूरतक जा सकता हूँ। पृथ्वी, समुद्र, पर्वत, वन और पाताल में भी मेरी गति नहीं रुकती’
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'I will smash trees, shatter mountains, cleave the earth and churn up the seas'. (said a another).
ShlokaShloka 14
अहं योजनसङ्ख्यायाः प्लविता नात्र संशयः।
शतं योजनसङ्ख्यायाश्शतं समधिकं ह्यहम्।।4.45.15।।
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वे समस्त महाबली वानर और उनके यूथपति अपने राजा के द्वारा इस प्रकार प्रेरित हो भाँति-भाँति के शब्द करते, उच्च स्वर से गर्जते, दहाड़ते, किलकारियाँ मारते, दौड़ते और कोलाहल करते हुए कहने लगे—’राजन् ! हम सीता को साथ लायेंगे और रावण का वध कर डालेंगे। युद्ध में यदि रावण मेरे सामने आ जाय तो मैं अकेला ही उसे मार गिराऊँगा। तत्पश्चात् उसकी सारी सेना को मथकर कष्ट एवं भय से काँपती हुई जानकी जी को सहसा यहाँ उठा लाऊँगा। आप लोग यहीं ठहरें। मैं अकेला ही पाताल से भी जनककिशोरी को निकाल लाऊँगा, वृक्षों को उखाड़ फेकूँगा, पर्वतों के टुकड़े-टुकड़े कर डालूँगा, पृथ्वी को विदीर्ण कर दूँगा और समुद्रों को भी विक्षुब्ध कर डालूँगा। मैं सौ योजनतक कूद सकता हूँ, इसमें संशय नहीं है। मैं सौ योजन से भी अधिक दूरतक जा सकता हूँ। पृथ्वी, समुद्र, पर्वत, वन और पाताल में भी मेरी गति नहीं रुकती’
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'I can doubtless cross a distance of a hundred yojanas' said one. Another said,' I can leap a hundred yojanas more'.
ShlokaShloka 15
भूतले सागरे वाऽपि शैलेषु च वनेषु च।
पातालस्यापि वा मध्ये न ममाच्छिद्यते गतिः।।4.45.16।।
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वे समस्त महाबली वानर और उनके यूथपति अपने राजा के द्वारा इस प्रकार प्रेरित हो भाँति-भाँति के शब्द करते, उच्च स्वर से गर्जते, दहाड़ते, किलकारियाँ मारते, दौड़ते और कोलाहल करते हुए कहने लगे—’राजन् ! हम सीता को साथ लायेंगे और रावण का वध कर डालेंगे। युद्ध में यदि रावण मेरे सामने आ जाय तो मैं अकेला ही उसे मार गिराऊँगा। तत्पश्चात् उसकी सारी सेना को मथकर कष्ट एवं भय से काँपती हुई जानकी जी को सहसा यहाँ उठा लाऊँगा। आप लोग यहीं ठहरें। मैं अकेला ही पाताल से भी जनककिशोरी को निकाल लाऊँगा, वृक्षों को उखाड़ फेकूँगा, पर्वतों के टुकड़े-टुकड़े कर डालूँगा, पृथ्वी को विदीर्ण कर दूँगा और समुद्रों को भी विक्षुब्ध कर डालूँगा। मैं सौ योजनतक कूद सकता हूँ, इसमें संशय नहीं है। मैं सौ योजन से भी अधिक दूरतक जा सकता हूँ। पृथ्वी, समुद्र, पर्वत, वन और पाताल में भी मेरी गति नहीं रुकती’
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'I can go unobstruted on the earth, or even in the sea, on the mountains, in the forests or even to the centre of the underworld'. (said another)
ShlokaShloka 16
इत्येकैकं तदा तत्र वानरा बलदर्पिताः।
ऊचुश्च वचनं तत्र हरिराजस्य सन्निधौ।।4.45.17।।
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वे समस्त महाबली वानर और उनके यूथपति अपने राजा के द्वारा इस प्रकार प्रेरित हो भाँति-भाँति के शब्द करते, उच्च स्वर से गर्जते, दहाड़ते, किलकारियाँ मारते, दौड़ते और कोलाहल करते हुए कहने लगे—’राजन् ! हम सीता को साथ लायेंगे और रावण का वध कर डालेंगे। युद्ध में यदि रावण मेरे सामने आ जाय तो मैं अकेला ही उसे मार गिराऊँगा। तत्पश्चात् उसकी सारी सेना को मथकर कष्ट एवं भय से काँपती हुई जानकी जी को सहसा यहाँ उठा लाऊँगा। आप लोग यहीं ठहरें। मैं अकेला ही पाताल से भी जनककिशोरी को निकाल लाऊँगा, वृक्षों को उखाड़ फेकूँगा, पर्वतों के टुकड़े-टुकड़े कर डालूँगा, पृथ्वी को विदीर्ण कर दूँगा और समुद्रों को भी विक्षुब्ध कर डालूँगा। मैं सौ योजनतक कूद सकता हूँ, इसमें संशय नहीं है। मैं सौ योजन से भी अधिक दूरतक जा सकता हूँ। पृथ्वी, समुद्र, पर्वत, वन और पाताल में भी मेरी गति नहीं रुकती’
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The monkeys uttered such words in the presence of their king, being proud of their prowess. इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे पञ्चचत्वारिंशस्सर्गः।। Thus ends the fortyfifth sarga in Kishkindakanda of the first epic, the Holy Ramayana composed by sage Valmiki.