Kishkindha Kanda
Sarga 9: Episode of Vali's fight with Mayavi -- installation of Sugriva as king of Kishkinda -- return of Vali to Kishkinda.
किष्किन्धाकाण्डम् · सर्ग 9
24 shlokas
ShlokaShloka 1
वाली नाम मम भ्राता ज्येष्ठश्शत्रुनिषूदनः।
पितुर्बहुमतो नित्यं ममापि च तथा पुरा4.9.1।।
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‘रघुनन्दन! वाली मेरे बड़े भाई हैं। उनमें शत्रुओं का संहार करने की शक्ति है। मेरे पिता ऋक्षरजा उनको बहुत मानते थे। वैरसे पहले मेरे मन में भी उनके प्रति आदर का भाव था
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'My elder brother called Vali, capable of exterminating enemies was always highly regarded by my father and me.
ShlokaShloka 2
पितर्युपरतेऽस्माकं ज्येष्ठोऽयमिति मन्त्रिभिः।
कपीनामीश्वरो राज्ये कृतः परमसम्मतः4.9.2।।
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‘वे पिता-पितामहों के विशाल राज्य का शासन करने लगे और मैं हर समय विनीतभाव से दास की भाँति उनकी सेवा में रहने लगा
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ShlokaShloka 3
राज्यं प्रशासतस्तस्य पितृपैतामहं महत्।
अहं सर्वेषु कालेषु प्रणतः प्��ेष्यवत् स्थितः4.9.3।।
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‘वे पिता-पितामहों के विशाल राज्य का शासन करने लगे और मैं हर समय विनीतभाव से दास की भाँति उनकी सेवा में रहने लगा
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'I served him obediently like a servant while he ruled over the great ancestral kingdom inherited by him.
ShlokaShloka 4
मायावी नाम तेजस्वी पूर्वजो दुन्दुभेः सुतः।
तेन तस्य महद्वैरं स्त्रीकृतं विश्श्रुतं पुरा4.9.4।।
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‘उन दिनों मायावी नामक एक तेजस्वी दानव रहता था, जो मय दानव का पुत्र और दुन्दुभि का बड़ा भाई था। उसके साथ वाली का स्त्री के कारण बहुत बड़ा वैर हो गया था
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'Dundubhi's eldest son Mayabi was a mighty demon. He developed bitter enmity with Vali for the sake of a woman.
ShlokaShloka 5
स तु सुप्तजने रात्रौ किष्किन्धाद्वारमागतः।
नर्दति स्म सुसंरब्धो वालिनं चाह्वयद्रणे4.9.5।।
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‘एक दिन आधी रात के समय जब सब लोग सो गये, मायावी किष्किन्धापुरी के दरवाजे पर आया और क्रोध से भरकर गर्जने तथा वाली को युद्ध के लिये ललकारने लगा
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'One midnight when all were asleep, he (Mayabi) came to the entrance of Kishkinda screaming angrily and bellowing at Vali, challenging him to a duel.
ShlokaShloka 6
प्रसुप्तस्तु मम भ्राता नर्दितं भैरवस्वनम्।
श्रुत्वा न ममृषे वाली निष्पपात जवात्तदा4.9.6।।
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‘जब वे क्रोध करके उस श्रेष्ठ असुर को मारने के लिये निकले, उस समय मैंने तथा अन्तःपुर की स्त्रियों ने पैरों पड़कर उन्हें जाने से रोका
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' My brother Vali, who was asleep could not tolerate the frightful sound and jumped out of bed hastily.
ShlokaShloka 7
स तु वै निस्सृतः क्रोधात्तं हन्तुमसुरोत्तमम्।
वार्यमाणस्तत स्त्रीभिर्मया च प्रणतात्मना4.9.7।।
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‘जब वे क्रोध करके उस श्रेष्ठ असुर को मारने के लिये निकले, उस समय मैंने तथा अन्तःपुर की स्त्रियों ने पैरों पड़कर उन्हें जाने से रोका
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'Enraged, he came out to kill the powerful demon even though I with the womenfolk (of the harem) tried to prevent him.
ShlokaShloka 8
स तु निर्धूय ताः सर्वा निर्जगाम महाबलः।
ततोऽहमपि सौहार्दान्निस्सृतो वालिना सह4.9.8।।
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‘उस असुर ने मेरे भाई को देखा तथा कुछ दूर पर खड़े हुए मेरे ऊपर भी उसकी दृष्टि पड़ी; फिर तो वह भय से थर्रा उठा और बड़े जोर से भागा
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'That mighty warrior(Vali) came out, pushing aside all the womenfolk. I too followed him due to my affection towards him.
ShlokaShloka 9
स तु मे भ्रातरं दृष्ट्वा मां च दूरादवस्थितम्।
असुरो जातसन्त्रासः प्रदुद्राव ततो भृशम्4.9.9।।
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‘उस असुर ने मेरे भाई को देखा तथा कुछ दूर पर खड़े हुए मेरे ऊपर भी उसकी दृष्टि पड़ी; फिर तो वह भय से थर्रा उठा और बड़े जोर से भागा
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'On seeing my brother and me from a distance, the demon took to his heels scared.
ShlokaShloka 10
तस्मिन् द्रवति सन्त्रस्ते ह्यावां द्रुततरं गतौ।
प्रकाशश्च कृतो मार्गश्चन्द्रेणोद्गच्छता तदा4.9.10।।
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‘उसके भयभीत होकर भागने पर हम दोनों भाइयों ने बड़ी तेजी के साथ उसका पीछा किया। उस समय उदित हुए चन्द्रमा ने हमारे मार्ग को भी प्रकाशित कर दिया था
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'Frightened, he ran. We too chased him running faster. As the Moon was rising the path was welllit.
ShlokaShloka 11
स तृणैरावृतं दुर्गं धरण्या विवरं महत्।
प्रविवेशासुरो वेगादावामासाद्य विष्ठितौ4.9.11।।
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‘आगे जाने पर धरती में एक बहुत बड़ा बिल था, जो घास-फूस से ढका हुआ था। उसमें प्रवेश करना अत्यन्त कठिन था। वह असुर बड़े वेग से उस बिल में जा घुसा। वहाँ पहुँचकर हम दोनों ठहर गये
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'The demon entered into a hole (cave) covered with a heap of grass, difficult, therefore, of access. Both of us reached there and took position.
ShlokaShloka 12
तं प्रविष्टं रिपुं दृष्ट्वा बिलं रोषवशं गतः।
मामुवाच तदा वाली वचनं क्षुभितेन्द्रियः4.9.12।।
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‘शत्रु को बिल के अंदर घुसा देख वाली के क्रोध की सीमा न रही। उनकी सारी इन्द्रियाँ क्षुब्ध हो उठीं और वे मुझसे इस प्रकार बोले-
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'Seeing the enemy entering the cave, Vali became wrathful and his senses were terribly disturbed.He said to me:
ShlokaShloka 13
इह त्वं तिष्ठ सुग्रीव बिलद्वारि समाहितः।
यावत्तत्र प्रविश्याहं निहन्मि सहसा रिपुम्4.9.13।।
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‘सुग्रीव! जब तक मैं इस बिल के भीतर प्रवेश करके युद्ध में शत्रु को मारता हूँ, तब तक तुम आज इसके दरवाजे पर सावधानी से खड़े रहो’
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'O Sugriva wait here at the entrance of the cave and be on your alert until I enter this hole and kill the enemy'.
ShlokaShloka 14
मया त्वेतद्वचश्श्रुत्वा याचितस्स परन्तपः।
शापयित्वा तु मां पद्भ्यां प्रविवेश बिलं महत्4.9.14।।
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‘यह बात सुनकर मैंने शत्रुओं को संताप देने वाले वाली से स्वयं भी साथ चलने के लिये प्रार्थना की, किंतु वे अपने चरणों की सौगन्ध दिलाकर अकेले ही बिल में घुसे
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'On hearing him, I begged the scorcher of enemies (Vali) that I would follow him, but he made me swear on his feet and entered the cave.
ShlokaShloka 15
तस्य प्रविष्टस्य बिलं साग्रस्संवत्सरो गतः।
स्थितस्य मम बिलद्वारि स कालो व्यत्यवर्तत4.9.15।।
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‘बिल के भीतर गये हुए उन्हें एक साल से अधिक समय बीत गया और बिल के दरवाजे पर खड़े-खड़े मेरा भी उतना ही समय निकल गया
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ShlokaShloka 16
अहं तु नष्टं ज्ञात्वा तं स्नेहादागतसम्भ्रमः।
भ्रातरं न च पश्यामि पापाशङ्कि च मे मनः4.9.16।।
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‘तदनन्तर दीर्घकाल के पश्चात् उस बिल से सहसा फेनसहित खून की धारा निकली। उसे देखकर मैं बहुत दुःखी हो गया
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'Thinking him dead, I became agitated because of my love for him. My mind began to apprehend his death since I had not seen my brother for long.
ShlokaShloka 17
अथ दीर्घस्य कालस्य बिलात्तस्माद्विनिस्सृतम्।
सफेनं रुधिरं रक्तमहं दृष्ट्वा सुदुःखितः।।4.9.17।।
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‘तदनन्तर दीर्घकाल के पश्चात् उस बिल से सहसा फेनसहित खून की धारा निकली। उसे देखकर मैं बहुत दुःखी हो गया
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ShlokaShloka 18
��र्दतामसुराणां च ध्वनिर्मे श्रोत्रमागतः।
निरस्तस्य च सङ्ग्रामे क्रोशतोनिस्स्वनो गुरोः4.9.18।।
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'I heard the roaring voices of the demons and not the yelling of my brother engaged in the duel.
ShlokaShloka 19
अहं त्ववगतो बुद्ध्या चिह्नैस्तैर्भ्रातरं हतम्।
पिधाय च बिलद्वारं शिलया गिरिमात्रया4.9.19।।
शोकार्तश्चोदकं कृत्वा किष्किन्धामागतस्सखे।
गूहमानस्य मे तत्त्वं यत्नतो मन्त्रिभिश्श्रुतम्4.9.20।।
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‘इन सब चिह्नों को देखकर बुद्धि द्वारा विचार करने पर मैं इस निश्चय पर पहुँचा कि मेरे बड़े भाई मारे गये। फिर तो उस गुफा के दरवाजे पर मैंने पर्वत के समान एक पत्थर की चट्टान रख दी और उसे बंद करके भाई को जलाञ्जलि दे शोक से व्याकुल हुआ मैं किष्किन्धापुरी में लौट आया। सखे! यद्यपि मैं इस यथार्थ बात को छिपा रहा था, तथापि मन्त्रियों ने यत्न करके सुन लिया
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'O friend by those signs I understood that my brother was killed and concluding that way I blocked the entrance of the cave with a rock of the size of a mountain and offered oblations to my brother and came to Kishkinda. I intended to hide the fact of Vali's death. But the ministers came to know the truth with their efforts.
ShlokaShloka 20
ततोऽहं तैस्समागम्य सम्मतैरभिषेचितः।
राज्यं प्रशासतस्तस्य न्यायतो मम राघव4.9.21।।
आजगाम रिपुं हत्वा वाली तमसुरोत्तमम्।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘इन सब चिह्नों को देखकर बुद्धि द्वारा विचार करने पर मैं इस निश्चय पर पहुँचा कि मेरे बड़े भाई मारे गये। फिर तो उस गुफा के दरवाजे पर मैंने पर्वत के समान एक पत्थर की चट्टान रख दी और उसे बंद करके भाई को जलाञ्जलि दे शोक से व्याकुल हुआ मैं किष्किन्धापुरी में लौट आया। सखे! यद्यपि मैं इस यथार्थ बात को छिपा रहा था, तथापि मन्त्रियों ने यत्न करके सुन लिया
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'Then all the ministers assembled together and consecrated me. While I was ruling the kingdom lawfully, Vali, the monkey came back after killing the enemy demon.
ShlokaShloka 21
अभिषिक्तं तु मां दृष्ट्वा वाली संरक्तलोचनः।
मदीयान्मन्त्रिणो बद्ध्वा परुषं वाक्यमब्रवीत्4.9.22।।
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‘तब उन सबने मिलकर मुझे राज्य पर अभिषिक्त कर दिया। रघुनन्दन! मैं न्यायपूर्वक राज्य का संचालन करने लगा। इसी समय अपने शत्रुभूत उस दानव को मारकर वानरराज वाली घर लौटे। लौटने पर मुझे राज्य पर अभिषिक्त हुआ देख उनकी आँखें क्रोध से लाल हो गयीं
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'Seeing me on the throne, Vali became angry and his eyes turned red. He imprisoned my ministers and spoke to me harshly.
ShlokaShloka 22
निग्रहेऽपि समर्थस्य तं पापं प्रति राघव।
न प्रावर्तत मे बुद्धिर्भ्रातुर्गौरवयन्त्रिता4.9.23।।
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‘तब उन सबने मिलकर मुझे राज्य पर अभिषिक्त कर दिया। रघुनन्दन! मैं न्यायपूर्वक राज्य का संचालन करने लगा। इसी समय अपने शत्रुभूत उस दानव को मारकर वानरराज वाली घर लौटे। लौटने पर मुझे राज्य पर अभिषिक्त हुआ देख उनकी आँखें क्रोध से लाल हो गयीं
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'O Rama even though I was capable of restraining the sinner, my intellect did not let me do so out of respect for my brother.
ShlokaShloka 23
हत्वा शत्रुं स मे भ्राता प्रविवेश पुरं तदा4.9.24।।
मानयंस्तं महात्मानं यथावच्चाभ्यवादयम्।
उक्ताश्च नाशिषस्तेन सन्तुष्टेनान्तरात्मना4.9.25।।
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'When my brother came back to the town after killing the enemy, I offered as usual my salutations to him. But he did not bless me wholeheartedly.
ShlokaShloka 24
नत्वा पादावहं तस्य मकुटेनास्पृशं प्रभो
अपि वाली मम क्रोधान्न प्रसादं चकार सः4.9.26।।
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‘इस प्रकार शत्रु का वध करके मेरे भाई ने उस समय नगर में प्रवेश किया। उन महात्मा का सम्मान करते हुए मैंने यथोचितरूप से उनके चरणों में मस्तक झुकाया तो भी उन्होंने प्रसन्नचित्त से मुझे आशीर्वाद नहीं दिया
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'O lord I bowed at his feet with my crown in total submission. Even then Vali was not pleased a bit. इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे नवमस्सर्गः।। Thus ends the ninth sarga of Kishkindakanda of the Holy Ramayana, the first epic composed by sage Valmiki.