Kishkindha Kanda

Sarga 46: Sugriva narrates the fight between Dundubhi and Vali and explains how he has come to acquire knowledge of geogrphy of all quarters

किष्किन्धाकाण्डम् · सर्ग 46

21 shlokas

ShlokaShloka 1
गतेषु वानरेन्द्रेषु रामस्सुग्रीवमब्रवीत्। कथं भवान्विजानीते सर्वं वै मण्डलं भुवः।।4.46.1।।
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When the chieftains of the monkeys left, Rama enquired Sugriva, how he had come to know the regions of the entire earth (which is a mandala. a circular form).
ShlokaShloka 2
सुग्रीवस्तु ततो राममुवाच प्रणतात्मवान्। श्रूयतां सर्वमाख्यास्ये विस्तरेण नरर्षभ।।4.46.2।।
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तब सुग्रीव ने विनीत होकर श्रीरामचन्द्रजी से कहा —’भगवन्! मैं सब कुछ विस्तार के साथ बता रहा हूँ मेरी बातें सुनिये
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Then offering reverential salutation to Rama, Sugriva said, 'I shall narrate in detail. Listen, O bull among men
ShlokaShloka 3
यदा तु दुन्��ुभिं नाम दानवं महिषाकृतिम्। परिकालयते वाली मलयं प्रति पर्वतम्।।4.46.3।। तदा विवेश महिषो मलयस्य गुहां प्रति। विवेश वाली तत्रापि मलयं तज्जिघांसया।।4.46.4।।
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‘उस समय मैं विनीतभाव से उस गुफा के द्वार पर खड़ा रहा; क्योंकि वाली ने मुझे वहीं रख छोड़ा था। परंतु एक वर्ष व्यतीत हो जाने पर भी वाली उसके भीतर से नहीं निकले
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Vali chased the demon Dundubhi in buffalo form into a cave of mount Malaya in order to kill him.
ShlokaShloka 4
ततोऽहं तत्र निक्षिप्तो गुहाद्वारि विनीतवत्। न च निष्क्रामते वाली तदा संवत्सरे गते4.46.5।।
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‘उस समय मैं विनीतभाव से उस गुफा के द्वार पर खड़ा रहा; क्योंकि वाली ने मुझे वहीं रख छोड़ा था। परंतु एक वर्ष व्यतीत हो जाने पर भी वाली उसके भीतर से नहीं निकले
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'Then I waited at the entrance of the cave with due loyalty. A year passed. Yet Vali did not return.
ShlokaShloka 5
ततः क्षतजवेगेन आपुपूरे तदा बिलम्। तदहं विस्मितो दृष्ट्वा भ्रातृशोकविषार्दितः।।4.46.6।।
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‘उस समय मैं विनीतभाव से उस गुफा के द्वार पर खड़ा रहा; क्योंकि वाली ने मुझे वहीं रख छोड़ा था। परंतु एक वर्ष व्यतीत हो जाने पर भी वाली उसके भीतर से नहीं निकले
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'There seeing the cave overflowing with the gushing blood, I was bewildered, thinking that my brother might have been killed. I suffered intense agony.
ShlokaShloka 6
अथाऽहं कृतबुद्धिस्तु सुव्यक्तं निहतो गुरुः। शिला पर्वतसङ्काशा बिलद्वारि मया कृता।।4.46.7।। अशक्नुव न्निष्क्रमितुं महिषो विनशेदिति।
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‘तदनन्तर वेगपूर्वक बहे हुए रक्त की धारा से उस समय वह सारी गुफा भर गयी। यह देखकर मुझे बड़ा विस्मय हुआ तथा मैं भाई के शोक से व्यथित हो उठा
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'Thereafter, convinced that my brother was killed, I placed a mountainsize rock at the entrance of the cave so that Dundubhi will be destroyed, unable to come out of the cave.
ShlokaShloka 7
ततोऽहमागां किष्किन्धां निराशस्तस्य जीविते।।4.46.8।। राज्यं च सुमहत्प्राप्य तारया रुमया सह। मित्रैश्च सहितस्तत्र वसामि विगतज्वरः।।4.46.9।।
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‘सोचा-इस शिला से द्वार बंद हो जाने पर मायावी निकल नहीं सकेगा, भीतर ही घुट-घुटकर मर जायगा। इसके बाद भाई के जीवन से निराश होकर मैं किष्किन्धापुरी में लौट आया
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'I lost hope of his life and came back to Kishkinda. Having got the kingdom, and also Ruma and Tara, I was anointed king and ruled it fearlessly with all friends.
ShlokaShloka 8
आजगाम ततो वाली हत्वा तं दानवर्षभम्। ततोऽहमददां राज्यं गौरवाद्भययन्त्रितः।।4.46.10।।
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‘सोचा-इस शिला से द्वार बंद हो जाने पर मायावी निकल नहीं सकेगा, भीतर ही घुट-घुटकर मर जायगा। इसके बाद भाई के जीवन से निराश होकर मैं किष्किन्धापुरी में लौट आया
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ShlokaShloka 9
स मां जिघांसुर्दुष्टात्मा वाली प्रव्यथितेन्द्रियः। परिकालयते क्रोधाद्धावन्तं सचिवैस्सह।।4.46.11।।
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‘यहाँ विशाल राज्य तथा रुमासहित तारा को पाकर मित्रों के साथ मैं निश्चिन्ततापूर्वक रहने लगा
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'The evilminded Vali, having lost his selfcontrol, ran after me in anger, to kill me and my ministers. I kept running.
ShlokaShloka 10
ततोऽहं वालिना तेन साऽनुबद्धः प्रधावितः। नदीश्च विविधाः पश्यन्वनानि नगराणि च।।4.46.12।।
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‘तत्पश्चात् वानरश्रेष्ठ वाली उस दानव का वध करके आ पहुँचे। उनके आते ही मैंने भाई के गौरव से भयभीत हो वह राज्य उन्हें वापस कर दिया
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ShlokaShloka 11
आदर्शतलसङ्काशा ततो वै पृथिवी मया। अलातचक्रप्रतिमा दृष्टा गोष्पदवत्तदा।।4.46.13।।
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‘परंतु दुष्टात्मा वाली मुझे मार डालना चाहता था, उसकी सारी इन्द्रियाँ यह सोचकर व्यथित हो उठी थीं कि ‘यह मुझे मारने के लिये ही गुफा का द्वार बंद करके भाग आया था।’ मैं अपनी प्राण-रक्षा के लिये मन्त्रियों के साथ भागा और वाली मेरा पीछा करने लगा
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ShlokaShloka 12
पूर्वां दिशं ततो गत्वा पश्यामि विविधान् द्रुमान्। पर्वतन्श्च नदी रम्यास्सरांसि विविधानि च।।4.46.14।।
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‘वाली मेरे पीछे लगा रहा और मैं जोर-जोर से भागता गया। उसी समय मैंने विभिन्न नदियों, वनों और नगरों को देखते हुए सारी पृथ्वी को गायकी खुरी की भाँति मानकर उसकी परिक्रमा कर डाली। भागते समय मुझे यह पृथ्वी दर्पण और अलातचक्र के समान दिखायी दी
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'Then I ran in the eastern direction and saw many trees, lakes, rivers and beautiful mountains.
ShlokaShloka 13
उदयं तत्र पश्यामि पर्वतं धातुमण्डितम्। क्षीरोदं सागरं चैव नित्यमप्सरसालयम्।।4.46.15।।
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‘वाली मेरे पीछे लगा रहा और मैं जोर-जोर से भागता गया। उसी समय मैंने विभिन्न नदियों, वनों और नगरों को देखते हुए सारी पृथ्वी को गायकी खुरी की भाँति मानकर उसकी परिक्रमा कर डाली। भागते समय मुझे यह पृथ्वी दर्पण और अलातचक्र के समान दिखायी दी
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'There I saw, filled with minerals the mountain behind which the Sun rises and the milky ocean frequented by the apsaras.
ShlokaShloka 14
परिकालयमानस्तु वालिनाऽभिद्रुत स्तदा। पुनरावृत्य सहसा प्रस्थितोऽहं तदा विभो।।4.46.16।।
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‘तदनन्तर पूर्व दिशा में जाकर मैंने नाना प्रकार के वृक्ष, कन्दराओं सहित रमणीय पर्वत और भाँतिभाँति के सरोवर देखे
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'O king chased thus by Vali, I ran and turned back and ran againfast.
ShlokaShloka 15
पुनरावर्तमानस्तु वालिनाऽभिद्रुतोद्रुतम्। दिशस्तस्यास्ततो भूयः प्रस्थितो दक्षिणां दिशम्। विन्ध्यपादपसङ्कीर्णां चन्दनद्रुमशोभिताम्।।4.46.17।।
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‘वहीं नाना प्रकार के धातुओं से मण्डित उदयाचल तथा अप्सराओं के नित्य-निवासस्थान क्षीरोद सागर का भी मैंने दर्शन किया
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'Then chased by Vali, I changed my present direction from the east towards the southern quarter where Vindhya mountain stood with its, beautiful sandal trees.
ShlokaShloka 16
द्रुमशैलांस्ततः पश्यन्भूयो दक्षिणतोऽपराम्। पश्चिमां च दिशं प्राप्ता वालिना समभिद्रुतः।।4.46.18।।
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‘उस समय वाली पीछा करते रहे और मैं भागता रहा। प्रभो! जब मैं यहाँ फिर लौटकर आया, तब वाली के डर से पुनः सहसा मुझे भागना पड़ा
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'I was looking at the trees and mountains in the southern direction, I reached the western quarter pursued by Vali.
ShlokaShloka 17
सम्पश्यन्विविधान्देशानस्तं च गिरिसत्तमम्। प्राप्य चास्तं गिरिश्रेष्ठमुत्तरां सम्प्रधावितः।।4.46.19।।
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‘उस दिशा को छोड़कर मैं फिर दक्षिण दिशा की ओर प्रस्थित हुआ, जहाँ विन्ध्यपर्वत और नाना प्रकार के वृक्ष भरे हुए हैं तथा चन्दन के वृक्ष जिसकी शोभा बढ़ाते हैं।
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'Looking at the places around, I reached the best of mountains where the Sun sets (I found Vali still chasing me) and ran towards the north.
ShlokaShloka 18
हिमवन्तं च मेरुं च समुद्रं च तथोत्तरम्। यदा न विन्दं शरणं वालिना समभिद्रुतः।।4.46.20।। तदा मां बुद्धिसम्पन्नो हनूमान्वाक्यमब्रवीत्।
हिन्दी अर्थ देखें
‘वृक्षों और पर्वतों की ओट में बारंबार वाली को देखकर मैंने दक्षिण दिशा को छोड़ दिया तथा वाली के खदेड़ने पर पश्चिम दिशा की शरण ली
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'I saw Himavan and mount Meru on the north and the northern sea. Still pursued by Vali, I could not know where to go when wise Hanuman spoke to me these words:
ShlokaShloka 19
इदानीं मे स्मृतं राजन्यथा वाली हरीश्वरः।।4.46.21।। मतङ्गेन तदा शप्तो ह्यस्मिन्नाश्रममण्डले। प्रविशेद्यदि वै वाली मूर्धाऽस्य शतधा भवेत्।।4.46.22।। तत्र वासस्सुखोऽस्माकं निरुद्विग्नो भविष्यति।
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वहाँ नाना प्रकार के देशों को देखता हुआ मैं गिरिश्रेष्ठ अस्ताचल तक जा पहँचा। वहाँ पहँचकर मैं पुनः उत्तर दिशा की ओर भागा
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'I remembed Matanga's curse to Vali, king of monkeys. Vali would not enter the site of Matanga's hermitage as his head would break into a hundred pieces if he did'. Therefore we thought it would be safe for us to reside in that place.
ShlokaShloka 20
ततः पर्वतमासाद्य ऋष्यमूकं नृपात्मज।।4.46.23।। न विवेश तदा वाली मतङ्गस्य भयात्तदा।
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'O prince Rama then I reached mount Rishyamuka which Vali did not enter out of fear of the curse of Matanga.
ShlokaShloka 21
एवं मया तदा राजन्प्रत्यक्षमुपलक्षितम्।।4.46.24।। पृथिवीमण्डलं कृत्स्नं गुहामस्यागतस्ततः।
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'O king that way I surveyed the entire earth directly and returned to this cave and lived here. इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे षटचत्वारिंशस्सर्गः।। Thus ends the fortysixth sarga in Kishkindakanda of the first epic, the Holy Ramayana composed by sage Valmiki.