Kishkindha Kanda

Sarga 44: Sugriva speaks very highly of Hanuman to Rama -- Rama hands in his ring to Hanuman as a mark of identification.

किष्किन्धाकाण्डम् · सर्ग 44

17 shlokas

ShlokaShloka 1
विशेषेण तु सुग्रीवो हनूमत्यर्थमुक्तवान्। स हि तस्मिन्हरिश्रेष्ठे निश्चितार्थोऽर्थसाधने।।4.44.1।।
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समस्त वानरों के स्वामी सुग्रीव ने अत्यन्त प्रसन्न होकर परम पराक्रमी वायुपुत्र हनुमान् से इस प्रकार कहा—
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Sugriva mentioned about the capacity of Hanuman, the best of monkeys as he knew he would surely succeed in accomplishing the task.
ShlokaShloka 2
अब्रवीच्च हनूमन्तं विक्रान्तमनिलात्मजम्। सुग्रीवः परमप्रीतः प्रभु स्सर्ववनौकसाम्।।4.44.2।।
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समस्त वानरों के स्वामी सुग्रीव ने अत्यन्त प्रसन्न होकर परम पराक्रमी वायुपुत्र हनुमान् से इस प्रकार कहा—
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Sugriva, king of the monkeys, spoke, highly pleased, to Hanuman, the warrior son of the Windgod advancing towards him:
ShlokaShloka 3
न भूमौ नान्तरिक्षे वा नाम्बरे नामरालये। नाप्सु वा गतिसङ्गं ते पश्यामि हरिपुङ्गव।।4.44.3।।
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‘कपिश्रेष्ठ! पृथ्वी, अन्तरिक्ष, आकाश, देवलोक अथवा जल में भी तुम्हारी गति का अवरोध मैं कभी नहीं देखता हूँ
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'O best of monkeys I scarcely see a hero comparable to your speed on earth or in space or sky or heaven or water.
ShlokaShloka 4
सासुरास्सहगन्धर्वास्सनागनरदेवताः। विदिता स्सर्वलोकास्ते ससागरधराधराः।।4.44.4।।
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‘असुर, गन्धर्व, नाग, मनुष्य, देवता, समुद्र तथा पर्वतों सहित सम्पूर्ण लोकों का तुम्हें ज्ञान है
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ShlokaShloka 5
गतिर्वेगश्च तेजश्च लाघवं च महाकपे। पितुस्ते सदृशं वीर मारुतस्य महौजसः।।4.44.5।।
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‘वीर! महाकपे! सर्वत्र अबाधित गति, वेग, तेज और फुर्ती—ये सभी सद्गुण तुम में अपने महापराक्रमी पिता वायु के ही समान हैं
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'O hero, O great monkey in movement, speed, brilliance and quickness you are similar to your mighty father, the Windgod.
ShlokaShloka 6
तेजसा वापि ते भूतं न समं भुवि न विद्यते। तद्यथा लभ्यते सीता तत्त्वमेवोपपादय।।4.44.6।।
हिन्दी अर्थ देखें
‘हनुमन् ! तुम नीतिशास्त्र के पण्डित हो एकमात्र तुम्हीं में बल, बुद्धि, पराक्रम, देश-काल का अनुसरण तथा नीतिपूर्ण बर्ताव एक साथ देखे जाते हैं’
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'I do not know any living being equal to you in brilliance on this earth. Therefore, you alone know how to secure Sita.Go ahead
ShlokaShloka 7
त्वय्येव हनुम न्नस्ति बलं बुद्धिः पराक्रमः। देशकालानुवृत्तिश्च नयश्च नयपण्डित।।4.44.7।।
हिन्दी अर्थ देखें
‘हनुमन् ! तुम नीतिशास्त्र के पण्डित हो एकमात्र तुम्हीं में बल, बुद्धि, पराक्रम, देश-काल का अनुसरण तथा नीतिपूर्ण बर्ताव एक साथ देखे जाते हैं’
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'O learned Hanuman I am of opinion that in you alone rest strength, wisdom, prowess, ability to act in accordance with time and place and knowledge of statecraft'.
ShlokaShloka 8
ततः कार्यसमासङ्गमवगम्य हनूमति। विदित्वा हनुमन्तं च चिन्तयामास राघवः।।4.44.8।।
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सुग्रीव की बात सुनकर श्रीरामचन्द्रजी को यह ज्ञात हुआ कि इस कार्य की सिद्धि का सम्बन्ध—इसे पूर्ण करने का सारा भार हनुमान् पर ही है। उन्होंने स्वयं भी यह अनुभव किया कि हनुमान् इस कार्य को सफल करने में समर्थ हैं फिर वे इस प्रकार मन-ही मन विचार करने लगे—
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Having understood that Hanuman was capable of accomplishing the goal, Rama started reflecting as follows:
ShlokaShloka 9
सर्वथा निश्चितार्थोऽयं हनूमति हरीश्वरः। निश्चितार्थकरश्चापि हनूमान्कार्यसाधने।।4.44.9।।
हिन्दी अर्थ देखें
‘वानरराज सुग्रीव सर्वथा हनुमान् पर ही यह भरोसा किये बैठे हैं कि ये ही निश्चित रूप से हमारे इस प्रयोजन को सिद्ध कर सकते हैं। स्वयं हनुमान् भी अत्यन्त निश्चित रूप से इस कार्य को सिद्ध करने का विश्वास रखते हैं
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'This monkey king, Sugriva has confidence in Hanuman that he will by all means accomplish the task.'
ShlokaShloka 10
तदेवं प्रस्थितस्यास्य परिज्ञातस्य कर्मभिः। भर्त्रा परिगृहीतस्य ध्रुवः कार्यफलोदयः।।4.44.10।।
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तदनन्तर शत्रुओं को संताप देने वाले श्रीराम ने प्रसन्नतापूर्वक अपने नाम के अक्षरों से सुशोभित एक अंगूठी हनुमान जी के हाथ में दी, जो राजकुमारी सीता को पहचान के रूप में अर्पण करने के लिये थी
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'The king Sugriva knows for sure that if Hanuman goes forth, success is assured. So he favours him.'
ShlokaShloka 11
तं समीक्ष्य महातेजा व्यवसायोत्तरं हरिम्। कृतार्थ इव संवृत्तः प्रहृष्टेन्द्रियमानसः।।4.44.11।।
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तदनन्तर शत्रुओं को संताप देने वाले श्रीराम ने प्रसन्नतापूर्वक अपने नाम के अक्षरों से सुशोभित एक अंगूठी हनुमान जी के हाथ में दी, जो राजकुमारी सीता को पहचान के रूप में अर्पण करने के लिये थी
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The mighty Rama was happy in his heart to see Hanuman. He felt as if the task is achieved.
ShlokaShloka 12
ददौ तस्य ततः प्रीतस्स्वनामाङ्कोपशोभितम्। अङ्गुलीयमभिज्ञानं राजपुत्र्याः परन्तपः।।4.44.12।।
हिन्दी अर्थ देखें
तदनन्तर शत्रुओं को संताप देने वाले श्रीराम ने प्रसन्नतापूर्वक अपने नाम के अक्षरों से सुशोभित एक अंगूठी हनुमान जी के हाथ में दी, जो राजकुमारी सीता को पहचान के रूप में अर्पण करने के लिये थी
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Rama, scorcher of enemies, gladly gave Hanuman a ring inscribed with his name as a mark of identification by princess (Sita). And said:
ShlokaShloka 13
अनेन त्वां हरिश्रेष्ठ चिह्नेन जनकात्मजा। मत्सकाशादनुप्राप्तमनुद्विग्नाऽनुपश्यति।।4.44.13।।
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अँगूठी देकर वे बोले—कपिश्रेष्ठ! इस चिह्न के द्वारा जनककिशोरी सीता को यह विश्वास हो जायगा कि तुम मेरे पास से ही गये हो। इससे वह भय त्यागकर तुम्हारी ओर देख सकेगी
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'O distinguished monkey Janaka's daughter will greet you without any hesitation when you present this signet to her. She will know that you have come from me.
ShlokaShloka 14
व्यवसायश्च ते वीर सत्त्वयुक्तश्च विक्रमः। सुग्रीवस्य च सन्देशस्सिद्धिं कथयतीव मे।।4.44.14।।
हिन्दी अर्थ देखें
‘वीरवर! तुम्हारा उद्योग, धैर्य, पराक्रम और सुग्रीव का संदेश—ये सब मुझे इस बात की सूचना-सी दे रहे हैं कि तुम्हारे द्वारा कार्य की सिद्धि अवश्य होगी’
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'O great hero your enterprise, prowess coupled with courage and Sugriva's message to you seem to indicate to me about the success of your mission'.
ShlokaShloka 15
स तद्गृह्य हरिश्रेष्ठः स्थाप्य मूर्ध्नि कृताञ्जलिः। वन्दित्वा चरणौ चैव प्रस्थितः प्लवगोत्तमः।।4.44.15।।
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वानरश्रेष्ठ हनुमान् ने वह अँगूठी लेकर उसे मस्तक पर रखा और फिर हाथ जोड़कर श्रीराम के चरणों में प्रणाम करके वे वानरशिरोमणि वहाँ से प्रस्थित हुए
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The foremost among the monkeys took the ring given to him, placed it on his forehead and saluated it with folded palms. He then prostrated at the feet of Rama and departed.
ShlokaShloka 16
स तत्प्रकर्षन् हरीणां महद्बलं बभूव वीरः पवनात्मजः कपिः। गताम्बुदे व्योम्नि विशुद्धमण्डलः शशीव नक्षत्रगणोपशोभितः।।4.44.16।।
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उस समय वीर-वानर पवनकुमार हनुमान् अपने साथ वानरों की उस विशाल सेना को ले जाते हुए उसी तरह शोभा पाने लगे, जैसे मेघरहित आकाश में विशुद्ध (निर्मल) मण्डल से उपलक्षित चन्द्रमा नक्षत्रसमूहों के साथ सुशोभित होता है
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Like the moon adorned by hosts of stars in the cloudless sky, the mighty heroic Hanuman, the great son of the Windgod, shone in the midst of the army of monkeys.
ShlokaShloka 17
अतिबल बलमाश्रितस्तवाहं हरिवरविक्रम विक्रमैरनल्पैः। पवनसुत यथाऽभिगम्यते सा जनकसुता हनुमं स्तथा कुरुष्व।।4.44.17।।
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जाते हुए हनुमान् को सम्बोधित करके श्रीरामचन्द्रजी ने फिर कहा—’अत्यन्त बलशाली कपिश्रेष्ठ! मैंने तुम्हारे बल का आश्रय लिया है। पवनकुमार हनुमान् ! जिस प्रकार भी जनकनन्दिनी सीता प्राप्त हो सके, तुम अपने महान् बल-विक्रम से वैसा ही प्रयत्न करो अच्छा, अब जाओ’
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O Hanuman son of the Windgod, O valiant among the Vanaras, I bank on your strength. Do whatever you can with your mighty valour so that the daughter of Janaka can be found. इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे चतुश्चत्वारिंशस्सर्गः।। Thus ends the fortyfourth sarga in Kishkindakanda of the first epic, the Holy Ramayana composed by sage Valmiki.