Kishkindha Kanda

Sarga 61: Sampati's revelation to sage Nishakara about his burnt wings.

किष्किन्धाकाण्डम् · सर्ग 61

16 shlokas

ShlokaShloka 1
ततस्तद्दारुणं कर्म दुष्करं सहसात्कृतम्। आचचक्षे मुनेस्सर्वं सूर्यानुगमनं तथा।।4.61.1।।
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‘उनके इस प्रकार पूछने पर मैंने बिना सोचे-समझे सूर्य का अनुगमनरूप जो दुष्कर एवं दारुण कार्य किया था, वह सब उन्हें बताया
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'Then I revealed everything to the sage,including the arrogant, impetuous action of rashly following the Sun (for challenging Indra).
ShlokaShloka 2
भगवन्व्रणयुक्तत्वाल्लज्जया व्याकुलेन्द्रियः। परिश्रान्तो न शक्नोमि वचनं परिभाषितुम्।।4.61.2।।
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‘मैं और जटायु दोनों ही गर्व से मोहित हो रहे थे; अतः अपने पराक्रम की थाह लगाने के लिये हम दोनों दूर तक पहुँचने के उद्देश्य से उड़ने लगे
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'O revered sage I am exhausted and my senses are depressed. I am ashamed of myself. My body is wounded. Therefore I am not able to reply.
ShlokaShloka 3
अहं चैव जटायुश्च सङ्घर्��ाद्धर्पमोहितौ। आकाशं पतितौ वीरौ जिज्ञासन्तौ पराक्रमम्।।4.61.3।।
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‘मैं और जटायु दोनों ही गर्व से मोहित हो रहे थे; अतः अपने पराक्रम की थाह लगाने के लिये हम दोनों दूर तक पहुँचने के उद्देश्य से उड़ने लगे
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'Deluded by pride, I and my brother Jatayu challenging each other to test our relative strength flew far into the sky.
ShlokaShloka 4
कैलासशिखरे बद्ध्वा मुनीनामग्रतः पणम्। रविस्स्यादनुयातव्यो यावदस्तं महागिरिम्।।4.61.4।।
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‘यह निश्चय करके हम साथ ही आकाश में जा पहुँचे। वहाँ से पृथ्वी के भिन्न-भिन्न नगर में हम रथ के पहिये के बराबर दिखायी देते थे
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'Both of us made a bet on the peak of mount Kailasa in the presence of sages to follow the Sungod until he sets on the western mountain.
ShlokaShloka 5
अथाऽवां युगपत्प्राप्तावपश्याव महीतले। रथचक्रप्रमाणानि नगराणि पृथक्पृथक्।।4.61.5।।
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‘यह निश्चय करके हम साथ ही आकाश में जा पहुँचे। वहाँ से पृथ्वी के भिन्न-भिन्न नगर में हम रथ के पहिये के बराबर दिखायी देते थे
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'And from there both of us looked at all the cities on the land which seemed like the size of chariot wheels one after the other.
ShlokaShloka 6
क्वचिद्वादित्रघोषांश्च ब्रह्मघोषांश्च शुश्रुवः। गायन्तीश्चाङ्गना बह्वीः पश्यावो रक्तवाससः।।4.61.6।।
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'We heard at some places sounds of musical instruments, sounds of Vedic chanting, and many lovely young women dressed in redsinging.
ShlokaShloka 7
तूर्णमुत्पत्य चाकाशमादित्यपथमाश्रितौ। आवामालोकयावस्तद्वनं शाद्वलसन्निभम्।।4.61.7।।
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‘उससे भी ऊँचे उड़कर हम तुरंत सूर्यके मार्ग पर जा पहुँचे। वहाँ से नीचे दृष्टि डालकर जब दोनों ने देखा, तब यहाँ के जंगल हरी-हरी घास की तरह दिखायी देते थे
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'We flew quickly into the sky and reached the path of the Sun and looked down at the forest which looked like a green lawn.
ShlokaShloka 8
उपलैरिव सञ्छन्ना दृश्यते भूश्शिलोच्चयैः। आपगाभिश्च संवीता सूत्रैरिव वसुन्धरा।।4.61.8।।
हिन्दी अर्थ देखें
‘पर्वतों के कारण यह भूमि ऐसी जान पड़ती थी,मानो इस पर पत्थर बिछाये गये हों और नदियों से ढकी हुई भूमि ऐसी लगती थी, मानो उसमें सूत के धागे लपेटे गये हों
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'The earth filled with lofty mountains appeared as if it is covered with pebbles. Surrounded by rivers meandering, it looked as though it was entwined with threads.
ShlokaShloka 9
हिमवांश्चैव विन्ध्यश्च मेरुश्च सुमहान्नगः। भूतले सम्प्रकाशन्ते नागा इव जलाशये।।4.61.9।।
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‘उस समय न दक्षिण दिशा का ज्ञान होता था, न अग्निकोण अथवा पश्चिम आदि दिशा का ही यद्यपि यह जगत् नियमित रूप से स्थित था, तथापि उस समय मानो युगान्तकाल में अग्नि से दग्ध हो गया हो, इस प्रकार नष्टप्राय दिखायी देता था
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'The mountains of the earth, Himavan and Vindhya and the great Meru looked like huge elephants in a huge pond.
ShlokaShloka 10
तीव्रस्स्वेदश्च खेदश्च भयं चासीत्तदाऽऽवयोः। समाविशति मोहश्च तमो मूर्छा च दारुणा।।4.61.10।।
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‘उस समय न दक्षिण दिशा का ज्ञान होता था, न अग्निकोण अथवा पश्चिम आदि दिशा का ही यद्यपि यह जगत् नियमित रूप से स्थित था, तथापि उस समय मानो युगान्तकाल में अग्नि से दग्ध हो गया हो, इस प्रकार नष्टप्राय दिखायी देता था
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'Much sweat, pain and fear generated in us while we went on and up. This led to terrific confusion and stupor.
ShlokaShloka 11
न दिग्विज्ञायते याम्या नाग्नेयी न च वारुणी। युगान्ते नियतो लोको हतो दग्ध इवाग्निना।।4.61.11।।
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‘उस समय न दक्षिण दिशा का ज्ञान होता था, न अग्निकोण अथवा पश्चिम आदि दिशा का ही यद्यपि यह जगत् नियमित रूप से स्थित था, तथापि उस समय मानो युगान्तकाल में अग्नि से दग्ध हो गया हो, इस प्रकार नष्टप्राय दिखायी देता था
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'I did not know which the southern direction was or the southeast or the west. It looked as if the world had been consumed by fire and dissolved, as if it was the end of the yuga.
ShlokaShloka 12
मनश्च मे हतं भूयस्सन्निवर्त्यतु संश्रयम्। यत्नेन महता ह्यस्मिन्पुनस्सन्धाय चक्षुषी।।4.61.12।। यत्नेन महता भूयो भास्करः प्रतिलोकितः। तुल्यः पृथ्वीप्रमाणेन भास्करः प्रतिभाति नौ।।4.61.13।।
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‘जटायु मुझसे पूछे बिना ही पृथ्वी पर उतर पड़ा। उसे नीचे जाते देख मैंने भी तुरंत अपने-आपको आकाश से नीचे की ओर छोड़ दिया
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'My mind was disturbed and I turned my attention from the object. Once again I focused my attention (on the Sun) and could see the Sungod with great effort. The Sun appeared to us equal in size to earth.
ShlokaShloka 13
जटायुर्मामनापृच्छ्य निपपात महीं ततः। तं दृष्ट्वा तूर्णमाकाशादात्मानं मुक्तवानहम्।।4.61.14।।
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‘जटायु मुझसे पूछे बिना ही पृथ्वी पर उतर पड़ा। उसे नीचे जाते देख मैंने भी तुरंत अपने-आपको आकाश से नीचे की ओर छोड़ दिया
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'Without taking leave of me Jatayu descended down to the earth. Seeing that, I also followed him down quickly from the sky.
ShlokaShloka 14
पक्षाभ्यां च मया गुप्तो जटायुर्न प्रदह्यते। प्रमादात्तत्र निर्दग्धः पतन्वायुपथादहम्।।4.61.15।।
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‘जटायु मुझसे पूछे बिना ही पृथ्वी पर उतर पड़ा। उसे नीचे जाते देख मैंने भी तुरंत अपने-आपको आकाश से नीचे की ओर छोड़ दिया
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'I protected Jatayu with my wings so that he was not burnt. I, however, got burnt miserably and fell down from the aerial region.
ShlokaShloka 15
आशङ्के तं निपतितं जनस्थाने जटायुषम्। अहं तु पतितो विन्ध्ये दग्धपक्षो जडीकृतः।।4.61.16।।
हिन्दी अर्थ देखें
‘मैंने अपने दोनों पंखों से जटायु को ढक लिया था, इसलिये वह जल न सका। मैं ही असावधानी के कारण वहाँ जल गया। वायु के पथ से नीचे गिरते समय मुझे ऐसा संदेह हुआ कि जटायु जनस्थान में गिरा है; परंतु मैं इस विन्ध्यपर्वत पर गिरा था। मेरे दोनों पंख जल गये थे, इसलिये यहाँ जडवत् हो गया
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'I thought Jatayu had fallen down somewhere at Janasthana, but I fell on Vindhya, wings burnt, in an unconscious state.
ShlokaShloka 16
राज्येन हीनो भ्रात्रा च पक्षाभ्यां विक्रमेण च। सर्वथा मर्तुमेवेच्छन्पतिष्ये शिखराद्गीरेः।।4.61.17।।
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‘मैंने अपने दोनों पंखों से जटायु को ढक लिया था, इसलिये वह जल न सका। मैं ही असावधानी के कारण वहाँ जल गया। वायु के पथ से नीचे गिरते समय मुझे ऐसा संदेह हुआ कि जटायु जनस्थान में गिरा है; परंतु मैं इस विन्ध्यपर्वत पर गिरा था। मेरे दोनों पंख जल गये थे, इसलिये यहाँ जडवत् हो गया
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'Bereft of my kingdom, my brother and my wings, and having lost my strength I desire to fall down from the mountain top and die.' इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वल्��ीकीय आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे एकषष्टितमस्सर्गः।। Thus ends the sixtyfirst sarga in Kishkindakanda of the first epic, the Holy Ramayana composed by sage Valmiki.