Kishkindha Kanda
Sarga 51: The story of Svayamprabha
किष्किन्धाकाण्डम् · सर्ग 51
16 shlokas
ShlokaShloka 1
इत्युक्त्वा हनुमांस्तत्र पुनः कृष्णाजिनाम्बराम्।
अब्रवीत्तां महाभागां तापसीं धर्मचारिणीम्।।4.51.1।।
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इस तरह पूछकर हनुमान जी चीर एवं कृष्ण मृगचर्म धारण करने वाली उस धर्मपरायणा महाभागा तपस्विनी से वहाँ फिर बोले
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On meeting the distinguished, righteous ascetic woman robed in deer skin, Hanuman said:
ShlokaShloka 2
इदं प्रविष्टास्सहसा बिलं तिमिरसंवृतम्।
क्षुत्पिपासापरिश्रान्ताः परिखिन्नाश्च सर्वशः।।4.51.2।।
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‘देवि! हम सब लोग भूख-प्यास और थकावट से कष्ट पा रहे थे। इसलिये सहसा इस अन्धकारपूर्ण गुफा में घुस आये। भूतल का यह विवर बहुत बड़ा है। हम प्यास से पीड़ित होने के कारण यहाँ आये हैं, किंतु यहाँ के इन ऐसे अद्भुत विविध पदार्थों को देखकर हमारे मन में बड़ी व्यथा हुई है हम यह सोचकर चिन्तित हो उठे हैं कि यह असुरों की माया तो नहीं है, इसीलिये हमारे मन में घबराहट हो रही है। हमारी विवेकशक्ति लुप्त-सी हो गयी है। हम जानना चाहते हैं कि ये बालसूर्य के समान कान्तिमान् सुवर्णमय वृक्ष किसके हैं?
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'We are exhausted with thirst and hunger. We are fatigued. (Hence) we entered this dark cave all at once(without waiting for permission).
ShlokaShloka 3
महद्धरण्या विवरं प्रविष्टाः स्म पिपासिताः।
इमां स्त्वेवंविधान्भावान्विविधानद्भुतोपमान्।।4.51.3।।
दृष्ट्वा वयं प्रव्यथितास्सम्भ्रान्ता नष्टचेतसः।
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‘देवि! हम सब लोग भूख-प्यास और थकावट से कष्ट पा रहे थे। इसलिये सहसा इस अन्धकारपूर्ण गुफा में घुस आये। भूतल का यह विवर बहुत बड़ा है। हम प्यास से पीड़ित होने के कारण यहाँ आये हैं, किंतु यहाँ के इन ऐसे अद्भुत विविध पदार्थों को देखकर हमारे मन में बड़ी व्यथा हुई है हम यह सोचकर चिन्तित हो उठे हैं कि यह असुरों की माया तो नहीं है, इसीलिये हमारे मन में घबराहट हो रही है। हमारी विवेकशक्ति लुप्त-सी हो गयी है। हम जानना चाहते हैं कि ये बालसूर्य के समान कान्तिमान् सुवर्णमय वृक्ष किसके हैं?
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'Thirst drove us into this cave on earth. We are amazed at the kind of many wonderful objects here and have nearly lost our senses. We are tormented with pain.
ShlokaShloka 4
कस्यैते काञ्चना वृक्षास्तरुणादित्यसन्निभाः।।4.51.4।।
शुचीन्यभ्यवहार्याणि मूलानि च फलानि च।
काञ्चनानि विमानानि राजतानि गृहाणि च।।4.51.5।।
तपनीयगवाक्षाणि मणिजालावृतानि च।
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‘देवि! हम सब लोग भूख-प्यास और थकावट से कष्ट पा रहे थे। इसलिये सहसा इस अन्धकारपूर्ण गुफा में घुस आये। भूतल का यह विवर बहुत बड़ा है। हम प्यास से पीड़ित होने के कारण यहाँ आये हैं, किंतु यहाँ के इन ऐसे अद्भुत विविध पदार्थों को देखकर हमारे मन में बड़ी व्यथा हुई है हम यह सोचकर चिन्तित हो उठे हैं कि यह असुरों की माया तो नहीं है, इसीलिये हमारे मन में घबराहट हो रही है। हमारी विवेकशक्ति लुप्त-सी हो गयी है। हम जानना चाहते हैं कि ये बालसूर्य के समान कान्तिमान् सुवर्णमय वृक्ष किसके हैं?
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'To whom do these golden trees resembling the rising Sun belong? For whom are these tasty roots and fruits? Whose are these manystoreyed golden houses with glittering windows adorned with silver lattices encrusted with gems?
ShlokaShloka 5
पुष्पिताः फलवन्तश्च पुण्यास्सुरभिगन्धिनः।।4.51.6।।
इमे जाम्बूनदमयाः पादपाः कस्य तेजसा।
काञ्चनानि च पद्मानि जातानि विमले जले।।4.51.7।।
कथं मत्स्याश्च सौवर्णा दृश्यन्ते सह कच्छपैः।
आत्मानमनुभावं च कस्य चैतत्तपोबलम्।।4.51.8।।
अजानतां न स्सर्वेषां सर्वमाख्यातुमर्हसि।
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‘अच्छा, ये शुद्ध भोजन और फल-मूल प्रस्तुत हैं। इन्हें खाकर पानी पी लो फिर मुझसे अपना सारा वृत्तान्त कहो’
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'By whose prowess are these golden trees yielding sacred fragrant flowers and fruits? How are these golden lotuses created in the clear water? How is it that here are golden fishes and tortoises? Whose fruit of penance is this? Is it by your power? We do not know. You should tell all of us everything'.
ShlokaShloka 6
एवमुक्ता हनुमता तापसी धर्मचारिणी।।4.51.9।।
प्रत्युवाच हनूमन्तं सर्वभूतहिते रता।
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‘अच्छा, ये शुद्ध भोजन और फल-मूल प्रस्तुत हैं। इन्हें खाकर पानी पी लो फिर मुझसे अपना सारा वृत्तान्त कहो’
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The noble ascetic committed to the welfare of all beings replied to Hanuman's enquiry:
ShlokaShloka 7
मयो नाम महातेजा मायावी वानरर्षभः।।4.51.10।।
तेनेदं निर्मितं सर्वं मायया काञ्चनं वनम्।
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‘अच्छा, ये शुद्ध भोजन और फल-मूल प्रस्तुत हैं। इन्हें खाकर पानी पी लो फिर मुझसे अपना सारा वृत्तान्त कहो’
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'O bull among monkeys this golden forest was created by the magical power of a deceitful demon called Maya.
ShlokaShloka 8
पुरा दानवमुख्यानां विश्वकर्मा बभूव ह।।4.51.11।।
येनेदं काञ्चनं दिव्यं निर्मितं भवनोत्तमम्।
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‘अच्छा, ये शुद्ध भोजन और फल-मूल प्रस्तुत हैं। इन्हें खाकर पानी पी लो फिर मुझसे अपना सारा वृत्तान्त कहो’
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This best of wonderful mansions has been constructed earlier by Visvakarma, the chief (architect) of the demons.
ShlokaShloka 9
स तु वर्षसहस्राणि तपस्तप्त्वा महावने।।4.51.12।।
पितामहाद्वरं लेभे सर्वमौशनसं धनम्।
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‘अच्छा, ये शुद्ध भोजन और फल-मूल प्रस्तुत हैं। इन्हें खाकर पानी पी लो फिर मुझसे अपना सारा वृत्तान्त कहो’
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'He (Maya) performed rigorous penance in the dense forest for thousands of years seeking the favour of Brahma, the creator and obtained a boon that he should inherit all the wealth of Usanas (Shukra).
ShlokaShloka 10
वनं विधाय बलवान्सर्वकामेश्वरस्तदा।।4.51.13।।
उवास सुखितः कालं कञ्चिदस्मिन्महावने।
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‘अच्छा, ये शुद्ध भोजन और फल-मूल प्रस्तुत हैं। इन्हें खाकर पानी पी लो फिर मुझसे अपना सारा वृत्तान्त कहो’
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Then the mighty Maya who received the power of (executing) desires created this mansion and lived here happily for some time in this dense forest.
ShlokaShloka 11
तमप्सरसि हेमायां सक्तं दानवपुङ्गवम्।।4.51.14।।
विक्रम्यैवाशनिं गृह्य जघानेत्रः पुरन्दरः।
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‘अच्छा, ये शुद्ध भोजन और फल-मूल प्रस्तुत हैं। इन्हें खाकर पानी पी लो फिर मुझसे अपना सारा वृत्तान्त कहो’
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'Seeing this great demon in love with a heavenly apsara (nymph) called Hema, Lord Indra with all his might attacked him with his thunderbolt.
ShlokaShloka 12
इदं च ब्रह्मणा दत्तं हेमायै वनमुत्तमम्।।4.51.15।।
शाश्वता: कामभोगश्च गृहं चेदं हिरण्मयम्।
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‘अच्छा, ये शुद्ध भोजन और फल-मूल प्रस्तुत हैं। इन्हें खाकर पानी पी लो फिर मुझसे अपना सारा वृत्तान्त कहो’
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'Thus this wonderful forest and the golden house with all luxury were given away permanently to Hema by the creator Brahma.
ShlokaShloka 13
दुहिता मेरुसावर्णेरहं तस्यास्स्वयंप्रभा।।4.51.16।।
इदं रक्षामि भवनं हेमाया वानरोत्तम।
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‘अच्छा, ये शुद्ध भोजन और फल-मूल प्रस्तुत हैं। इन्हें खाकर पानी पी लो फिर मुझसे अपना सारा वृत्तान्त कहो’
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'O best of monkeys daughter of Meru Sauvarni, I am Svayamprabha (selfilluminator), caretaker of this house of Hema. (Meru Sauvarni is the eleventh Manu).
ShlokaShloka 14
मम प्रियसखी हेमा नृत्तगीतविशारदा।।4.51.17।।
तया दत्तवरा चास्मि रक्षामि भवनोत्तमम्।
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‘अच्छा, ये शुद्ध भोजन और फल-मूल प्रस्तुत हैं। इन्हें खाकर पानी पी लो फिर मुझसे अपना सारा वृत्तान्त कहो’
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'Hema, wellversed in dance and music is a fast friend to me. She granted a boon (that none can resist me) and gave this house of which I am the caretaker.
ShlokaShloka 15
किं कार्यं कस्य वा हेतोः कान्ताराणि प्रपश्यथ।।4.51.18।।
कथं चेदं वनं दुर्गं युष्माभिरुपलक्षितम्।
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‘अच्छा, ये शुद्ध भोजन और फल-मूल प्रस्तुत हैं। इन्हें खाकर पानी पी लो फिर मुझसे अपना सारा वृत्तान्त कहो’
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'What is your mission? For what purpose have you come to this inaccessible forest? What are you looking for?How did you find this?
ShlokaShloka 16
इमान्यभ्यवहार्याणि मूलानि च फलानि च।।4.51.19।।
भुक्त्वा पीत्वा च पानीयं सर्वं मे वक्तुमर्हथ।
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‘अच्छा, ये शुद्ध भोजन और फल-मूल प्रस्तुत हैं। इन्हें खाकर पानी पी लो फिर मुझसे अपना सारा वृत्तान्त कहो’
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'Eat these wonderful roots and fruits and have these drinks and then tell me all about you. इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे एकपञ्चशस्सर्गः।। Thus ends of the fiftyfirst sarga in Kishkindakanda of the first epic, the Holy Ramayana composed by sage Valmiki.