Aranya Kanda
Sarga 2: Viradha attacks Rama and Lakshmana -- carries away Sita.
अरण्यकाण्डम् · सर्ग 2
23 shlokas
ShlokaShloka 1
कृतातिथ्योऽथ रामस्तु सूर्यस्योदयनं प्रति।
आम्नत्ऱ्य स मुनीन्सर्वान्वनमेवान्वगाहत।।3.2.1।।
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रात्रि में उन महर्षियों का आतिथ्य ग्रहण करके सबेरे सूर्योदय होने पर समस्त मुनियों से विदा ले श्रीरामचन्द्रजी पुनः वन में ही आगे बढ़ने लगे
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After receiving hospitality from the sages, Rama took of all of them at sunrise and entered deep into the forest.
ShlokaShloka 2
नानामृगगणाकीर्णमृक्षशार्दूल सेवितम्।
ध्वस्तवृक्षलतागुल्मं दुर्दर्शसलिलाशयम्।।3.2.2।।
निष्कूजनानाशकुनिझिल्लिकागणनादितम्।
लक्ष्मणानुगतो रामो वनमध्यं ददर्श ह।।3.2.3।।
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इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्ड में दूसरा सर्ग पूरा हुआ
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With Lakshmana following, Rama went through the forest, filled with herds of animals and inhabited by bears and tigers. It was a place where trees, creepers and bushes were crushed (by frequent visits of demons). It was difficult to locate a water source. And it resounded with the chirping of various birds and insects (crickets).
ShlokaShloka 3
सीतया सह काकुत्स्थस्तस्मिनघोरमृगायुते।
ददर्श गिरिशृङ्गाभं पुरुषादं महास्वनम्।।3.2.4।।
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जाते-जाते लक्ष्मणसहित श्रीराम ने वन के मध्यभाग में एक ऐसे स्थान को देखा, जो नाना प्रकार के मृगों से व्याप्त था। वहाँ बहुत-से रीछ और बाघ रहा करते थे। वहाँ के वृक्ष, लता और झाड़ियाँ नष्ट-भ्रष्ट हो गयी । थीं। उस वनप्रान्त में किसी जलाशय का दर्शन होना कठिन था। वहाँ के पक्षी वहीं चहक रहे थे। झींगरों की झंकार गूंज रही थी
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While Rama along with Sita was wandering in the forest infested with dreadful animals, he saw a roaring cannibal resembling the peak of a mountain.
ShlokaShloka 4
गम्भीराक्षं महावक्त्रं विकटं विषमोदरम्।
बीभत्सं विषमं दीर्घं विकृतं घोरदर्शनम्।।3.2.5।।
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भयंकर जंगली पशुओं से भरे हुए उस दुर्गम वन में सीता के साथ श्रीरामचन्द्रजी ने एक नरभक्षी राक्षस देखा, जो पर्वतशिखर के समान ऊँचा था और उच्चस्वर से गर्जना कर रहा था
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He was of dreadful appearance with deep eyes, a huge face and a big belly. He looked tall, ugly and frightening.
ShlokaShloka 5
वसानं चर्म वैयाघ्रं वसार्द्रं रुधिरोक्षितम्।
त्रासनं सर्वभूतानां व्यादितास्यमिवान्तकम्।।3.2.6।।
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उसकी आँखें गहरी, मुँह बहुत बड़ा, आकार विकट, और पेट विकराल था। वह देखने में बड़ा भयंकर, घृणित, बेडौल, बहुत बड़ा और विकृत वेश से युक्त था
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Wearing a tigerskin, he resembled the god of death. With a wide, open mouth, wet with marrow and drenched with blood, he struck terror into all beings.
ShlokaShloka 6
त्रीन्सिम्हान्श्चतुरो व्याघ्रान्द्वौ वृकौ पृषतान्दश।
सविषाणं वसादिग्धं गजस्य च शिरो महत्।
अवसज्यायसे शूले विनदन्तं महास्वनम्।।3.2.7।।
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उसने खून से भीगा और चरबी से गीला व्याघ्रचर्म पहन रखा था। समस्त प्राणियों को त्रास पहुँचाने वाला वह राक्षस यमराज के समान मुँह बाये खड़ा था
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Roaring loudly, he carried an iron spit in which were pierced three lions, four tigers, two wolves, ten deer and the huge head of an elephant with its tusks smeared with the fat of flesh.
ShlokaShloka 7
स रामं लक्ष्मणं चैव सीतां दृष्ट्वा च मैथिलीम्।
अभ्यधावत्सुसङ्कृद्धः प्रजाः काल इवान्तकः।।3.2.8।।
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दुरात्मा विराध की ये दुष्टता और घमंड से भरी बातें सुनकर जनकनन्दिनी सीता घबरा गयीं और जैसे तेज हवा चलने पर केले का वृक्ष जोर-जोर से हिलने लगता है, उसी प्रकार वे उद्वेग के कारण थरथर काँपने लगीं
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Looking extremely furious, he ran towards Rama, Lakshmana and Sita like the god of death rushes towards the (dying) people.
ShlokaShloka 8
स कृत्वा भैरवं नादं चालयन्निव मेदिनीम्।
अङ्केनादाय वैदेहीमपक्रम्य ततोऽब्रवीत्।।3.2.9।।
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दुरात्मा विराध की ये दुष्टता और घमंड से भरी बातें सुनकर जनकनन्दिनी सीता घबरा गयीं और जैसे तेज हवा चलने पर केले का वृक्ष जोर-जोर से हिलने लगता है, उसी प्रकार वे उद्वेग के कारण थरथर काँपने लगीं
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Making a dreadful sound, as if shaking the earth, he took Sita on his lap, stepped aside and said:
ShlokaShloka 9
युवां जटाचीरधरौ सभार्यौ क्षीणजीवितौ।
प्रविष्टौ दण्डकारण्यं शरचापासिधारिणौ।।3.2.10।।
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दुरात्मा विराध की ये दुष्टता और घमंड से भरी बातें सुनकर जनकनन्दिनी सीता घबरा गयीं और जैसे तेज हवा चलने पर केले का वृक्ष जोर-जोर से हिलने लगता है, उसी प्रकार वे उद्वेग के कारण थरथर काँपने लगीं
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You both clad in bark and wearing matted hair, holding bows, arrows and swords have entered into the Dandaka forest with your wife. Your life has been cut short indeed৷৷
ShlokaShloka 10
कथं तापसयोर्वां च वासः प्रमदया सह।
अधर्मचारिणौ पापौ कौ युवां मुनिदूषकौ।।3.2.11।।
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दुरात्मा विराध की ये दुष्टता और घमंड से भरी बातें सुनकर जनकनन्दिनी सीता घबरा गयीं और जैसे तेज हवा चलने पर केले का वृक्ष जोर-जोर से हिलने लगता है, उसी प्रकार वे उद्वेग के कारण थरथर काँपने लगीं
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How is it that you both, dressed in the robes of ascetics, live with a woman? Leading an unrighteous and sinful life, who are you who have brought disgrace to the ascetic discipline ?
ShlokaShloka 11
अहं वनमिदं दुर्गं विराधो नाम राक्षसः।
चरामि सायुधो नित्यमृषिमांसानि भक्षयन्।।3.2.12।।
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दुरात्मा विराध की ये दुष्टता और घमंड से भरी बातें सुनकर जनकनन्दिनी सीता घबरा गयीं और जैसे तेज हवा चलने पर केले का वृक्ष जोर-जोर से हिलने लगता है, उसी प्रकार वे उद्वेग के कारण थरथर काँपने लगीं
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I am a demon named Viradha. I move in this dense forest with my weapons eating the flesh of the sages.
ShlokaShloka 12
इयं नारी वरारोहा मम भार्या भविष्यति।
युवयोः पापयोश्चाहं पास्यामि रुधिरं मृधे।।3.2.13।।
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दुरात्मा विराध की ये दुष्टता और घमंड से भरी बातें सुनकर जनकनन्दिनी सीता घबरा गयीं और जैसे तेज हवा चलने पर केले का वृक्ष जोर-जोर से हिलने लगता है, उसी प्रकार वे उद्वेग के कारण थरथर काँपने लगीं
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This woman of fine hips shall be my wife. You sinners I shall drink the blood of both of you in the fight.
ShlokaShloka 13
तस्यैवं ब्रुवतो दुष्टं विराधस्य दुरात्मनः।
श्रुत्वा सगर्वितं वाक्यं सम्भ्रान्ता जनकात्मजा।।3.2.14।।
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दुरात्मा विराध की ये दुष्टता और घमंड से भरी बातें सुनकर जनकनन्दिनी सीता घबरा गयीं और जैसे तेज हवा चलने पर केले का वृक्ष जोर-जोर से हिलने लगता है, उसी प्रकार वे उद्वेग के कारण थरथर काँपने लगीं
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Sita, daughter of Janaka was bewildered out of fear when she heard the cruel and boastful words of that wicked Viradha.
ShlokaShloka 14
सीता प्रवेपतोद्वेगात् प्रावाते कदली यथा।।3.2.15।।
तां दृष्ट्वा राघवः सीतां विराधाङ्कगतां शुभाम्।
अब्रवील्लक्ष्मणं वाक्यं मुखेन परिशुष्यता।।3.2.16।।
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दुरात्मा विराध की ये दुष्टता और घमंड से भरी बातें सुनकर जनकनन्दिनी सीता घबरा गयीं और जैसे तेज हवा चलने पर केले का वृक्ष जोर-जोर से हिलने लगता है, उसी प्रकार वे उद्वेग के कारण थरथर काँपने लगीं
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Seeing the auspicious Sita in the lap of Viradha shaken out of anxiety, like a plantain tree in a strong wind, Rama with his throat parched said to Lakshmana:
ShlokaShloka 15
पश्य सौम्य नरेन्द्रस्य जनकस्यात्मसम्भवाम्।
मम भार्यां शुभाचारां विराधाङ्के प्रवेशिताम्।।3.2.17।।
अत्यन्तसुखसंमव़ृद्धां राजपुत्रीं यशस्विनीम्।
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दुरात्मा विराध की ये दुष्टता और घमंड से भरी बातें सुनकर जनकनन्दिनी सीता घबरा गयीं और जैसे तेज हवा चलने पर केले का वृक्ष जोर-जोर से हिलने लगता है, उसी प्रकार वे उद्वेग के कारण थरथर काँपने लगीं
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Gentle Lakshmana, see the illustrious daughter ofJanaka, a lady of good conduct, brought up in utmost comfort caught in the lap of Viradha
ShlokaShloka 16
यदभिप्रेतमस्मासु प्रियं वरवृतं च यत्।।3.2.18।।
कैकेय्यास्तु सुसंवृत्तं क्षिप्रमद्यैव लक्ष्मण।
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शुभलक्षणा सीता को सहसा विराध के चंगुल में फँसी देख श्रीरामचन्द्र जी सूखते हुए मुँह से लक्ष्मण को सम्बोधित करके बोले-
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O Lakshmana whatever Kaikeyi desired through her boons has now come true so soon.
ShlokaShloka 17
या न तुष्यति राज्येन पुत्रार्थे दीर्घदर्शिनी।।3.2.19।।
ययाहं सर्वभूतानां प्रियः प्रस्थापितो वनम्।
अद्येदानीं सकामा सा या माता मध्यमा मम।।3.2.20।।
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‘सौम्य! देखो तो सही, महाराज जनक की पुत्री और मेरी सती-साध्वी पत्नी सीता विराध के अङ्क में विवशतापूर्वक जा पहुँची हैं
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Kaikeyi, my middle mother is farsighted indeed Not content with the kingdom alone see sent me, beloved of all beings, away to the forest. Let her cherished desire be fulfilled.
ShlokaShloka 18
परस्पर्शात्तु वैदेह्याः न दुःखतरमस्तिमे।
पितुर्विनाशात्सौमित्रे स्वराज्यहरणात्तथा।।3.2.21।।
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‘अत्यन्त सुख में पली हुई यशस्विनी राजकुमारी सीता की यह अवस्था! (हाय! कितने कष्टकी बात है!) लक्ष्मण! वन में हमारे लिये जिस दुःख की प्राप्ति कैकेयी को अभीष्ट थी और जो कुछ उसे प्रिय था, जिसके लिये उसने वर माँगे थे, वह सब आज ही शीघ्रतापूर्वक सिद्ध हो गया। तभी तो वह दूरदर्शिनी कैकेयी अपने पुत्र के लिये केवल राज्य लेकर नहीं संतुष्ट हुई थी
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O Lakshmana nothing is more sorrowful to me than the touch of Vaidehi by another. It is more painful to me than the death of my father or loss of my kingdom.
ShlokaShloka 19
इति ब्रुवति काकुत्स्थे बाष्पशोकपरिप्लुते।
अब्रवील्लक्ष्मणः क्रुद्धो रुद्धो नाग इव श्वसन्।।3.2.22।।
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‘अत्यन्त सुख में पली हुई यशस्विनी राजकुमारी सीता की यह अवस्था! (हाय! कितने कष्टकी बात है!) लक्ष्मण! वन में हमारे लिये जिस दुःख की प्राप्ति कैकेयी को अभीष्ट थी और जो कुछ उसे प्रिय था, जिसके लिये उसने वर माँगे थे, वह सब आज ही शीघ्रतापूर्वक सिद्ध हो गया। तभी तो वह दूरदर्शिनी कैकेयी अपने पुत्र के लिये केवल राज्य लेकर नहीं संतुष्ट हुई थी
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As Rama was thus full of tears of sorrow, Lakshmana sighed heavily in anger like a hissing serpant in confinement. And said:
ShlokaShloka 20
अनाथ इव भूतानां नाथस्त्वं वासवोपमः।
मया प्रेष्येण काकुत्स्थ किमर्थं परितप्यसे।।3.2.23।।
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‘जिसने समस्त प्राणियों के लिये प्रिय होने पर भी मुझे वन में भेज दिया, वह मेरी मझली माता कैकेयी आज इस समय सफलमनोरथ हुई है
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O Rama, you are, like Indra, lord of all beings. What makes you feel sad like an orphan when I am at your service like a servant?
ShlokaShloka 21
शरेण निहतस्याद्य मया क्रुद्धेन रक्षसः।
विराधस्य गतासोर्हि मही पास्यति शोणितम्।।3.2.24।।
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‘विदेहनन्दिनीका दूसरा कोई स्पर्श कर ले, इससे बढ़कर दुःख की बात मेरे लिये दूसरी कोई नहीं है। सुमित्रानन्दन! पिताजी की मृत्यु तथा अपने राज्य के अपहरण से भी उतना कष्ट मुझे नहीं हुआ था, जितना अब हुआ है’
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The earth will drink the blood of Viradha with his life gone, slain by my angry arrow.
ShlokaShloka 22
राज्यकामे मम क्रोधो भरते यो बभूव ह।
तं विराधे प्रमोक्ष्यामि वज्री वज्रमिवाचले।।3.2.25।।
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श्रीरामचन्द्रजी के ऐसा कहने पर शोक के आँसू बहाते हुए लक्ष्मण कुपित हो मन्त्र से अवरुद्ध हुए सर्प की भाँति फुफकारते हुए बोले-
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Like Indra who hits the mountain with his thunderbolt, I shall release on Viradha the anger I felt against Bharata for his passion for the kingdom.
ShlokaShloka 23
मम भुजबलवेगवेगितः पततु शरोऽस्य महान्महोरसि।
व्यपनयतु तनोश्च जीवितं पततु ततस्समहीं विघूर्णितः।।3.2.26।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘मैं अभी कुपित होकर अपने बाण से इस राक्षस का वध करता हूँ। आज यह पृथ्वी मेरे द्वारा मारे गये प्राणशून्य विराध का रक्त पीयेगी।
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Spurred by the speed of my strong arms, my arrow will fall on his broad chest and separate his life from his body. Then his body reeling round and round will fall on the ground. इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिकाव्ये अरण्यकाण्डे द्वितीयस्सर्गः।। Thus ends the second sarga of Aranyakanda of the holy Ramayana the first epic composed by sage Valmiki.