Aranya Kanda
Sarga 22: Khara gets his brother Dusana and the army ready to fight Rama -- proceeds with fourteen thousand demons.
अरण्यकाण्डम् · सर्ग 22
22 shlokas
ShlokaShloka 1
एवमाधर्षितश्शूरश्शूर्पणख्या खरस्ततः।
उवाच रक्षसां मध्ये खरः खरतरं वचः।।3.22.1।।
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शूर्पणखा द्वारा इस प्रकार तिरस्कृत होकर शूरवीर खर ने राक्षसों के बीच अत्यन्त कठोर वाणी में कहा –
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Ashamed and accused thus in the presence of the demons, the valiant Khara spoke to Surpanakha in harsh words:
ShlokaShloka 2
तवावमानप्रभवः क्रोधोऽयमतुलो मम।
न शक्यते धारयितुं लवणाम्भ इवोल्बणम्।।3.22.2।।
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“बहिन! तुम्हारे अपमान के कारण मुझे बेतरह क्रोध चढ़ आया है। इसे धारण करना या दबा देना उसी प्रकार असम्भव है, जैसे पूर्णिमा को प्रचण्ड वेग से बढ़े हुए खारे पानी के समुद्र के जल को (अथवा यह उसी प्रकार असह्य है, जैसे घाव पर नमकीन पानी का छिड़कना)
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Like the overslowing salt sea water, I am unable to contain this my excessive anger arising out of your insult.
ShlokaShloka 3
न रामं गणये वीर्यान्मानुषं क्षीणजीवितम्।
आत्मदुश्चरितैः प्राणान्हतोयोऽद्य विमोक्ष्यते।।3.22.3।।
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‘मैं पराक्रम की दृष्टि से राम को कुछ भी नहीं गिनता हूँ; क्योंकि उस मनुष्य का जीवन अब क्षीण हो चला है। वह अपने दुष्कर्मों से ही मारा जाकर आज प्राणों से हाथ धो बैठेगा
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Rama is a shortlived human. I do not care for his valour. His life span will be shortened (he will be killed) now for his own misdeeds.
ShlokaShloka 4
बाष्पस्संह्रियतामेष सम्भ्रमश्च विमुच्यताम्।
अहं रामं सह भ्रात्रा नयामि यमसादनम्।।3.22.4।।
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‘तुम अपने आँसुओं को रोको और यह घबराहट छोड़ो। मैं भाईसहित राम को अभी यमलोक पहुँचा देता हूँ
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Restrain your tears and your anxieties I will send Rama along with his brother to the abode of Yama.
ShlokaShloka 5
परश्वथहतस्याद्य मन्दप्राणस्य संयुगे।
रामस्य रुधिरं रक्तमुष्णं पास्यसि राक्षसि।।3.22.5।।
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‘राक्षसी! आज मेरे फरसे की मार से निष्प्राण होकर धरतीपर पड़े हुए राम का गरम-गरम रक्त तुम्हें पीने को मिलेगा’
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With his life ebbing out, killed by my axe in the fight, you will drink today, O demoness, Rama's red, hot blood.
ShlokaShloka 6
सा प्रहृष्टा वचश्श्रुत्वा खरस्य वदनाच्च्युतम्।
प्रशशंस पुनर्मौर्ख्याद्भ्रातरं रक्षसां वरम्।।3.22.6।।
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On hearing the words that came out of Khara's mouth, she was pleased. And in stupidity began praising her brother once again as the best of demons.
ShlokaShloka 7
तया परुषितः पूर्वं पुनरेव प्रशंसितः।
अब्रवीद्दूषणं नाम खरस्सेनापतिं तदा।।3.22.7।।
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Khara, accused by her earlier and admired again, said to Dusana, chief of army:
ShlokaShloka 8
चतुर्दश सहस्राणि मम चित्तानुवर्तिनाम्।
रक्षसां भीमवेगानां समरेष्वनिवर्तिनाम्।।3.22.8।।
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‘सौम्य! मेरे मन के अनुकूल चलने वाले, युद्ध के मैदान से पीछे न हटने वाले, भयंकर वेगशाली, मेघों की काली घटा के समान काले रंगवाले, लोगों की हिंसा से ही क्रीड़ा-विहार करने वाले तथा युद्ध में उत्साहपूर्वक आगे बढ़ने वाले चौदह सहस्र राक्षसों को युद्ध के लिये भेजने की पूरी तैयारी कराओ
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There are fourteen thousand demons at my command ready to act according to my will. They are warriors of terrific speed and will not retreat from the fight.
ShlokaShloka 9
नीलजीमूतवर्णानां घोराणां क्रूरकर्मणाम्।
लोकहिंसाविहाराणां बलिनामुग्रतेजसाम्।।3.22.9।।
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‘सौम्य! मेरे मन के अनुकूल चलने वाले, युद्ध के मैदान से पीछे न हटने वाले, भयंकर वेगशाली, मेघों की काली घटा के समान काले रंगवाले, लोगों की हिंसा से ही क्रीड़ा-विहार करने वाले तथा युद्ध में उत्साहपूर्वक आगे बढ़ने वाले चौदह सहस्र राक्षसों को युद्ध के लिये भेजने की पूरी तैयारी कराओ
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They are of the colour of the dark blue cloud, dreadful and merciless, strong and powerful fighters who roam about forturing people.
ShlokaShloka 10
तेषां शार्दूलदर्पाणां महास्यानां महौजसाम्।
सर्वोद्योग मुदीर्णानां रक्षसां सौम्य कारय।।3.22.10।।
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सौम्य सेनापते! तुम शीघ्र ही मेरा रथ भी यहाँ मँगवा लो। उस पर बहुत-से धनुष, बाण, विचित्रविचित्र खड्ग और नाना प्रकार की तीखी शक्तियों को भी रख दो
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O handsome one, get them all, powerful like tigers, demons with large countenances, mighty and arragant, ready (for the fight).
ShlokaShloka 11
उपस्थापय मे क्षिप्रं रथं सौम्य धनूंषि च।
शरांश्चित्रांश्च खङ्गांश्च शक्तीश्च विविधाश्शिताः।।3.22.11।।
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‘रणकुशल वीर! मैं इस उद्दण्ड राम का वध करने के लिये महामनस्वी पुलस्त्यवंशी राक्षसों के आगे-आगे जाना चाहता हूँ’
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O goodnatured one, get my chariot, bows and arrows, wonderful swords of different kinds and sharp missiles ready quickly.
ShlokaShloka 12
अग्रे निर्यातुमिच्छामि पौलस्त्यानां महात्मनाम्।
वधार्थं दुर्विनीतस्य रामस्य रणकोविदः।।3.22.12।।
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उसके इस प्रकार आज्ञा देते ही एक सूर्य के समान प्रकाशमान और चितकबरे रंग के अच्छे घोड़ों से जुता हुआ विशाल रथ वहाँ आ गया दूषण ने खर को इसकी सूचना दी
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O expert in warfare, I wish to lead those great warriors of Paulasthya family, to kill that immodest Rama.
ShlokaShloka 13
इति तस्य ब्रुवाणस्य सूर्यवर्णं महारथम्।
सदश्वैश्शबलैर्युक्तमाचचक्षेऽथ दूषणः।।3.22.13।।
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वह रथ मेरुपर्वत के शिखर की भाँति ऊँचा था, उसे तपाये हुए सोने के बने हुए साज-बाज से सजाया गया था, उसके पहियों में सोना जड़ा हुआ था, उसका विस्तार बहुत बड़ा था, उस रथ के कूबर वैदूर्यमणि से जड़े गये थे, उसकी सजावट के लिये सोने के बने हुए मत्स्य, फूल, वृक्ष, पर्वत, चन्द्रमा, सूर्य, माङ्गलिक पक्षियों के समुदाय तथा तारिकाओं से वह रथ सुशोभित हो रहा था, उस पर ध्वजा फहरा रही थी तथा रथ के भीतर खड्ग आदि अस्त्र-शस्त्र रखे हुए थे, छोटी-छोटी घण्टियों अथवा सुन्दर घुघुरुओं से सजे और उत्तम घोड़ों से जुते हुए उस रथ पर राक्षसराज खर उस समय आरूढ़ हुआ। अपनी बहिन के अपमान का स्मरण करके उसके मन में बड़ा अमर्ष हो रहा था
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While Khara was speaking thus, Dusana reported that a huge chariot of the colour of the Sun yoked with good horses of variegated hues stood ready.
ShlokaShloka 14
तं मेरुशिखराकारं तप्तकाञ्चनभूषणम्।
हेमचक्रमसम्बाधं वैदूर्यमयकूबरम्।।3.22.14।।
मत्स्यैः पुष्पैर्द्रुमैश्शैलैश्चन्द्रसूर्यैश्च काञ्चनैः।
मङ्गलैः पक्षिसङ्घैश्च ताराभिरभिसंवृतम्।।3.22.15।।
ध्वजनिस्त्रिंशसम्पन्नं किङ्किणीकविराजितम्।
सदश्वयुक्तं सोऽमर्षादारुरोह खरो रथम्।।3.22.16।।
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वह रथ मेरुपर्वत के शिखर की भाँति ऊँचा था, उसे तपाये हुए सोने के बने हुए साज-बाज से सजाया गया था, उसके पहियों में सोना जड़ा हुआ था, उसका विस्तार बहुत बड़ा था, उस रथ के कूबर वैदूर्यमणि से जड़े गये थे, उसकी सजावट के लिये सोने के बने हुए मत्स्य, फूल, वृक्ष, पर्वत, चन्द्रमा, सूर्य, माङ्गलिक पक्षियों के समुदाय तथा तारिकाओं से वह रथ सुशोभित हो रहा था, उस पर ध्वजा फहरा रही थी तथा रथ के भीतर खड्ग आदि अस्त्र-शस्त्र रखे हुए थे, छोटी-छोटी घण्टियों अथवा सुन्दर घुघुरुओं से सजे और उत्तम घोड़ों से जुते हुए उस रथ पर राक्षसराज खर उस समय आरूढ़ हुआ। अपनी बहिन के अपमान का स्मरण करके उसके मन में बड़ा अमर्ष हो रहा था
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Then the impatient Khara mounted the chariot that looked like the peak of mount Meru. It was decorated with pure gold, had golden wheels, poles studded with vaidurya. The carriage of the chariot was engraved with golden figures of fishes, flowers, trees, the Sun, stars, flocks of auspicious birds, flags and swords. Shining with small bells, it was yoked to fine horses.
ShlokaShloka 15
निशाम्य तु रथस्थं तं राक्षसा भीमविक्रमाः।
तस्थुस्संपरिवार्यैनं दूषणं च महाबलम्।।3.22.17।।
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वह रथ मेरुपर्वत के शिखर की भाँति ऊँचा था, उसे तपाये हुए सोने के बने हुए साज-बाज से सजाया गया था, उसके पहियों में सोना जड़ा हुआ था, उसका विस्तार बहुत बड़ा था, उस रथ के कूबर वैदूर्यमणि से जड़े गये थे, उसकी सजावट के लिये सोने के बने हुए मत्स्य, फूल, वृक्ष, पर्वत, चन्द्रमा, सूर्य, माङ्गलिक पक्षियों के समुदाय तथा तारिकाओं से वह रथ सुशोभित हो रहा था, उस पर ध्वजा फहरा रही थी तथा रथ के भीतर खड्ग आदि अस्त्र-शस्त्र रखे हुए थे, छोटी-छोटी घण्टियों अथवा सुन्दर घुघुरुओं से सजे और उत्तम घोड़ों से जुते हुए उस रथ पर राक्षसराज खर उस समय आरूढ़ हुआ। अपनी बहिन के अपमान का स्मरण करके उसके मन में बड़ा अमर्ष हो रहा था
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The demons of terrific prowess surounded Khara and Dusana and stood by, when they saw both of them mounting the chariot.
ShlokaShloka 16
खरस्तु तान्महेष्वासान्घोरवर्मायुधध्वज��न्।
निर्यातेत्यब्रवीद्दृष्ट्वा रथस्थस्सर्वराक्षसान्।।3.22.18।।
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कूच करने की आज्ञा प्राप्त होते ही भयंकर ढाल, अस्त्र-शस्त्र तथा ध्वजा से युक्त वह विशाल राक्षस सेना जोर-जोर से गर्जना करती हुई जनस्थान से बड़े वेग के साथ निकली
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Khara mounted the chariot, saw the demons holding great weapons, wearing dreadful shields and holding flags, and ordered them to march.
ShlokaShloka 17
ततस्तद् राक्षसं सैन्यं घोरचर्मायुधध्वजम्।
निर्जगाम जनस्थानान्महानादं महाजवम्।।3.22.19।।
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कूच करने की आज्ञा प्राप्त होते ही भयंकर ढाल, अस्त्र-शस्त्र तथा ध्वजा से युक्त वह विशाल राक्षस सेना जोर-जोर से गर्जना करती हुई जनस्थान से बड़े वेग के साथ निकली
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Then the army of the demons wearing dreadful shields, holding weapons and flags, and making a loud noise started in great speed from Janasthanam.
ShlokaShloka 18
मुद्गरैः पट्टिसैश्शूलैस्सुतीक्ष्णैश्च परश्वधैः।
खङ्गैश्चक्रैश्च हस्तस्थैर्भ्राजमानैश्च तोमरैः।।3.22.20।।
शक्तिभिः परिघैर्घोरैरतिमात्रैश्च कार्मुकैः।
गदासिमुसलैर्वज्रैर्गृहीतैर्भीमदर्शनैः।।3.22.21।।
राक्षसानां सुघोराणां सहस्राणि चतुर्दश।
निर्यातानि जनस्थानात्खरचित्तानुवर्तिनाम्।।3.22.22।।
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सैनिकों के हाथ में मुद्गर, पट्टिश, शूल, अत्यन्त तीखे फर से, खड़ग, चक्र और तोमर चमक उठे। शक्ति, भयंकर परिघ, विशाल धनुष, गदा, तलवार, मुसल तथा वज्र (आठ कोणवाले आयुधविशेष) उन राक्षसों के हाथों में आकर बड़े भयानक दिखायी दे रहे थे। इन अस्त्र-शस्त्रों से उपलक्षित और खर के मन की इच्छा के अनुसार चलने वाले अत्यन्त भयंकर चौदह हजार राक्षस जनस्थान से युद्ध के लिये चले
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The fourteen thousand demons loyal to the wishes of Khara, took in their hands, maces, piercing weapons, spears, sharp axes used in battle, swords, wheels, splinters, iron clubs, powerful missiles, dreadful iron bars of giant size, bows made of bamboo, clubs and frightening weapons like thunderbolt (of Indra) and departed from Janasthana.
ShlokaShloka 19
तांस्त्वभिद्रवतो दृष्ट्वा राक्षसान् भीमविक्रमान्।
खरस्यापि रथः किञ्चिज्जगाम तदनन्तरम्।।3.22.23।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
सैनिकों के हाथ में मुद्गर, पट्टिश, शूल, अत्यन्त तीखे फर से, खड़ग, चक्र और तोमर चमक उठे। शक्ति, भयंकर परिघ, विशाल धनुष, गदा, तलवार, मुसल तथा वज्र (आठ कोणवाले आयुधविशेष) उन राक्षसों के हाथों में आकर बड़े भयानक दिखायी दे रहे थे। इन अस्त्र-शस्त्रों से उपलक्षित और खर के मन की इच्छा के अनुसार चलने वाले अत्यन्त भयंकर चौदह हजार राक्षस जनस्थान से युद्ध के लिये चले
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Khara's chariot moved a bit behind the army of demons of frightening prowess who rushed forward to attack (Rama).
ShlokaShloka 20
ततस्ताञ्छबलानश्वास्तप्तकाञ्चनभूषितान्।
खरस्य मतिमाज्ञाय सारथिस्समचोदयत्।।3.22.24।।
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सैनिकों के हाथ में मुद्गर, पट्टिश, शूल, अत्यन्त तीखे फर से, खड़ग, चक्र और तोमर चमक उठे। शक्ति, भयंकर परिघ, विशाल धनुष, गदा, तलवार, मुसल तथा वज्र (आठ कोणवाले आयुधविशेष) उन राक्षसों के हाथों में आकर बड़े भयानक दिखायी दे रहे थे। इन अस्त्र-शस्त्रों से उपलक्षित और खर के मन की इच्छा के अनुसार चलने वाले अत्यन्त भयंकर चौदह हजार राक्षस जनस्थान से युद्ध के लिये चले
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Knowing the mind of Khara, the charioteer hastened the horses of the colourful chariot decorated with pure gold.
ShlokaShloka 21
स चोदितो रथश्शीघ्रं खरस्य रिपुघातिनः।
शब्देनापूरयामास दिशश्च प्रदिशस्तदा।।3.22.25।।
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उन भयंकर दिखायी देने वाले राक्षसों को धावा करते देख खर का रथ भी कुछ देर सैनिकों के निकलने की प्रतीक्षा करके उनके साथ ही आगे बढ़ा
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Spurred by the charioteer, the chariot of Khara, the slayer of enemies, produced a rattle that filled all four quarters and the intermediate directions.
ShlokaShloka 22
प्रवृद्धमन्युस्तु खरः खरस्वनो रिपोर्वधार्थं त्वरितो यथान्तकः।
अचूचुदत्सारथिमुन्नदन्घनं महाबलो मेघ इवाश्मवर्षवान्।।3.22.26।।
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तदनन्तर खर का अभिप्राय जानकर उसके सारथि ने तपाये हुए सोनेके आभूषणों से विभूषित उन चितकबरे घोड़ों को हाँका
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Khara in extreme anger hastened, like Yama, to slay his enemy. He roared loudly like a cloud raining hail stones and impelled his charioteer to speed up. इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वालल्मीकीय आदिकाव्ये अरण्यकाण्डे द्वाविंशस्सर्गः।। Thus ends the twentysecond sarga of Aranyakanda of the holy Ramayana the first epic composed by sage Valmiki.