Aranya Kanda
Sarga 63: Rama recalls the events starting from exile-- describes Sita's beauty, virtues and gentleness--drifts back to sorrow--Lakshmana tells Rama to think of a way of finding Sita.
अरण्यकाण्डम् · सर्ग 63
20 shlokas
ShlokaShloka 1
स राजपुत्रः प्रियया विहीनः शोकेन मोहेन च पीड्यमानः।
विषादयन्भ्रातरमार्तरूपो भूयो विषादं प्रविवेश तीव्रम्।।3.63.1।।
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अपनी प्रिया सीता से रहित हो राजकुमार श्रीराम शोक और मोह से पीड़ित होने लगे। वे स्वयं तो पीड़ित थे ही, अपने भाई लक्ष्मण को भी विषाद में डालते हुए पुनः तीव्र शोक में मग्न हो गये
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Prince Rama, separated from his beloved, lost his senses out of sorrow. Seeing his brother in a distressed state, he sank again into intense grief.
ShlokaShloka 2
स लक्ष्मणं शोकवशाभिपन्नं शोके निमग्नो विपुले तु रामः।
उवाच वाक्यं व्यसनानुरूपमुष्णं विनिश्श्वस्य रुदंत्सशोकम्।।3.63.2।।
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लक्ष्मण शोक के अधीन हो रहे थे, उनसे महान् शोक में डूबे हुए श्रीराम दुःख के साथ रोते हुए गरम उच्छ्वास लेकर अपने ऊपर पड़े हुए संकट के अनुरूप वचन बोले-
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Plunged in deep grief, Rama heaved hot sighs and said these words to griefstricken Lakshmanaweeping:
ShlokaShloka 3
न मद्विधो दुष्कृतकर्मकारी मन्ये द्वितीयोऽस्ति वसुन्धरायाम्।
शोकेन शोको हि परम्पराया मा मेति भिन्दन्हृदयं मनश्च।।3.63.3।।
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‘सुमित्रानन्दन! मालूम होता है, मेरे-जैसा पापकर्म करने वाला मनुष्य इस पृथ्वी पर दूसरा कोई नहीं है; क्योंकि एक के बाद दूसरा शोक मेरे हृदय (प्राण) और मन को विदीर्ण करता हुआ लगातार मुझपर आता जा रहा है
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I think there is none on earth like me who has performed such forbidden acts. One grief after the other is successively piercing my heart and my mind.
ShlokaShloka 4
पूर्वं मया नूनमभीप्सितानि पापानि कर्माण्यसकृत्कृतानि।
तत्रायमद्यापतितो विपाको दुःखेन दुःखं यदहं विशामि।।3.63.4।।
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‘निश्चय ही पूर्वजन्म में मैंने अपनी इच्छा के अनुसार बारंबार बहुत-से पापकर्म किये हैं; उन्हीं में से कुछ कर्मों का यह परिणाम आज प्राप्त हुआ है, जिससे मैं एक दुःख से दूसरे दुःख में पड़ता जा रहा हूँ
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In the past I had certainly done some sinful deeds I often liked the consequences of which have descended on me now as I am experiencing one sorrow after another.
ShlokaShloka 5
राज्यप्रणाशस्स्वजनैर्वियोगः पितुर्विनाशो जननीवियोगः।
सर्वाणि मे लक्ष्मण शोकवेगमापूरयन्ति प्रविचिन्तितानि।।3.63.5।।
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‘पहले तो मैं राज्य से वञ्चित हुआ; फिर मेरा स्वजनों से वियोग हुआ। तत्पश्चात् पिताजी का परलोकवास हुआ, फिर माता से भी मुझे बिछुड़ जाना पड़ा। लक्ष्मण! ये सारी बातें जब मुझे याद आती हैं, तब मेरे शोक के वेग को बढ़ा देती हैं।
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O Lakshmana, loss of kingdom, separation from kith and kin, death of father, separation from mother--all these thoughts augment my sorrow faster and in greater measure.
ShlokaShloka 6
सर्वं तु दुःखं मम लक्ष्मणेदं शान्तं शरीरे वनमेत्य शून्यम्।
सीतावियोगात्पुनरप्युदीर्णं काष्ठैरिवाग्निस्सहसा प्रदीप्तः।।3.63.6।।
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‘लक्ष्मण! वन में आकर क्लेश का अनुभव करके भी यह सारा दुःख सीता के समीप रहने से मेरे शरीर में ही शान्त हो गया था, परंतु सीता के वियोग से वह फिर उद्दीप्त हो उठा है, जैसे सूखे काठ का संयोग पाकर आग सहसा प्रज्वलित हो उठती है
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O Lakshmana, all this sorrow calmed down when I came to this solitary forest. But with Sita's separation, it was rekindled just as fire blazes forth again with logs of wood.
ShlokaShloka 7
सा नूनमार्या मम राक्षसेन बलाद्दृता खं समुपेत्य भीरुः।
अपस्वरं सस्वरविप्रलापा भयेन विक्रन्दितवत्यभीक्ष्णम्।।3.63.7।।
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‘मेरी प्रिया के वे दोनों गोल-गोल स्तन, जो सदा लाल चन्दन से चर्चित होने योग्य थे, निश्चय ही रक्त की कीच में सन गये होंगे। हाय! इतने पर भी मेरे शरीर का पतन नहीं होता
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The timid princess of mine forcibly carried away into the sky by a demon must have again and again cried aloud out of fear in a broken voice.
ShlokaShloka 8
तौ लोहितस्य प्रियदर्शनस्य सदोचितावुत्तमचन्दनस्य।
वृत्तौ स्तनौ शोणितपङ्कदिग्धौ नूनं प्रियाया मम नाभिभातः।।3.63.8।।
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‘मेरी प्रिया के वे दोनों गोल-गोल स्तन, जो सदा लाल चन्दन से चर्चित होने योग्य थे, निश्चय ही रक्त की कीच में सन गये होंगे। हाय! इतने पर भी मेरे शरीर का पतन नहीं होता
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Her captivating copper coloured skin, smeared with the best of red sandal paste would not be surely pleasing now, drenched in blood and mud.
ShlokaShloka 9
तच्छलक्ष्णसुव्यक्तमृदुप्रलापं तस्या मुखं कुञ्चितकेशभारम्।
रक्षोवशं नूनमुपागताया न भ्राजते राहुमुखे यथेन्दुः।।3.63.9।।
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‘राक्षस के वश में पड़ी हुई मेरी प्रिया का वह मुख जो स्निग्ध एवं सुस्पष्ट मधुर वार्तालाप करने वाला तथा काले-काले घुघराले केशों के भार से सुशोभित था, वैसे ही श्रीहीन हो गया होगा, जैसे राहु के मुख में पड़ा हुआ चन्द्रमा शोभा नहीं पाता है
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Her face with her clear, sweet and gentle words and her curly hair falling will no more look bright coming under the grip of demons like the moon eclipsed by Rahu.
ShlokaShloka 10
तां हारपाशस्य सदोचिताया ग्रीवां प्रियाया मम सुव्रतायाः।
रक्षांसि नूनं परिपीतवन्ति विभिद्य शून्ये रुधिराशनानि।।3.63.10।।
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‘हाय! उत्तम व्रत का पालन करने वाली मेरी प्रियतमा का कण्ठ हर समय हार से सुशोभित होनेयोग्य था, किंतु रक्तभोजी राक्षसों ने सूने वन में अवश्य उसे फाड़कर उसका रक्त पिया होगा
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The bloodthirsty demons must have drunk the blood of my faithful beloved in a lonely place breaking her neck that used to wear beautiful necklaces.
ShlokaShloka 11
मया विहीना विजने वने या रक्षोभिराहृत्य विकृष्यमाणा।
नूनं निनादं कुररीव दीना सा मुक्तवत्यायतकान्तनेत्रा।।3.63.11।।
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‘मेरे न रहने के कारण निर्जन वन में राक्षसों ने उसे ले-लेकर घसीटा होगा और विशाल एवं मनोहर नेत्रोंवाली वह जानकी अत्यन्त दीनभाव से कुररीकी भाँति विलाप करती रही होगी
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The lovely, largeeyed lady separated from me in the desolate forest, abducted and dragged by demons must have cried at that time desperately like a female osprey.
ShlokaShloka 12
अस्मिन्मयासार्धमुदारशीला शिलातले पूर्वमुपोपविष्टा।
कान्तस्मिता लक्ष्मण जातहासा त्वामाह सीता बहुवाक्यजातम्।।3.63.12।।
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‘उसका मुख और विशाल नेत्र प्रफुल्ल कमलों के समान सुन्दर हैं, सम्भव है, वह कमलपुष्प लाने के लिये ही गोदावरी तट पर गयी हो, परंतु यह भी ठीक नहीं है; क्योंकि वह मुझे साथ लिये बिना कभी कमलों के पास नहीं जाती थी
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On this rock, O Lakshmana, my goodnatured lady with her lovely smile sat with me in the past and chatted with you.
ShlokaShloka 13
गोदावरीयं सरितां वरिष्ठा प्रिया प्रियाया मम नित्यकालम्।
अप्यत्र गच्छेदिति चिन्तयामि नैकाकिनी याति हि सा कदाचित्।।3.63.13।।
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‘उसका मुख और विशाल नेत्र प्रफुल्ल कमलों के समान सुन्दर हैं, सम्भव है, वह कमलपुष्प लाने के लिये ही गोदावरी तट पर गयी हो, परंतु यह भी ठीक नहीं है; क्योंकि वह मुझे साथ लिये बिना कभी कमलों के पास नहीं जाती थी
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Would she have gone to Godavari, the foremost of the rivers so dear at all times to my beloved ? But I think she has not gone there alone at any time.
ShlokaShloka 14
पद्मानना पद्मविशालनेत्रा पद्मानि वानेतुमभिप्रयाता।
तदप्ययुक्तं न हि सा कदाचिन्मया विना गच्छति पङ्कजानि।।3.63.14।।
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‘उसका मुख और विशाल नेत्र प्रफुल्ल कमलों के समान सुन्दर हैं, सम्भव है, वह कमलपुष्प लाने के लिये ही गोदावरी तट पर गयी हो, परंतु यह भी ठीक नहीं है; क्योंकि वह मुझे साथ लिये बिना कभी कमलों के पास नहीं जाती थी
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The lady whose face was like the lotus, whose large eyes were like lotus petals could have gone to fetch lotuses (but) that also is not possible as she has never gone there without me.
ShlokaShloka 15
कामं त्विदं पुष्पितवृक्षषण्डं नानाविधैः पक्षिगणैरुपेतम्।
वनं प्रयाता नु तदप्ययुक्त मेकाकिनी सातिबिभेति भीरुः।।3.63.15।।
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‘सूर्यदेव! संसार में किसने क्या किया और क्या नहीं किया—इसे तुम जानते हो; लोगों के सत्य-असत्य (पुण्य और पाप) कर्मो के तुम्ही साक्षी हो। मेरी प्रिया सीता कहाँ गयी अथवा उसे किसने हर लिया, यह सब मुझे बताओ; क्योंकि मैं उसके शोक से पीड़ित हूँ
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Could she have gone to the forest where there are many kinds of trees in full bloom inhabited by a variety of birds? That is also not possible as she is timid and too scared to go there alone.
ShlokaShloka 16
आदित्य भो लोककृताकृतज्ञ लोकस्य सत्यानृतकर्मसाक्षिन्।
मम प्रिया सा क्व गता हृता वा शंसस्व मे शोकवशस्य नित्यम्।।3.63.16।।
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‘सूर्यदेव! संसार में किसने क्या किया और क्या नहीं किया—इसे तुम जानते हो; लोगों के सत्य-असत्य (पुण्य और पाप) कर्मो के तुम्ही साक्षी हो। मेरी प्रिया सीता कहाँ गयी अथवा उसे किसने हर लिया, यह सब मुझे बताओ; क्योंकि मैं उसके शोक से पीड़ित हूँ
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O Sungod, you know all the happenings of the world. You are witness to all the deeds of the people, true and false. Tell me where my beloved Sita has gone or has been carried off. My grief never ceases.
ShlokaShloka 17
लोकेषु सर्वेषु च नास्ति किञ्चिद्यत्ते न नित्यं विदितं भवेत्तत्।
शंसस्व वायो कुलशालिनीं तां हृता मृता वा पथि वर्तते वा।।3.63.17।।
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“वायुदेव! समस्त विश्व में ऐसी कोई बात नहीं है, जो तुम्हें सदा ज्ञात न रहती हो। मेरी कुलपालिका सीता कहाँ है, यह बता दो वह मर गयी, हर ली गयी अथवा मार्ग में ही है’
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O Windgod, there is nothing that you know not in all the worlds. Do tell me if that lady of a noble race has been abducted or dead or is on the way.
ShlokaShloka 18
इतीव तं शोकविधेयदेहं रामं विसंज्ञं विलपन्तमेवम्।
उवाच सौमित्रिरदीनसत्त्वो न्याये स्थितः कालयुतं च वाक्यम्।।3.63.18।।
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इस प्रकार शोक के अधीन होकर जब श्रीरामचन्द्रजी संज्ञाशून्य हो विलाप करने लगे, तब उनकी ऐसी अवस्था देख न्यायोचित मार्ग पर स्थित रहने वाले उदारचित्त सुमित्राकुमार लक्ष्मण ने उनसे यह समयोचित बात कही-
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While Rama was thus in tears, in a state of sorrow and swoon, Lakshmana who was rational and courageous spoke to him words appropriate to the time :
ShlokaShloka 19
शोकं विमुञ्चार्य धृतिं भजस्व सोत्साहता चास्तु विमार्गणेऽस्याः।
उत्साहवन्तो हि नरा न लोके सीदन्ति कर्मस्वतिदुष्करेषु।।3.63.19।।
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‘आर्य! आप शोक छोड़कर धैर्य धारण करें; सीता की खोज के लिये मन में उत्साह रखें; क्योंकि उत्साही मनुष्य जगत् में अत्यन्त दुष्कर कार्य आ पड़ने पर भी कभी दुःखी नहीं होते हैं
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O noble prince, give up grief. Take courage. Show enthusiasm to search and find Sita. Enthusiastic people will not get despondent in carrying out the most difficult tasks.
ShlokaShloka 20
इतीव सौमित्रिमुदग्रपौरुषं ब्रुवन्तमार्तो रघुवंशवर्धनः।
न चिन्तयामास धृतिं विमुक्तवान्पुनश्च दुःखं महदभ्युपागमत्।।3.63.20।।
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बढ़े हुए पुरुषार्थवाले सुमित्राकुमार लक्ष्मण जब इस प्रकार की बातें कह रहे थे, उस समय रघुकुल की वृद्धि करने वाले श्रीराम ने आर्त होकर उनके कथन के औचित्य पर कोई ध्यान नहीं दिया। उन्होंने धैर्य छोड़ दिया और वे पुनः महान् दुःख में पड़ गये
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Rama who carries on the (glorious) progeny of the Raghu dynasty, did not (however) consider seriously the words of Lakshmana, a man of great prowess. Forsaking his courage he was once again overtaken by deep sorrow. इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिकाव्ये अरण्यकाण्डे त्रिषष्टितमस्सर्गः।। Thus ends the sixtythird sarga of Aranyakanda of the holy Ramayana the first epic composed by sage Valmiki.