Aranya Kanda
Sarga 60: Rama's sorrow -- goes from tree to tree enquiring about Sita -- Rama and Lakshmana go in search of Sita.
अरण्यकाण्डम् · सर्ग 60
35 shlokas
ShlokaShloka 1
भृशमाव्रजमानस्य तस्याधो वामलोचनम्।
प्रास्फुरच्चास्खलद्रामो वेपथुश्चाप्य जायत।।3.60.1।।
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बारंबार इन अपशकुनों को देखकर वे कहने लगे —क्या सीता सकुशल होगी?
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As Rama was returning( to the hermitage), his left eye throbbed repeatedly and he stumbled and his body trembled.
ShlokaShloka 2
उपालक्ष्य निमित्तानि सोऽशुभानि मुहुर्मुहुः।
अपि क्षेमं नु सीताया इति वै व्याजहार च।।3.60.2।।
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बारंबार इन अपशकुनों को देखकर वे कहने लगे —क्या सीता सकुशल होगी?
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As inauspicious omens appeared again and again, doubting if all is well with Sita, he said to himself, Can Sita be safe?
ShlokaShloka 3
त्वरमाणो जगामाथ सीतादर्शनलालसः।
शून्यमावसथं दृष्ट्वा बभूवोद्विग्नमानसः।।3.60.3।।
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सीता को देखने के लिये उत्कण्ठित हो वे बड़ी उतावली के साथ आश्रम पर गये। वहाँ कुटिया सूनी देख उनका मन अत्यन्त उद्विग्न हो उठा
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Anxious to see Sita, he hastened to the hermitage and finding it empty, became restless.
ShlokaShloka 4
उद्भ्रमन्निव वेगेन विक्षिपन्रघुनन्दनः।
तत्र तत्रोटजस्थानमभिवीक्षय समन्ततः।।3.60.4।।
ददर्श पर्णशालां च रहितां सीतया तदा।
श्रिया विरहितां ध्वस्तां हेमन्ते पद्मिनीमिव।।3.60.5।।
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रघुनन्दन बड़े वेग से इधर-उधर चक्कर लगाने और हाथ-पैर चलाने लगे। उन्होंने वहाँ जहाँ-तहाँ बनी हुई एक-एक पर्णशाला को चारों ओर से देख डाला, किंतु उस समय उसे सीता से सूनी ही पाया। जैसे हेमन्तऋतु में कमलिनी हिम से ध्वस्त हो श्रीहीन हो जाती है, । उसी प्रकार प्रत्येक पर्णशाला शोभाशून्य हो गयी थी
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Rama, the delight of the Raghu dynasty, hurtled in, turning round, throwing his hands to and fro, casting his looks all around the cottage where she used to move. The cottage, devoid of Sita looked like a lotuspond, the beauty of its lotuses destroyed by winter.
ShlokaShloka 5
रुदन्तमिव वृक्षैश्च म्लानपुष्पमृगद्विजम्।
श्रिया विहीनं विध्वस्तं सन्त्यक्तवनदेवतम्।।3.60.6।।
विप्रकीर्णाजिनकुशं विप्रविद्धब्रुसीकटम्।
दृष्ट्वा शून्यं निजस्थानं विललाप पुनः पुनः।।3.60.7।।
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रघुनन्दन बड़े वेग से इधर-उधर चक्कर लगाने और हाथ-पैर चलाने लगे। उन्होंने वहाँ जहाँ-तहाँ बनी हुई एक-एक पर्णशाला को चारों ओर से देख डाला, किंतु उस समय उसे सीता से सूनी ही पाया। जैसे हेमन्तऋतु में कमलिनी हिम से ध्वस्त हो श्रीहीन हो जाती है, । उसी प्रकार प्रत्येक पर्णशाला शोभाशून्य हो गयी थी
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The trees with flowers withered, the animals and birds turned pale looked as if they were weeping. Bereft of their beauty they wore a ruinous look. The sylvan deities had left. The deerskin and kusa grass were strewn here and there, the grass cushions and straw mats lay scattered. Seeing his cottage so desolate Rama wept again and again.
ShlokaShloka 6
हृता मृता वा नष्टा वा भक्षिता वा भविष्यति।
निलीनाप्यथवा भीरुरथवा वनमाश्रिता।।3.60.8।।
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वह स्थान वृक्षों (की सनसनाहट) के द्वारा मानो रो रहा था, फूल मुरझा गये थे, मृग और पक्षी मन मारे बैठे थे। वहाँ की सम्पूर्ण शोभा नष्ट हो गयी थी। सारी कुटी उजाड़ दिखायी देती थी। वन के देवता भी उस स्थान को छोड़कर चले गये थे
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'Timid Sita might have been abducted or dead or crushed or eaten up by demons. Or, she may be hiding for protection in the forest'
ShlokaShloka 7
गता विचेतुं पुष्पाणि फलान्यपि च वा पुनः।
अथवा पद्मिनीं याता जलार्थं वा नदीं गता।।3.60.9।।
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सब ओर मृगचर्म और कुश बिखरे हुए थे। चटाइयाँ अस्त-व्यस्त पड़ी थीं। पर्णशाला को सूनी देख भगवान् श्रीराम बारंबार विलाप करने लगे—
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'Maybe she has gone to pluck flowers or fruits. Or to the lotuspond or river to fetch water.'
ShlokaShloka 8
यत्नान्मृगयमाणस्तु नाससाद वने प्रियाम्।
शोकरक्तेक्षणश्शोकादुन्मत्त इव लक्ष्यते।।3.60.10।।
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‘हाय ! सीता को किसी ने हर तो नहीं लिया। उसकी मृत्यु तो नहीं हो गयी अथवा वह खो तो नहीं गयी या किसी राक्षस ने उसे खा तो नहीं लिया। वह भीरु कहीं छिप तो नहीं गयी है अथवा फल-फूल लाने के लिये वन के भीतर तो नहीं चली गयी
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He ransacked the forest, yet did not find his beloved. He appeared like a mad man, his eyes turned red with tears of sorrow.
ShlokaShloka 9
वृक्षाद्वृक्षं प्रधावन्सगिरेश्चाद्रिं नदान्नदीम्।
बभूव विलपन्रामश्शोकार्णवपरिप्लुतः।।3.60.11।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘सम्भव है, फल-फूल लाने के लिये ही गयी हो या जल लाने के लिये किसी पुष्करिणी अथवा नदी के तट पर गयी हो’
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Running from tree to tree, hill to hill, and river to river and weeping, Rama was immersed in a sea of sorrow.
ShlokaShloka 10
अपि काचित्त्वया दृष्टा सा कदम्बप्रिया प्रिया।
कदम्ब यदि जानीषे शंस सीतां शुभाननाम्।।3.60.12।।
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एक वृक्ष से दूसरे वृक्ष के पास दौड़ते हुए वे पर्वतों, नदियों और नदों के किनारे घूमने लगे। शोक से समुद्र में डूबे हुए श्रीरामचन्द्रजी विलाप करते-करते वृक्षों से पूछने लगे—
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O Kadamba tree, tell me if you have seen my beloved with a fair face and with love for kadamba flowers.
ShlokaShloka 11
स्निग्धपल्लवसङ्काशा पीतकौशेयवासिनी।
शंसस्व यदि वा दृष्टा बिल्व बिल्वोपमस्तनी।।3.60.13।।
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एक वृक्ष से दूसरे वृक्ष के पास दौड़ते हुए वे पर्वतों, नदियों और नदों के किनारे घूमने लगे। शोक से समुद्र में डूबे हुए श्रीरामचन्द्रजी विलाप करते-करते वृक्षों से पूछने लगे—
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O Bilva tree, tell me if you have seen a lady delicate like your tender leaf, dressed in yellow silk, a lady whose breasts are round like Bilva fruits.
ShlokaShloka 12
अथवाऽर्जुन शंस त्वं प्रियां तामर्जुनप्रियाम्।
जनकस्य सुता भीरुर्यदि जीवति वा न वा।।3.60.14।।
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‘कदम्ब! मेरी प्रिया सीता तुम्हारे पुष्प से बहुत प्रेम करती थी, क्या वह यहाँ है? क्या तुमने उसे देखा है? यदि जानते हो तो उस शुभानना सीता का पता बताओ। उसके अङ्ग सुस्निग्ध पल्लवों के समान कोमल हैं तथा शरीर पर पीले रंग की रेशमी साड़ी शोभा पाती है। बिल्व! मेरी प्रिया के स्तन तुम्हारे ही समान हैं। यदि तुमने उसे देखा हो तो बताओ
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O Arjuna tree, tell me if you know a timid lady, daughter of Janaka and my beloved, fond of Arjuna tree. Is the living or not ?
ShlokaShloka 13
ककुभः ककुभोरूं तां व्यक्तं जानाति मैथिलीम्।
यथा पल्लवपुष्पाढ्यो भाति ह्येष वनस्पतिः।।3.60.15।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘कदम्ब! मेरी प्रिया सीता तुम्हारे पुष्प से बहुत प्रेम करती थी, क्या वह यहाँ है? क्या तुमने उसे देखा है? यदि जानते हो तो उस शुभानना सीता का पता बताओ। उसके अङ्ग सुस्निग्ध पल्लवों के समान कोमल हैं तथा शरीर पर पीले रंग की रेशमी साड़ी शोभा पाती है। बिल्व! मेरी प्रिया के स्तन तुम्हारे ही समान हैं। यदि तुमने उसे देखा हो तो बताओ
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This Kakubha tree rich with tender leaves and flowers (perhaps)knows Maithili whose thighs are beautiful like the trunk of the Kakubha tree.
ShlokaShloka 14
भ्रमरैरुपगीतश्च यथा द्रुमवरो ह्ययम्।
एष व्यक्तं विजानाति तिलकस्तिलकप्रियाम्।।3.60.16।।
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This great Tilaka tree round which bees bumble surely knows the lady who loves to put tilaka marks on the forehead.
ShlokaShloka 15
अशोक शोकापनुद शोकोपहतचेतसम्।
त्वन्नामानं कुरु क्षिप्रं प्रियासन्दर्शनेन माम्।।3.60.17।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
यह ककुभ* अपने ही समान ऊरुवाली मिथिलेशकुमारी को अवश्य जानता होगा; क्योंकि यह वनस्पति लता, पल्लव तथा फूलों से सम्पन्न हो बड़ी शोभा पा रहा है। ककुभ! तुम सब वृक्षों में श्रेष्ठ हो, क्योंकि ये भ्रमर तुम्हारे समीप आकर अपने झंकारों द्वारा तुम्हारा यशोगान करते हैं। (तुम्हीं सीता का पता बताओ, अहो! यह भी कोई उत्तर नहीं दे रहा है।) यह तिलक वृक्ष अवश्य सीता के विषय में जानता होगा; क्योंकि मेरी प्रिया सीता को भी तिलक से प्रेम था
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O Ashoka tree, dispeller of sorrow, by quickly showing me my darling make me ashoka (free from sorrow) as I am griefstricken at heart.
ShlokaShloka 16
यदि ताल त्वया दृष्टा पक्वतालफलस्तनी।
कथयस्व वरारोहां कारुण��यं यदि ते मयि।।3.60.18।।
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यह ककुभ* अपने ही समान ऊरुवाली मिथिलेशकुमारी को अवश्य जानता होगा; क्योंकि यह वनस्पति लता, पल्लव तथा फूलों से सम्पन्न हो बड़ी शोभा पा रहा है। ककुभ! तुम सब वृक्षों में श्रेष्ठ हो, क्योंकि ये भ्रमर तुम्हारे समीप आकर अपने झंकारों द्वारा तुम्हारा यशोगान करते हैं। (तुम्हीं सीता का पता बताओ, अहो! यह भी कोई उत्तर नहीं दे रहा है।) यह तिलक वृक्ष अवश्य सीता के विषय में जानता होगा; क्योंकि मेरी प्रिया सीता को भी तिलक से प्रेम था
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O Palmyra tree be kind to me and tell me if you have seen my beautiful beloved who has breasts like ripe palmyra fruit?
ShlokaShloka 17
यदि दृष्टा त्वया सीता जम्बु जम्बूफलोपमा।
प्रियां यदि विजानीषे निःशङ्कं कथयस्व मे।।3.60.19।।
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‘अशोक! तुम शोक दूर करने वाले हो। इधर मैं शोक से अपनी चेतना खो बैठा हूँ। मुझे मेरी प्रियतमा का दर्शन कराकर शीघ्र ही अपने-जैसे नामवाला बना दो—मुझे अशोक (शोकहीन) कर दो
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O Jambu tree, do not hesitate to tell me if you know Sita whose body shines lovely like gold.
ShlokaShloka 18
अहो त्वं कर्णिकाराद्य सुपुष्पैश्शोभसे भृशम्।
कर्णिकारप्रिया साध्वी शंस दृष्टा प्रिया यदि।।3.60.20।।
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‘जामुन ! जाम्बूनद (सुवर्ण) के समान कान्तिवाली मेरी प्रिया यदि तुम्हारी दृष्टि में पड़ी हो, यदि तुम उसके विषय में कुछ जानते हो तो निःशङ्क होकर मुझे बताओ
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O Karnikara tree with flowers in full bloom, tell me if you have seen my faithful beloved who is fond of karnikara flowers.
ShlokaShloka 19
चूतनीपमहासालान्पनसान्कुरवान्धवान्।
दाडिमाननसान्गत्वा दृष्ट्वा रामो महायशाः।।3.60.21।।
मल्लिका माधवीश्चैव चम्पकान्केतकीस्तथा।
पृच्छन्रामो वने भान्तः उन्मत्त इव लक्ष्यते।।3.60.22।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘जामुन ! जाम्बूनद (सुवर्ण) के समान कान्तिवाली मेरी प्रिया यदि तुम्हारी दृष्टि में पड़ी हो, यदि तुम उसके विषय में कुछ जानते हो तो निःशङ्क होकर मुझे बताओ
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Renowned Rama, like a madman confused, approached the Mango, Kadamba , Sal and Jackfruit, Dhava, Champak, Ketaki trees and Pomegranate, Jasmine and Madhavi creepers, in order to make similar queries.
ShlokaShloka 20
अथवा मृगशाबाक्षीं मृग जानासि मैथिलीम्।
मृगविप्रेक्षणी कान्ता मृगीभिस्सहिता भवेत्।।3.60.23।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘कनेर! आज तो फूलों के लगने से तुम्हारी बड़ी शोभा हो रही है। अहो! मेरी प्रिया साध्वी सीता को तुम्हारे ये पुष्प बहुत पसंद थे। यदि तुमने उसे कहीं देखा हो तो मुझसे कहो’
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Or, O deer do you know about Maithili who has the eyes of a fawn? My beloved who has the restless eyes of a doe may be found in their company.
ShlokaShloka 21
गज सा गजनासोरूर्यदि दृष्टा त्वया भवेत्।
तां मन्ये विदितां तुभ्यमाख्याहि वरवारण।3.60.24।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
इसी प्रकार आम, कदम्ब, विशाल शाल, कटहल, कुरव, धव और अनार आदि वृक्षों को भी देखकर महायशस्वी श्रीरामचन्द्रजी उनके पास गये और वकुल, पुन्नाग, चन्दन तथा केवड़े आदि के वृक्षों से भी पूछते फिरे। उस समय वे वन में पागल की तरह इधर-उधर भटकते दिखायी देते थे
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O elephant tell me if you have seen her whose thighs are like the trunk of an elephant. O best of elephants, tell me if you know her.
ShlokaShloka 22
शार्दूल यदि सा दृष्टा प्रिया चन्द्रनिभानना।
मैथिली मम विस्रब्धं कथयस्व न ते भयम्।।3.60.25।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
इसी प्रकार आम, कदम्ब, विशाल शाल, कटहल, कुरव, धव और अनार आदि वृक्षों को भी देखकर महायशस्वी श्रीरामचन्द्रजी उनके पास गये और वकुल, पुन्नाग, चन्दन तथा केवड़े आदि के वृक्षों से भी पूछते फिरे। उस समय वे वन में पागल की तरह इधर-उधर भटकते दिखायी देते थे
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O tiger tell me freely and fearlessly if you have seen my beloved princess from Mithila with a face like the moon.
ShlokaShloka 23
किं धावसि प्रिये दूरे दृष्टासि कमलेक्षणे।
वृक्षैराच्छाद्य चात्मानं किं मां न प्रतिभाषसे।।3.60.26।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
अपने सामने हरिणको देखकर वे बोले—’मृग! अथवा तुम्ही बताओ! मृगनयनी मैथिली को जानते हो। मेरी प्रिया की दृष्टि भी तुम हरिणों की-सी है, अतः सम्भव है, वह हरिणियों के ही साथ हो
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O lotus eyed darling, why are you running away? I have already seen you. Why are you hiding behind trees and not replying to me?
ShlokaShloka 24
तिष्ठ तिष्ठ वरारोहे न तेऽस्ति करुणा मयि।
नात्यर्थं हास्यशीलासि किमर्थं मामुपेक्षसे।।3.60.27।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘श्रेष्ठ गजराज! तुम्हारी सँड़ के समान ही जिसके दोनों ऊरु हैं, उस सीता को सम्भवतः तुमने देखा होगा। मालूम होता है, तुम्हें उसका पता विदित है, अतः बताओ! वह कहाँ है?
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O my beautiful beloved, stay, stay Have you no compassion for me ? You are so fond of fun. Why do you avoid me?
ShlokaShloka 25
पीतकौशेयकेनासि सूचिता वरवर्णिनि।
धावन्त्यपि मया दृष्टा तिष्ठ यद्यस्ति सौहृदम्।।3.60.28।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘व्याघ्र ! यदि तुमने मेरी प्रिया चन्द्रमुखी मैथिली को देखा हो तो निःशङ्क होकर बता दो, मुझसे तुम्हें कोई भय नहीं होगा’
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O lady of lovely complexion, I can see your yellow silk (flying), while you are running away. If you have love for me, stay on.
ShlokaShloka 26
नैव सा नूनमथवा हिंसिता चारुहासिनी।
कृच्छ्रप्राप्तं न मां नूनं यथोपेक्षितुमर्हति।।3.60.29।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
(इतने ही में उनको भ्रम हुआ कि सीता उधर भागकर छिप रही है, तब वे बोले-) ‘प्रिये! क्यों भागी जा रही हो। कमललोचने! निश्चय ही मैंने तुम्हें देख लिया है। तुम वृक्षों की ओट में अपने-आपको छिपाकर मुझसे बात क्यों नहीं करती हो?
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O lady with a sweet smile I have never hurt you. When I am in difficulty it does not behove you to ignore me.
ShlokaShloka 27
व्यक्तं सा भक्षिता बाला राक्षसैः पिशिताशनैः।
विभज्याङ्कानि सर्वाणि मया विरहिता प्रिया।।3.60.30।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘वरारोहे ! ठहरो, ठहरो। क्या तुम्हें मुझपर दया नहीं आती है। अधिक हास-परिहास करने का तुम्हारा स्वभाव तो नहीं था, फिर किसलिये मेरी उपेक्षा करती हो?
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It is clear that separated from me, the body of my young beloved is torn off and eaten away by carnivorous demons.
ShlokaShloka 28
नूनं तच्छुभदन्तोष्ठं सुनासं चारुकुण्डलम्।
पूर्णचन्द्रनिभं ग्रस्तं मुखंनिष्प्रभतां गतम्।।3.60.31।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘सुन्दरि! पीली रेशमी साड़ीसे ही, तुम कहाँ हो– यह सूचना मिल जाती है। भागी जाती हो तो भी मैंने तुम्हें देख लिया है। यदि मेरे प्रति स्नेह एवं सौहार्द हो तो खड़ी हो जाओ’
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Her beautiful face with her sparkling teeth and lips, wellshaped nose, shining earrings has been like the full moon, eclipsed and rendered pale.
ShlokaShloka 29
सा हि चम्पकवर्णाभा ग्रीवा ग्रैवेयशोभिता।
कोमला विलपन्त्यास्तु कान्ताया भक्षिता शुभा।।3.60.32।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
(फिर भ्रम दूर होने पर बोले-) ‘अथवा निश्चय ही वह नहीं है। उस मनोहर मुसकानवाली सीता को राक्षसों ने मार डाला, अन्यथा इस तरह संकटमें पड़े हुए की (मेरी) वह कदापि उपेक्षा नहीं कर सकती थी
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That delicate, beautiful neck of my beloved having the complexion of a champak flower and adorned with necklaces was perhaps eaten up.
ShlokaShloka 30
नूनं विक्षिप्यमाणौ तौ बाहू पल्लवकोमलौ।
भक्षितौ वेपमानाग्रौ सहस्ताभरणाङ्गदौ।।3.60.33।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘स्पष्ट जान पड़ता है कि मांसभक्षी राक्षसों ने मुझसे बिछुड़ी हुई मेरी भोली-भाली प्रिया मैथिली को उसके सारे अङ्ग बाँटकर खा लिया
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Her arms, delicate like tender leaves, their tips (fingers) quivering, adorned with armlets and bracelets have surely been eaten away.
ShlokaShloka 31
मया विरहिता बाला रक्षसां भक्षणाय वै।
सार्धेनेव परित्यक्ता भक्षिता बहुबान्धवा।।3.60.34।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘सुन्दर दाँत, मनोहर ओष्ठ, सुघड़ नासिका से युक्त तथा रुचिर कुण्डलों से अलंकृत वह पूर्ण चन्द्रमा के समान अभिराम मुख राक्षसों का ग्रास बनकर निश्चय ही अपनी प्रभा खो बैठा होगा
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The young lady having many relations, forsaken by me, has been (perhaps) picked up by a demon for food and later abandoned halfeaten.
ShlokaShloka 32
हा लक्ष्मण महाबाहो पश्यसि त्वं प्रियां क्वचित्।
हा प्रिये क्व गता भद्रे हा सीतेति पुनः पुनः।।3.60.35।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘रोती-विलखती हुई प्रियतमा सीता की वह चम्पा के समान वर्णवाली कोमल एवं सुन्दर ग्रीवा, जो हार और हँसली आदि आभूषण पहनने के योग्य थी, निशाचरों का आहार बन गयी
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O longarmed Lakshmana, are you able to see my beloved anywhere? O noble lady, O darling, where have you gone? O Sita SIta
ShlokaShloka 33
इत्येवं विलपन्रामः परिधावन्वनाद्वनम्।
क्वचिदुद्भ्रमते वेगात्क्वचिद्विभ्रमते बलात्।।3.60.36।।
क्वचिन्मत्त इवाभाति कान्तान्वेषणतत्परः।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘वे नूतन पल्लवों के समान कोमल भुजाएँ, जो इधर-उधर पटकी जा रही होंगी और जिनके अग्रभाग काँप रहे होंगे, हाथों के आभूषण तथा बाजूबंदसहित निश्चय ही राक्षसों के पेट में चली गयीं
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Rama ran from forest to forest, now jumping, now taking strong strides, but all the time weeping, a madman busy in search of his beloved.
ShlokaShloka 34
स वनानि नदीश्शैलान् गिरिप्रस्रवणानि च।।3.60.37।।
काननानि च वेगेन भ्रमत्यपरिसंस्थितः।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘मैंने राक्षसों का भक्ष्य बनने के लिये ही उस बाला को अकेली छोड़ दिया। यद्यपि उसके बन्धुबान्धव बहुत हैं, तथापि वह यात्रियों के समुदाय से विलग हुई किसी अकेली स्त्री की भाँति निशाचरों का ग्रास बन गयी
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He rushed through forests, rivers, hills and mountain streams and through dense jungles with an unstable mind.
ShlokaShloka 35
तथा स गत्वा विपुलम् महद्वनं परीत्य सर्वं त्वथ मैथिलीं प्रति।
अनिष्ठिताशस्सचकार मार्गणे पुनः प्रियायाः परमं परिश्रमम्।।3.60.38।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘हा महाबाहु लक्ष्मण! क्या तुम कहीं मेरी प्रियतमा को देखते हो! हा प्रिये! हा भद्रे! हा सीते! तुम कहाँ चली गयी?’ इस तरह बारंबार विलाप करते हुए श्रीरामचन्द्रजी एक वन से दूसरे वन में दौड़ने लगे। वे कहीं सीता की समानता पाकर उद्भ्रान्त हो उठते (उछल पड़ते थे) और कहीं शोक की प्रबलता के कारण विभ्रान्त हो जाते (बवंडर की भाँति चक्कर काटने लगते) थे
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Rama went about the vast forest searching for the princess from Mithila all over not giving up hope of finding her. He continued to make great efforts for searching his beloved. इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिकाव्ये अरण्यकाण्डे षष्टितमस्सर्गः।। Thus ends the sixtieth sarga of Aranyakanda of the holy Ramayana the first epic composed by sage Valmiki.