Sundara Kanda
Sarga 38: Hanuman carries the episode of Kakasura and the Chudamani from Sita to Rama as a mark of identification
सुन्दरकाण्डम् · सर्ग 38
65 shlokas
ShlokaShloka 1
ततस्स कपिशार्दूलस्तेन वाक्येन तोषितः।
सीतामुवाच तच्छृत्वा वाक्यं वाक्यविशारदः।।5.38.1।।
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सीता के इस वचन से कपिश्रेष्ठ हनुमान जी को बड़ी प्रसन्नता हुई। वे बातचीत में कुशल थे। उन्होंने पूर्वोक्त बातें सुनकर सीता से कहा—
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Satisfied with the words of Sita, the tiger among monkeys, who was eloquent in speech said:
ShlokaShloka 2
युक्तरूपं त्वया देव�� भाषितं शुभदर्शने।
सदृशं स्त्रीस्वभावस्य साध्वीनां विनयस्य च��।5.38.2।।
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‘देवि! आपका कहना बिलकुल ठीक और युक्तिसंगत है। शुभदर्शने! आपकी यह बात नारी स्वभाव के तथा पतिव्रताओं की विनयशीलता के अनुरूप है
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"O queen O lady of auspicious appearance your words are most appropriate to and characteristic of a modest virtuous woman.
ShlokaShloka 3
स्त्रीत्वं न तु समर्थं हि सागरं व्यतिवर्तितुम्।
मामधिष्ठाय विस्तीर्णं शतयोजनमायतम्।।5.38.3।।
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‘इसमें संदेह नहीं कि आप अबला होने के कारण मेरी पीठ पर बैठकर सौ योजन विस्तृत समुद्र के पार जाने में समर्थ नहीं हैं
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"It may not be possible for a woman to cross on my back the vast ocean stretching over a hundred yojanas. It is not possible for a woman.
ShlokaShloka 4
द्वितीयं कारणं यच्च ब्रवीषि विनयान्विते।
रामादन्यस्य नार्हामि संस्पर्शमिति जानकि ।।5.38.4।।
एतत्ते सदृशं देवि पत्न्यास्तस्य महात्मनः।
का ह्यन्या त्वामृते देवि ब्रूयाद्वचनमीदृशम्।।5.38.5।।
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‘देवि! मेरे सामने आपने जो-जो पवित्र चेष्टाएँ की और जैसी-जैसी उत्तम बातें कही हैं, वे सब पूर्णरूप से श्रीरामचन्द्रजी मुझसे सुनेंगे
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"O humble lady the second reason given by you, 'I ought not to touch a person other than Rama' is well said and worthy of you, being the wife of the great soul. Who else can speak such words?
ShlokaShloka 5
श्रोष्यते चैव काकुत्स्थ: सर्वं निरवशेषतः।
चेष्टितं यत्त्वया देवि भाषितं मम चाग्रतः।।5.38.6।।
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‘देवि! मेरे सामने आपने जो-जो पवित्र चेष्टाएँ की और जैसी-जैसी उत्तम बातें कही हैं, वे सब पूर्णरूप से श्रीरामचन्द्रजी मुझसे सुनेंगे
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"O queen Kakutstha Rama will hear from me fully all that has been said and done by you in my presence without any omission.
ShlokaShloka 6
कारणैर्बहुभिर्देवि रामप्रियचिकीर्षया।
स्नेहप्रस्कन्नमनसा मयैतत्समुदीरितम्।।5.38.7।।
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‘देवि! मेरे सामने आपने जो-जो पवित्र चेष्टाएँ की और जैसी-जैसी उत्तम बातें कही हैं, वे सब पूर्णरूप से श्रीरामचन्द्रजी मुझसे सुनेंगे
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"O queen my heart is drenched with love for Rama and desires to please him for many reasons. Therefore these words have been spoken by me.
ShlokaShloka 7
लङ्काया दुष्प्रवेशत्वाद्दुस्तरत्वान्महोदधेः।
सामर्थ्यादात्मनश्चैव मयैतत्समुदीरितम्।।5.38.8।।
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‘दूसरा कारण यह है कि लङ्का में प्रवेश करना सबके लिये अत्यन्त कठिन है। तीसरा कारण है, महासागर को पार करने की कठिनाई इन सब कारणों से तथा अपने में आपको ले जाने की शक्ति होने से मैंने ऐसा प्रस्ताव किया था
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"Crossing the ocean and entering Lanka are difficult. But I accomplished it. Hence my proposal.
ShlokaShloka 8
इच्छामि त्वां समानेतुमद्यैव रघुबन्धुना।
गुरुस्नेहेन भक्त्या च नान्यथैतदुदाहृतम्।।5.38.9।।
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‘दूसरा कारण यह है कि लङ्का में प्रवेश करना सबके लिये अत्यन्त कठिन है। तीसरा कारण है, महासागर को पार करने की कठिनाई इन सब कारणों से तथा अपने में आपको ले जाने की शक्ति होने से मैंने ऐसा प्रस्ताव किया था
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"I offered to take you today itself out of my love and devotion to Rama with a desire to unite you with him and not with any other intention.
ShlokaShloka 9
यदि नोत्सहसे यातुं मया सार्थमनिन्दिते।
अभिज्ञानं प्रयच्छ त्वं जानीयाद्राघवो हि यत्।।5.38.10।।
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‘मैं आज ही आपको श्रीरघुनाथजी से मिला देना चाहता था। अतः अपने परमाराध्य गुरु श्रीराम के प्रति स्नेह और आपके प्रति भक्ति के कारण ही मैंने ऐसी बात कही थी, किसी और उद्देश्य से नहीं
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"O blameless lady If you wish not to accompany me you may give me a token of identification to let Rama know about my coming here and seeing you".
ShlokaShloka 10
एवमुक्ता हनुमता सीता सुरसुतोपमा।
उवाच वचनं मन्दं बाष्पप्रग्रथिताक्षरम्।।5.38.11।।
इदं श्रेष्ठमभिज्ञानं ब्रूयास्त्वं तु मम प्रियम्।
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‘किंतु सती-साध्वी देवि! यदि आपके मन में मेरे साथ चलने का उत्साह नहीं है तो आप अपनी कोई पहचान ही दे दीजिये, जिससे श्रीरामचन्द्रजी यह जान लें कि मैंने आपका दर्शन किया है’
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Having heard Hanuman, Sita, a child of god, said these words in a low tone. Choked with tears, 'Carry this token of identity to my dear husband':
ShlokaShloka 11
शैलस्य चित्रकूटस्य पादे पूर्वोत्तरे पुरा।।5.38.12।।
तापसाश्रमवासिन्याः प्राज्यमूलफलोदके।
तस्मिन्सिद्धाश्रमे देशे मन्दाकिन्या विदूरतः।।5.38.13।।
तस्योपवनषण्डेषु नानापुष्पसुगन्धिषु।
विहृत्य सलिले क्लिन्ना ममाङ्के समुपाविशमः।।5.38.14।।
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हनुमान जी के ऐसा कहने पर देवकन्या के समान तेजस्विनी सीता अश्रुगद्गदवाणी में धीरे-धीरे इस प्रकार बोलीं-
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'Long ago we were staying at Siddhasrama. This hermitage was situated to the northeast at the foot of Chitrakuta mountain which was not far from the river Mandakini. It had abundant roots, fruits and water. You sported with me in the gardens which were fragrant with many types of flowers and ponds. You sat down on my lap with wet clothes in the hermitage'.
ShlokaShloka 12
ततो मांससमायुक्तो वायसः पर्यतुण्डयत्।
तमहं लोष्टमुद्यम्य वारयामिस्म वायसम्।।5.38.15।।
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‘मैं उस पक्षी पर बहुत कुपित थी। अतः अपने लहँगे को दृढ़तापूर्वक कसने के लिये कटिसूत्र (नारे)को खींचने लगी। उस समय मेरा वस्त्र कुछ नीचे खिसक गया और उसी अवस्था में आपने मुझे देख लिया
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'Then a crow greedy of flesh began to peck my bossom with its beak. I took a clod of earth and warded him off.
ShlokaShloka 13
दारयन्स च मां काकस्तत्त्रैव परिलीयते।
न चाप्युपारमन्मांसाद्भक्षार्थि बलिभोजनः।।5.38.16।।
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‘मैं उस पक्षी पर बहुत कुपित थी। अतः अपने लहँगे को दृढ़तापूर्वक कसने के लिये कटिसूत्र (नारे)को खींचने लगी। उस समय मेरा वस्त्र कुछ नीचे खिसक गया और उसी अवस्था में आपने मुझे देख लिया
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'The crow was an eater of offerings, hungry for food began to peck me again and again for flesh.He did not stop.
ShlokaShloka 14
उत्कर्षन्त्यां च रशनां क्रुद्धायां मयि पक्षिणि।
स्रस्यमाने च वसने ततो दृष्टा त्वया ह्यहम्।।5.38.17।।
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‘मैं उस पक्षी पर बहुत कुपित थी। अतः अपने लहँगे को दृढ़तापूर्वक कसने के लिये कटिसूत्र (नारे)को खींचने लगी। उस समय मेरा वस्त्र कुछ नीचे खिसक गया और उसी अवस्था में आपने मुझे देख लिया
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'My upper cloth was slipping. I was trying to pull up my waist string angrily when you saw me.
ShlokaShloka 15
त्वयाऽपहसिता चाहं क्रुद्धा संलज्जिता तदा।
भक्षगृध्नेन काकेन दारिता त्वामुपागता।।5.38.18।।
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‘मैं उस पक्षी पर बहुत कुपित थी। अतः अपने लहँगे को दृढ़तापूर्वक कसने के लिये कटिसूत्र (नारे)को खींचने लगी। उस समय मेरा वस्त्र कुछ नीचे खिसक गया और उसी अवस्था में आपने मुझे देख लिया
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'Then you made fun of me, and I became angry. I was abashed. Torn by the voracious bird I sought your shelter.
ShlokaShloka 16
आसीनस्य च ते श्रान्ता पुनरुत्सङ्गमाविशम्।
क्रुध्यन्ती च प्रहृष्टेन त्वयाऽहं परिसान्त्विता।।5.38.19।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘मैं उस पक्षी पर बहुत कुपित थी। अतः अपने लहँगे को दृढ़तापूर्वक कसने के लिये कटिसूत्र (नारे)को खींचने लगी। उस समय मेरा वस्त्र कुछ नीचे खिसक गया और उसी अवस्था में आपने मुझे देख लिया
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'Exhausted, I sat on your lap again. Seeing my angry face you pacified me. You were happy (to see me draw close).
ShlokaShloka 17
बाष्पपूर्णमुखी मन्दं चक्षुषी परिमार्जती।
लक्षिताऽहं त्वया नाथ वायसेन प्रकोपिता।।5.38.20।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘मैं उस पक्षी पर बहुत कुपित थी। अतः अपने लहँगे को दृढ़तापूर्वक कसने के लिये कटिसूत्र (नारे)को खींचने लगी। उस समय मेरा वस्त्र कुछ नीचे खिसक गया और उसी अवस्था में आपने मुझे देख लिया
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'O lord when I was angered by the crow and my face was filled with tears, you marked me wiping my eyes.
ShlokaShloka 18
परिश्रमात्प्रसुप्ता च राघवाङ्केऽप्यहं चिरम्।
पर्यायेण प्रसुप्तश्च ममाङ्के भरताग्रजः।।5.38.21।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘देखकर आपने मेरी हँसी उड़ायी। इससे मैं पहले तो कुपित हुई और फिर लज्जित हो गयी। इतने में ही उस भक्ष्य-लोलुप कौएने फिर चोंच मारकर मुझे क्षत-विक्षत कर दिया और उसी अवस्था में मैं आपके पास आयी
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'Totally exhausted I slept on your lap for a long time, and in turn you slept on my lap later.
ShlokaShloka 19
स तत्र पुनरेवाथ वायसस्समुपागमत्।
ततस्सुप्तप्रबुद्धां मां रामस्याङ्कात्समुत्थिताम्।।5.38.22।।
वायसस्सहसागम्य विददार स्तनान्तरे।
पुनः पुनरथोत्पत्य विददार स मां भृशम्।।5.38.23।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘आप वहाँ बैठे हुए थे। मैं उस कौए की हरकत से तंग आ गयी थी। अतः थककर आपकी गोद में आ बैठी। उस समय मैं कुपित-सी हो रही थी और आपने प्रसन्न होकर मुझे सान्त्वना दी
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'The crow came back again and clawed me in the space between my breasts even after I woke up after slumber from Rama's lap. Flying, it tore my bosom again and again.
ShlokaShloka 20
ततस्समुक्षितो रामो मुक्तैश्शोणितबिन्दुभिः।
वायसेन ततस्तेन बलवत्क्लिश्यमानया।।5.38.24।।
स मया बोधितश्श्रीमान्सुखसुप्तः परन्तपः।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘हनुमान् ! मैं थक जाने के कारण उस दिन बहुत देर तक श्रीरघुनाथजी की गोद में सोयी रही। फिर उनकी बारी आयी और वे भरत के बड़े भाई मेरी गोद में सिर रखकर सो रहे
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'At the touch of the drops of blood dripping from my body, tormented by seeing me distressed with the dripping blood, you were awakened, you who were an illustrious scorcher of foes.
ShlokaShloka 21
स मां दृष्ट्वा महाबाहुर्वितुन्नां स्तनयोस्तदा।।5.38.25।।
आशीविष इव क्रुद्धश्वसन्वाक्यमभाषत।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘हनुमान् ! मैं थक जाने के कारण उस दिन बहुत देर तक श्रीरघुनाथजी की गोद में सोयी रही। फिर उनकी बारी आयी और वे भरत के बड़े भाई मेरी गोद में सिर रखकर सो रहे
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'O strongarmed Rama, seeing my torn breasts, you became angry like a hissing serpent and hissing said :
ShlokaShloka 22
केन ते नागनासोरु विक्षतं वै स्तनान्तरम्।।5.38.26।।
कः क्रीडति सरोषेण पञ्चवक्त्रेण भोगिना।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘इसी समय वह कौआ फिर वहाँ आया। मैं सोकर जगने के बाद श्रीरघुनाथजी की गोद से उठकर बैठी ही थी कि उस कौए ने सहसा झपटकर मेरी छाती में चोंच मार दी
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'O Sita with a beautiful lap like an elephant trunk by whom is your bosom wounded? Who is sporting with an angry fivehooded snake?
ShlokaShloka 23
वीक्षमाणस्ततस्तं वै वायसं समुदैक्षत।।5.38.27।।
नखैस्सरुधिरैस्तीक्ष्णैर्मामेवाभिमुखं स्थितम्।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘उसने बारंबार उड़कर मुझे अत्यन्त घायल कर दिया। मेरे शरीर से रक्त की बूंदें झरने लगीं, इससे श्रीरामचन्द्रजी की नींद खुल गयी और वे जागकर उठ बैठे
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'Then looking around, you saw the crow facing me with sharp, bloodstained claws.
ShlokaShloka 24
पुत्त्रः किल स शक्रस्य वायसः पततां वरः।।5.38.28।।
धरान्तरगतश्शीघ्रं पवनस्य गतौ समः।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘मेरी छाती में घाव हुआ देख महाबाहु श्रीराम उस समय कुपित हो उठे और फुफकारते हुए विषधर सर्प के समान जोर-जोर से साँस लेते हुए बोले-
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'This crow was the best of birds. He was surely Indra's son who had covered a long distance with great speed and his speed was like the Windgod's.
ShlokaShloka 25
ततस्तस्मिन्महाबाहुः कोपसंवर्तितेक्षणः।।5.38.29।।
वायसे कृतवान्क्रूरां मतिं मतिमतां वरः।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘हाथी की ढूँड़ के समान जाँघों वाली सुन्दरी! किसने तुम्हारी छाती को क्षत-विक्षत किया है ? कौन रोष से भरे हुए पाँच मुखवाले सर्प के साथ खेल रहा है?’
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'Then you, the strongarmed and best among the wise, your eyeballs rolling in fury, made up your mind about the cruel crow.
ShlokaShloka 26
स दर्भं संस्तराद्गृह्य ब्राह्मेणास्त्रेण योजयत्।।5.38.30।।
स दीप्त इव कालाग्निर्जज्वालाभिमुखो द्विजम्।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘इतना कहकर जब उन्होंने इधर-उधर दृष्टि डाली, तब उस कौए को देखा, जो मेरी ओर ही मुँह किये बैठा था। उसके तीखे पंजे खून से रँग गये थे
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'Taking out a blade of darbha grass from your mat, you invoked the weapon of Brahma by reciting the mantra. Then you discharged it which blazed like the fire of death and went spearheading towards the crow.
ShlokaShloka 27
स तं प्रदीप्तं चिक्षेप दर्भं तं वायसं प्रति।।5.38.31।।
ततस्तं वायसं दर्भस्सोम्बरेऽनुजगाम ह।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘वह पक्षियों में श्रेष्ठ कौआ इन्द्र का पुत्र था। उसकी गति वायु के समान तीव्र थी। वह शीघ्र ही स्वर्ग से उड़कर पृथ्वी पर आ पहुँचा था
Show English TranslationEnglish Translation
'Then you threw the burning darbha grass at the crow and it chased him in the sky.
ShlokaShloka 28
अनुसृष्टस्तदा काको जगाम विविधां गतिम्।।5.38.32।।
लोककाम इमं लोकं सर्वं वै विचचार ह।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘उस समय बुद्धिमानों में श्रेष्ठ महाबाहु श्रीराम के नेत्र क्रोध से घूमने लगे। उन्होंने उस कौए को कठोर दण्ड देने का विचार किया
Show English TranslationEnglish Translation
'Then that crow flew to many places seeking asylum all over the universe chased by the blade of grass.
ShlokaShloka 29
स पित्रा च परित्यक्तस्सुरैश्च समहर्षिभिः।।5.38.33।।
त्रीन्लोकान्सम्परिक्रम्य तमेव शरणं गतः।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘श्रीरघुनाथजी ने वह प्रज्वलित कुश उस कौए की ओर छोड़ा। फिर तो वह आकाश में उसका पीछा करने लगा
Show English TranslationEnglish Translation
'Then the crow went round all the three worlds, having been rejected by his father Indra, including all the sages and gods. Refused by all he came back to Rama seeking shelter.
ShlokaShloka 30
स तं निपतितं भूमौ शरण्यश्शरणागतम्।।5.38.34।।
वधार्हमपि काकुत्स्थ: कृपया पर्यपालयत्।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘श्रीरघुनाथजी ने वह प्रज्वलित कुश उस कौए की ओर छोड़ा। फिर तो वह आकाश में उसका पीछा करने लगा
Show English TranslationEnglish Translation
'Seeing the crow fallen on the ground, O Kakutstha, you who are a saviour of those who seek refuge saved him out of compassion, even though he deserved to be killed.
ShlokaShloka 31
परिद्यूनं विषण्णं च स तमायान्तमब्रवीत्।।5.38.35।।
मोघं कर्तुं न शक्यं तु ब्राह्ममस्त्रं तदुच्यताम्।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘वह कौआ कई प्रकार की उड़ानें लगाता अपने प्राण बचाने के लिये इस सम्पूर्ण जगत् में भागता फिरा, किंतु उस बाण ने कहीं भी उसका पीछा न छोड़ा
Show English TranslationEnglish Translation
'Rama, you saw the crow in pain and despondency who returned to you and said that it is not possible to make Brahma's weapon ineffectual.You may tell now. (what should be done.)
ShlokaShloka 32
हिनस्तु दक्षिणाक्षि त्वच्छर इत्यथ सोऽब्रवीत्।।5.38.36।।
ततस्तस्याक्षि काकस्य हिनस्ति स्म स दक्षिणम्।
दत्त्वा स दक्षिणं नेत्रं प्राणेभ्यः परिरक्षितः।।5.38.37।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘रघुनाथजी शरणागतवत्सल हैं। उनकी शरण में आकर जब वह पृथ्वी पर गिर पड़ा, तब उन्हें उस पर दया आ गयी; अतः वध के योग्य होने पर भी उस कौए को उन्होंने मारा नहीं, उबारा
Show English TranslationEnglish Translation
'Then that crow said, 'let my right eye be blinded'. you then hit the right eye of the crow'. Thus the crow offered his right eye and saved himself.
ShlokaShloka 33
स रामाय नमस्कृत्य राज्ञे दशरथाय च।
विसृष्टस्तेन वीरेण प्रतिपेदे स्वमालयम्।।5.38.38।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘रघुनाथजी शरणागतवत्सल हैं। उनकी शरण में आकर जब वह पृथ्वी पर गिर पड़ा, तब उन्हें उस पर दया आ गयी; अतः वध के योग्य होने पर भी उस कौए को उन्होंने मारा नहीं, उबारा
Show English TranslationEnglish Translation
'That crow offered salutations to you Rama and king Dasaratha, thereafter took permission and went to his own dwelling.
ShlokaShloka 34
मत्कृते काकमात्रे तु ब्रह्मास्त्रं समुदीरितम्।
कस्माद्यो मां हरेत्त्वत्तः क्षमसे तं महीपते।।5.38.39।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘उसकी शक्ति क्षीण हो चुकी थी और वह उदास होकर सामने गिरा था। इस अवस्था में उसको लक्ष्यकर के भगवान् बोले—’ब्रह्मास्त्र को तो व्यर्थ किया नहीं जा सकता। अतः बताओ, इसके द्वारा तुम्हारा कौन-सा अङ्ग-भङ्ग किया जाय’
Show English TranslationEnglish Translation
'(Addressing Rama as though he was present before her, Sita said) 'O lord of the earth for my sake you released the weapon of Brahma on a crow. What makes you excuse him who has abducted me?
ShlokaShloka 35
स कुरुष्व महोत्साहः कृपां मयि नरर्षभ।
त्वया नाथवती नाथ ह्यनाथा इव दृश्यते।।5.38.40।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘तदनन्तर दशरथनन्दन राजा राम को नमस्कार करके उन वीरशिरोमणि से विदा लेकर वह अपने निवासस्थान को चला गया
Show English TranslationEnglish Translation
'O bull among men you are so loving to me. I am like an orphan. Be kind to me. She who has found her lord in you stays without a protector.
ShlokaShloka 36
आनृशंस्यं परो धर्मस्तवत्त्त ऐव मया श्रुतः।
जानामि त्वां महावीर्यं महोत्साहं महाबलम्।।5.38.41।।
अपारपारमक्षोभ्यं गाम्भीर्यात्सागरोपमम्।
भर्तारं ससमुद्राया धरण्या वासवोपमम्।।5.38.42।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘तदनन्तर दशरथनन्दन राजा राम को नमस्कार करके उन वीरशिरोमणि से विदा लेकर वह अपने निवासस्थान को चला गया
Show English TranslationEnglish Translation
'O my supreme lord I know you are kind, righteous, valiant, vigroous, mighty. You are boundless, calm and deep like the ocean. You are lord of earth and the seas and compeer of Vasava. I have heard from you that motiveless compassion is the best way to make one righteous.
ShlokaShloka 37
एवमस्त्रविदां श्रेष्ठस्सत्यवान्बलवानपि।
किमर्थमस्त्रं रक्षस्सु न योजयसि राघव।।5.38.43।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘कपिश्रेष्ठ! तुम मेरे स्वामी से जाकर कहना —’प्राणनाथ! पृथ्वीपते! आपने मेरे लिये एक साधारण अपराध करने वाले कौए पर भी ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया था; फिर जो आपके पास से मुझे हर ले आया, उसको आप कैसे क्षमा कर रहे हैं?
Show English TranslationEnglish Translation
'Even though you are an expert in the use of weapons, truthful and strong. (Yet) why are you not using weapons aganst the demons?'
ShlokaShloka 38
न नागा नाऽपि गन्धर्वा नासुरा न मरुद्गणाः।
रामस्य समरे वेगं शक्ताः प्रतिसमाधितुं।।5.38.44।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के सुन्दरकाण्ड में अड़तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ
Show English TranslationEnglish Translation
(Now Sita turns to Hanuman and says) "In war serpents, gandharvas, demons or Marutas cannot withstand the speed of Rama's arrows and hit back.
ShlokaShloka 39
तस्य वीर्यवतः कश्चिद्यद्यस्ति मयि सम्भ्रमः।
किमर्थं न शरैस्तीक्ष्णै: क्षयं नयति राक्षसान्।।5.38.45।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘दया करना सबसे बड़ा धर्म है, यह मैंने आपसे ही सुना है। मैं आपको अच्छी तरह जानती हूँ। आपका बल, पराक्रम और उत्साह महान् है
Show English TranslationEnglish Translation
"Does Rama have a little anxiety about me? If he has, why does he, a disciplined hero, not put an end to the demons with his sharp arrows?
ShlokaShloka 40
भ्रातुरादेशमादाय लक्ष्मणो वा परन्तपः।
कस्य हेतोर्न मां वीरः परित्राति महाबलः।।5.38.46।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘आपका कहीं आर-पार नहीं है—आप असीम हैं। आपको कोई क्षुब्ध या पराजित नहीं कर सकता। आप गम्भीरता में समुद्र के समान हैं। समुद्रपर्यन्त सारी पृथ्वी के स्वामी हैं तथा इन्द्र के समान तेजस्वी हैं। मैं आपके प्रभाव को जानती हूँ
Show English TranslationEnglish Translation
"Or, why does the mighty hero, Lakshmana, who is a scorcher of enemies, not come to my rescue taking the orders from his brother?
ShlokaShloka 41
यदि तौ पुरुषव्याघ्रौ वाय्वग्निसमतेजसौ।
सुराणामपि दुर्धर्षौ किमर्थं मामुपेक्षतः।।5.38.47।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘रघुनन्दन! इस प्रकार अस्त्रवेत्ताओं में श्रेष्ठ, बलवान् और शक्तिशाली होते हुए भी आप राक्षसों पर अपने अस्त्रों का प्रयोग क्यों नहीं करते हैं?
Show English TranslationEnglish Translation
"Both Rama and Lakshmana are tigers among men who resemble wind and fire in power and have the unassailability of the gods. Wherefore are they disregarding me?.
ShlokaShloka 42
ममैव दुष्कृतं किञ्चिन्महदस्ति न संशयः।
समर्थावपि तौ यन्मां नावेक्षेते परन्तपौ।।5.38.48।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘पवनकुमार! नाग, गन्धर्व, देवता और मरुद्गण —कोई भी समराङ्गण में श्रीरामचन्द्रजी का वेग नहीं सह सकते
Show English TranslationEnglish Translation
"Perhaps I must have committed an atrocious sin. There is no doubt. For although both of them are scorchers of enemies, they deliver me not."
ShlokaShloka 43
वैदेह्या वचनं श्रुत्वा करुणं साश्रुभाषितम्।
अथाब्रवीन्महातेजा हनुमान्मारुतात्मजः।।5.38.49।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘उन परम पराक्रमी श्रीराम के हृदय में यदि मेरे लिये कुछ व्याकुलता है तो वे अपने तीखे सायकों से इन राक्षसों का संहार क्यों नहीं कर डालते?
Show English TranslationEnglish Translation
Hearing the piteous words of Vaidehi and beholding her eyes filled with tears, the Windgod's son, lustrous Hanuman replied thus:.
ShlokaShloka 44
त्वच्छोकविमुखो रामो देवि सत्येन ते शपे।
रामे दुःखाभिपन्ने च लक्ष्मणः परितप्यते।।5.38.50।।
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‘अथवा शत्रुओं को संताप देने वाले महाबली वीर लक्ष्मण ही अपने बड़े भाई की आज्ञा लेकर मेरा उद्धार क्यों नहीं करते हैं?
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"O godlike lady Rama is not averse to your misery. On my word this is true. Rama is immersed in sorrow. Even Lakshmana wails.
ShlokaShloka 45
कथञ्चिद्भवती दृष्टा न कालः परिदेवितुम्।
इमं मुहूर्तं दुःखानां द्रक्ष्यस्यन्तमनिन्दिते।।5.38.51।।
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‘वे दोनों पुरुषसिंह वायु तथा इन्द्र के समान तेजस्वी हैं। यदि वे देवताओं के लिये भी दुर्जय हैं तो किसलिये मेरी उपेक्षा करते हैं?
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"I could find you with difficulty. This is not the time to wail. O blameless lady take it, your sorrow has come to an end at this moment.
ShlokaShloka 46
तावुभौ पुरुषव्याघ्रौ राजपुत्रौ महाबलौ।
त्वद्दर्शनकृतोत्साहौ लङ्कां भस्मीकरिष्यतः।।5.38.52।।
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विदेहकुमारी सीता ने आँसू बहाते हुए जब यह करुणायुक्त बात कही, तब इसे सुनकर वानरयूथपति महातेजस्वी हनुमान् इस प्रकार बोले-
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"Both the mighty brothers, tigers among men, are eager to see you. Both the princes will reduce this Lanka into ashes.
ShlokaShloka 47
हत्त्वा च समरे क्रूरं रावणं सहबान्धवम्।
राघवस्त्वां विशालाक्षि नेष्यति स्वां पुरीं प्रति।।5.38.53।।
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विदेहकुमारी सीता ने आँसू बहाते हुए जब यह करुणायुक्त बात कही, तब इसे सुनकर वानरयूथपति महातेजस्वी हनुमान् इस प्रकार बोले-
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"O largeeyed lady cruel Ravana along with his relatives will be killed by Rama in war and Rama will return to his city with you.
ShlokaShloka 48
ब्रूहि यद्राघवो वाच्यो लक्ष्मणश्च महाबलः।
सुग्रीवो वापि तेजस्वी हरयोऽपि समागताः।।5.38.54।।
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‘देवि! मैं सत्य की शपथ खाकर आपसे कहता हूँ कि श्रीरामचन्द्रजी आपके विरह-शोक से पीड़ित हो अन्य सब कार्यों से विमुख हो गये हैं केवल आपका ही चिन्तन करते रहते हैं। श्रीराम के दुःखी होने से लक्ष्मण भी सदा संतप्त रहते हैं
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"Communicate your message to mighty Rama and Lakshamana, to brilliant Sugriva and even the vanaras who gather there.
ShlokaShloka 49
इत्युक्तवति तस्मिंस्तु सीता सुरसुतोपमा।
उवाच शोकसन्तप्ता हनुमन्तं प्लवङ्गमम्।।5.38.55।।
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‘किसी तरह आपका दर्शन हो गया। अब शोक करने का अवसर नहीं है। शोभने! इसी घड़ी से आप अपने दुःखों का अन्त होता देखेंगी
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"Hanuman having spoken this way, Sita, resembling a god's daughter, grieving, thus addressed Hanuman:
ShlokaShloka 50
कौसल्या लोकभर्तारं सुषुवे यं मनस्विनी।
तं ममार्थे सुखं पृच्छ शिरसा चाभिवादय।।5.38.56।।
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‘विशाललोचने! रघुनाथजी समराङ्गण में क्रूरता प्रकट करनेवाले रावण को उसके बन्धु-बान्धवोंसहित मारकर आपको अपनी पुरी में ले जायँगे
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"Bow to Rama and offer salutations on my behalf. Inquiries concerning his welfare should be addressed to Rama, whom virtuous Kausalya bore as a son.
ShlokaShloka 51
स्रजश्च सर्वरत्नानि प्रिया याश्च वराङ्गनाः।
ऐश्वर्यं च विशालायां पृथिव्यामपि दुर्लभम्।।5.38.57।।
पितरं मातरं चैव सम्मान्याभिप्रसाद्य च।
अनुप्रव्रजितो रामं सुमित्रा येन सुप्रजाः।।5.38.58।।
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‘विशाललोचने! रघुनाथजी समराङ्गण में क्रूरता प्रकट करनेवाले रावण को उसके बन्धु-बान्धवोंसहित मारकर आपको अपनी पुरी में ले जायँगे
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ShlokaShloka 52
आनुकूल्येन धर्मात्मा त्यक्त्वा सुखमनुत्तमम्।
अनुगच्छति काकुत्स्थं भ्रातरं पालयन्वने।।5.38.59।।
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‘अब भगवान् श्रीराम, महाबली लक्ष्मण, तेजस्वी सुग्रीव तथा वहाँ एकत्र हुए वानरों के प्रति आपको जो कुछ कहना हो, वह कहिये’
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"Great, righteous Lakshmana had given up his pleasures and followed his brother Rama in his favour into the forest to be able to serve him.
ShlokaShloka 53
सिंहस्कन्धो महाबाहुर्मनस्वी प्रियदर्शिनः।
पितृवद्वर्तते रामे मातृवन्मां समाचरन्।।5.38.60।।
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"Lakshmana, who has lionshoulders and strong arms, who is handsome, who takes Rama as his father and treats me as his own mother.
ShlokaShloka 54
ह्रियमाणां तदा वीरो न तु मां वेद लक्ष्मणः।
वृद्धोपसेवी लक्ष्मीवान् शक्तो न बहुभाषिता।।5.38.61।।
राजपुत्रः प्रियः श्रेष्ठः सदृशः श्वशुरस्य मे।
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‘वानरयूथपते! अधिक क्या कहूँ? जिस तरह यह कार्य सिद्ध हो सके, वही उपाय तुम्हें करना चाहिये। इस विषय में तुम्ही प्रमाण हो—इसका सारा भार तुम्हारे ही ऊपर है। तुम्हारे प्रोत्साहन देने से ही श्रीरघुनाथजी मेरे उद्धार के लिये प्रयत्नशील हो सकते हैं
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"Heroic Lakshmana, did not know while I was borne away. He is prosperous, foremost in serving elders. He is energetic and reserved in his speech like my fatherinlaw. He is a prince dear (to his brother).
ShlokaShloka 55
ममः प्रियतरो नित्यं भ्राता रामस्य लक्ष्मणः।।5.38.62।।
नियुक्तो धुरि यस्यां तु ���ामुद्वहति वीर्यवान्।
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‘वानरयूथपते! अधिक क्या कहूँ? जिस तरह यह कार्य सिद्ध हो सके, वही उपाय तुम्हें करना चाहिये। इस विषय में तुम्ही प्रमाण हो—इसका सारा भार तुम्हारे ही ऊपर है। तुम्हारे प्रोत्साहन देने से ही श्रीरघुनाथजी मेरे उद्धार के लिये प्रयत्नशील हो सकते हैं
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"Rama's brother Lakshmana is always dear to me. Heroic Lakshmana will discharge whichever responsibility is entrusted to him.
ShlokaShloka 56
यं दृष्ट्वा राघवो नैव वृत्तमार्यमनुस्मरेत्।।5.38.63।।
स ममार्थाय कुशलं वक्तव्यो वचनान्मम।
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‘वानरयूथपते! अधिक क्या कहूँ? जिस तरह यह कार्य सिद्ध हो सके, वही उपाय तुम्हें करना चाहिये। इस विषय में तुम्ही प्रमाण हो—इसका सारा भार तुम्हारे ही ऊपर है। तुम्हारे प्रोत्साहन देने से ही श्रीरघुनाथजी मेरे उद्धार के लिये प्रयत्नशील हो सकते हैं
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"He is Lakshmana for whose care and support Rama did not miss the noble king Dasaratha (during exile). Convey him my words of enquiry about his wellbeing.
ShlokaShloka 57
मृदुर्नित्यं शुचिर्दक्षः प्रियो रामस्य लक्ष्मणः।।5.38.64।।
यथा हि वानरश्रेष्ठ दुःखक्षयकरो भवेत्।
त्वमस्मिन्कार्यनिर्योगे प्रमाणं हरिसत्तमः।।5.38.65।।
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‘वानरयूथपते! अधिक क्या कहूँ? जिस तरह यह कार्य सिद्ध हो सके, वही उपाय तुम्हें करना चाहिये। इस विषय में तुम्ही प्रमाण हो—इसका सारा भार तुम्हारे ही ऊपर है। तुम्हारे प्रोत्साहन देने से ही श्रीरघुनाथजी मेरे उद्धार के लिये प्रयत्नशील हो सकते हैं
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"Lakshmana is soft, pure, competent and dear to Rama. O great vanara, act in such a manner that Lakshmana can mitigate my suffering. O great monkey, the best of vanaras you are competent in accomplishing this task.
ShlokaShloka 58
राघवस्त्वत्समारम्भान्मयि यत्नपरो भवेत्।
इदं ब्रूयाश्च मे नाथं शूरं रामं पुनः पुनः।।5.38.66।।
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‘वानरयूथपते! अधिक क्या कहूँ? जिस तरह यह कार्य सिद्ध हो सके, वही उपाय तुम्हें करना चाहिये। इस विषय में तुम्ही प्रमाण हो—इसका सारा भार तुम्हारे ही ऊपर है। तुम्हारे प्रोत्साहन देने से ही श्रीरघुनाथजी मेरे उद्धार के लिये प्रयत्नशील हो सकते हैं
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"By your efforts alone my husband will try for my release. You may tell these words to my heroic husband, Rama, again and again.
ShlokaShloka 59
जीवितं धारयिष्यामि मासं दशरथात्मज।
ऊर्ध्वं मासान्न जीवेयं सत्येनाहं ब्रवीमि ते।।5.38.67।।
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‘वानरयूथपते! अधिक क्या कहूँ? जिस तरह यह कार्य सिद्ध हो सके, वही उपाय तुम्हें करना चाहिये। इस विषय में तुम्ही प्रमाण हो—इसका सारा भार तुम्हारे ही ऊपर है। तुम्हारे प्रोत्साहन देने से ही श्रीरघुनाथजी मेरे उद्धार के लिये प्रयत्नशील हो सकते हैं
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"I will hold on to life only for a month. Beyond, I will not survive. I swear by truth. You may tell this to Rama.
ShlokaShloka 60
रावणेनोपरुद्धां मां निकृत्य पापकर्मणा।
त्रातुमर्हसि वीर त्वं पातालादिव कौशिकीम्।।5.38.68।।
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‘वानरयूथपते! अधिक क्या कहूँ? जिस तरह यह कार्य सिद्ध हो सके, वही उपाय तुम्हें करना चाहिये। इस विषय में तुम्ही प्रमाण हो—इसका सारा भार तुम्हारे ही ऊपर है। तुम्हारे प्रोत्साहन देने से ही श्रीरघुनाथजी मेरे उद्धार के लिये प्रयत्नशील हो सकते हैं
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"O heroic Rama just as Kausik was rescued from the underworld it behoves you to deliver me from imprisonment of wicked Ravana".
ShlokaShloka 61
ततो वस्त्रगतं मुक्त्वा दिव्यं चूडामणिं शुभम्।
प्रदेयो राघवायेति सीता हनुमते ददौ।।5.38.69।।
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‘वानरयूथपते! अधिक क्या कहूँ? जिस तरह यह कार्य सिद्ध हो सके, वही उपाय तुम्हें करना चाहिये। इस विषय में तुम्ही प्रमाण हो—इसका सारा भार तुम्हारे ही ऊपर है। तुम्हारे प्रोत्साहन देने से ही श्रीरघुनाथजी मेरे उद्धार के लिये प्रयत्नशील हो सकते हैं
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Then Sita took out the exquisite and auspicious Chudamani worn on the head, untied from her clothes and gave it to Hanuman to be presented to Rama.
ShlokaShloka 62
प्रतिगृह्य ततो वीरो मणिरत्नमनुत्तमम्।
अङ्गुल्या योजयामास न ह्यस्�� प्राभवद्भुजः।।5.38.70।।
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‘वानरयूथपते! अधिक क्या कहूँ? जिस तरह यह कार्य सिद्ध हो सके, वही उपाय तुम्हें करना चाहिये। इस विषय में तुम्ही प्रमाण हो—इसका सारा भार तुम्हारे ही ऊपर है। तुम्हारे प्रोत्साहन देने से ही श्रीरघुनाथजी मेरे उद्धार के लिये प्रयत्नशील हो सकते हैं
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Then Hanuman, taking the extraordinary jewel and placed it on his finger as it was not fitting to his arm.
ShlokaShloka 63
मणिरत्नं कपिवरः प्रतिगृह्याभिवाद्य च।
सीतां प्रदक्षिणं कृत्वा प्रणतः पार्व्शतः स्थितः।।5.38.71।।
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‘वानरयूथपते! अधिक क्या कहूँ? जिस तरह यह कार्य सिद्ध हो सके, वही उपाय तुम्हें करना चाहिये। इस विषय में तुम्ही प्रमाण हो—इसका सारा भार तुम्हारे ही ऊपर है। तुम्हारे प्रोत्साहन देने से ही श्रीरघुनाथजी मेरे उद्धार के लिये प्रयत्नशील हो सकते हैं
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Having recieved the jewel from Sita and circumambulated her, Hanuman offered salutations to her and stood by her.
ShlokaShloka 64
हर्षेण महता युक्तः सीतादर्शनजेन सः।
हृदयेन गतो रामं शरीरेण तु विष्ठितः।।5.38.72।।
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‘वीर! पापाचारी रावण ने मुझे कैद कर रखा है। अतः राक्षसियों द्वारा शठतापूर्वक मुझे बड़ी पीड़ा दी जाती है। जैसे भगवान् विष्णु ने इन्द्र की लक्ष्मी का पाताल से उद्धार किया था, उसी प्रकार आप यहाँ से मेरा उद्धार करें
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Hanuman stood there physically, with great joy gazing at Sita, but mentally he was with Rama.
ShlokaShloka 65
मणिवरमुपगृह्य तं महार्हं जनकनृपात्मजया धृतं प्रभावात्।
गिरिरिव पवनावधूतमुक्तः सुखितमनाः प्रतिसङ्क्रमं प्रपेदे।।5.38.73।।
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‘वीर! पापाचारी रावण ने मुझे कैद कर रखा है। अतः राक्षसियों द्वारा शठतापूर्वक मुझे बड़ी पीड़ा दी जाती है। जैसे भगवान् विष्णु ने इन्द्र की लक्ष्मी का पाताल से उद्धार किया था, उसी प्रकार आप यहाँ से मेरा उद्धार करें
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Having received the most precious jewel from the daughter of Janaka, Hanuman prepared to return like a mountain released from the impact of the wind. इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे अष्टत्रिंशस्सर्गः।। Thus ends the thirtyeighth sarga of Sundarakanda of the holy Ramayana, the first epic composed by sage Valmiki.