Sundara Kanda
Sarga 47: Death of Prince Aksha in the combat with Hanuman
सुन्दरकाण्डम् · सर्ग 47
38 shlokas
ShlokaShloka 1
सेनापतीन्पञ्च स तु प्रमापितान् हनूमता सानुचरान्सवाहनान्।
समीक्ष्य राजा समरोद्धतोन्मुखं कुमारमक्षं प्रसमैक्षताग्रतः।।5.47.1।।
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हनुमान जी के द्वारा अपने पाँच सेनापतियों को सेवकों और वाहनोंसहित मारा गया सुनकर राजा रावण ने अपने सामने बैठे हुए पुत्र अक्षकुमार की ओर देखा, जो युद्ध में उद्धत और उसके लिये उत्कण्ठित रहनेवाला था
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Hearing the sad news of death of the five army generals including their followers and destruction of their vehicles, King (Ravana) gave a suggestive look at prince Aksha who was inclined to fight the war.
ShlokaShloka 2
स तस्य दृष्ट्यर्पणसम्प्रचोदितः प्रतापवान्काञ्चनचित्रकार्मुकः।
समुत्पपाताथ सदस्युदीरितो द्विजातिमुख्यैर्हविषेव पावकः।।5.47.2।।
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पिता के दृष्टिपातमात्र से प्रेरित हो वह प्रतापी वीर युद्ध के लिये उत्साहपूर्वक उठा। उसका धनुष सुवर्णजटित होने के कारण विचित्र शोभा धारण करता था। जैसे श्रेष्ठ ब्राह्मणों द्वारा यज्ञशाला में हविष्य की आहुति देने पर अग्निदेव प्रज्वलित हो उठते हैं, उसी प्रकार वह भी सभा में उठकर खड़ा हो गया
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Spurred by the mere glance of Ravana, the glorious Aksha with his wonderful bow inlaid with gold sprang up from the royal assembly just as flame rises from firesanctuary when oblations are poured in by reputed brahmins.
ShlokaShloka 3
ततो महद्बालदिवाकरप्रभं प्रतप्तजाम्बूनदजालसन्ततम्।
रथं समास्थाय ययौ स वीर्यवान्महाहरिं तं प्रति नैरृतर्षभः।।5.47.3।।
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वह महापराक्रमी राक्षसशिरोमणि अक्ष प्रातःकालीन सूर्य के समान कान्तिमान् तथा तपाये हुए सुवर्ण के जाल से आच्छादित रथ पर आरूढ़ हो उन महाकपि हनुमान जी के पास चल दिया
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Ascending a glittering chariot inlaid with pure gold Aksha, the courageous bull among giants looking splendid like the rising Sun, marched forth towards the great vanara.
ShlokaShloka 4
ततस्तपस्सङ्ग्रहसञ्चयार्जितं प्रतप्तजाम्बूनदजालशोभितम्।
पताकिनं रत्नविभूषितध्वजं मनोजवाष्टाश्ववरैः सुयोजितम्।।5.47.4।।
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वह रथ उसे बड़ी भारी तपस्याओं के संग्रह से प्राप्त हुआ था। उसमें तपे हुए जाम्बूनद (सुवर्ण)-की जाली जड़ी हुई थी। पताका फहरा रही थी। उसका ध्वजदण्ड रत्नों से विभूषित था। उसमें मन के समान वेगवाले आठ घोड़े अच्छी तरह जुते हुए थे। देवता और असुर कोई भी उस रथ को नष्ट नहीं कर सकते थे। उसकी गति कहीं रुकती नहीं थी। वह बिजली के समान प्रकाशित होता और आकाश में भी चलता था। उस रथ को सब सामग्रियों से सुसज्जित किया गया था। उसमें तरकस रखे गये थे। आठ तलवारों के बँधे रहने से वह और भी सुन्दर दिखायी देता था। उसमें यथास्थान शक्ति और तोमर आदि अस्त्र-शस्त्र क्रम से रखे गये थे। चन्द्रमा और सूर्य के समान दीप्तिमान् तथा सोने की रस्सी से युक्त युद्ध के समस्त उपकरणों से सुशोभित उस सूर्यतुल्य तेजस्वी रथ पर बैठकर देवताओं के तुल्य पराक्रमी अक्षकुमार राजमहल से बाहर निकला
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The chariot was (strong as it was) gained by his austerities of high order. It was overlaid with pure gold armour, fixed with flags, and staff, studded with precious gems, yoked to the best of eight horses and endowed with the speed of mind.
ShlokaShloka 5
सुरासुराधृष्यमसङ्गचारिणं रविप्रभं व्योमचरं समाहितम्।
सतूणमष्टासिनिबद्धबन्धुरं यथाक्रमावेशितशक्तितोमरम्।।5.47.5।।
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वह रथ उसे बड़ी भारी तपस्याओं के संग्रह से प्राप्त हुआ था। उसमें तपे हुए जाम्बूनद (सुवर्ण)-की जाली जड़ी हुई थी। पताका फहरा रही थी। उसका ध्वजदण्ड रत्नों से विभूषित था। उसमें मन के समान वेगवाले आठ घोड़े अच्छी तरह जुते हुए थे। देवता और असुर कोई भी उस रथ को नष्ट नहीं कर सकते थे। उसकी गति कहीं रुकती नहीं थी। वह बिजली के समान प्रकाशित होता और आकाश में भी चलता था। उस रथ को सब सामग्रियों से सुसज्जित किया गया था। उसमें तरकस रखे गये थे। आठ तलवारों के बँधे रहने से वह और भी सुन्दर दिखायी देता था। उसमें यथास्थान शक्ति और तोमर आदि अस्त्र-शस्त्र क्रम से रखे गये थे। चन्द्रमा और सूर्य के समान दीप्तिमान् तथा सोने की रस्सी से युक्त युद्ध के समस्त उपकरणों से सुशोभित उस सूर्यतुल्य तेजस्वी रथ पर बैठकर देवताओं के तुल्य पराक्रमी अक्षकुमार राजमहल से बाहर निकला
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(The chariot) was unassailable to suras or asuras.It moved without touching the ground, it could fly in air and had the splendour of the Sun. It was equipped readily with quivers, eight swords, javelins and clubs placed in right order.
ShlokaShloka 6
विराजमानं प्रतिपूर्णवस्तुना सहेमदाम्ना शशिसूर्यवर्चसा।
दिवाकराभं रथमास्थितस्ततस्स निर्जगामामरतुल्यविक्रमः।।5.47.6।।
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वह रथ उसे बड़ी भारी तपस्याओं के संग्रह से प्राप्त हुआ था। उसमें तपे हुए जाम्बूनद (सुवर्ण)-की जाली जड़ी हुई थी। पताका फहरा रही थी। उसका ध्वजदण्ड रत्नों से विभूषित था। उसमें मन के समान वेगवाले आठ घोड़े अच्छी तरह जुते हुए थे। देवता और असुर कोई भी उस रथ को नष्ट नहीं कर सकते थे। उसकी गति कहीं रुकती नहीं थी। वह बिजली के समान प्रकाशित होता और आकाश में भी चलता था। उस रथ को सब सामग्रियों से सुसज्जित किया गया था। उसमें तरकस रखे गये थे। आठ तलवारों के बँधे रहने से वह और भी सुन्दर दिखायी देता था। उसमें यथास्थान शक्ति और तोमर आदि अस्त्र-शस्त्र क्रम से रखे गये थे। चन्द्रमा और सूर्य के समान दीप्तिमान् तथा सोने की रस्सी से युक्त युद्ध के समस्त उपकरणों से सुशोभित उस सूर्यतुल्य तेजस्वी रथ पर बैठकर देवताओं के तुल्य पराक्रमी अक्षकुमार राजमहल से बाहर निकला
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Prince Aksha, whose courage was equal to that of gods, shone like the Sun. He ascended the splendid chariot decked with golden garlands shining like Sun and Moon, equipped with all weapons, bows and shields etc, he went out.
ShlokaShloka 7
स पूरयन्खं च महीं च साचलां तुरङ्गमातङ्गमहारथस्वनैः।
बलैस्समेतैस्सहि तोरणस्थितं समर्थमासीनमुपागमत्कपिम्।।5.47.7।।
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घोड़े, हाथी और बड़े-बड़े रथों की भयंकर आवाज से पर्वतोंसहित पृथ्वी तथा आकाश को जाता हुआ वह बड़ी भारी सेना साथ लेकर वाटिका के द्वार पर बैठे हुए शक्तिशाली वीर वानर हनुमान् जी के पास जा पहुँचा
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Seated on the chariot he (Aksha) sallied forth along with the army filling the entire earth and mountains with the sounds of horses, elephants and rumblings of big chariots and reached the portal where the great vanara stood.
ShlokaShloka 8
स तं समासाद्य हरिं हरीक्षणो युगान्तकालाग्निमिव प्रजाक्षये।
अवस्थितं विस्मितजातसम्भ्रम स्समैक्षताक्षो बहुमानचक्षुषा।।5.47.8।।
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सिंह के समान भयंकर नेत्रवाले अक्षने वहाँ पहुँचकर लोकसंहार के समय प्रज्वलित हुई प्रलयाग्नि के समान स्थित और विस्मय एवं सम्भ्रम में पड़े हुए हनुमान् जी को अत्यन्त गर्वभरी दृष्टि से देखा
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The lioneyed Aksha saw the vanara who appeared like the cosmic fire at the time of dissolution of the universe. The prince was astonished and struck with awe (at the majestic form of the Vanara) and looked at him with great respect.
ShlokaShloka 9
स तस्य वेगं च कपेर्महात्मनः पराक्रमं चारिषु पार्थिवात्मजः।
विचारयन्स्वं च बलं महाबलो हिमक्षये सूर्य इवाभिवर्धते।।5.47.9।।
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उन महात्मा कपिश्रेष्ठ के वेग तथा शत्रुओं के प्रति उनके पराक्रमका और अपने बल का भी विचार करके वह महाबली रावणकुमार प्रलयकाल के सूर्य की भाँति बढ़ने लगा
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Aksha, the mighty prince judging the speed and prowess of the monkey with his own in confronting enemies and the strength of the monkey, began to swell up in spirit like the glow of the Sun at the end of winter.
ShlokaShloka 10
स जातमन्युः प्रसमीक्ष्य विक्रमं स्थिरं स्थिरस्सम्यति दुर्निवारणम्।
समाहितात्मा हनुमन्तमाहवे प्रचोदयामास शरैस्त्रिभि श्शितैः।।5.47.10।।
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हनुमान जी के पराक्रम पर दृष्टिपात करके उसे क्रोध आ गया। अतः स्थिरतापूर्वक स्थित हो उसने एकाग्रचित्त से तीन तीखे बाणों द्वारा रणदुर्जय हनुमान् जी को युद्ध के लिये प्रेरित किया
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Knowing that it is difficult to win Hanuman who was steady and of irresistible valour Aksha was angry. Remaining steady, with full attention, he provoked the vanara to fight and released three sharp arrows.
ShlokaShloka 11
ततः कपिं तं प्रसमीक्ष्य गर्वितं जितश्रमं शत्रुपराजयोर्जितम्।
अवैक्षताक्षस्समुदीर्णमानसस्सबाणपाणिः प्रगृहीतकार्मुकः।।5.47.11।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
तदनन्तर हाथ में धनुष और बाण लिये अक्ष ने यह जानकर कि ‘ये खेद या थकावट को जीत चुके हैं, शत्रुओं को पराजित करने की योग्यता रखते हैं और युद्ध के लिये इनके मन का उत्साह बढ़ा हुआ है; इसीलिये ये गर्वीले दिखायी देते हैं, उनकी ओर दृष्टिपात किया
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Then Aksha contempuously looked at Hanuman who had conquered his fatigue and was determined to defeat the enemy. Holding in his hands his bow and arrows proudly, he reflected.
ShlokaShloka 12
स हेमनिष्काङ्गदचारुकुण्डल स्समाससादाऽशुपराक्रमः कपिम्।
तयोर्बभूवाप्रतिमस्समागम स्सुरासुराणामपि सम्भ्रमप्रदः।।5.47.12।।
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गले में सुवर्ण के निष्क (पदक), बाँहों में बाजूबंद और कानों में मनोहर कुण्डल धारण किये वह शीघ्रपराक्रमी रावणकुमार हनुमान जी के पास आया। उस समय उन दोनों वीरों में जो टक्कर हुई, उसकी कहीं तुलना नहीं थी। उनका युद्ध देवताओं और असुरों के मन में भी घबराहट पैदा कर देने वाला था
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Adorned with armlets studded with golden coins and lovely earrings Aksha advanced instantaneously to meet the monkey. Their matchless combat excuitement and enthusiasm even among gods and demons.
ShlokaShloka 13
ररास भूमिर्न तताप भानुमा न्वनौ न वायुः प्रच��चल चाचलः।
कपेः कुमारस्य च वीक्ष्य संयुगं ननाद च द्यौरुदधिश्च चुक्षुभे।।5.47.13।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
कपिश्रेष्ठ हनुमान् और अक्षकुमार का वह संग्राम देखकर भूतल के सारे प्राणी चीख उठे। सूर्य का ताप कम हो गया। वायु की गति रुक गयी। पर्वत हिलने लगे। आकाश में भयंकर शब्द होने लगा और समुद्र में तूफान आ गया
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Witnessing the fight between Hanuman and Prince Aksha, even the earth shrieked in agony, the Sun became dim, the wind stopped blowing, mountains were shaken, the sky thundered and even the ocean was agitated.
ShlokaShloka 14
ततस्स वीरस्सुमुखान् पतत्रिणस्सुवर्णपुङ्खान्सविषानिवोरगान्।
समाधिसम्योगविमोक्षतत्त्वविच्छरानथ त्रीन्कपिमूर्ध्न्यपातयत्।।5.47.14।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
अक्षकुमार निशाना साधने, बाण को धनुष पर चढ़ाने और उसे लक्ष्य की ओर छोड़ने में बड़ा प्रवीण था। उस वीर ने विषधर सोके समान भयंकर, सुवर्णमय पंखों से युक्त, सुन्दर अग्रभागवाले तथा पत्रयुक्त तीन बाण हनुमान जी के मस्तक में मारे
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Heroic Aksha, who was good at targeting correctly, with due concentration struck the vanara on his head with three goldenshafted, winged arrows with feathers smeared with poison which resembled serpents.
ShlokaShloka 15
स तै श्शरैर्मूर्ध्नि समं निपातितैः क्षरन्नसृग्दिग्धविवृत्तलोचनः।
नवोदितादित्यनिभ श्शरांशुमान् व्यराजतादित्य इवांशुमालिकः।।5.47.15।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
उन तीनों की चोट हनुमान् जी के माथे में एक साथ ही लगी, इससे खून की धारा गिरने लगी। वे उस रक्त से नहा उठे और उनकी आँखें घूमने लगीं। उस समय बाणरूपी किरणों से युक्त हो वे तुरंत के उगे हुए अंशुमाली सूर्य के समान शोभा पाने लगे
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With the three arrows shot on his forehead simultaneously his eyes were drenched with flowing blood and with arrows shining like rays he appeared like the rising Sun, garlanded by glowing rays.
ShlokaShloka 16
ततस्स पिङ्गाधिपमन्त्रिसत्तमः समीक्ष्य तं राजवरात्मजं रणे।
उदग्रचित्रायुधचित्रकार्मुकं जहर्ष चापूर्यत चाहवोन्मुखः।।5.47.16।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
तदनन्तर वानरराज के श्रेष्ठ मन्त्री हनुमान् जी राक्षसराज रावण के राजकुमार अक्ष को अति उत्तम विचित्र आयुध एवं अद्भुत धनुष धारण किये देख हर्ष और उत्साह से भर गये और युद्ध के लिये उत्कण्ठित हो अपने शरीर को बढ़ाने लगे
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Hanuman, the esteemed minister of the copperyeyed Sugriva observed the prince holding manifold splendid weapons. He rejoiced, grew in size ready to fight, making the necessary prepararions (taking the required position).
ShlokaShloka 17
स मन्दराग्रस्थ इवांशुमालिको विवृद्धकोपो बलवीर्यसंयुतः।
कुमारमक्षं सबलं सवाहनं ददाह नेत्राग्निमरीचिभिस्तदा।।5.47.17।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
हनुमान जी का क्रोध बहुत बढ़ा हुआ था। वे बल और पराक्रम से सम्पन्न थे, अतः मन्दराचल के शिखर पर प्रकाशित होने वाले सूर्यदेव के समान वे अपनी नेत्राग्निमयी किरणों से उस समय सेना और सवारियोंसहित राजकुमार अक्ष को दग्ध-सा करने लगे
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Huge Hanuman, endowed with strength and valour looked like the rising Sun on the peak of mount Mandara. He looked at prince Aksha and his army as well as his vehicles as though he was burning them with the rays emerging from his fiery eyes.
ShlokaShloka 18
ततस्स बाणासनचित्रकार्मुक श्शरप्रवर्षो युधि राक्षसाम्बुदः।
शरान्मुमोचाशु हरीश्वराचले वलाहको वृष्टिमिवाचलोत्तमे।।5.47.18।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
तब जैसे बादल श्रेष्ठ पर्वत पर जल बरसाता है, उसी प्रकार युद्धस्थल में अपने शरासनरूपी इन्द्रधनुष से युक्त वह राक्षसरूपी मेघ बाणवर्षी होकर कपिश्रेष्ठ हनुमान् रूपी पर्वत पर बड़े वेग से बाणों की वृष्टि करने लगा
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Aksha, with his wonderful quiver and bow, began to rain rapidly a shower of arrows in the battle, on the mountainlike monkeylord just as a cloud rains on a mountain.
ShlokaShloka 19
ततः कपिस्तं रणचण्डविक्रमं विवृद्धतेजोबलवीर्यसंयुतम्।
कुमारमक्षं प्रसमीक्ष्य संयुगे ननाद हर्षाद् घनतुल्यविक्रमम्।।5.47.19।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
रणभूमि में अक्षकुमार का पराक्रम बड़ा प्रचण्ड दिखायी देता था। उसके तेज, बल, पराक्रम और बाण सभी बढ़े-चढ़े थे। युद्धस्थल में उसकी ओर दृष्टिपात करके हनुमान जी ने हर्ष और उत्साह में भरकर मेघ के समान भयानक गर्जना की
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Then Hanuman saw prince Aksha, endowed with excessive splendour, power and energy advancing in a fierce manner like a cloud in the battle. Then Hanuman happy (to see the heroic prince) roared like a clap of thunder.
ShlokaShloka 20
स बालभावाद्युधि वीर्यदर्पितः प्रवृद्धमन्युः क्षतजोपमेक्षणः।
समाससादाप्रतिमं कपिं रणे गजो महाकूपमिवावृतं तृणैः।।5.47.20।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
समराङ्गण में बल के घमंड में भरे हुए अक्षकुमार को उनकी गर्जना सुनकर बड़ा क्रोध हुआ। उसकी आँखें रक्त के समान लाल हो गयीं। वह अपने बालोचित अज्ञान के कारण अनुपम पराक्रमी हनुमान् जी का सामना करने के लिये आगे बढ़ा। ठीक उसी तरह, जैसे कोई हाथी तिनकों से ढके हुए विशाल कूप की ओर अग्रसर होता है
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Young Aksha, proud of his valour with eyes bloodshot in anger rushed towards the matchless Hanuman, just as an elephant would approach a huge pitfall covered with grass.
ShlokaShloka 21
स तेन बाणैः प्रसभं निपातितैश्चकार नादं घननादनिस्स्वनः।
समुत्पपाताशु नभस्स मारुतिर्भुजोरुविक्षेपणघोरदर्शनः।।5.47.21।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
उसके बलपूर्वक चलाये हुए बाणों से विद्ध होकर हनुमान जी ने तुरंत ही उत्साहपूर्वक आकाश को विदीर्ण करते हुए-से मेघ के समान गम्भीर स्वर से भीषण गर्जना की। उस समय दोनों भुजाओं और जाँघों को चलाने के कारण वे बड़े भयंकर दिखायी देते थे
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Struck by the arrows released by prince Aksha, Hanuman roared violently like a thundering cloud and leaped into the sky putting up a fierce appearance, stretching his arms and thighs.
ShlokaShloka 22
समुत्पतन्तं समभिद्रवद्बली स राक्षसानां प्रवरः प्रतापवान्।
रथी रथिश्रेष्ठतमः किरन्शरैः पयोधरश्शैलमिवाश्मवृष्टिभिः।।5.47.22।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
उन्हें आकाशमें उछलते देख रथियोंमें श्रेष्ठ और रथपर चढ़े हुए उस बलवान्, प्रतापी एवं राक्षसशिरोमणि वीरने बाणोंकी वर्षा करते हुए उनका पीछा किया। उस समय वह ऐसा जान पड़ता था मानो कोई मेघ किसी पर्वतपर ओले और पत्थरोंकी वर्षा कर रहा हो
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ShlokaShloka 23
स तान्शरांस्तस्य हरिर्विमोक्षयंश्चचार वीरः पथि वायुसेविते।
शरान्तरे मारुतवद्विनिष्पतन्मनोजवस्संयति चण्डविक्रमः।।5.47.23।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
उस युद्धस्थल में मन के समान वेगवाले वीर हनुमान् जी भयंकर पराक्रम प्रकट करने लगे। वे अक्षकुमार के उन बाणों को व्यर्थ करते हुए वायु के पथ पर विचरते और दो बाणों के बीच से हवा की भाँति निकल जाते थे
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Dodging like the wind between the arrows and also escaping the arrows Hanuman, who was swift in movement like the mind, was seen exhibiting his terrific valour in the battle while he moved in the sky.
ShlokaShloka 24
तमात्तबाणासनमाहवोन्मुखं खमास्तृणन्तं विशिखैश्शरोत्तमैः।
अवैक्षताक्षं बहुमानचक्षुषा जगाम चिन्तां च स मारुतात्मजः।।5.47.24।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
अक्षकुमार हाथ में धनुष लिये युद्ध के लिये उन्मुख हो नाना प्रकारके उत्तम बाणोंद्वारा आकाश को आच्छादित किये देता था। पवनकुमार हनुमान ने उसे बड़े आदर की दृष्टि से देखा और वे मन-ही-मन कुछ सोचने लगे
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Admiring the young Aksha's appearance, his skill in holding the quiver and spreading the excellent arrows with missiles and facing the war, Hanuman became thoughtful (as to how to kill him).
ShlokaShloka 25
ततश्शरैर्भिन्नभुजान्तरः कपिः कुमारवीरेण महात्मना नदन्।
महाभुजः कर्मविशेषतत्त्ववि द्विचिन्तयामास रणे पराक्रमम्।।5.47.25।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
इतने ही में महामना वीर अक्षकुमार ने अपने बाणों द्वारा कपिश्रेष्ठ हनुमान जी की दोनों भुजाओं के मध्यभाग–छाती में गहरा आघात किया। वे महाबाहु वानरवीर समयोचित कर्तव्यविशेष को ठीक-ठीक जानते थे; अतः वे रणक्षेत्र में उस चोट को सहकर सिंहनाद करते हुए उसके पराक्रम के विषयमें इस प्रकार विचार करने लगे-
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The strongarmed Hanuman, who was aware of the propriety of actions, wounded in his arms by the warrior prince started roaring and thinking about the next strategy in the combat.
ShlokaShloka 26
अबालवद्बालदिवाकरप्रभः करोत्ययं कर्म महन्महाबलः।
न चास्य सर्वाहवकर्मशोभिनः प्रमापणे मे मतिरत्र जायते।।5.47.26।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘यह महाबली अक्षकुमार बालसूर्य के समान तेजस्वी है और बालक होकर भी बड़ों के समान महान् कर्म कर रहा है। युद्धसम्बन्धी समस्त कर्मों में कुशल होने के कारण अद्भुत शोभा पाने वाले इस वीर को यहाँ मार डालने की मेरी इच्छा नहीं हो रही है।
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'He (Aksha) is like the radiant, rising Sun with extraordinary might. He is accomplishing great deeds unlike young warriors of his age and is exhibiting a magnificent feat. He knows all means of fighting. I do not feel like cutting him to size. My mind does not allow me to kill this boy.
ShlokaShloka 27
अयं महात्मा च महांश्च वीर्यत स्समाहितश्चातिसहश्च संयुगे।
असंशयं कर्मगुणोदयादयं सनागयक्षैर्मुनिभिश्च पूजितः��।5.47.27।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘पराक्रम और उत्साह से इसका मन बढ़ा हुआ है। यह युद्ध के मुहाने पर मेरे सामने खड़ा हो मुझे ही देख रहा है। शीघ्रतापूर्वक युद्ध करने वाले इस वीर का पराक्रम देवताओं और असुरों के हृदय को भी कम्पित कर सकता है
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'He is a great self. His valour is also admirable. He is focused in battle and highly tolerant. There is no doubt that on account of his excellence even nagas, yakshas and sages offer salutations to him.
ShlokaShloka 28
पराक्रमोत्साहविवृद्धमानस स्समीक्षते मां प्रमुखाग्रतःस्थितः।
पराक्रमो ह्यस्य मनांसि कम्पयेत्सुरासुराणामपि शीघ्रगामिनः।।5.47.28।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘पराक्रम और उत्साह से इसका मन बढ़ा हुआ है। यह युद्ध के मुहाने पर मेरे सामने खड़ा हो मुझे ही देख रहा है। शीघ्रतापूर्वक युद्ध करने वाले इस वीर का पराक्रम देवताओं और असुरों के हृदय को भी कम्पित कर सकता है
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'His mental horizon is enhanced by his valour and power. He is standing before me and dares to look into my eyes. Surely his swift movement and valour will shake even the minds of suras and asuras.
ShlokaShloka 29
न खल्वयं नाभिभवेदुपेक्षितः पराक्रमो ह्यस्य रणे विवर्धते।
प्रमापणं त्वेव ममाद्य रोचते न वर्धमानोऽग्निरुपेक्षितुं क्षमः।।5.47.29।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
तत्पश्चात् आकाश में विचरते हुए वीर वानर पवनकुमार ने थप्पड़ों की मार से अक्षकुमार के उन आठों उत्तम और विशाल घोड़ों को, जो भार सहन करने में समर्थ और नाना प्रकार के पैंतरे बदलने की कला में सुशिक्षित थे, यमलोक पहुँचा दिया
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If I ignore him now, he would get the better of me (I have to consider his challenge seriously). His valour in the battle is growing. It is proper to subdue him now. A spreading fire cannot be neglected.
ShlokaShloka 30
इति प्रवेगं तु परस्य चिन्तयन्स्वकर्मयोगं च विधाय वीर्यवान्।
चकार वेगं तु महाबलस्तदा मतिं च चक्रेऽस्य वधे महाकपिः।।5.47.30।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
तत्पश्चात् आकाश में विचरते हुए वीर वानर पवनकुमार ने थप्पड़ों की मार से अक्षकुमार के उन आठों उत्तम और विशाल घोड़ों को, जो भार सहन करने में समर्थ और नाना प्रकार के पैंतरे बदलने की कला में सुशिक्षित थे, यमलोक पहुँचा दिया
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Reflecting on the power of the enemy, the mighty and valiant vanara thought of his own course of action. Hanuman made up his mind to kill the enemy and increased his speed.
ShlokaShloka 31
स तस्य तानष्टहयान्महाजवान् समाहितान्भारसहान्विवर्तने।
जघान वीरः पथि वायुसेविते तलप्रहारैः पवनात्मजः कपिः।।5.47.31।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
तत्पश्चात् आकाश में विचरते हुए वीर वानर पवनकुमार ने थप्पड़ों की मार से अक्षकुमार के उन आठों उत्तम और विशाल घोड़ों को, जो भार सहन करने में समर्थ और नाना प्रकार के पैंतरे बदलने की कला में सुशिक्षित थे, यमलोक पहुँचा दिया
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Hanuman the brave son of the Windgod hit with his palm and killed the eight horses (yoked to Aksha's chariot) which had great speed were stable and had the capacity to bear heavy loads while turning round in the sky. (The battle was fought in the air since Hanuman leaped into the air and the demon hero had to resist him there).
ShlokaShloka 32
ततस्तलेनाभिहतो महारथ स्स तस्य पिङ्गाधिपमन्त्रिनिर्जितः।
प्रभग्ननीडः परिमुक्तकूबरः पपात भूमौ हतवाजिरम्बरात्।।5.47.32।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
तदनन्तर वानरराज सुग्रीव के मन्त्री हनुमान जी ने अक्षकुमार के उस विशाल रथ को भी अभिभूत कर दिया, उन्होंने हाथ से ही पीटकर रथ की बैठक तोड़ डाली और उसके हरसे को उलट दिया। घोड़े तो पहले ही मर चुके थे, अतः वह महान् रथ आकाश से पृथ्वी पर गिर पड़ा
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Then hit by Hanuman with his palm, the minister of the copperyeyed Sugriva, the huge chariot seat of Aksha was broken, the wooden frame of the yoke was disjointed, horses were slain and the great chariot fell down from the sky.
ShlokaShloka 33
स तं परित्यज्य महारथो रथं सकार्मुकः खङ्गधरः खमुत्पतन्।
तपोऽभियोगादृषिरुग्रवीर्यवान्विहाय देहं मरुतामिवालयम्।।5.47.33।।
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उस समय महारथी अक्षकुमार धनुष और तलवार ले रथ छोड़कर अन्तरिक्ष में ही उड़ने लगा। ठीक वैसे ही, जैसे कोई उग्रशक्ति से सम्पन्न महर्षि योगमार्ग से शरीर त्यागकर स्वर्गलोक की ओर चला जा रहा हो
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(Aksha) the great charioteer abandoned the chariot, held a sword and a bow, and flew up to the region of the sky with his fierce power just as a sage with his fearsome ascetic power ascends to heaven, leaving his body.
ShlokaShloka 34
ततः कपिस्तं विचरन्तमम्बरे पतत्रिराजानिलसिद्धसेविते।
समेत्य तं मारुततुल्यविक्रमः क्रमेण जग्राह स पादयोर्दृढम्।।5.47.34।।
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तब वायु के समान वेग और पराक्रमवाले कपिवर हनुमान जी ने पक्षिराज गरुड़, वायु तथा सिद्धों से सेवित व्योममार्ग में विचरते हुए उस राक्षस के पास पहुँचकर क्रमशः उसके दोनों पैर दृढ़तापूर्वक पकड़ लिये
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Thereupon Hanuman with the prowess that was equal to wind, approaching the sky firmly caught hold of the legs of Aksha flying into the abode of Garuda, the Windgod and the Siddhas.
ShlokaShloka 35
स तं समाविध्य सहस्रशः कपिर्महोरगं गृह्य इवाण्डजेश्वरः।
मुमोच वेगात्पितृतुल्यविक्रमो महीतले संयति वानरोत्तमः।।5.47.35।।
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फिर तो अपने पिता वायु देवता के तुल्य पराक्रमी वानर-शिरोमणि हनुमान् ने जिस प्रकार गरुड़ बड़ेबड़े सर्पो को घुमाते हैं, उसी तरह उसे हजारों बार घुमाकर बड़े वेग से उस युद्ध-भूमि में पटक दिया
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Hanuman, the foremost of the vanaras who was equal to his father in valour, seized him just as Garuda, the lord of birds, would seize a great serpent. And spinning him round speedily a thousand times and hitting him, dropped him on the earth.
ShlokaShloka 36
स भग्नबाहूरुकटीशिरोधरः क्षरन्नसृङिनर्मथितास्थिलोचनः।
सम्भग्नसन्धि: प्रविकीर्णबन्धनो हतः क्षितौ वायुसुतेन राक्षसः।।5.47.36।।
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अक्षकुमार को पृथ्वी पर पटककर महाकपि हनुमान् जी ने राक्षसराज रावण के हृदय में बहुत बड़ा भय उत्पन्न कर दिया। उसके मारे जाने पर नक्षत्रमण्डल में विचरने वाले महर्षियों, यक्षों, नागों, भूतों तथा इन्द्रसहित देवताओं ने वहाँ एकत्र होकर बड़े विस्मय के साथ हनुमान जी का दर्शन किया
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Hit by Hanuman, the ogre's arms, thighs, hips and neck broken, bones rendered to fragments, eyes protruded, joints disjointed, tendons strewn he was thrown down on the earth dripping blood.
ShlokaShloka 37
महाकपिर्भूमितले निपीड्य तं चकार रक्षोधिपतेर्महद्भयम्।
महर्षिभिश्चक्रचरैर्महाव्रतै स्समेत्य भूतैश्च सयक्षपन्नगैः।।5.47.37।।
सुरैश्च सेन्द्रैर्भृशजातविस्मयै र्हते कुमारे स कपिर्निरीक्षितः।
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अक्षकुमार को पृथ्वी पर पटककर महाकपि हनुमान् जी ने राक्षसराज रावण के हृदय में बहुत बड़ा भय उत्पन्न कर दिया। उसके मारे जाने पर नक्षत्रमण्डल में विचरने वाले महर्षियों, यक्षों, नागों, भूतों तथा इन्द्रसहित देवताओं ने वहाँ एकत्र होकर बड़े विस्मय के साथ हनुमान जी का दर्शन किया
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When the great vanara dashed Aksha down on to the earth, the king of demons was struck with terror. The great sages who go round the planets, great seers who were observants of vows, yakshas, panagas, suras including Indra all beings collected together and looked at the vanara with awe.
ShlokaShloka 38
निहत्य तं वज्रिसुतोपमप्रभं कुमारमक्षं क्षतजोपमेक्षणम्।
तमेव वीरोऽभिजगाम तोरणं कृतक्षणः काल इव प्रजाक्षये।।5.47.38।।
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युद्ध में इन्द्रपुत्र जयन्त के समान पराक्रमी और लाल-लाल आँखों वाले अक्षकुमार का काम तमाम करके वीरवर हनुमान जी प्रजा के संहार के लिये उद्यत हुए काल की भाँति पुनः युद्ध की प्रतीक्षा करते हुए वाटिका के उसी द्वार पर जा पहुँचे
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Hanuman, the hero with bloodshot eyes having slain Aksha, shone resplendent like the son of Indra (Jayanta), and reached the portal, and waited looking like the god of death determined to destroy all beings. इत्यार्षे वाल्मीकीये श्रीमद्रामायणे आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे सप्तचत्वारिंशस्सर्गः।। Thus ends the fortyseventh sarga of Sundarakanda of the holy Ramayana, the first epic composed by sage Valmiki.