Sundara Kanda
Sarga 41: Hanuman decides to meet Ravana and measure his strength
सुन्दरकाण्डम् · सर्ग 41
20 shlokas
ShlokaShloka 1
स च वाग्भिः प्रशस्ताभिर्गमिष्यन्पूजितस्तया।
तस्माद्देशादपक्रम्य चिन्तयामास वानरः।।5.41.1।।
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सीताजी से उत्तम वचनों द्वारा समादर पाकर वानरवीर हनुमान जी जब वहाँ से जाने लगे, तब उस स्थान से दूसरी जगह हटकर वे इस प्रकार विचार करने लगे—
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Having been honoured and praised by Sita's words, Hanuman prepared to depart from Sita's presence.
ShlokaShloka 2
अल्पशेषमिदं कार्यं दृष्टेयम���ितेक्षणा।
त्रीनुपायानतिक्रम्य चतुर्थ: इह विद्यते।।5.41.2।।
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‘मैंने कजरारे नेत्रोंवाली सीताजी का दर्शन तो कर लिया, अब मेरे इस कार्य का थोड़ा-सा अंश (शत्रु की शक्ति का पता लगाना) शेष रह गया है। इसके लिये चार उपाय हैं—साम, दान, भेद और दण्ड यहाँ साम आदि तीन उपायों को लाँघकर केवल चौथे उपाय (दण्ड)-का प्रयोग ही उपयोगी दिखायी देता है
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ShlokaShloka 3
न साम रक्षस्सु गुणाय कल्पते न दानमर्थोपचितेषु युज्यते।
न भेदसाध्या बलदर्पिता जनाः पराक्रमस्त्वेव ममेह रोचते।।5.41.3।।
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‘राक्षसों के प्रति सामनीति का प्रयोग करने से कोई लाभ नहीं होता। इनके पास धन भी बहुत है, अतःइन्हें दान देने का भी कोई उपयोग नहीं है। इसके सिवा, ये बल के अभिमान में चूर रहते हैं, अतः भेदनीति के द्वारा भी इन्हें वश में नहीं किया जा सकता। ऐसी दशा में मुझे यहाँ पराक्रम दिखाना ही उचित जान पड़ता है
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'With demons, negotiation is of no use. They are wealthy, they need no gifts. Proud of their stregth, the demons will not yield to dissension. I think only by using power it can be done.
ShlokaShloka 4
न चास्य कार्यस्य पराक्रमादृते विनिश्चयः कश्चिदिहोपपद्यते।
हतप्रवीरा हि रणे हि राक्षसाः कथञ्चिदीयुर्यदिहाद्य मार्दवम्।।5.41.4।।
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‘इस कार्य की सिद्धि के लिये पराक्रम के सिवा यहाँ और किसी उपाय का अवलम्बन ठीक नहीं जंचता। यदि युद्ध में राक्षसों के मुख्य-मुख्य वीर मारे जायँ तो ये लोग किसी तरह कुछ नरम पड़ सकते हैं
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'Other than power, there is no way to accomplish the task of ascertaining their strength. If I slay a few strong ogres somehow they may soften a little and yield.
ShlokaShloka 5
कार्ये कर्मणि निर्दिष्टे यो बहून्यपि साधयेत्।
पूर्वकार्याविरोधेन स कार्यं कर्तुमर्हति।।5.41.5।।
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‘जो पुरुष प्रधान कार्य के सम्पन्न हो जाने पर दूसरे दूसरे बहुत-से कार्यों को भी सिद्ध कर लेता है और पहले के कार्यों में बाधा नहीं आने देता, वही कार्य को सुचारु रूप में कर सकता है
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'He, who can perform tasks in addition to the objective accomplished without affecting it, is really worthy.
ShlokaShloka 6
न ह्येकस्साधको हेतुस्स्वल्पस्यापीह कर्मणः।
यो ह्यर्थं बहुधा वेद स समर्थोऽर्थसाधने।।5.41.6।।
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‘यदि इसी यात्रा में मैं इस बात को ठीक-ठीक समझ लूँ कि अपने और शत्रुपक्ष में युद्ध होने पर कौन प्रबल होगा और कौन निर्बल, तत्पश्चात् भविष्य के कार्य का भी निश्चय करके आज सुग्रीव के पास चलूँ तो मेरे द्वारा स्वामी की आज्ञाका पूर्णरूप से पालन हुआ समझा जायगा
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'There are ways more than one even to perform a small work. And the capable know it.
ShlokaShloka 7
इहैव तावत्कृतनिश्चयो ह्यहं यदि व्रजेयं प्लवगेश्वरालयम्।
परात्मसम्मर्दविशेषतत्त्ववित्ततः कृतं स्यान्मम भर्तृशासनम्।।5.41.7।।
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‘यदि इसी यात्रा में मैं इस बात को ठीक-ठीक समझ लूँ कि अपने और शत्रुपक्ष में युद्ध होने पर कौन प्रबल होगा और कौन निर्बल, तत्पश्चात् भविष्य के कार्य का भी निश्चय करके आज सुग्रीव के पास चलूँ तो मेरे द्वारा स्वामी की आज्ञाका पूर्णरूप से पालन हुआ समझा जायगा
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'If I ascertain the difference in the strength of enemies and vanaras in war here itself and return to Kishkinda, the abode of vanaras, then I would have executed the orders of my lord properly.
ShlokaShloka 8
कथं नु खल्वद्य भवेत्सुखागतं प्रसह्य युद्धं मम राक्षसैः सह।
तथैव खल्वात्मबलं च सारवत्सम्मानयेन्मां च रणे दशाननः।।5.41.8।।
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‘परंतु आज मेरा यहाँ तक आना सुखद अथवा शुभ परिणाम का जनक कैसे होगा? राक्षसों के साथ हठात् युद्ध करने का अवसर मुझे कैसे प्राप्त होगा? तथा दशमुख रावण समर में अपनी सेना को और मुझे भी तुलनात्मक दृष्टि से देखकर कैसे यह समझ सकेगा कि कौन सबल है ?
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'How can I have enduring war with the ogres today? How will my visit to this place end in happy return? Only in a combat this tenheaded Ravana will guage his strength and mine
ShlokaShloka 9
ततस्समासाद्य रणे दशाननं समन्त्रिवर्गं सबलप्रयायिनम्।
हृदि स्थितं तस्य मतं बलं च वै सुखेन मत्त्वाऽहमितः पुनर्व्रजे।।5.41.9।।
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‘उस युद्ध में मन्त्री, सेना और सहायकोंसहित रावण का सामना करके मैं उसके हार्दिक अभिप्राय तथा सैनिक-शक्ति का अनायास ही पता लगा लूँगा। उसके बाद यहाँ से जाऊँगा
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'I can return happily only after I gauge the tenheaded Ravana's army in war, his strength, his companions including the ministers and his mind.
ShlokaShloka 10
इदमस्य नृशंसस्य नन्दनोपममुत्तमम्।
वनं नेत्रमनःकान्तं नानाद्रुमलतायुतम्।।5.41.10।।
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‘इस निर्दयी रावण का यह सुन्दर उपवन नेत्रों को आनन्द देने वाला और मनोरम है। नाना प्रकार के वृक्षों और लताओं से व्याप्त होने के कारण यह नन्दनवन के समान उत्तम प्रतीत होता है
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'This Ashoka garden of Ravana filled with different kinds of trees and creepers is a feast to the eyes and mind. It is an excellent garden like the Nandana garden of Indra.
ShlokaShloka 11
इदं विध्वंसयिष्यामि शुष्कं वनमिवानलः।
अस्मिन्भग्ने ततः कोपं करिष्यति दशाननः।।5.41.11।।
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‘तत्पश्चात् वह राक्षसराज हाथी, घोड़े तथा विशाल रथों से युक्त और त्रिशूल, कालायस एवं पट्टिश आदि अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित बहुत बड़ी सेना लेकर आयेगा। फिर तो यहाँ महान् संग्राम छिड़ जायगा’
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'I will devastate this garden, just as fire destroys a dried up forest. This will enrage Ravana.
ShlokaShloka 12
ततो महत्साश्वमहारथद्विपं बलं समादेक्ष्यति राक्षसाधिपः।
त्रिशूलकालायसपट्टिसायुधं ततो महद्युद्धमिदं भविष्यति।।5.41.12।।
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‘तत्पश्चात् वह राक्षसराज हाथी, घोड़े तथा विशाल रथों से युक्त और त्रिशूल, कालायस एवं पट्टिश आदि अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित बहुत बड़ी सेना लेकर आयेगा। फिर तो यहाँ महान् संग्राम छिड़ जायगा’
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'Then the demon king will order the horses, chariots and elephants and army equipped with tridents and spears to march against me. A great war will take place.
ShlokaShloka 13
अहं तु तैः संयति चण्डविक्रमै स्समेत्य रक्षोभिरसह्य विक्रमः।
निहत्य तद्रावणचोदितं बलं सुखं गमिष्यामि कपीश्वरालयम्।।5.41.13।।
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‘उस युद्ध में मेरी गति रुक नहीं सकती। मेरा पराक्रम कुण्ठित नहीं हो सकता। मैं प्रचण्ड पराक्रम दिखाने वाले उन राक्षसों से भिड़ जाऊँगा और रावण की भेजी हुई उस सारी सेना को मौत के घाट उतारकर सुखपूर्वक सुग्रीव के निवासस्थान किष्किन्धापुरी को लौट जाऊँगा’
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'I will fight with the ogres sent by Ravana, endowed with fierce strength and irresistible valour. After destroying their army I will go to the abode of vanaras happily'.
ShlokaShloka 14
ततो मारुतवत्कृद्धो मारुतिर्भीमविक्रमः।
ऊरुवेगेन महता द्रुमान्क्षेप्तुमथारभत्।।5.41.14।।
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तदनन्तर वीर हनुमान् ने मतवाले पक्षियों के कलरव से मुखरित और नाना प्रकार के वृक्षों एवं लताओं से भरे-पूरे उस प्रमदावन (अन्तःपुर के उपवन)-को उजाड़ डाला
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Furious Maruti endowed with fierce valour started uprooting the trees with the speed sprung from his thighs like the Windgod.
ShlokaShloka 15
ततस्तु हनुमान्वीरो बभञ्ज प्रमदावनम्।
मत्तद्विजसमाघुष्टं नानाद्रुमलतायुतम्।।5.41.15।।
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तदनन्तर वीर हनुमान् ने मतवाले पक्षियों के कलरव से मुखरित और नाना प्रकार के वृक्षों एवं लताओं से भरे-पूरे उस प्रमदावन (अन्तःपुर के उपवन)-को उजाड़ डाला
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Then Hanuman felled a variety of trees and vines inhabited by intoxicated birds in the beautiful garden meant for womenfolk.
ShlokaShloka 16
तद्वनं मथितैर्वृक्षैर्भिन्नैश्च सलिलाशयैः।
चूर्णितैः पर्वताग्रैश्च बभूवाप्रियदर्शनम्।।5.41.16।।
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वहाँ के वृक्षों को खण्ड-खण्ड कर दिया जलाशयों को मथ डाला और पर्वत-शिखरों को चूरचूर कर डाला। इससे वह सुन्दर वन कुछ ही क्षणों में अभव्य दिखायी देने लगा
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That garden looked ugly with uprooted trees, breached ponds and powdered mountain peaks.
ShlokaShloka 17
नानाशकुन्तविरुतैः प्रभिन्नैस्सलिलाशयैः।
ताम्रैः किसलयैः क्लान्तै: क्लान्तद्रुमलतायुतम्।।5.41.17।।
न बभौ तद्वनं तत्र दावानलहतं यथा।
व्याकुलावरणा रेजुर्विह्वला इव ता लताः।।5.41.18।।
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दशमुख रावण की स्त्रियों की रक्षा करने वाले तथा अन्तःपुर के क्रीडाविहार के लिये उपयोगी उस विशाल कानन की भूमि, जहाँ चंचल अशोक-लताओं के समूह शोभा पाते थे, कपिवर हनुमान जी के बल प्रयोग से श्रीहीन होकर शोचनीय लताओं के विस्तार से युक्त हो गयी (उसकी दुरवस्था देखकर दर्शक के मन में दुःख होता था)
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Vines and trees wilted, birds shrieking, the embankments of ponds destroyed, its tender coppery red shoots withered, the garden looked as though it is burnt by forest fire and the climbers looked like women shivering in fear with their robes disarrayed.
ShlokaShloka 18
लतागृहैश्चित्रगृहैश्च नाशितैर्महोरगैर्व्यालमृगैश्च निर्धुतैः।
शिलागृहैरुन्मथितैस्तथा गृहैः प्रणष्टरूपं तदभून्महद्वनम्।।5.41.19।।
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दशमुख रावण की स्त्रियों की रक्षा करने वाले तथा अन्तःपुर के क्रीडाविहार के लिये उपयोगी उस विशाल कानन की भूमि, जहाँ चंचल अशोक-लताओं के समूह शोभा पाते थे, कपिवर हनुमान जी के बल प्रयोग से श्रीहीन होकर शोचनीय लताओं के विस्तार से युक्त हो गयी (उसकी दुरवस्था देखकर दर्शक के मन में दुःख होता था)
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The great garden lay disfigured, with the arbours and the picture galleries ruined, huge serpents and wild animals scattered, with stone houses and sheds destroyed.
ShlokaShloka 19
सा विह्वलाऽशोकलताप्रताना वनस्थली शोकलताप्रताना।
जाता दशास्यप्रमदावनस्य कपेर्बलाद्धि प्रमदावनस्य।।5.41.20।।
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दशमुख रावण की स्त्रियों की रक्षा करने वाले तथा अन्तःपुर के क्रीडाविहार के लिये उपयोगी उस विशाल कानन की भूमि, जहाँ चंचल अशोक-लताओं के समूह शोभा पाते थे, कपिवर हनुमान जी के बल प्रयोग से श्रीहीन होकर शोचनीय लताओं के विस्तार से युक्त हो गयी (उसकी दुरवस्था देखकर दर्शक के मन में दुःख होता था)
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The pleasuregarden of Ravana appeared as though it was spreading the creepers of sorrow, since it was totally destroyed by the monkey who had set out to protect a woman. प्रमदावनस्य of the pleasure garden, प्रमदाअवनस्य of the hero who came to protect a lady.
ShlokaShloka 20
स तस्य कृत्वार्थपतेर्महाकपिर्महद्व्यलीकं मनसो महात्मनः।
युयुत्सुरेको बहुभिर्महाबलैश्शिया ज्वलंस्तोरणमास्थितः कपिः।।5.41.21।।
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दशमुख रावण की स्त्रियों की रक्षा करने वाले तथा अन्तःपुर के क्रीडाविहार के लिये उपयोगी उस विशाल कानन की भूमि, जहाँ चंचल अशोक-लताओं के समूह शोभा पाते थे, कपिवर हनुमान जी के बल प्रयोग से श्रीहीन होकर शोचनीय लताओं के विस्तार से युक्त हो गयी (उसकी दुरवस्था देखकर दर्शक के मन में दुःख होता था)
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The great vanara having perpetrated mischief, rousing anger in the mind of the great lord of wealth, stood at the exit doorway ready to combat singlehanded with many warriors in that mighty army blazing in glory. इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे एकचत्वारिंशस्सर्गः।। Thus ends the fortyfirst sarga of Sundarakanda of the holy Ramayana, the first epic composed by sage Valmiki.