Sundara Kanda
Sarga 65: Hanuman apprises Sri Rama of Sita's presence under the Simsupa tree surrounded by demonesses and presents the Chudamani to Rama in the presence of Sugriva.
सुन्दरकाण्डम् · सर्ग 65
22 shlokas
ShlokaShloka 1
ततः प्रस्रवणं शैलं ते गत्वा चित्रकाननम्।
प्रणम्य शिरसा रामं लक्ष्मणं च महाबलम्।।5.65.1।।
युवराजं पुरस्कृत्य सुग्रीवमभिवाद्य च।
प्रवृत्तिमथ सीतायाः प्रवक्तुमुपचक्रमुः।।5.65.2।।
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तदनन्तर विचित्र काननों से सुशोभित प्रस्रवण पर्वत पर जाकर युवराज अङ्गद को आगे करके श्रीराम, महाबली लक्ष्मण तथा सुग्रीव को मस्तक झुकाकर प्रणाम करने के अनन्तर सब वानरों ने सीता का समाचार बताना आरम्भ किया-
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Thereafter the vanaras arrived at the Prasrvana mount, with wonderful forests and bowed down to Sri Rama and mighty Lakshaman and Sugriva placing their leader, heir apparent in front. Then they began telling the story of Sita and her state.
ShlokaShloka 2
रावणान्तः पुरे रोधं राक्षसीभिश्च तर्जनम्।
रामे समनुरागं च यश्चायं समयः कृतः।।5.65.3।।
एतदाख्यान्ति ते सर्वे हरयो रामसन्निधौ।
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तदनन्तर विचित्र काननों से सुशोभित प्रस्रवण पर्वत पर जाकर युवराज अङ्गद को आगे करके श्रीराम, महाबली लक्ष्मण तथा सुग्रीव को मस्तक झुकाकर प्रणाम करने के अनन्तर सब वानरों ने सीता का समाचार बताना आरम्भ किया-
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The monkeys in Rama's presence narrated all about Sita's detention in Ravana's Ashoka garden, the ogresses threatening her and the time limit fixed by Ravana (for her survival).
ShlokaShloka 3
वैदेहीमक्षतां श्रुत्वा रामस्तूत्तरमब्रवीत्।।5.65.4।।
क्व सीता वर्तते देवी कथं च मयि वर्तते।
एतन्मे सर्वमाख्यात वैदेहीं प्रति वानराः।।5.65.5।।
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‘सीता देवी रावण के अन्तःपुर में रोक रखी गयी हैं। राक्षसियाँ उन्हें धमकाती रहती हैं। श्रीराम के प्रति उनका अनन्य अनुराग है। रावण ने सीता के जीवित रहने के लिये केवल दो मास की अवधि दे रखी है।इस समय विदेह-कुमारी को कोई क्षति नहीं पहुँची है –वे सकुशल हैं।’ श्रीरामचन्द्रजी के निकट ये सब बातें बताकर वे वानर चुप हो गये। विदेहकुमारी के सकुशल होने का वृत्तान्त सुनकर श्रीराम ने आगे की बात पूछते हुए कहा—
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Hearing of Sita alive and not harmed, Rama asked the vanaras, 'How is Sita? How is she disposed to me? Tell me everything'.
ShlokaShloka 4
रामस्य गदितं श्रुत्वा हरयो रामसन्निधौ।
चोदयन्ति हनूमन्तं सीतावृत्तान्तकोविदम्।।5.65.6।।
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‘सीता देवी रावण के अन्तःपुर में रोक रखी गयी हैं। राक्षसियाँ उन्हें धमकाती रहती हैं। श्रीराम के प्रति उनका अनन्य अनुराग है। रावण ने सीता के जीवित रहने के लिये केवल दो मास की अवधि दे रखी है।इस समय विदेह-कुमारी को कोई क्षति नहीं पहुँची है –वे सकुशल हैं।’ श्रीरामचन्द्रजी के निकट ये सब बातें बताकर वे वानर चुप हो गये। विदेहकुमारी के सकुशल होने का वृत्तान्त सुनकर श्रीराम ने आगे की बात पूछते हुए कहा—
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On hearing the words from Rama, the vanaras requested Hanuman who was aware of Sita's position to tell Rama all about her.
ShlokaShloka 5
श्रुत्वा तु वचनं तेषां हनुमान्मारुतात्मजः।
प्रणम्य शिरसा देव्यै सीतायै तां दिशं प्रति।।5.65.7।।
उवाच वाक्यं वाक्यज्ञस्सीताया दर्शनं यथा।
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‘वानरो! देवी सीता कहाँ हैं? मेरे प्रति उनका कैसा भाव है ? विदेहकुमारी के विषय में ये सारी बातें मुझसे कहो’
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The son of the Wind god, Hanuman who was wise in speech heard the words of Rama, offered salutations to Sita in the direction in which she was located and narrated the story about her discovery.
ShlokaShloka 6
समुद्रं लङ्घयित्वाहं शतयोजनमायतम्।।5.65.8।।
अगच्छं जानकीं सीतां मार्गमाणो दिदृक्षया।
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श्रीरामचन्द्रजी का यह कथन सुनकर वे वानर श्रीराम के निकट सीता के वृत्तान्त को अच्छी तरह जानने वाले हनुमान जी को उत्तर देने के लिये प्रेरित करने लगे
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"Having crossed the sea consisting of a hundred yojanas in quest of Vaidehi, I found her.
ShlokaShloka 7
तत्र लङ्केति नगरी रावणस्य दुरात्मनः।।5.65.9।।
दक्षिणस्य समुद्रस्य तीरे वसति दक्षिणे।
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उन वानरों की बात सुनकर पवनपुत्र हनुमान जी ने पहले देवी सीता के उद्देश्य से दक्षिण दिशा की ओर मस्तक झुकाकर प्रणाम किया
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"On the southern shore of the ocean is situated the city of Lanka , ruled by the evilminded Ravana.
ShlokaShloka 8
तत्र दृष्टा मया सीता रावणान्तः पुरे सती।।5.65.10।।
सन्न्यस्य त्वयि जीवन्ती रामा राम मनोरथम्।
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"There in the inner palace of Ravana, I saw your lovely wife Sita, with all her hopes pinned on you, giving up all other desires.
ShlokaShloka 9
दृष्टा मे राक्षसीमध्ये तर्ज्यमाना मुहुर्मुहुः।।5.65.11।।
राक्षसीभिर्विरूपाभी रक्षिता प्रमदावने।
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"I found her in the beautiful garden guarded by hideous ogresses threatening her again and again৷৷
ShlokaShloka 10
दुःख मासाद्यते देवी तथाऽदुःखोचिता सती।।5.65.12।।
रावणान्तः पुरे रुद्धा राक्षसीभि स्सुरक्षिता।
एकवेणीधरा दीना त्वयि चिन्तापरायणा।।5.65.13।।
अधःशय्या विवर्णाङ्गी पद्मिनीव हिमागमे।
रावणाद्विनिवृत्तार्था मर्तव्यकृतनिश्चया।।5.65.14।।
देवी कथञ्चित्काकुत्स्थ त्वन्मना मार्गिता मया।
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"Sita, who did not deserve and yet was full of grief was detained by Ravana in his inner palace, guarded by ogresses. She had single braid (a sign of desolation), was pathetic, and totally absorbed in your thought. She was lying on bare ground with her limbs turned pale, like lotus in winter. She was averse to Ravana and was determined to commit suicide. She has only Rama in her mind. Somehow I found her.
ShlokaShloka 11
इक्ष्वाकुवंशविख्यातिं शनैः कीर्तयतानघ।।5.65.15।।
सा मया नरशार्दूल विश्वासमुपपादिता।
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"O sinless one O tiger among men To inspire confidence in her I praised the glory of your Ikshvaku dynasty.
ShlokaShloka 12
तत स्सम्भाषिता देवी सर्वमर्थं च दर्शिता।।5.65.16।।
रामसुग्रीवसख्यं च श्रुत्वा प्रीतिमुपागता।
नियत स्समुदाचारो भक्तिश्चास्यास्तथा त्वयि।।5.65.17।।
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"When the divine lady talked to me, I presented all the facts about the alliance of Rama and Sugriva. On hearing me, virtuous Sita, whose devotion is fixed on you became delighted.
ShlokaShloka 13
एवं मया महाभागा दृष्टा जनकनन्दिनी।
उग्रेण तपसा युक्ता त्वद्भक्त्या पुरुषर्षभ।।5.65.18।।
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‘वीरवर! देवी सीता आपके साथ सुख भोगनेके योग्य हैं, परंतु इस समय बड़े दुःखसे दिन बिता रही हैं। उन्हें रावणके अन्तःपुरमें रोक रखा गया है और वे राक्षसियोंके पहरेमें रहती हैं। सिरपर एक वेणी धारण किये दुःखी हो सदा आपकी चिन्तामें डूबी रहती हैं
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"O bull among men I saw Janaki,the delight of Janaka, a formidable lady filled with devotion to you and richly endowed with austerity.
ShlokaShloka 14
अभिज्ञानं च मे दत्तं यथा वृत्तं तवान्तिके।
चित्रकूटे महाप्राज्ञ वायसं प्रति राघव।।5.65.19।।
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‘वीरवर! देवी सीता आपके साथ सुख भोगनेके योग्य हैं, परंतु इस समय बड़े दुःखसे दिन बिता रही हैं। उन्हें रावणके अन्तःपुरमें रोक रखा गया है और वे राक्षसियोंके पहरेमें रहती हैं। सिरपर एक वेणी धारण किये दुःखी हो सदा आपकी चिन्तामें डूबी रहती हैं
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"O wise one, with your ring given her, she told me an anecdote of a crow that took place at Chitrakuta.
ShlokaShloka 15
विज्ञाप्यश्च नरव्याघ्रो रामो वायुसुत त्वया।
अखिलेनेह यद्धृष्टमिति मामाह जानकी।।5.65.20।।
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‘वे नीचे भूमि पर सोती हैं जैसे जाड़े के दिनों में पाला पड़ने के कारण कमलिनी सूख जाती है, उसी प्रकार उनके अङ्गों की कान्ति फीकी पड़ गयी है। रावण से उनका कोई प्रयोजन नहीं है। उन्होंने प्राण त्याग देने का निश्चय कर लिया है
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(She said)'O son of the Windgod you should let Rama, the tiger among men know all that you have seen here.
ShlokaShloka 16
अयं चास्मै प्रदातव्यो यत्नात्सुपरिरक्षितः।
ब्रुवता वचनान्येवं सुग्रीवस्योपशृण्वतः।।5.65.21।।
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‘ककुत्स्थकुलभूषण! उनका मन निरन्तर आप में ही लगा रहता है। निष्पाप नरश्रेष्ठ ! मैंने बड़ा प्रयत्न करके किसी तरह महारानी सीता का पता लगाया और धीरे-धीरे इक्ष्वाकुवंश की कीर्ति का वर्णन करते हुए किसी प्रकार उनके हृदय में अपने प्रति विश्वास उत्पन्न किया। तत्पश्चात् देवी से वार्तालाप करके मैंने यहाँ की सब बातें उन्हें बतलायीं
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'Within hearing of Sugriva, tell him about your efforts. Present this(signet) to Rama carefully preserved by me.
ShlokaShloka 17
एष चूडामणिश्श्रीमान् मया सुपरिरक्षितः।
मनश्शिलायास्तिलको गण्डपार्श्वे निवेशितः।।5.65.22।।
त्वया प्रणष्ठे तिलके तं किल स्��र्तुमर्हसि।
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‘ककुत्स्थकुलभूषण! उनका मन निरन्तर आप में ही लगा रहता है। निष्पाप नरश्रेष्ठ ! मैंने बड़ा प्रयत्न करके किसी तरह महारानी सीता का पता लगाया और धीरे-धीरे इक्ष्वाकुवंश की कीर्ति का वर्णन करते हुए किसी प्रकार उनके हृदय में अपने प्रति विश्वास उत्पन्न किया। तत्पश्चात् देवी से वार्तालाप करके मैंने यहाँ की सब बातें उन्हें बतलायीं
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'This auspicious (jewel) Chudamani has been preserved by me very carefully. Remind him of the decorative red mark he painted with a stone pigment on my forehead, indeed, it is proper to remind him of this.
ShlokaShloka 18
एष निर्यातितश्श्रीमान्मया ते वारि सम्भवः।
एतं दृष्ट्वा प्रहृष्यामि व्यसने त्वामिवानघ।।5.65.23।।
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‘आपकी सुग्रीव के साथ मित्रता का समाचार सुनकर उन्हें बड़ा हर्ष हुआ। उनका उच्चकोटि का आचार-विचार (पातिव्रत्य) सुदृढ़ है। वे सदा आप में ही भक्ति रखती हैं
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'O sinless one tell Rama that this auspicious Chudamani born in the ocean is sent to him and I was gazing at it as if it was him (Rama) and feeling happy.
ShlokaShloka 19
जीवितं धारयिष्यामि मासं दशरथात्मज।।5.65.24।।
ऊर्ध्वं मासान्न जीवेयं रक्षसां वशमागता।
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‘महाभाग! पुरुषोत्तम! इस प्रकार जनकनन्दिनी को मैंने आपकी भक्ति से प्रेरित होकर कठोर तपस्या करते देखा है
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'O Son of Dasaratha I will hold on to life for a month. Captured by the demons, I will not live for more than a month'.
ShlokaShloka 20
इति मामब्रवीत्सीता कृशाङ्गी धर्मचारिणी।।5.65.25।।
रावणान्तः पुरे रुद्धा मृगीवोत्फुल्ललोचना।
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‘महामते! रघुनन्दन! चित्रकूटमें आपके पास देवी के रहते समय एक कौए को लेकर जो घटना घटित हुई थी, उस वृत्तान्त को उन्होंने पहचान के रूप में मुझसे कहा था
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"With her limbs emaciated through austerities detained in Ravana's inner palace, eyes wide open in fear, Sita said this to me:
ShlokaShloka 21
एतदेव मयाख्यातं सर्वं राघव यद्यथा।।5.65.26।।
सर्वथा सागरजले संतारः प्रविधीयताम्।
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"O Rama I have spoken everything that has happened. We have to pay attention to the means of crossing the ocean."
ShlokaShloka 22
तौ जाताश्वासौ राजपुत्रौ विदित्वा तच्चाभिज्ञानं राघवाय प्रदाय।
देव्या चाख्यातं सर्वमेवानुपूर्व्याद्वाचा सम्पूर्णं वायुपुत्त्र श्शशंस।।5.65.27।।
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‘ऐसे समय में देना, जब कि सुग्रीव भी निकट बैठकर तुम्हारी कही हुई बातें सुन रहे हों। साथ ही मेरी ये बातें भी उनसे निवेदन करना—’प्रभो! आपकी दी हुई यह कान्तिमती चूड़ामणि मैंने बड़े यत्न से सुरक्षित रखी थी। जल से प्रकट हुए इस दीप्तिमान् रत्न को मैंने आपकी सेवा में लौटाया है। निष्पाप रघुनन्दन! संकट के समय इसे देखकर मैं उसी प्रकार आनन्दमग्न हो जाती थी, जैसे आपके दर्शन से आनन्दित होती हूँ। आपने मेरे ललाट में जो मैनसिल का तिलक लगाया था, इसको स्मरण कीजिये’ ये बातें जानकीजी ने कही थीं
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Coming to know that the two princes were sighing in relief, Hanuman presented the token of identification given by Sita to Rama, after having communicated in full the messsage of Sita in an orderly manner. इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे पञ्चषष्टितमस्सर्गः।। Thus ends the sixtyfifth sarga of Sundarakanda of the holy Ramayana, the first epic composed by sage Valmiki.