Sundara Kanda
Sarga 5: Hanuman finds demons all over Lanka -- feels sad, unable to find Sita.
सुन्दरकाण्डम् · सर्ग 5
27 shlokas
ShlokaShloka 1
ततः स मध्यंगतमंशुमन्तं ज्योत्स्नावितानं महदुद्वमन्तम्।
ददर्श धीमान् दिवि भानुमन्तं गोष्ठे वृषं मत्तमिव भ्रमन्तम्।।5.5.1।।
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तत्पश्चात् बुद्धिमान् हनुमान जी ने देखा, जिस प्रकार गोशाला के भीतर गौओं के झुंड में मतवाला साँड़ विचरता है, उसी प्रकार पृथ्वी के ऊपर बारम्बार अपनी चाँदनी का चँदोवा तानते हए चन्द्रदेव आकाश के मध्यभाग में तारिकाओं के बीच विचरण कर रहे हैं
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Then intelligent Hanuman observed the Moon in the central part of the sky spreading a canopy of his luminescence like the Sun, and looking like an intoxicated mighty (white) bull moving in a stable.
ShlokaShloka 2
लोकस्य पापानि विनाशयन्तं महोदधिं चापि समेधयन्तम्।
भूतानि सर्वाणि विराजयन्तं ददर्श शीतांशुमथाभियान्तम्।।5.5.2।।
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वे शीतरश्मि चन्द्रमा जगत् के पाप-तापका नाश कर रहे हैं, महासागर में ज्वार उठा रहे हैं, समस्त प्राणियों को नयी दीप्ति एवं प्रकाश दे रहे हैं और आकाश में क्रमशः ऊपर की ओर उठ रहे हैं
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While moving forward, Hanuman saw the Moon spreading his light, thereby warding off the agony of all creatures, causing the swelling of the ocean and illuminating the earth as well as the sky.
ShlokaShloka 3
या भाति लक्ष्मीर्भुवि मन्दरस्था तथा प्रदोषेषु च सागरस्था।
तथैव तोयेषु च पुष्करस्था रराज सा चारुनिशाकरस्था।।5.5.3।।
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भूतलपर मन्दराचल में, संध्या के समय महासागर में और जल के भीतर कमलों में जो लक्ष्मी जिस प्रकार सुशोभित होती हैं, वे ही उसी प्रकार मनोहर चन्द्रमा में शोभा पा रही थीं
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'The same splendour on the Mandara mountain on earth, which glows at dusk lay on the ocean is there, on lotuses in the lakes and on the beautiful Moon also.
ShlokaShloka 4
हंसो यथा राजतपञ्जरस्थः सिंहो यथा मन्दरकन्दरस्थः।
वीरो यथा गर्वितकुञ्जरस्थ चन्द्रोऽपि बभ्राज तथाम्बरस्थः।।5.5.4।।
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जैसे तीखे सींग वाला बैल खड़ा हो, जैसे ऊपर को उठे शिखर वाला महान् पर्वत श्वेत (हिमालय) शोभा पाता हो और जैसे सुवर्णजटित दाँतों से युक्त गजराज सुशोभित होता हो, उसी प्रकार हरिण के शृङ्गरूपी चिह्न से युक्त परिपूर्ण चन्द्रमा छबि पा रहे थे
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'Like a swan in a cage of silver, like a lion in a cave of Mandara mountain, like a hero on a proud, intoxicated elephant, the Moon shone in the sky.
ShlokaShloka 5
स्थितः ककुद्मानिव तीक्ष्णशृङ्गो महाचलः श्वेत इवोच्चशृङ्गः।
हस्तीव जाम्बूनदबद्धशृङ्गो रराज चन्द्रः परिपूर्णशृङ्गः।।5.5.5।।
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इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के सुन्दरकाण्ड में पाँचवाँ सर्ग पूरा हुआ
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The fullmoon with its hornlike spot shone like a bull with sharp horns, like the white Himalayan mountain with its lofty peaks, and like an elephant with gold plated tusks
ShlokaShloka 6
विनष्टशीताम्बुतुषारपङ्को महाग्रहग्राहविनष्टपङ्कः।
प्रकाशलक्ष्म्याश्रयनिर्मलाङ्क: रराज चन्द्रो भगवान् शशाङ्कः।।5.5.6।।
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जिनका शीतल जल और हिमरूपी पङ्क से संसर्ग का दोष नष्ट हो गया है, अर्थात् जो इनके संसर्ग से बहुत दूर है, सूर्य-किरणों को ग्रहण करने के कारण जिन्होंने अपने अन्धकाररूपी पङ्क को भी नष्ट कर दिया है तथा प्रकाश रूप लक्ष्मी का आश्रयस्थान होने के कारण जिनकी कालिमा भी निर्मल प्रतीत होती है, वे भगवान् शशलाञ्छन चन्द्रदेव आकाश में प्रकाशित हो रहे थे
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With the Sun, the great planet (star), destroying the frost that forms the dew, the Moon with its stain shone with graceful radiance.
ShlokaShloka 7
शिलातलं प्राप्य यथा मृगेन्द्रो महारणं प्राप्य यथा गजेन्द्रः।
राज्यं समासाद्य यथा नरेन्द्र स्तथाप्रकाशो विरराज चन्द्रः।।5.5.7।।
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जैसे गुफा के बाहर शिलातलपर बैठा हुआ मृगराज (सिंह) शोभा पाता है, जैसे विशाल वन में पहुँचकर गजराज सुशोभित होता है तथा जैसे राज्य पाकर राजा अधिक शोभा से सम्पन्न हो जाता है, उसी प्रकार निर्मल प्रकाश से युक्त होकर चन्द्रदेव सुशोभित हो रहे थे
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The Moon shone bright like a lion mounted on a rock, like a lordly elephant in a deep forest, like a king on attaining the kingdom.
ShlokaShloka 8
प्रकाशचन्द्रोदयनष्टदोषः प्रवृत्तरक्षः पिशिताशदोषः।
रामाभिरामेरितचित्तदोषः स्वर्गप्रकाशो भगवान् प्रदोषः।।5.5.8।।
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वीणा के श्रवणसुखद शब्द झङ्कत हो रहे थे, सदाचारिणी स्त्रियाँ पतियों के साथ सो रही थीं तथा अत्यन्त अद्भुत और भयंकर शील-स्वभाव वाले निशाचर निशीथ काल में विहार कर रहे थे
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At the time of moonrise, the darkness of dusk is dispelled, the dark deeds of cannibals disappear, the natural instinct for love returns to women as the radiance of the Moon spreads everywhere like in heaven.
ShlokaShloka 9
तन्त्रीस्वनाः कर्णसुखाः प्रवृत्ताः स्वपन्ति नार्यः पतिभिः सुवृत्ताः।
नक्तंचराश्चापि तथा प्रवृत्ता: विहर्तुमत्यद्भुतरौद्रवृत्ताः।।5.5.9।।
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वीणा के श्रवणसुखद शब्द झङ्कत हो रहे थे, सदाचारिणी स्त्रियाँ पतियों के साथ सो रही थीं तथा अत्यन्त अद्भुत और भयंकर शील-स्वभाव वाले निशाचर निशीथ काल में विहार कर रहे थे
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Pleasing sounds of string instruments had begun to be heard. Chaste women were found asleep with their husbands.The nightrangers had begun their strange (evil and cruel) deeds exhibiting their anger.
ShlokaShloka 10
मत्तप्रमत्तानि समाकुलानि रथाश्वभद्रासनसङ्कुलानि।
वीरश्रिया चापि समाकुलानि ददर्श धीमान् स कपिः कुलानि।।5.5.10।।
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बुद्धिमान् वानर हनुमान् ने वहाँ बहुत-से घर देखे। किन्हीं में ऐश्वर्य-मद से मत्त निशाचर निवास करते थे, किन्हीं में मदिरापान से मतवाले राक्षस भरे हुए थे। । कितने ही घर रथ, घोड़े आदि वाहनों और भद्रासनों से सम्पन्न थे तथा कितने ही वीर-लक्ष्मी से व्याप्त दिखायी देते थे। वे सभी गृह एक-दूसरे से मिले हुए थे
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Intelligent Hanuman, the great warrior, observed there in the prosperous mansions, demons proud of their wealth, highly intoxicated and dull, their houses full of horsedrawn chariots with comfortable seats.
ShlokaShloka 11
परस्परं चाधिकमाक्षिपन्ति भुजांश्च पीनानधिकं क्षिपन्ति।
मत्तप्रलापानधिकं क्षिपन्ति मत्तानि चान्योन्यमधिक्षिपन्ति।।5.5.11।।
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राक्षस लोग आपस में एक-दूसरे पर अधिक आक्षेप करते थे। अपनी मोटी-मोटी भुजाओं को भी हिलाते और चलाते थे। मतवालों की-सी बहकी-बहकी बातें करते थे और मदिरा से उन्मत्त होकर परस्पर कटु वचन बोलते थे
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The intoxicated demons were quarrelling, ridiculing one another bitterly and wildly throwing their stout arms on one another, indulging in incoherent talk, uttering vulgar words.
ShlokaShloka 12
रक्षांसि वक्षांसि च विक्षिपन्ति गात्राणि कान्तासु च विक्षिपन्ति।
रूपाणि चित्राणि च विक्षिपन्ति दृढानि चापानि च विक्षिपन्ति।।5.5.12।।
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इतना ही नहीं, वे मतवाले राक्षस अपनी छाती भी पीटते थे। अपने हाथ आदि अंगों को अपनी प्यारी पत्नियों पर रख देते थे। सुन्दर रूपवाले चित्रों का निर्माण करते थे और अपने सुदृढ़ धनुषों को कान तक खींचा करते थे
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The demons were seen expanding their chests sportively and caressing their wives by placing their limbs on them. They were assuming wonderful forms, and drawing their bows up to their ears.
ShlokaShloka 13
ददर्श कान्ताश्च समालभन्त्य स्तथा परास्तत्र पुनः स्वपन्त्यः।
सुरूपवक्त्राश्च तथा हसन्त्यः क्रुद्धाः पराश्चापि विनिःश्वसन्त्य।।5.5.13।।
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चिग्घाड़ते हुए महान् गजराजों, अत्यन्त सम्मानित श्रेष्ठ सभासदों तथा लंबी साँसें छोड़ने वाले वीरों के कारण वह लंकापुरी फुफकारते हुए सोसे युक्त सरोवरों के समान शोभा पा रही थी
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He even saw women collected there, their limbs smeared with unguents on their bodies, like wise women with beautiful countenances laughing at others, some sleeping, and others hissing (sighing) like angry serpents.
ShlokaShloka 14
महागजैश्चापि तथा नदद्भि: सुपूजितैश्चापि तथा सुसद्भिः।
रराज वीरैश्च विनिःश्वसद्भिः ह्रदो भुजङ्गैरिव निःश्वसद्भिः।।5.5.14।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
चिग्घाड़ते हुए महान् गजराजों, अत्यन्त सम्मानित श्रेष्ठ सभासदों तथा लंबी साँसें छोड़ने वाले वीरों के कारण वह लंकापुरी फुफकारते हुए सोसे युक्त सरोवरों के समान शोभा पा रही थी
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There were huge elephants trumpeting, respected people, warriors sighing for the lack of enemies (to vanquish). It had a lake infested with hissing snakes.
ShlokaShloka 15
बुद्धिप्रधानान् रुचिराभिधानान् संश्रद्धधानान् जगतः प्रधानान्।
नानाविधानान् रुचिराभिधानान् ददर्श तस्यां पुरि यातुधानान्।।5.5.15।।
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हनुमान जी ने उस पुरी में बहुत-से उत्कृष्ट बुद्धिवाले, सुन्दर बोलने वाले, सम्यक् श्रद्धा रखने वाले, अनेक प्रकार के रूप-रंगवाले और मनोहर नाम धारण करने वाले विश्वविख्यात राक्षस देखे
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He saw there in the city of Lanka, demons, who were intellectuals, pleasing in words, with faith in religion, preeminent heroes of the world of different kinds, followers of good practices and with lovely names.
ShlokaShloka 16
ननन्द दृष्ट्वा स च तान् सुरूपान्नानागुणानात्मगुणानुरूपान्।
विद्योतमानान्स तदानुरूपान् ददर्श कांश्चिच्च पुनर्विरूपान्।।5.5.16।।
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वे सुन्दर रूपवाले, नाना प्रकार के गुणों से सम्पन्न, अपने गुणों के अनुरूप व्यवहार करने वाले और तेजस्वी थे। उन्हें देखकर हनुमान् जी बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने बहुतेरे राक्षसों को सुन्दर रूपसे सम्पन्न देखा और कोई-कोई उन्हें बड़े कुरूप दिखायी दिये
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He rejoiced to see the handsome demons radiant with forms commensurate with their virtues. He also saw some ugly figures, their traits in conformity to their forms.
ShlokaShloka 17
ततो वरार्हाः सुविशुद्धभावा स्तेषां स्त्रियस्तत्र महानुभावाः।
प्रियेषु पानेषु च सक्तभावा ददर्श तारा इव सुप्रभावाः।।5.5.17।।
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तदनन्तर वहाँ उन्होंने सुन्दर वस्त्राभूषण धारण करने के योग्य सुन्दरी राक्षस-रमणियों को देखा, जिनका भाव अत्यन्त विशुद्ध था। वे बड़ी प्रभावशालिनी थीं। उनका मन प्रियतम में तथा मधुपान में आसक्त था। वे तारिकाओं की भाँति कान्तमती और सुन्दर स्वभाववाली थीं
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There he saw demonesses adorned with choicest ornaments, their minds attached faithfully to their husbands and bottles of wine. Some of the wives of the demons, however, looked gentle and bright like stars.
ShlokaShloka 18
श्रिया ज्वलन्तीस्त्रपयोपगूढा निशीथकाले रमणोपगूढाः।
ददर्श काश्चित्प्रमदोपगूढा यथा विहङ्गाः कुसुमोपगूढाः।।5.5.18।।
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हनुमान जी की दृष्टि में कुछ ऐसी स्त्रियाँ भी आयीं, जो अपने रूप-सौन्दर्य से प्रकाशित हो रही थीं। वे बड़ी लजीली थीं और आधी रात के समय अपने प्रियतम के आलिङ्गनपाश में इस प्रकार बँधी हुई थीं जैसे पक्षिणी पक्षी के द्वारा आलिङ्गित होती है। वे सब-के-सब आनन्द में मग्न थीं
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There he saw cheerful demonesses shining brightly, abashed by the embrace of their beloveds during the night. He also saw those sporting with their beloveds freely and looking like birds embracing flowers.
ShlokaShloka 19
अन्याः पुनर्हर्म्यतलोपविष्टा स्तत्र प्रियाङ्केषु सुखोपविष्टाः।
भर्तुः प्रिया धर्मपरा निविष्टा ददर्श धीमान् मदनाभिविष्टाः।।5.5.19।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
दूसरी बहुत-सी स्त्रियाँ महलों की छतों पर बैठी थीं। वे पति की सेवा में तत्पर रहने वाली, धर्मपरायणा, विवाहिता और कामभावना से भावित थीं। हनुमान् जी ने उन सबको अपने प्रियतम के अङ्क में सुखपूर्वक बैठी देखा
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Intelligent Hanuman saw demonesses seated happily on the laps of their beloved ones on the terraces of the mansions, exhibiting their attachment to one another, overwhelmed with sexual pleasure.
ShlokaShloka 20
अप्रावृताः काञ्चनराजिवर्णाः काश्चित्परार्थ्यास्तपनीयवर्णाः।
पुनश्च काश्चिच्छशलक्ष्मवर्णाः कान्तप्रहीणा रुचिराङ्गवर्णाः।।5.5.20।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
कितनी ही कामिनियाँ सुवर्ण-रेखा के समान कान्तिमती दिखायी देती थीं। उन्होंने अपनी ओढ़नी उतार दी थी। कितनी ही उत्तम वनिताएँ तपाये हुए सुवर्ण के समान रंगवाली थीं तथा कितनी ही पतिवियोगिनी बालाएँ चन्द्रमा के समान श्वेत वर्ण की दिखायी देती थीं। उनकी अंगकान्ति बड़ी ही सुन्दर थी
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Ogresses without veil, some altruistic, some separated from their husbands looked pale like the Moon, though possessed of polished gold complexion.
ShlokaShloka 21
ततः प्रियान् प्राप्य मनोभिरामाः सुप्रीतियुक्ताः प्रसमीक्ष्यरामाः।
गृहेषु हृष्टाः परमाभिरामाः हरिप्रवीरः स ददर्श रामाः।।5.5.21।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
तदनन्तर वानरों के प्रमुख वीर हनुमान जी ने विभिन्न गृहों में ऐसी परम सुन्दरी रमणियों का अवलोकन किया, जो मनोभिराम प्रियतम का संयोग पाकर अत्यन्त प्रसन्न हो रही थीं। फूलों के हार से विभूषित होने के कारण उनकी रमणीयता और भी बढ़ गयी थी और वे सब-की-सब हर्ष से उत्फुल्ल दिखायी देती थीं
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That heroic monkey saw ogresses delighted in the happy company of their loved ones who have joined them, ecstatic wives in the houses.
ShlokaShloka 22
चन्द्रप्रकाशाश्च हि वक्त्रमालाः वक्राक्षिपक्ष्माश्च सुनेत्रमालाः।
विभूषणानां च ददर्श मालाः शतह्रद���नामिव चारुमालाः।।5.5.22।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
उन्होंने चन्द्रमा के समान प्रकाशमान मुखों की पंक्तियाँ, सुन्दर पलकों वाले तिरछे नेत्रों की पंक्तियाँ और चमचमाती हुई विद्युल्लेखाओं के समान आभूषणों की भी मनोहर पंक्तियाँ देखीं
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He saw rows of faces of shedemons shining like moonlight with sidelong glances and graceful eyelashes wearing ornaments resembling charmimg flashes of lightning.
ShlokaShloka 23
न त्वेव सीतां परमाभिजातां पथि स्थिते राजकुले प्रजाताम्।
लतां प्रपुल्लामिव साधु जातां ददर्श तन्वीं मनसाभिजाताम्।।5.5.23।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
किंतु जो परमात्मा के मानसिक संकल्प से धर्ममार्गपर स्थिर रहने वाले राजकुल में प्रकट हुई थीं, जिनका प्रादुर्भाव परम ऐश्वर्य की प्राप्ति कराने वाला है, जो परम सुन्दररूप में उत्पन्न हुई प्रफुल्ल लता के समान शोभा पाती थीं, उन कृशाङ्गी सीता को उन्होंने वहाँ कहीं नहीं देखा था
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Hanuman could not find Sita anywhere, an excellent lady born in a noble royal family, adopting the right path, a lady delicate like a blossoming creeper of good breed, or so he imagined.
ShlokaShloka 24
सनातने वर्त्मनि सन्निविष्टां रामेक्षणां तां मदनाभिविष्टाम्।
भर्तुर्मनः श्रीमदनुप्रविष्टां स्त्रीभ्यो वराभ्यश्च सदा विशिष्टाम्।।5.5.24।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
जो सदा सनातन मार्गपर स्थित रहने वाली, श्रीराम पर ही दृष्टि रखने वाली, श्रीरामविषयक काम या प्रेम से परिपूर्ण, अपने पति के तेजस्वी मन में बसी हुई तथा दूसरी सभी स्त्रियों से सदा ही श्रेष्ठ थीं; जिन्हें विरहजनित ताप सदा पीड़ा देता रहता था, जिनके नेत्रों से निरन्तर आँसुओं की झड़ी लगी रहती थी और कण्ठ उन आँसुओं से गद्गद रहता था, पहले संयोग काल में जिनका कण्ठ श्रेष्ठ एवं बहुमूल्य निष्क (पदक)-से विभूषित रहा करता था, जिनकी पलकें बहुत ही सुन्दर थीं और कण्ठस्वर अत्यन्त मधुर था । तथा जो वन में नृत्य करने वाली मयूरी के समान मनोहर लगती थीं, जो मेघ आदि से आच्छादित होने के कारण अव्यक्त रेखावाली चन्द्रलेखा के समान दिखायी देती थीं, धूलि-धूसर सुवर्ण-रेखा-सी प्रतीत होती थीं, बाण के आघात से उत्पन्न हुई रेखा (चिह्न)-सी जान पड़ती थीं तथा वायु के द्वारा उड़ायी जाती हुई बादलों की रेखा-सी दृष्टिगोचर होती थीं। वक्ताओं में श्रेष्ठ नरेश्वर श्रीरामचन्द्रजी की पत्नी उन सीताजी को बहुत देर तक ढूँढ़ने पर भी जब हनुमान् जी न देख सके, तब वे तत्क्षण अत्यन्त दुःखी और शिथिल हो गये
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'Sita must have had a pair of beautiful eyes. She must have been a passionate lady with mind fixed on her glorious husband. Ever established in dharma, she is perhaps a distinguished lady compared to her counterparts (in Lanka).
ShlokaShloka 25
उष्णार्दितां सानुसृतास्रकण्ठीम् पुरा वरार्होत्तमनिष्ककण्ठीम्।
सुजातपक्ष्मामभिरक्तकण्ठीं वनेऽप्रवृत्तामिव नीलकण्ठीम्।।5.5.25।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
जो सदा सनातन मार्गपर स्थित रहने वाली, श्रीराम पर ही दृष्टि रखने वाली, श्रीरामविषयक काम या प्रेम से परिपूर्ण, अपने पति के तेजस्वी मन में बसी हुई तथा दूसरी सभी स्त्रियों से सदा ही श्रेष्ठ थीं; जिन्हें विरहजनित ताप सदा पीड़ा देता रहता था, जिनके नेत्रों से निरन्तर आँसुओं की झड़ी लगी रहती थी और कण्ठ उन आँसुओं से गद्गद रहता था, पहले संयोग काल में जिनका कण्ठ श्रेष्ठ एवं बहुमूल्य निष्क (पदक)-से विभूषित रहा करता था, जिनकी पलकें बहुत ही सुन्दर थीं और कण्ठस्वर अत्यन्त मधुर था । तथा जो वन में नृत्य करने वाली मयूरी के समान मनोहर लगती थीं, जो मेघ आदि से आच्छादित होने के कारण अव्यक्त रेखावाली चन्द्रलेखा के समान दिखायी देती थीं, धूलि-धूसर सुवर्ण-रेखा-सी प्रतीत होती थीं, बाण के आघात से उत्पन्न हुई रेखा (चिह्न)-सी जान पड़ती थीं तथा वायु के द्वारा उड़ायी जाती हुई बादलों की रेखा-सी दृष्टिगोचर होती थीं। वक्ताओं में श्रेष्ठ नरेश्वर श्रीरामचन्द्रजी की पत्नी उन सीताजी को बहुत देर तक ढूँढ़ने पर भी जब हनुमान् जी न देख सके, तब वे तत्क्षण अत्यन्त दुःखी और शिथिल हो गये
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She whose neck was adorned with costly ornaments earlier must be shedding hot tears now, her throat choked with grief. With her beautiful eyelashes and a sweet loving voice, she would be now like a peahen wandering in the woods.
ShlokaShloka 26
अव्यक्तरेखामिव चन्द्ररेखां पांसुप्रदिग्धामिव हेमरेखाम्।
क्षतप्ररूढामिव बाणरेखां वायुप्रभिन्नामिव मेघरेखाम्।।5.5.26।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
जो सदा सनातन मार्गपर स्थित रहने वाली, श्रीराम पर ही दृष्टि रखने वाली, श्रीरामविषयक काम या प्रेम से परिपूर्ण, अपने पति के तेजस्वी मन में बसी हुई तथा दूसरी सभी स्त्रियों से सदा ही श्रेष्ठ थीं; जिन्हें विरहजनित ताप सदा पीड़ा देता रहता था, जिनके नेत्रों से निरन्तर आँसुओं की झड़ी लगी रहती थी और कण्ठ उन आँसुओं से गद्गद रहता था, पहले संयोग काल में जिनका कण्ठ श्रेष्ठ एवं बहुमूल्य निष्क (पदक)-से विभूषित रहा करता था, जिनकी पलकें बहुत ही सुन्दर थीं और कण्ठस्वर अत्यन्त मधुर था । तथा जो वन में नृत्य करने वाली मयूरी के समान मनोहर लगती थीं, जो मेघ आदि से आच्छादित होने के कारण अव्यक्त रेखावाली चन्द्रलेखा के समान दिखायी देती थीं, धूलि-धूसर सुवर्ण-रेखा-सी प्रतीत होती थीं, बाण के आघात से उत्पन्न हुई रेखा (चिह्न)-सी जान पड़ती थीं तथा वायु के द्वारा उड़ायी जाती हुई बादलों की रेखा-सी दृष्टिगोचर होती थीं। वक्ताओं में श्रेष्ठ नरेश्वर श्रीरामचन्द्रजी की पत्नी उन सीताजी को बहुत देर तक ढूँढ़ने पर भी जब हनुमान् जी न देख सके, तब वे तत्क्षण अत्यन्त दुःखी और शिथिल हो गये
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She would be like a barely visible ray of the Moon, like a streak of gold covered with dust, like an unhealed scar of a wound caused by an arrow only superficially covered and like a flake of cloud swept off by the wind.
ShlokaShloka 27
सीतामपश्यन् मनुजेश्वरस्य रामस्य पत्नीं वदतां वरस्य।
बभूव दुःखाभिहतश्चिरस्य प्लवङ्गमो मन्द इवाचिरस्य।।5.5.27।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
जो सदा सनातन मार्गपर स्थित रहने वाली, श्रीराम पर ही दृष्टि रखने वाली, श्रीरामविषयक काम या प्रेम से परिपूर्ण, अपने पति के तेजस्वी मन में बसी हुई तथा दूसरी सभी स्त्रियों से सदा ही श्रेष्ठ थीं; जिन्हें विरहजनित ताप सदा पीड़ा देता रहता था, जिनके नेत्रों से निरन्तर आँसुओं की झड़ी लगी रहती थी और कण्ठ उन आँसुओं से गद्गद रहता था, पहले संयोग काल में जिनका कण्ठ श्रेष्ठ एवं बहुमूल्य निष्क (पदक)-से विभूषित रहा करता था, जिनकी पलकें बहुत ही सुन्दर थीं और कण्ठस्वर अत्यन्त मधुर था । तथा जो वन में नृत्य करने वाली मयूरी के समान मनोहर लगती थीं, जो मेघ आदि से आच्छादित होने के कारण अव्यक्त रेखावाली चन्द्रलेखा के समान दिखायी देती थीं, धूलि-धूसर सुवर्ण-रेखा-सी प्रतीत होती थीं, बाण के आघात से उत्पन्न हुई रेखा (चिह्न)-सी जान पड़ती थीं तथा वायु के द्वारा उड़ायी जाती हुई बादलों की रेखा-सी दृष्टिगोचर होती थीं। वक्ताओं में श्रेष्ठ नरेश्वर श्रीरामचन्द्रजी की पत्नी उन सीताजी को बहुत देर तक ढूँढ़ने पर भी जब हनुमान् जी न देख सके, तब वे तत्क्षण अत्यन्त दुःखी और शिथिल हो गये
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Hanuman stood griefstricken, having (unsuccessfully) searched for a long time for the wife of Rama, the lord of men. The highly eloquent was now despondent. For a while he looked dull and dejected. इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे पञ्चमस्सर्गः।। Thus ends the fifth sarga of Sundarakanda of the holy Ramayana, the first epic composed by sage Valmiki.