Sundara Kanda
Sarga 43: Hanuman destroys the demons in the palace
सुन्दरकाण्डम् · सर्ग 43
20 shlokas
ShlokaShloka 1
ततस्स किङ्करान्हत्वा हनुमान्ध्यानमास्थितः।
वनं भग्नं मया चैत्यप्रासादो न विनाशितः।।5.43.1।।
तस्मात्प्रासादमप्येवं भीमं विध्वंसयाम्यहं।
इति सञ्चिन्त्य मनसा हनुमान्दर्शयन्बलम्।।5.43.2।।
चैत्यप्रासादमाप्लुत्य मेरुशृङ्गमिवोन्नतम्।
आरुरोह कपिश्रेष्ठो हनुमान्मारुतात्मजः।।5.43.3।।
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इधर किंकरों का वध करके हनुमान जी यह सोचने लगे कि ‘मैंने वन को तो उजाड़ दिया, परंतु इस चैत्य* प्रासाद को नष्ट नहीं किया है
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Having slain the kinkaras, Hanuman stood and reflected, ' I have ruined the garden and not the palatial buildings that are like temples (Chaityas)'. Then Hanuman, son of the Windgod, decided in his mind to show his strength and jumped on to the top of the palatial building that appeared like the peak of mount Meru.
ShlokaShloka 2
आरुह्य गिरिसङ्काशं प्रासादं हरियूथपः।
बभौ स सुमहातेजाः प्रतिसूर्य इवोदितः।।5.43.4।।
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‘अतः आज इस चैत्यप्रासाद का भी विध्वंस किये देता हूँ। मन-ही-मन ऐसा विचारकर पवनपुत्र वानरश्रेष्ठ हनुमान जी अपने बल का प्रदर्शन करते हुए मेरुपर्वत के शिखर की भाँति ऊँचे उस चैत्यप्रासाद पर उछलकर चढ़ गये’
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The powerful vanara leader climbed the tall, palatial building which resembled a mountain. He looked like another Sun, just risen.
ShlokaShloka 3
संप्रधृष्य च दुर्धर्षं चैत्यप्रासादमुत्तमम्।
हनुमान्प्रज्वलन्लक्ष्म्या पारियात्रोपमोऽभवत्।।5.43.5।।
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‘अतः आज इस चैत्यप्रासाद का भी विध्वंस किये देता हूँ। मन-ही-मन ऐसा विचारकर पवनपुत्र वानरश्रेष्ठ हनुमान जी अपने बल का प्रदर्शन करते हुए मेरुपर्वत के शिखर की भाँति ऊँचे उस चैत्यप्रासाद पर उछलकर चढ़ गये’
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Having destroyed the fine palace building, the indomitable Hanuman was blazing with glory like the mountain Pariyatra. (one of the seven Kula mountains viz., Mahendra, Malaya, Sahya, Shuktiman, Riksha, Vindhya and Pariyatra)
ShlokaShloka 4
स भूत्वा सुमहाकायः प्रभावान्मारुतात्मजः।
धृष्टमास्फोटयामास लङ्कां शब्देन पूरयन्।।5.43.6।।
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उस पर्वताकार प्रासाद पर चढ़कर महातेजस्वी वानर-यूथपति हनुमान् तुरंत के उगे हुए दूसरे सूर्य की भाँति शोभा पाने लगे
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Hanuman heaved his body huge with his prowess and patted his arms loudly filling the city of Lanka with that terrible sound.
ShlokaShloka 5
तस्यास्फोटितशब्देन महता श्रोत्रघातिना।
पेतुर्विहङ्गमास्तत्र चैत्यपालाश्च मोहिताः।।5.43.7।।
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उस ऊँचे प्रासाद पर आक्रमण करके दुर्धर्ष वीर हनुमान जी अपनी सहज शोभा से उद्भासित होते हुए पारियात्र पर्वत के समान प्रतीत होने लगे
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By the deafening sound caused by the patting, the birds fell down and the guards of the palace lost consciousness.
ShlokaShloka 6
अस्त्रविज्जयतां रामो लक्ष्मणश्च महाबलः।
राजा जयति सुग्रीवो राघवेणाभिपालितः।।5.43.8।।
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वे तेजस्वी पवनकुमार विशाल शरीर धारण करके लङ्का को प्रतिध्वनित करते हुए धृष्टतापूर्वक उस प्रासाद को तोड़ने-फोड़ने लगे
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'May Sri Rama, unsurpassed in the use of missiles be victorious May his brother, mighty Lakshmana, a matchless warrior be victorious. May King Sugriva ruled by Rama be victorious.'
ShlokaShloka 7
दासोऽहं कोसलेन्द्रस्य रामस्याक्लिष्टकर्मणः।
हनुमान्शत्रुसैन्यानां निहन्ता मारुतात्मजः।।5.43.9।।
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जोर-जोर से होने वाला वह तोड़-फोड़ का शब्द कानों से टकराकर उन्हें बहरा किये देता था। इससे मूर्च्छित हो वहाँ के पक्षी और प्रासादरक्षक भी पृथ्वी पर गिर पड़े
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'I am the son of the Windgod, destroyer of enemy army. I am a servant of Rama, the king of Kosala who can accomplish any task with ease.
ShlokaShloka 8
न रावणसहस्रं मे युद्धे प्रतिबलं भवेत्।
शिलाभिस्तु प्रहरतः पादपैश्च सहस्रशः।।5.43.10।।
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उस समय हनुमान जी ने पुनः यह घोषणा की’अस्त्रवेत्ता भगवान् श्रीराम तथा महाबली लक्ष्मण की जय हो। श्रीरघुनाथजी के द्वारा सुरक्षित राजा सुग्रीव की भी जय हो मैं अनायास ही महान् पराक्रम करने वाले कोसलनरेश श्रीरामचन्द्रजी का दास हूँ। मेरा नाम हनुमान् है। मैं वायु का पुत्र तथा शत्रुसेना का संहार करने वाला हूँ। जब मैं हजारों वृक्षों और पत्थरों से प्रहार करने लगूंगा, उस समय सहस्रों रावण मिलकर भी युद्ध में मेरे बल की समानता अथवा मेरा सामना नहीं कर सकते। मैं लङ्कापुरी को तहस-नहस कर डालूँगा और मिथिलेशकुमारी सीता को प्रणाम करने के अनन्तर सब राक्षसों के देखते-देखते अपना कार्य सिद्ध करके जाऊँगा’
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'Not even a thousand Ravanas can stand my might in combat as I start assailing them with thousands of rocks or even trees.
ShlokaShloka 9
अर्दयित्वा पुरीं लङ्कामभिवाद्य च मैथिलीम्।
समृद्धार्थो गमिष्यामि मिषतां सर्वरक्षसाम्।।5.43.11।।
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उस समय हनुमान जी ने पुनः यह घोषणा की’अस्त्रवेत्ता भगवान् श्रीराम तथा महाबली लक्ष्मण की जय हो। श्रीरघुनाथजी के द्वारा सुरक्षित राजा सुग्रीव की भी जय हो मैं अनायास ही महान् पराक्रम करने वाले कोसलनरेश श्रीरामचन्द्रजी का दास हूँ। मेरा नाम हनुमान् है। मैं वायु का पुत्र तथा शत्रुसेना का संहार करने वाला हूँ। जब मैं हजारों वृक्षों और पत्थरों से प्रहार करने लगूंगा, उस समय सहस्रों रावण मिलकर भी युद्ध में मेरे बल की समानता अथवा मेरा सामना नहीं कर सकते। मैं लङ्कापुरी को तहस-नहस कर डालूँगा और मिथिलेशकुमारी सीता को प्रणाम करने के अनन्तर सब राक्षसों के देखते-देखते अपना कार्य सिद्ध करके जाऊँगा’
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'I shall return only after accomplishing the destruction of the city of Lanka and offering obeisance to Sita, while all demons keep looking at me'.
ShlokaShloka 10
एवमुक्त्वा विमानस्थश्चैत्यस्थान्हरियूथपः।
ननाद भीमनिर्ह्रादो रक्षसां जनयन्भयम्।।5.43.12।।
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उस समय हनुमान जी ने पुनः यह घोषणा की’अस्त्रवेत्ता भगवान् श्रीराम तथा महाबली लक्ष्मण की जय हो। श्रीरघुनाथजी के द्वारा सुरक्षित राजा सुग्रीव की भी जय हो मैं अनायास ही महान् पराक्रम करने वाले कोसलनरेश श्रीरामचन्द्रजी का दास हूँ। मेरा नाम हनुमान् है। मैं वायु का पुत्र तथा शत्रुसेना का संहार करने वाला हूँ। जब मैं हजारों वृक्षों और पत्थरों से प्रहार करने लगूंगा, उस समय सहस्रों रावण मिलकर भी युद्ध में मेरे बल की समानता अथवा मेरा सामना नहीं कर सकते। मैं लङ्कापुरी को तहस-नहस कर डालूँगा और मिथिलेशकुमारी सीता को प्रणाम करने के अनन्तर सब राक्षसों के देखते-देखते अपना कार्य सिद्ध करके जाऊँगा’
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Having made proclamations that way from the top of the Vimana (palace) the monkey leader roared making terrific sound frightening the ogres.
ShlokaShloka 11
तेन शब्देन महता चैत्यपालाश्शतं ययुः।
गृहीत्वा विविधानस्त्रान्प्रासान्खङ्गान्परश्वथान्।।5.43.13।।
विसृजन्तो महाकाया मारुतिं पर्यवारयन्।
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उस समय हनुमान जी ने पुनः यह घोषणा की’अस्त्रवेत्ता भगवान् श्रीराम तथा महाबली लक्ष्मण की जय हो। श्रीरघुनाथजी के द्वारा सुरक्षित राजा सुग्रीव की भी जय हो मैं अनायास ही महान् पराक्रम करने वाले कोसलनरेश श्रीरामचन्द्रजी का दास हूँ। मेरा नाम हनुमान् है। मैं वायु का पुत्र तथा शत्रुसेना का संहार करने वाला हूँ। जब मैं हजारों वृक्षों और पत्थरों से प्रहार करने लगूंगा, उस समय सहस्रों रावण मिलकर भी युद्ध में मेरे बल की समानता अथवा मेरा सामना नहीं कर सकते। मैं लङ्कापुरी को तहस-नहस कर डालूँगा और मिथिलेशकुमारी सीता को प्रणाम करने के अनन्तर सब राक्षसों के देखते-देखते अपना कार्य सिद्ध करके जाऊँगा’
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Hearing the terrific sound, a hundred gigantic guards of the palace set forth, holding different kinds of weapons like darts, swords and axes and hurled at Maruti surrounding him.
ShlokaShloka 12
ते गदाभिर्विचित्राभिः परिघैः काञ्चनाङ्गदैः।
आजघ्नुर्वानरश्रेष्ठं बाणैश्चादित्यसन्निभैः।।5.43.14।।
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उस भीषण गर्जना से प्रभावित हो सैकड़ों प्रासादरक्षक नाना प्रकार के प्रास, खड्ग और फर से लिये वहाँ आये
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Holding astonishing maces decorated with gold, iron crowbars and sharp arrows resembling the rays of the Sun the ogres hit Hanuman, the foremost of vanaras.
ShlokaShloka 13
आवर्त इव गङ्गायास्तोयस्य विपुलो महान्।
परिक्षिप्य हरिश्रेष्ठं स बभौ रक्षसां गणः।।5.43.15।।
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उस भीषण गर्जना से प्रभावित हो सैकड़ों प्रासादरक्षक नाना प्रकार के प्रास, खड्ग और फर से लिये वहाँ आये
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The demons surrounding the great monkey looked like a big whirlpool of the water of the river Ganga.
ShlokaShloka 14
ततो वातात्मजः क्रुद्धो भीम रूपं समास्थितः।।5.43.16।।
प्रासादस्य महन्तस्य स्तम्बं हेमपरिष्कृतम्।
उत्पाटयित्वा वेगेन हनुमान्पवनात्मजः।।5.43.17।।
ततस्तं भ्रामयामास शतधारं महाबलः।
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Thereupon the infuriated son of the Windgod, assumed a fearsome form, uprooted a pillar of the palace decked with gold and holding that hundred edged pillar whirled it round swiftly.
ShlokaShloka 15
तत्र चाग्निस्समभवत्प्रासादश्चाप्यदह्यत।।5.43.18।।
दह्यमानं ततो दृष्ट्वा प्रासादं हरियूथपः।
स राक्षसशतं हत्त्वा वज्रेणेन्द्र इवासुरान्।।5.43.19।।
अन्तरिक्षे स्थितश्श्तीमानिदं वचनमब्रवीत्।
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Thereafter fire was generated (through friction) and with if the palace blazed. Hanuman saw the palace burning. He killed a hundred demons there as Indra killed demons with his thunderbolt. (The whirling pillar that generated fire apeared like a thunderbolt) Later he stood in the air and proclaimed this:
ShlokaShloka 16
मादृशानां सहस्राणि विसृष्टानि महात्मनाम्।।5.43.20।।
बलिनां वानरेन्द्राणां सुग्रीववशवर्तिनाम्।
अटन्ति वसुधां कृत्स्नां वयमन्ये च वानराः।।5.43.21।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
तब राक्षसों को इस प्रकार आक्रमण करते देख पवनकुमार हनुमान् ने कुपित हो बड़ा भयंकर रूप धारण किया। उन महावीर ने उस प्रासाद के एक सुवर्णभूषित खंभे को, जिसमें सौ धारें थीं, बड़े वेग से उखाड़ लिया। उखाड़कर उन महाबली वीर ने उसे घुमाना आरम्भ किया। घुमाने पर उससे आग प्रकट हो गयी, जिससे वह प्रासाद जलने लगा
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"Thousands of huge and mighty monkeys, equal to me, loyal to king Sugriva, are coming under the orders and have been recruited from the entire earth. They are the best among monkeys.
ShlokaShloka 17
दशनागबलाः केचित्केचिद्दशगुणोत्तराः।
केचिन्नागसहस्रस्य बभूवुस्तुल्यविक्रमाः।।5.43.22।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
तब राक्षसों को इस प्रकार आक्रमण करते देख पवनकुमार हनुमान् ने कुपित हो बड़ा भयंकर रूप धारण किया। उन महावीर ने उस प्रासाद के एक सुवर्णभूषित खंभे को, जिसमें सौ धारें थीं, बड़े वेग से उखाड़ लिया। उखाड़कर उन महाबली वीर ने उसे घुमाना आरम्भ किया। घुमाने पर उससे आग प्रकट हो गयी, जिससे वह प्रासाद जलने लगा
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"Of them some have the strength equal to ten elephants, others are ten times stronger, and still others have a thousand elephants' strength.
ShlokaShloka 18
सन्ति चौघबलाः केचित्केचिद्वायुबलोपमाः।
अप्रमेयबलाश्चान्ये तत्रासन्हरियूथपाः।।5.43.23।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
तब राक्षसों को इस प्रकार आक्रमण करते देख पवनकुमार हनुमान् ने कुपित हो बड़ा भयंकर रूप धारण किया। उन महावीर ने उस प्रासाद के एक सुवर्णभूषित खंभे को, जिसमें सौ धारें थीं, बड़े वेग से उखाड़ लिया। उखाड़कर उन महाबली वीर ने उसे घुमाना आरम्भ किया। घुमाने पर उससे आग प्रकट हो गयी, जिससे वह प्रासाद जलने लगा
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"Some have the strength of flood waters, some are powerful as wind and yet others have strength beyond measure.
ShlokaShloka 19
ईदृग्विधैस्तु हरिभिर्वृतो दन्तनखायुधैः।
शतैश्शतसहस्रैश्च कोटीभिरयुतैरपि।।5.43.24।।
आगमिष्यति सुग्रीवः सर्वेषां वो निषूदनः।
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"Sugriva will come here with hundreds of thousands of crores of vanaras who would be fighting with their teeth and nails as weapons.
ShlokaShloka 20
नेयमस्ति पुरी लङ्का न यूयं न च रावणः।5.43.25।।
यस्मादिक्ष्वाकुनाथेन बद्धं वैरं महात्मना।
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"You have established great enmity with the noble lord of Ikshvaku dynasty. Neither this Lanka will endure nor you, nor even Ravana will be traced. इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे त्रिचत्वारिशस्सर्गः।। Thus ends the fortythird sarga of Sundarakanda of the holy Ramayana, the first epic composed by sage Valmiki.