Sundara Kanda
Sarga 8: Further description of the aerial car, Pushpaka
सुन्दरकाण्डम् · सर्ग 8
7 shlokas
ShlokaShloka 1
स तस्य मध्ये भवनस्य संस्थितं
महद्विमानं मणिवज्रचित्रितम्।
प्रतप्तजाम्बूनदजालकृत्रिमं
ददर्श वीरः पवनात्मजः कपिः।।5.8.1।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
रावण के भवन के मध्यभाग में खड़े हुए बुद्धिमान् पवनकुमार कपिवर हनुमान् जी ने मणि तथा रत्नों से जटित एवं तपे हुए सुवर्णमय गवाक्षों की रचना से युक्त उस विशाल विमान को पुनः देखा
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The courageous son of the Windgod, Hanuman, the vanara saw the aerial chariot kept in the middle of the mansion inlaid with gems and diamonds latticed with artificial windows of barnished gold.
ShlokaShloka 2
तदप्रमेयाप्रतिकारकृत्रिमं
कृतं स्वयं साध्विति विश्वकर्मणा।
दिवं गतं वायुपथप्रतिष्ठितं
व्यराजतादित्यपथस्य लक्ष्मवत्।।5.8.2।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
उसकी रचना को सौन्दर्य आदि की दृष्टि से मापा नहीं जा सकता था। उसका निर्माण अनुपम रीति से किया गया था। स्वयं विश्वकर्मा ने ही उसे बनाया था और बहुत उत्तम कहकर उसकी प्रशंसा की थी। जब वह आकाश में उठकर वायुमार्ग में स्थित होता था, तब सौर मार्ग के चिह्न-सा सुशोभित होता था
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The immeasurable Pushpaka fashioned by Visvakarma with images of incomparable beauty was not possible to describe. An excellent product of his achievement, it was placed in the aerial path appearing as a beaconlight (signpost) in the orbit of the Sun.
ShlokaShloka 3
न तत्र किञ्चिन्न कृतं प्रयत्नतो
न तत्र किञ्चिन्न महार्हरत्नवत्।
न ते विशेषा नियताः सुरेष्वपि
न तत्र किञ्चिन्न महाविशेषवत्।।5.8.3।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
उसमें कोई ऐसी वस्तु नहीं थी, जो अत्यन्त प्रयत्न से न बनायी गयी हो तथा वहाँ कोई भी ऐसा स्थान या विमान का अंग नहीं था, जो बहुमूल्य रत्नों से जटित न हो। उसमें जो विशेषताएँ थीं, वे देवताओं के विमानों में भी नहीं थीं। उसमें कोई ऐसी चीज नहीं थी, जो बड़ी भारी विशेषता से युक्त न हो
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There was nothing in Pushpaka which was not executed carefully with special effort, nothing which was not made of precious stones. Such privileges were not available to even gods. Indeed there was nothing which was not unique.
ShlokaShloka 4
तपः समाधानपराक्रमार्जितं
मनः समाधानविचारचारिणम्।
अनेकसंस्थानविशेषनिर्मितं
ततस्ततस्तुल्यविशेषदर्शनम्।।5.8.4।।
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रावण ने जो निराहार रहकर तप किया था और भगवान् के चिन्तन में चित्त को एकाग्र किया था, इससे मिले हुए पराक्रम के द्वारा उसने उस विमान पर अधिकार प्राप्त किया था। मनमें जहाँ भी जाने का संकल्प उठता, वहीं वह विमान पहुँच जाता था। अनेक प्रकार की विशिष्ट निर्माण-कलाओं द्वारा उस विमान की रचना हुई थी तथा जहाँ-तहाँ से प्राप्त की गयी दिव्य विमान-निर्माणोचित विशेषताओं से उसका निर्माण हुआ था
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(The Pushpaka) was designed by dint of divine efforts and prowess (of Kubera). It could touch any place its master commanded with a cool mind. It had many beautiful places of rest.
ShlokaShloka 5
विशेषमालम्ब्य विशेषसंस्थितं
विचित्रकूटं बहुकूटमण्डितम्।
मनोऽभिरामं शरदिन्दुनिर्मलं
विचित्रकूटं शिखरं गिरेर्यथा।।5.8.5।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
वह स्वामी के मन का अनुसरण करते हुए बड़ी शीघ्रता से चलने वाला, दूसरों के लिये दुर्लभ और वायु के समान वेगपूर्वक आगे बढ़ने वाला था तथा श्रेष्ठ आनन्द (महान् सुख)के भागी, बढ़े-चढ़े तपवाले, पुण्यकारी महात्माओं का ही वह आश्रय था
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The Pushpaka was specially designed in a unique manner. It was decorated with many colourful peaks. It was delghtful and pleasing to the mind and bright like the autumnal fullmoon. It looked like a mountain with many wonderful towers around.
ShlokaShloka 6
वहन्ति यं कुण्डलशोभिताननाः
महाशना व्योमचरा निशाचराः।
विवृत्तविध्वस्तविशाललोचनाः
महाजवा भूतगणाः सहस्रशः।।5.8.6।।
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वह विमान गतिविशेष का आश्रय ले व्योम रूप देश-विशेष में स्थित था। आश्चर्यजनक विचित्र वस्तुओं का समुदाय उसमें एकत्र किया गया था। बहुत-सी शालाओं के कारण उसकी बड़ी शोभा हो रही थी। वह शरद् ऋतु के चन्द्रमा के समान निर्मल और मन को आनन्द प्रदान करने वाला था। विचित्र छोटे-छोटे शिखरों से युक्त किसी पर्वत के प्रधान शिखर की जैसी शोभा होती है, उसी प्रकार अद्भुत शिखर वाले उस पुष्पक विमान की भी शोभा हो रही थी
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The Pushpaka was borne by multitudes of Bhutas whose faces were shining with earrings, who were demons ranging in the night sky. They were gluttons endowed with great speed, and they had big, rolling and frightening eyes.
ShlokaShloka 7
वसन्तपुष्पोत्करचारुदर्शनं
वसन्तमासादपि कान्तदर्शनम्।
स पुष्पकं तत्र विमानमुत्तमं
ददर्श तद्वानरवीरसत्तमः।।5.8.7।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
जिनके मुखमण्डल कुण्डलों से सुशोभित और नेत्र घूमते या घूरते रहनेवाले, निमेषरहित तथा बड़े-बड़े थे, वे अपरिमित भोजन करने वाले, महान् वेगशाली, आकाश में विचरने वाले तथा रात में भी दिन के समान ही चलने वाले सहस्रों भूतगण जिसका भार वहन करते थे, जो वसन्त-कालिक पुष्प-पुञ्ज के समान रमणीय दिखायी देता था और वसन्त मास से भी अधिक सुहावना दृष्टिगोचर होता था, उस उत्तम पुष्पक विमान को वानरशिरोमणि हनुमान जी ने वहाँ देखा
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That hero among monkeys, beheld the aerial chariot looking beautiful like a colourful collection of spring blossoms. Its appearance was more pleasant than spring itself. इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे अष्टमस्सर्गः।। Thus ends the eighth sarga of Sundarakanda of the holy Ramayana, the first epic composed by sage Valmiki.