उत्तरकाण्ड

श्रीरामचरितमानस — हिन्दी अर्थ और अंग्रेज़ी अनुवाद सहित

130 दोहे · 855 पद

उत्तरकाण्ड में श्रीराम का राज्याभिषेक और रामराज्य की स्थापना, तत्पश्चात काकभुशुण्डि एवं गरुड़ के संवाद में भक्ति, ज्ञान और वैराग्य का निरूपण है।

मंगलाचरण

केकीकण्ठाभनीलं सुरवरविलसद्विप्रपादाब्जचिह्नं

दोहा 1

रहेउ एक दिन अवधि अधारा। समुझत मन दुख भयउ अपारा।।

दोहा 2

देखत हनूमान अति हरषेउ। पुलक गात लोचन जल बरषेउ।।

दोहा 3

हरषि भरत कोसलपुर आए। समाचार सब गुरहि सुनाए।।

दोहा 4

इहाँ भानुकुल कमल दिवाकर। कपिन्ह देखावत नगर मनोहर।।

दोहा 5

आए भरत संग सब लोगा। कृस तन श्रीरघुबीर बियोगा।।

दोहा 6

भरतानुज लछिमन पुनि भेंटे। दुसह बिरह संभव दुख मेटे।।

दोहा 7

सासुन्ह सबनि मिली बैदेही। चरनन्हि लागि हरषु अति तेही।।

दोहा 8

लंकापति कपीस नल नीला। जामवंत अंगद सुभसीला।।

दोहा 9

कंचन कलस बिचित्र सँवारे। सबहिं धरे सजि निज निज द्वारे।।

दोहा 10

प्रभु जानी कैकेई लजानी। प्रथम तासु गृह गए भवानी।।

दोहा 11

अवधपुरी अति रुचिर बनाई। देवन्ह सुमन बृष्टि झरि लाई।।

दोहा 12

प्रभु बिलोकि मुनि मन अनुरागा। तुरत दिब्य सिंघासन मागा।।

दोहा 13

जय सगुन निर्गुन रूप रूप अनूप भूप सिरोमने।

दोहा 14

जय राम रमारमनं समनं। भव ताप भयाकुल पाहि जनं।।

दोहा 15

सुनु खगपति यह कथा पावनी। त्रिबिध ताप भव भय दावनी।।

दोहा 16

बिसरे गृह सपनेहुँ सुधि नाहीं। जिमि परद्रोह संत मन माही।।

दोहा 17

सुनि प्रभु बचन मगन सब भए। को हम कहाँ बिसरि तन गए।।

दोहा 18

सुनु सर्बग्य कृपा सुख सिंधो। दीन दयाकर आरत बंधो।।

दोहा 19

भरत अनुज सौमित्र समेता। पठवन चले भगत कृत चेता।।

दोहा 20

पुनि कृपाल लियो बोलि निषादा। दीन्हे भूषन बसन प्रसादा।।

दोहा 21

दैहिक दैविक भौतिक तापा। राम राज नहिं काहुहि ब्यापा।।

दोहा 22

भूमि सप्त सागर मेखला। एक भूप रघुपति कोसला।।

दोहा 23

फूलहिं फरहिं सदा तरु कानन। रहहि एक सँग गज पंचानन।।

दोहा 24

कोटिन्ह बाजिमेध प्रभु कीन्हे। दान अनेक द्विजन्ह कहँ दीन्हे।।

दोहा 25

सेवहिं सानकूल सब भाई। राम चरन रति अति अधिकाई।।

दोहा 26

प्रातकाल सरऊ करि मज्जन। बैठहिं सभाँ संग द्विज सज्जन।।

दोहा 27

नारदादि सनकादि मुनीसा। दरसन लागि कोसलाधीसा।।

दोहा 28

सुमन बाटिका सबहिं लगाई। बिबिध भाँति करि जतन बनाई।।

दोहा 29

दूरि फराक रुचिर सो घाटा। जहँ जल पिअहिं बाजि गज ठाटा।।

दोहा 30

जहँ तहँ नर रघुपति गुन गावहिं। बैठि परसपर इहइ सिखावहिं।।

दोहा 31

जब ते राम प्रताप खगेसा। उदित भयउ अति प्रबल दिनेसा।।

दोहा 32

भ्रातन्ह सहित रामु एक बारा। संग परम प्रिय पवनकुमारा।।

दोहा 33

कीन्ह दंडवत तीनिउँ भाई। सहित पवनसुत सुख अधिकाई।।

दोहा 34

सुनि प्रभु बचन हरषि मुनि चारी। पुलकित तन अस्तुति अनुसारी।।

दोहा 35

देहु भगति रघुपति अति पावनि। त्रिबिध ताप भव दाप नसावनि।।

दोहा 36

सनकादिक बिधि लोक सिधाए। भ्रातन्ह राम चरन सिरु नाए।।

दोहा 37

करउँ कृपानिधि एक ढिठाई। मैं सेवक तुम्ह जन सुखदाई।।

दोहा 38

बिषय अलंपट सील गुनाकर। पर दुख दुख सुख सुख देखे पर।।

दोहा 39

सनहु असंतन्ह केर सुभाऊ। भूलेहुँ संगति करिअ न काऊ।।

दोहा 40

लोभइ ओढ़न लोभइ डासन। सिस्त्रोदर पर जमपुर त्रास न।।

दोहा 41

पर हित सरिस धर्म नहिं भाई। पर पीड़ा सम नहिं अधमाई।।

दोहा 42

श्रीमुख बचन सुनत सब भाई। हरषे प्रेम न हृदयँ समाई।।

दोहा 43

एक बार रघुनाथ बोलाए। गुर द्विज पुरबासी सब आए।।

दोहा 44

एहि तन कर फल बिषय न भाई। स्वर्गउ स्वल्प अंत दुखदाई।।

दोहा 45

जौं परलोक इहाँ सुख चहहू। सुनि मम बचन ह्रृदयँ दृढ़ गहहू।।

दोहा 46

कहहु भगति पथ कवन प्रयासा। जोग न मख जप तप उपवासा।।

दोहा 47

सुनत सुधासम बचन राम के। गहे सबनि पद कृपाधाम के।।

दोहा 48

एक बार बसिष्ट मुनि आए। जहाँ राम सुखधाम सुहाए।।

दोहा 49

जप तप नियम जोग निज धर्मा। श्रुति संभव नाना सुभ कर्मा।।

दोहा 50

अस कहि मुनि बसिष्ट गृह आए। कृपासिंधु के मन अति भाए।।

दोहा 51

मामवलोकय पंकज लोचन। कृपा बिलोकनि सोच बिमोचन।।

दोहा 52

गिरिजा सुनहु बिसद यह कथा। मैं सब कही मोरि मति जथा।।

दोहा 53

राम चरित जे सुनत अघाहीं। रस बिसेष जाना तिन्ह नाहीं।।

दोहा 54

नर सहस्त्र महँ सुनहु पुरारी। कोउ एक होइ धर्म ब्रतधारी।।

दोहा 55

यह प्रभु चरित पवित्र सुहावा। कहहु कृपाल काग कहँ पावा।।

दोहा 56

मैं जिमि कथा सुनी भव मोचनि। सो प्रसंग सुनु सुमुखि सुलोचनि।।

दोहा 57

तेहिं गिरि रुचिर बसइ खग सोई। तासु नास कल्पांत न होई।।

दोहा 58

गिरिजा कहेउँ सो सब इतिहासा। मैं जेहि समय गयउँ खग पासा।।

दोहा 59

नाना भाँति मनहि समुझावा। प्रगट न ग्यान हृदयँ भ्रम छावा।।

दोहा 60

तब खगपति बिरंचि पहिं गयऊ। निज संदेह सुनावत भयऊ।।

दोहा 61

तेहिं मम पद सादर सिरु नावा। पुनि आपन संदेह सुनावा।।

दोहा 62

मिलहिं न रघुपति बिनु अनुरागा। किएँ जोग तप ग्यान बिरागा।।

दोहा 63

गयउ गरुड़ जहँ बसइ भुसुंडा। मति अकुंठ हरि भगति अखंडा।।

दोहा 64

सुनहु तात जेहि कारन आयउँ। सो सब भयउ दरस तव पायउँ।।

दोहा 65

बहुरि राम अभिषेक प्रसंगा। पुनि नृप बचन राज रस भंगा।।

दोहा 66

कहि दंडक बन पावनताई। गीध मइत्री पुनि तेहिं गाई।।

दोहा 67

जेहि बिधि कपिपति कीस पठाए। सीता खोज सकल दिसि धाए।।

दोहा 68

निसिचर निकर मरन बिधि नाना। रघुपति रावन समर बखाना।।

दोहा 69

देखि चरित अति नर अनुसारी। भयउ हृदयँ मम संसय भारी।।

दोहा 70

बोलेउ काकभसुंड बहोरी। नभग नाथ पर प्रीति न थोरी।।

दोहा 71

गुन कृत सन्यपात नहिं केही। कोउ न मान मद तजेउ निबेही।।

दोहा 72

जो माया सब जगहि नचावा। जासु चरित लखि काहुँ न पावा।।

दोहा 73

असि रघुपति लीला उरगारी। दनुज बिमोहनि जन सुखकारी।।

दोहा 74

सुनु खगेस रघुपति प्रभुताई। कहउँ जथामति कथा सुहाई।।

दोहा 75

राम कृपा आपनि जड़ताई। कहउँ खगेस सुनहु मन लाई।।

दोहा 76

कहइ भसुंड सुनहु खगनायक। रामचरित सेवक सुखदायक।।

दोहा 77

अरुन पानि नख करज मनोहर। बाहु बिसाल बिभूषन सुंदर।।

दोहा 78

एतना मन आनत खगराया। रघुपति प्रेरित ब्यापी माया।।

दोहा 79

ऐसेहिं हरि बिनु भजन खगेसा। मिटइ न जीवन्ह केर कलेसा।।

दोहा 80

मूदेउँ नयन त्रसित जब भयउँ। पुनि चितवत कोसलपुर गयऊँ।।

दोहा 81

लोक लोक प्रति भिन्न बिधाता। भिन्न बिष्नु सिव मनु दिसित्राता।।

दोहा 82

भ्रमत मोहि ब्रह्मांड अनेका। बीते मनहुँ कल्प सत एका।।

दोहा 83

देखि चरित यह सो प्रभुताई। समुझत देह दसा बिसराई।।

दोहा 84

ग्यान बिबेक बिरति बिग्याना। मुनि दुर्लभ गुन जे जग नाना।।

दोहा 85

एवमस्तु कहि रघुकुलनायक। बोले बचन परम सुखदायक।।

दोहा 86

अब सुनु परम बिमल मम बानी। सत्य सुगम निगमादि बखानी।।

दोहा 87

एक पिता के बिपुल कुमारा। होहिं पृथक गुन सील अचारा।।

दोहा 88

कबहूँ काल न ब्यापिहि तोही। सुमिरेसु भजेसु निरंतर मोही।।

दोहा 89

मैं पुनि अवध रहेउँ कछु काला। देखेउँ बालबिनोद रसाला।।

दोहा 90

बिनु संतोष न काम नसाहीं। काम अछत सुख सपनेहुँ नाहीं।।

दोहा 91

निज मति सरिस नाथ मैं गाई। प्रभु प्रताप महिमा खगराई।।

दोहा 92

प्रभु अगाध सत कोटि पताला। समन कोटि सत सरिस कराला।।

दोहा 93

सुनि भुसुंडि के बचन सुहाए। हरषित खगपति पंख फुलाए।।

दोहा 94

तुम्ह सर्बग्य तन्य तम पारा। सुमति सुसील सरल आचारा।।

दोहा 95

गरुड़ गिरा सुनि हरषेउ कागा। बोलेउ उमा परम अनुरागा।।

दोहा 96

स्वारथ साँच जीव कहुँ एहा। मन क्रम बचन राम पद नेहा।।

दोहा 97

तेहि कलिजुग कोसलपुर जाई। जन्मत भयउँ सूद्र तनु पाई।।

दोहा 98

बरन धर्म नहिं आश्रम चारी। श्रुति बिरोध रत सब नर नारी।।

दोहा 99

नारि बिबस नर सकल गोसाई। नाचहिं नट मर्कट की नाई।।

दोहा 100

पर त्रिय लंपट कपट सयाने। मोह द्रोह ममता लपटाने।।

दोहा 101

बहु दाम सँवारहिं धाम जती। बिषया हरि लीन्हि न रहि बिरती।।

दोहा 102

अबला कच भूषन भूरि छुधा। धनहीन दुखी ममता बहुधा।।

दोहा 103

कृतजुग सब जोगी बिग्यानी। करि हरि ध्यान तरहिं भव प्रानी।।

दोहा 104

नित जुग धर्म होहिं सब केरे। हृदयँ राम माया के प्रेरे।।

दोहा 105

गयउँ उजेनी सुनु उरगारी। दीन मलीन दरिद्र दुखारी।।

दोहा 106

एक बार गुर लीन्ह बोलाई। मोहि नीति बहु भाँति सिखाई।।

दोहा 107

मंदिर माझ भई नभ बानी। रे हतभाग्य अग्य अभिमानी।।

दोहा 108

नमामीशमीशान निर्वाणरूपं। विंभुं ब्यापकं ब्रह्म वेदस्वरूपं।

दोहा 109

एहि कर होइ परम कल्याना। सोइ करहु अब कृपानिधाना।।

दोहा 110

त्रिजग देव नर जोइ तनु धरउँ। तहँ तहँ राम भजन अनुसरऊँ।।

दोहा 111

तब मुनिष रघुपति गुन गाथा। कहे कछुक सादर खगनाथा।।

दोहा 112

कबहुँ कि दुख सब कर हित ताकें। तेहि कि दरिद्र परस मनि जाकें।।

दोहा 113

सुनु खगेस नहिं कछु रिषि दूषन। उर प्रेरक रघुबंस बिभूषन।।

दोहा 114

काल कर्म गुन दोष सुभाऊ। कछु दुख तुम्हहि न ब्यापिहि काऊ।।

दोहा 115

जे असि भगति जानि परिहरहीं। केवल ग्यान हेतु श्रम करहीं।।

दोहा 116

इहाँ न पच्छपात कछु राखउँ। बेद पुरान संत मत भाषउँ।।

दोहा 117

सुनहु तात यह अकथ कहानी। समुझत बनइ न जाइ बखानी।।

दोहा 118

सोहमस्मि इति बृत्ति अखंडा। दीप सिखा सोइ परम प्रचंडा।।

दोहा 119

ग्यान पंथ कृपान कै धारा। परत खगेस होइ नहिं बारा।।

दोहा 120

कहेउँ ग्यान सिद्धांत बुझाई। सुनहु भगति मनि कै प्रभुताई।।

दोहा 121

पुनि सप्रेम बोलेउ खगराऊ। जौं कृपाल मोहि ऊपर भाऊ।।

दोहा 122

एहि बिधि सकल जीव जग रोगी। सोक हरष भय प्रीति बियोगी।।

दोहा 123

कहेउँ नाथ हरि चरित अनूपा। ब्यास समास स्वमति अनुरुपा।।

दोहा 124

सुमिरि राम के गुन गन नाना। पुनि पुनि हरष भुसुंडि सुजाना।।

दोहा 125

मै कृत्कृत्य भयउँ तव बानी। सुनि रघुबीर भगति रस सानी।।

दोहा 126

कहेउँ परम पुनीत इतिहासा। सुनत श्रवन छूटहिं भव पासा।।

दोहा 127

सोइ सर्बग्य गुनी सोइ ग्याता। सोइ महि मंडित पंडित दाता।।

दोहा 128

मति अनुरूप कथा मैं भाषी। जद्यपि प्रथम गुप्त करि राखी।।

दोहा 129

राम कथा गिरिजा मैं बरनी। कलि मल समनि मनोमल हरनी।।

दोहा 130

यह सुभ संभु उमा संबादा। सुख संपादन समन बिषादा।।