लङ्काकाण्ड

श्रीरामचरितमानस — हिन्दी अर्थ और अंग्रेज़ी अनुवाद सहित

121 दोहे · 785 पद

लंकाकाण्ड (युद्धकाण्ड) में रामसेतु का निर्माण, अंगद का रावण की सभा में जाना, लंका का महायुद्ध, संजीवनी बूटी से लक्ष्मण का पुनर्जीवन, कुम्भकर्ण, मेघनाद एवं रावण वध तथा अयोध्या वापसी का वर्णन है।

Mangalacharan

रामं कामारिसेव्यं भवभयहरणं कालमत्तेभसिंहं

Doha 1

यह लघु जलधि तरत कति बारा। अस सुनि पुनि कह पवनकुमारा।।

Doha 2

सैल बिसाल आनि कपि देहीं। कंदुक इव नल नील ते लेहीं।।

Doha 3

जे रामेस्वर दरसनु करिहहिं। ते तनु तजि मम लोक सिधरिहहिं।।

Doha 4

बाँधि सेतु अति सुदृढ़ बनावा। देखि कृपानिधि के मन भावा।।

Doha 5

अस कौतुक बिलोकि द्वौ भाई। बिहँसि चले कृपाल रघुराई।।

Doha 6

निज बिकलता बिचारि बहोरी। बिहँसि गयउ ग्रह करि भय भोरी।।

Doha 7

नाथ दीनदयाल रघुराई। बाघउ सनमुख गएँ न खाई।।

Doha 8

तब रावन मयसुता उठाई। कहै लाग खल निज प्रभुताई।।

Doha 9

कहहिं सचिव सठ ठकुरसोहाती। नाथ न पूर आव एहि भाँती।।

Doha 10

यह मत जौं मानहु प्रभु मोरा। उभय प्रकार सुजसु जग तोरा।।

Doha 11

इहाँ सुबेल सैल रघुबीरा। उतरे सेन सहित अति भीरा।।

Doha 12

पूरब दिसि गिरिगुहा निवासी। परम प्रताप तेज बल रासी।।

Doha 13

देखु बिभीषन दच्छिन आसा। घन घंमड दामिनि बिलासा।।

Doha 14

कंप न भूमि न मरुत बिसेषा। अस्त्र सस्त्र कछु नयन न देखा।।

Doha 15

पद पाताल सीस अज धामा। अपर लोक अँग अँग बिश्रामा।।

Doha 16

बिहँसा नारि बचन सुनि काना। अहो मोह महिमा बलवाना।।

Doha 17

इहाँ प्रात जागे रघुराई। पूछा मत सब सचिव बोलाई।।

Doha 18

बंदि चरन उर धरि प्रभुताई। अंगद चलेउ सबहि सिरु नाई।।

Doha 19

तुरत निसाचर एक पठावा। समाचार रावनहि जनावा।।

Doha 20

कह दसकंठ कवन तैं बंदर। मैं रघुबीर दूत दसकंधर।।

Doha 21

रे कपिपोत बोलु संभारी। मूढ़ न जानेहि मोहि सुरारी।।

Doha 22

सिव बिरंचि सुर मुनि समुदाई। चाहत जासु चरन सेवकाई।।

Doha 23

तुम्हरे कटक माझ सुनु अंगद। मो सन भिरिहि कवन जोधा बद।।

Doha 24

धन्य कीस जो निज प्रभु काजा। जहँ तहँ नाचइ परिहरि लाजा।।

Doha 25

सुनु सठ सोइ रावन बलसीला। हरगिरि जान जासु भुज लीला।।

Doha 26

सुनि अंगद सकोप कह बानी। बोलु सँभारि अधम अभिमानी।।

Doha 27

सुनु रावन परिहरि चतुराई। भजसि न कृपासिंधु रघुराई।।

Doha 28

सठ साखामृग जोरि सहाई। बाँधा सिंधु इहइ प्रभुताई।।

Doha 29

जरत बिलोकेउँ जबहिं कपाला। बिधि के लिखे अंक निज भाला।।

Doha 30

अब जनि बतबढ़ाव खल करही। सुनु मम बचन मान परिहरही।।

Doha 31

जौ अस करौं तदपि न बड़ाई। मुएहि बधें नहिं कछु मनुसाई।।

Doha 32

जब तेहिं कीन्ह राम कै निंदा। क्रोधवंत अति भयउ कपिंदा।।

Doha 33

एहि बिधि बेगि सूभट सब धावहु। खाहु भालु कपि जहँ जहँ पावहु।।

Doha 34

मै तव दसन तोरिबे लायक। आयसु मोहि न दीन्ह रघुनायक।।

Doha 35

कपि बल देखि सकल हियँ हारे। उठा आपु कपि कें परचारे।।

Doha 36

कंत समुझि मन तजहु कुमतिही। सोह न समर तुम्हहि रघुपतिही।।

Doha 37

जेहिं जलनाथ बँधायउ हेला। उतरे प्रभु दल सहित सुबेला।।

Doha 38

नारि बचन सुनि बिसिख समाना। सभाँ गयउ उठि होत बिहाना।।

Doha 39

रिपु के समाचार जब पाए। राम सचिव सब निकट बोलाए।।

Doha 40

लंकाँ भयउ कोलाहल भारी। सुना दसानन अति अहँकारी।।

Doha 41

कोट कँगूरन्हि सोहहिं कैसे। मेरु के सृंगनि जनु घन बैसे।।

Doha 42

राम प्रताप प्रबल कपिजूथा। मर्दहिं निसिचर सुभट बरूथा।।

Doha 43

भय आतुर कपि भागन लागे। जद्यपि उमा जीतिहहिं आगे।।

Doha 44

जुद्ध बिरुद्ध क्रुद्ध द्वौ बंदर। राम प्रताप सुमिरि उर अंतर।।

Doha 45

महा महा मुखिआ जे पावहिं। ते पद गहि प्रभु पास चलावहिं।।

Doha 46

प्रभु पद कमल सीस तिन्ह नाए। देखि सुभट रघुपति मन भाए।।

Doha 47

सकल मरमु रघुनायक जाना। लिए बोलि अंगद हनुमाना।।

Doha 48

निसा जानि कपि चारिउ अनी। आए जहाँ कोसला धनी।।

Doha 49

परिहरि बयरु देहु बैदेही। भजहु कृपानिधि परम सनेही।।

Doha 50

कहँ कोसलाधीस द्वौ भ्राता। धन्वी सकल लोक बिख्याता।।

Doha 51

देखि पवनसुत कटक बिहाला। क्रोधवंत जनु धायउ काला।।

Doha 52

नभ चढ़ि बरष बिपुल अंगारा। महि ते प्रगट होहिं जलधारा।।

Doha 53

छतज नयन उर बाहु बिसाला। हिमगिरि निभ तनु कछु एक लाला।।

Doha 54

घायल बीर बिराजहिं कैसे। कुसुमित किंसुक के तरु जैसे।।

Doha 55

सुनु गिरिजा क्रोधानल जासू। जारइ भुवन चारिदस आसू।।

Doha 56

राम चरन सरसिज उर राखी। चला प्रभंजन सुत बल भाषी।।

Doha 57

अस कहि चला रचिसि मग माया। सर मंदिर बर बाग बनाया।।

Doha 58

कपि तव दरस भइउँ निष्पापा। मिटा तात मुनिबर कर सापा।।

Doha 59

परेउ मुरुछि महि लागत सायक। सुमिरत राम राम रघुनायक।।

Doha 60

तात कुसल कहु सुखनिधान की। सहित अनुज अरु मातु जानकी।।

Doha 61

उहाँ राम लछिमनहिं निहारी। बोले बचन मनुज अनुसारी।।

Doha 62

हरषि राम भेंटेउ हनुमाना। अति कृतग्य प्रभु परम सुजाना।।

Doha 63

भल न कीन्ह तैं निसिचर नाहा। अब मोहि आइ जगाएहि काहा।।

Doha 64

महिष खाइ करि मदिरा पाना। गर्जा बज्राघात समाना।।

Doha 65

बंधु बचन सुनि चला बिभीषन। आयउ जहँ त्रैलोक बिभूषन।।

Doha 66

उमा करत रघुपति नरलीला। खेलत गरुड़ जिमि अहिगन मीला।।

Doha 67

कुंभकरन रन रंग बिरुद्धा। सन्मुख चला काल जनु क्रुद्धा।।

Doha 68

कर सारंग साजि कटि भाथा। अरि दल दलन चले रघुनाथा।।

Doha 69

कुंभकरन मन दीख बिचारी। हति धन माझ निसाचर धारी।।

Doha 70

भागे भालु बलीमुख जूथा। बृकु बिलोकि जिमि मेष बरूथा।।

Doha 71

सभय देव करुनानिधि जान्यो। श्रवन प्रजंत सरासनु तान्यो।।

Doha 72

दिन कें अंत फिरीं दोउ अनी। समर भई सुभटन्ह श्रम घनी।।

Doha 73

सक्ति सूल तरवारि कृपाना। अस्त्र सस्त्र कुलिसायुध नाना।।

Doha 74

चरित राम के सगुन भवानी। तर्कि न जाहिं बुद्धि बल बानी।।

Doha 75

मेघनाद के मुरछा जागी। पितहि बिलोकि लाज अति लागी।।

Doha 76

जाइ कपिन्ह सो देखा बैसा। आहुति देत रुधिर अरु भैंसा।।

Doha 77

बिनु प्रयास हनुमान उठायो। लंका द्वार राखि पुनि आयो।।

Doha 78

तिन्हहि ग्यान उपदेसा रावन। आपुन मंद कथा सुभ पावन।।

Doha 79

चलेउ निसाचर कटकु अपारा। चतुरंगिनी अनी बहु धारा।।

Doha 80

रावनु रथी बिरथ रघुबीरा। देखि बिभीषन भयउ अधीरा।।

Doha 81

सुर ब्रह्मादि सिद्ध मुनि नाना। देखत रन नभ चढ़े बिमाना।।

Doha 82

धायउ परम क्रुद्ध दसकंधर। सन्मुख चले हूह दै बंदर।।

Doha 83

रे खल का मारसि कपि भालू। मोहि बिलोकु तोर मैं कालू।।

Doha 84

जानु टेकि कपि भूमि न गिरा। उठा सँभारि बहुत रिस भरा।।

Doha 85

इहाँ बिभीषन सब सुधि पाई। सपदि जाइ रघुपतिहि सुनाई।।

Doha 86

चलत होहिं अति असुभ भयंकर। बैठहिं गीध उड़ाइ सिरन्ह पर।।

Doha 87

एहीं बीच निसाचर अनी। कसमसात आई अति घनी।

Doha 88

मज्जहि भूत पिसाच बेताला। प्रमथ महा झोटिंग कराला।।

Doha 89

देवन्ह प्रभुहि पयादें देखा। उपजा उर अति छोभ बिसेषा।।

Doha 90

अस कहि रथ रघुनाथ चलावा। बिप्र चरन पंकज सिरु नावा।।

Doha 91

कहि दुर्बचन क्रुद्ध दसकंधर। कुलिस समान लाग छाँड़ै सर।।

Doha 92

चले बान सपच्छ जनु उरगा। प्रथमहिं हतेउ सारथी तुरगा।।

Doha 93

दसमुख देखि सिरन्ह कै बाढ़ी। बिसरा मरन भई रिस गाढ़ी।।

Doha 94

आवत देखि सक्ति अति घोरा। प्रनतारति भंजन पन मोरा।।

Doha 95

देखा श्रमित बिभीषनु भारी। धायउ हनूमान गिरि धारी।।

Doha 96

अंतरधान भयउ छन एका। पुनि प्रगटे खल रूप अनेका।।

Doha 97

प्रभु छन महुँ माया सब काटी। जिमि रबि उएँ जाहिं तम फाटी।।

Doha 98

सिर भुज बाढ़ि देखि रिपु केरी। भालु कपिन्ह रिस भई घनेरी।।

Doha 99

तेही निसि सीता पहिं जाई। त्रिजटा कहि सब कथा सुनाई।।

Doha 100

अस कहि बहुत भाँति समुझाई। पुनि त्रिजटा निज भवन सिधाई।।

Doha 101

जब कीन्ह तेहिं पाषंड। भए प्रगट जंतु प्रचंड।।

Doha 102

काटत बढ़हिं सीस समुदाई। जिमि प्रति लाभ लोभ अधिकाई।।

Doha 103

सायक एक नाभि सर सोषा। अपर लगे भुज सिर करि रोषा।।

Doha 104

पति सिर देखत मंदोदरी। मुरुछित बिकल धरनि खसि परी।।

Doha 105

मंदोदरी बचन सुनि काना। सुर मुनि सिद्ध सबन्हि सुख माना।।

Doha 106

आइ बिभीषन पुनि सिरु नायो। कृपासिंधु तब अनुज बोलायो।।

Doha 107

पुनि प्रभु बोलि लियउ हनुमाना। लंका जाहु कहेउ भगवाना।।

Doha 108

अब सोइ जतन करहु तुम्ह ताता। देखौं नयन स्याम मृदु गाता।।

Doha 109

प्रभु के बचन सीस धरि सीता। बोली मन क्रम बचन पुनीता।।

Doha 110

तब रघुपति अनुसासन पाई। मातलि चलेउ चरन सिरु नाई।।

Doha 111

जय राम सदा सुखधाम हरे। रघुनायक सायक चाप धरे।।

Doha 112

तेहि अवसर दसरथ तहँ आए। तनय बिलोकि नयन जल छाए।।

Doha 113

जय राम सोभा धाम। दायक प्रनत बिश्राम।।

Doha 114

सुनु सुरपति कपि भालु हमारे। परे भूमि निसचरन्हि जे मारे।।

Doha 115

मामभिरक्षय रघुकुल नायक। धृत बर चाप रुचिर कर सायक।।

Doha 116

करि बिनती जब संभु सिधाए। तब प्रभु निकट बिभीषनु आए।।

Doha 117

सुनत बिभीषन बचन राम के। हरषि गहे पद कृपाधाम के।।

Doha 118

भालु कपिन्ह पट भूषन पाए। पहिरि पहिरि रघुपति पहिं आए।।

Doha 119

अतिसय प्रीति देख रघुराई। लिन्हे सकल बिमान चढ़ाई।।

Doha 120

तुरत बिमान तहाँ चलि आवा। दंडक बन जहँ परम सुहावा।।

Doha 121

प्रभु हनुमंतहि कहा बुझाई। धरि बटु रूप अवधपुर जाई।।