Yuddha Kanda
Sarga 10: Vibheeshana once again goes to Ravana and appeals to him stating about the evil portents.
युद्धकाण्डम् · सर्ग 10
29 shlokas
ShlokaShloka 1
ततःप्रत्युषसिप्राप्तेप्राप्तधर्मार्थनिश्चयः ।
रा��्षसाधिपतेर्वेश्मभीमकर्माविभीषणः ।।6.10.1।।
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दूसरे दिन सबेरा होते ही धर्म और अर्थ के तत्त्व को जानने वाले भीमकर्मा महातेजस्वी वीर विभीषण अपने बड़े भाई राक्षसराज रावण के घर गये। वह घर अनेक प्रासादों के कारण पर्वतशिखरों के समूह की भाँति शोभा पाता था। उसकी ऊँचाई भी पहाड़ की चोटी को लज्जित करती थी। उसमें अलग-अलग बड़ी-बड़ी कक्षाएँ (ड्योढ़ियाँ) सुन्दर ढंग से बनी हुई थीं। बहुतेरे श्रेष्ठ पुरुषों का वहाँ आना-जाना लगा रहता था। अनेकानेक बुद्धिमान् महामन्त्री, जो राजा के प्रति अनुराग रखने वाले थे, उसमें बैठे थे। विश्वसनीय, हितैषी तथा कार्यसाधन में कुशल बहुसंख्यक राक्षस सब ओर से उस भवन की रक्षा करते थे। वहाँ की वायु मतवाले हाथियों के निःश्वास से मिश्रित हो बवंडर-सी जान पड़ती थी। शङ्खध्वनि के समान राक्षसों का गम्भीर घोष वहाँ गूंजता रहता था। नाना प्रकार के वाद्यों के मनोरम शब्द उस भवन को निनादित करते थे। रूप और यौवन के मद से मतवाली युवतियों की वहाँ भीड-सी लगती रहती थी। वहाँ के बड़े-बड़े मार्ग लोगों के वार्तालाप से मुखरित जान पड़ते थे। उसके फाटक तपाये हुए सुवर्ण के बने हुए थे। उत्तम सजावट की वस्तुओं से वह महल अच्छी तरह सजा हुआ था, अतएव वह गन्धर्वो के आवास और देवताओं के निवासस्थान-सा मनोरम प्रतीत होता था। रत्नराशि से परिपूर्ण होने के कारण वह नागभवन के समान उद्भासित होता था। जैसे तेज से विस्तृत किरणों वाले सूर्य महान् मेघों की घटा में प्रवेश करते हैं, उसी प्रकार तेजस्वी विभीषण ने रावण के उस भवन में पदार्पण किया
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Thereafter, determined to relate about righteous and material gains, Vibheeshana of fierce tasks got up early in the morning when the Sun rose and set himself to go to the residence of Lord of Rakshasas.
ShlokaShloka 2
शैलाग्रचयसङ्काशंशैलशृङ्गमिवोन्नतम् ।
सुविभक्तमहाकक्षंमहाजनपरिग्रहम् ।।6.10.2।।
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दूसरे दिन सबेरा होते ही धर्म और अर्थ के तत्त्व को जानने वाले भीमकर्मा महातेजस्वी वीर विभीषण अपने बड़े भाई राक्षसराज रावण के घर गये। वह घर अनेक प्रासादों के कारण पर्वतशिखरों के समूह की भाँति शोभा पाता था। उसकी ऊँचाई भी पहाड़ की चोटी को लज्जित करती थी। उसमें अलग-अलग बड़ी-बड़ी कक्षाएँ (ड्योढ़ियाँ) सुन्दर ढंग से बनी हुई थीं। बहुतेरे श्रेष्ठ पुरुषों का वहाँ आना-जाना लगा रहता था। अनेकानेक बुद्धिमान् महामन्त्री, जो राजा के प्रति अनुराग रखने वाले थे, उसमें बैठे थे। विश्वसनीय, हितैषी तथा कार्यसाधन में कुशल बहुसंख्यक राक्षस सब ओर से उस भवन की रक्षा करते थे। वहाँ की वायु मतवाले हाथियों के निःश्वास से मिश्रित हो बवंडर-सी जान पड़ती थी। शङ्खध्वनि के समान राक्षसों का गम्भीर घोष वहाँ गूंजता रहता था। नाना प्रकार के वाद्यों के मनोरम शब्द उस भवन को निनादित करते थे। रूप और यौवन के मद से मतवाली युवतियों की वहाँ भीड-सी लगती रहती थी। वहाँ के बड़े-बड़े मार्ग लोगों के वार्तालाप से मुखरित जान पड़ते थे। उसके फाटक तपाये हुए सुवर्ण के बने हुए थे। उत्तम सजावट की वस्तुओं से वह महल अच्छी तरह सजा हुआ था, अतएव वह गन्धर्वो के आवास और देवताओं के निवासस्थान-सा मनोरम प्रतीत होता था। रत्नराशि से परिपूर्ण होने के कारण वह नागभवन के समान उद्भासित होता था। जैसे तेज से विस्तृत किरणों वाले सूर्य महान् मेघों की घटा में प्रवेश करते हैं, उसी प्रकार तेजस्वी विभीषण ने रावण के उस भवन में पदार्पण किया
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Like a lofty mountain top, and like a summit of a mountain, Ravana's palace was a supreme one, divided into many spacious sections and surrounded by many people.
ShlokaShloka 3
मतिमद्भिर्महामात्रैरनुरक्तैरधिष्ठितम् ।
राक्षसैराप्तपर्याप्तैस्सर्वतःपरिरक्षितम् ।।6.10.3।।
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दूसरे दिन सबेरा होते ही धर्म और अर्थ के तत्त्व को जानने वाले भीमकर्मा महातेजस्वी वीर विभीषण अपने बड़े भाई राक्षसराज रावण के घर गये। वह घर अनेक प्रासादों के कारण पर्वतशिखरों के समूह की भाँति शोभा पाता था। उसकी ऊँचाई भी पहाड़ की चोटी को लज्जित करती थी। उसमें अलग-अलग बड़ी-बड़ी कक्षाएँ (ड्योढ़ियाँ) सुन्दर ढंग से बनी हुई थीं। बहुतेरे श्रेष्ठ पुरुषों का वहाँ आना-जाना लगा रहता था। अनेकानेक बुद्धिमान् महामन्त्री, जो राजा के प्रति अनुराग रखने वाले थे, उसमें बैठे थे। विश्वसनीय, हितैषी तथा कार्यसाधन में कुशल बहुसंख्यक राक्षस सब ओर से उस भवन की रक्षा करते थे। वहाँ की वायु मतवाले हाथियों के निःश्वास से मिश्रित हो बवंडर-सी जान पड़ती थी। शङ्खध्वनि के समान राक्षसों का गम्भीर घोष वहाँ गूंजता रहता था। नाना प्रकार के वाद्यों के मनोरम शब्द उस भवन को निनादित करते थे। रूप और यौवन के मद से मतवाली युवतियों की वहाँ भीड-सी लगती रहती थी। वहाँ के बड़े-बड़े मार्ग लोगों के वार्तालाप से मुखरित जान पड़ते थे। उसके फाटक तपाये हुए सुवर्ण के बने हुए थे। उत्तम सजावट की वस्तुओं से वह महल अच्छी तरह सजा हुआ था, अतएव वह गन्धर्वो के आवास और देवताओं के निवासस्थान-सा मनोरम प्रतीत होता था। रत्नराशि से परिपूर्ण होने के कारण वह नागभवन के समान उद्भासित होता था। जैसे तेज से विस्तृत किरणों वाले सूर्य महान् मेघों की घटा में प्रवेश करते हैं, उसी प्रकार तेजस्वी विभीषण ने रावण के उस भवन में पदार्पण किया
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The palace was inhabited by wise ones, and devoted to their Lord and ministers,commanded by trustworthy and competent Rakshasas spread everywhere and well protected.
ShlokaShloka 4
मत्तमातङ्गनिश्श्वासैर्व्याकुलीकृतमारुतम् ।
शङ्खघोषमहाघोषंतूर्यनादानुनादितम् ।।6.10.4।।
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दूसरे दिन सबेरा होते ही धर्म और अर्थ के तत्त्व को जानने वाले भीमकर्मा महातेजस्वी वीर विभीषण अपने बड़े भाई राक्षसराज रावण के घर गये। वह घर अनेक प्रासादों के कारण पर्वतशिखरों के समूह की भाँति शोभा पाता था। उसकी ऊँचाई भी पहाड़ की चोटी को लज्जित करती थी। उसमें अलग-अलग बड़ी-बड़ी कक्षाएँ (ड्योढ़ियाँ) सुन्दर ढंग से बनी हुई थीं। बहुतेरे श्रेष्ठ पुरुषों का वहाँ आना-जाना लगा रहता था। अनेकानेक बुद्धिमान् महामन्त्री, जो राजा के प्रति अनुराग रखने वाले थे, उसमें बैठे थे। विश्वसनीय, हितैषी तथा कार्यसाधन में कुशल बहुसंख्यक राक्षस सब ओर से उस भवन की रक्षा करते थे। वहाँ की वायु मतवाले हाथियों के निःश्वास से मिश्रित हो बवंडर-सी जान पड़ती थी। शङ्खध्वनि के समान राक्षसों का गम्भीर घोष वहाँ गूंजता रहता था। नाना प्रकार के वाद्यों के मनोरम शब्द उस भवन को निनादित करते थे। रूप और यौवन के मद से मतवाली युवतियों की वहाँ भीड-सी लगती रहती थी। वहाँ के बड़े-बड़े मार्ग लोगों के वार्तालाप से मुखरित जान पड़ते थे। उसके फाटक तपाये हुए सुवर्ण के बने हुए थे। उत्तम सजावट की वस्तुओं से वह महल अच्छी तरह सजा हुआ था, अतएव वह गन्धर्वो के आवास और देवताओं के निवासस्थान-सा मनोरम प्रतीत होता था। रत्नराशि से परिपूर्ण होने के कारण वह नागभवन के समान उद्भासित होता था। जैसे तेज से विस्तृत किरणों वाले सूर्य महान् मेघों की घटा में प्रवेश करते हैं, उसी प्रकार तेजस्वी विभीषण ने रावण के उस भवन में पदार्पण किया
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It was filled with elephants in rut breathing heavily, which was like a tempestuous wind around, that echoed by the blowing of conchs of the early morning and filled with the sounds of drums and trumpets.
ShlokaShloka 5
प्रमदाजनसम्बाधंप्रजल्पितमहापथम् ।
तप्तकाञ्चननिर्यूहंभूषणोत्तमभूषितम् ।।6.10.5।।
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दूसरे दिन सबेरा होते ही धर्म और अर्थ के तत्त्व को जानने वाले भीमकर्मा महातेजस्वी वीर विभीषण अपने बड़े भाई राक्षसराज रावण के घर गये। वह घर अनेक प्रासादों के कारण पर्वतशिखरों के समूह की भाँति शोभा पाता था। उसकी ऊँचाई भी पहाड़ की चोटी को लज्जित करती थी। उसमें अलग-अलग बड़ी-बड़ी कक्षाएँ (ड्योढ़ियाँ) सुन्दर ढंग से बनी हुई थीं। बहुतेरे श्रेष्ठ पुरुषों का वहाँ आना-जाना लगा रहता था। अनेकानेक बुद्धिमान् महामन्त्री, जो राजा के प्रति अनुराग रखने वाले थे, उसमें बैठे थे। विश्वसनीय, हितैषी तथा कार्यसाधन में कुशल बहुसंख्यक राक्षस सब ओर से उस भवन की रक्षा करते थे। वहाँ की वायु मतवाले हाथियों के निःश्वास से मिश्रित हो बवंडर-सी जान पड़ती थी। शङ्खध्वनि के समान राक्षसों का गम्भीर घोष वहाँ गूंजता रहता था। नाना प्रकार के वाद्यों के मनोरम शब्द उस भवन को निनादित करते थे। रूप और यौवन के मद से मतवाली युवतियों की वहाँ भीड-सी लगती रहती थी। वहाँ के बड़े-बड़े मार्ग लोगों के वार्तालाप से मुखरित जान पड़ते थे। उसके फाटक तपाये हुए सुवर्ण के बने हुए थे। उत्तम सजावट की वस्तुओं से वह महल अच्छी तरह सजा हुआ था, अतएव वह गन्धर्वो के आवास और देवताओं के निवासस्थान-सा मनोरम प्रतीत होता था। रत्नराशि से परिपूर्ण होने के कारण वह नागभवन के समान उद्भासित होता था। जैसे तेज से विस्तृत किरणों वाले सूर्य महान् मेघों की घटा में प्रवेश करते हैं, उसी प्रकार तेजस्वी विभीषण ने रावण के उस भवन में पदार्पण किया
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(It was) The royal path was filled with women, with prattling sounds of gossiping. It had shining golden passages and decorated with the best of ornaments.
ShlokaShloka 6
गन्धर्वाणामिवाऽवासमालयंमरुतामिव ।
रत्नसञ्चयसम्बाधंभवनंभोगिनामिव ।।6.10.6।।
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दूसरे दिन सबेरा होते ही धर्म और अर्थ के तत्त्व को जानने वाले भीमकर्मा महातेजस्वी वीर विभीषण अपने बड़े भाई राक्षसराज रावण के घर गये। वह घर अनेक प्रासादों के कारण पर्वतशिखरों के समूह की भाँति शोभा पाता था। उसकी ऊँचाई भी पहाड़ की चोटी को लज्जित करती थी। उसमें अलग-अलग बड़ी-बड़ी कक्षाएँ (ड्योढ़ियाँ) सुन्दर ढंग से बनी हुई थीं। बहुतेरे श्रेष्ठ पुरुषों का वहाँ आना-जाना लगा रहता था। अनेकानेक बुद्धिमान् महामन्त्री, जो राजा के प्रति अनुराग रखने वाले थे, उसमें बैठे थे। विश्वसनीय, हितैषी तथा कार्यसाधन में कुशल बहुसंख्यक राक्षस सब ओर से उस भवन की रक्षा करते थे। वहाँ की वायु मतवाले हाथियों के निःश्वास से मिश्रित हो बवंडर-सी जान पड़ती थी। शङ्खध्वनि के समान राक्षसों का गम्भीर घोष वहाँ गूंजता रहता था। नाना प्रकार के वाद्यों के मनोरम शब्द उस भवन को निनादित करते थे। रूप और यौवन के मद से मतवाली युवतियों की वहाँ भीड-सी लगती रहती थी। वहाँ के बड़े-बड़े मार्ग लोगों के वार्तालाप से मुखरित जान पड़ते थे। उसके फाटक तपाये हुए सुवर्ण के बने हुए थे। उत्तम सजावट की वस्तुओं से वह महल अच्छी तरह सजा हुआ था, अतएव वह गन्धर्वो के आवास और देवताओं के निवासस्थान-सा मनोरम प्रतीत होता था। रत्नराशि से परिपूर्ण होने के कारण वह नागभवन के समान उद्भासित होता था। जैसे तेज से विस्तृत किरणों वाले सूर्य महान् मेघों की घटा में प्रवेश करते हैं, उसी प्रकार तेजस्वी विभीषण ने रावण के उस भवन में पदार्पण किया
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(It was) like the abode of Gandharvas (the celestial musicians), like an abode of wind god, abounding in collection of precious gems, like the mansion of Nagas indulging in enjoyment.
ShlokaShloka 7
तंमहाभ्रमिवाऽदित्यस्तेजोविस्तृतरश्मिमान् ।
अग्रजस्यालयंवीरःप्रविवेशमहाद्युतिः ।।6.10.7।।
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दूसरे दिन सबेरा होते ही धर्म और अर्थ के तत्त्व को जानने वाले भीमकर्मा महातेजस्वी वीर विभीषण अपने बड़े भाई राक्षसराज रावण के घर गये। वह घर अनेक प्रासादों के कारण पर्वतशिखरों के समूह की भाँति शोभा पाता था। उसकी ऊँचाई भी पहाड़ की चोटी को लज्जित करती थी। उसमें अलग-अलग बड़ी-बड़ी कक्षाएँ (ड्योढ़ियाँ) सुन्दर ढंग से बनी हुई थीं। बहुतेरे श्रेष्ठ पुरुषों का वहाँ आना-जाना लगा रहता था। अनेकानेक बुद्धिमान् महामन्त्री, जो राजा के प्रति अनुराग रखने वाले थे, उसमें बैठे थे। विश्वसनीय, हितैषी तथा कार्यसाधन में कुशल बहुसंख्यक राक्षस सब ओर से उस भवन की रक्षा करते थे। वहाँ की वायु मतवाले हाथियों के निःश्वास से मिश्रित हो बवंडर-सी जान पड़ती थी। शङ्खध्वनि के समान राक्षसों का गम्भीर घोष वहाँ गूंजता रहता था। नाना प्रकार के वाद्यों के मनोरम शब्द उस भवन को निनादित करते थे। रूप और यौवन के मद से मतवाली युवतियों की वहाँ भीड-सी लगती रहती थी। वहाँ के बड़े-बड़े मार्ग लोगों के वार्तालाप से मुखरित जान पड़ते थे। उसके फाटक तपाये हुए सुवर्ण के बने हुए थे। उत्तम सजावट की वस्तुओं से वह महल अच्छी तरह सजा हुआ था, अतएव वह गन्धर्वो के आवास और देवताओं के निवासस्थान-सा मनोरम प्रतीत होता था। रत्नराशि से परिपूर्ण होने के कारण वह नागभवन के समान उद्भासित होता था। जैसे तेज से विस्तृत किरणों वाले सूर्य महान् मेघों की घटा में प्रवेश करते हैं, उसी प्रकार तेजस्वी विभीषण ने रावण के उस भवन में पदार्पण किया
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Heroic (Vibheeshana) of exceptional splendour, whose brilliance spread widely like the radiance of the highly lustrous Sun entered his brother's abode.
ShlokaShloka 8
पुण्यान्पुण्याहघोषांश्चवेदविद्भिरुदाहृतान् ।
शुश्रावसुमहातेजाभ्रातुर्विजयसंश्रितान् ।।6.10.8।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
वहाँ पहुँचकर उन महातेजस्वी विभीषण ने अपने भाई की विजय के उद्देश्य से वेदवेत्ता ब्राह्मणों द्वारा किये गये पुण्याहवाचन के पवित्र घोष सुने
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Highly effulgent (Vibheeshana) heard sounds of recitation of sacred mantras from Vedas uttered by learned ones desiring a propitious day for his brother.
ShlokaShloka 9
पूजितान् दधिपात्रैश्चसर्पिर्भिस्सुमनोक्षतैः ।
मन्त्रवेदविदोविप्रान्ददर्शसमहाबलः ।।6.10.9।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
तत्पश्चात् उन महाबली विभीषण ने वेदमन्त्रों के ज्ञाता ब्राह्मणों का दर्शन किया, जिनके हाथों में दही और घी के पात्र थे। फूलों और अक्षतों से उन सबकी पूजा की गयी थी
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Mighty Vibheeshana saw there, brahmins learned in vedas and mantras, who worshipped with yellow rice, curd, clarified butter and flowers.
ShlokaShloka 10
सपूज्यमानोरक्षोभिद्दीप्यमानस्स्वतेजसा ।
आसनस्थंमहाबाहुर्ववन्देधनदानुजम् ।।6.10.10।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आपरामायण आदिकाव्य के युद्धकाण्ड में दसवाँ सर्ग पूरा हुआ
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Vibheeshana, of broad shoulders, who is revered by Rakshasas was shining in his own splendour. He greeted with folded palms, the brother of Kubera (Ravana) seated on his chair.
ShlokaShloka 11
सराजदृष्टिसम्पन्नमासनंहेमभूषितम् ।
जगामसमुदाचारंप्रयुज्याचारकोविदः ।।6.10.11।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
तदनन्तर शिष्टाचार के ज्ञाता विभीषण ‘विजयतां महाराजः’ (महाराज की जय हो) इत्यादि रूप से राजा के प्रति परम्पराप्राप्त शुभाशंसासूचक वचन का प्रयोग करके राजा के द्वारा दृष्टि के संकेत से बताये गये सुवर्णभूषित सिंहासन पर बैठ गये
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Vibheeshana who was learned in traditions and wellversed with code of conduct reached a seat decorated with gold blessed by the glance of the king Ravana.
ShlokaShloka 12
सरावणंमहात्मानंविजनेमन्त्रिसन्निधौ ।
उवाचहितमत्यर्थंवचनंहेतुनिश्चितम् ।।6.10.12।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
विभीषण जगत् की भली-बुरी बातों को अच्छी तरह जानते थे। उन्होंने प्रणाम आदि व्यवहार का यथार्थरूप से निर्वाह करके सान्त्वनापूर्ण वचनों द्वारा अपने बड़े भाई महामना रावण को प्रसन्न किया और उससे एकान्त में मन्त्रियों के निकट देश, काल और प्रयोजन के अनुरूप, युक्तियों द्वारा निश्चित तथा अत्यन्त हितकारक बात कही—
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When none other than ministers were present, Vibheeshana spoke these meaningful words to the distinguished Ravana, decidedly wishing for welfare.
ShlokaShloka 13
प्रसाद्यभ्रातरंजेष्ठंसान्त्वेनोपस्थितक्रमः ।
देशकालार्थसंवादिदृष्टलोकपरावरः ।।6.10.13।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
विभीषण जगत् की भली-बुरी बातों को अच्छी तरह जानते थे। उन्होंने प्रणाम आदि व्यवहार का यथार्थरूप से निर्वाह करके सान्त्वनापूर्ण वचनों द्वारा अपने बड़े भाई महामना रावण को प्रसन्न किया और उससे एकान्त में मन्त्रियों के निकट देश, काल और प्रयोजन के अनुरूप, युक्तियों द्वारा निश्चित तथा अत्यन्त हितकारक बात कही—
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Vibheeshana who knew the good and bad of the world and knew to advice in consonance with place and time said to his elder brother in an appeasing manner, propitiating him observing the customary tradition.
ShlokaShloka 14
यदाप्रभृतिवैदेहीसम्प्रास्तेमांपुरींतव ।
तदाप्रभृतिदृश्यन्तेनिमित्तान्यशुभानिनः ।।6.10.14।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘शत्रुओं को संताप देने वाले महाराज! जबसे विदेहकुमारी सीता यहाँ आयी हैं, तभी से हमलोगों को अनेक प्रकार के अमङ्गलसूचक अपशकुन दिखायी दे रहे हैं
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"Since Vaidehi has come to this city, inauspicious happenings are seen by us."
ShlokaShloka 15
सस्फुलिङ्ग���्सधूमार्चिस्सधूमकलुषोदयः ।
मन्त्रसङ्घहुतोऽप्यग्निर्नसम्यगभिवर्��ते ।।6.10.15।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘गायों का दूध सूख गया है, बड़े-बड़े गजराज मदरहित हो गये हैं, घोड़े नये ग्रास से आनन्दित (भोजन से संतुष्ट) होने पर भी दीनतापूर्ण स्वर में हिनहिनाते हैं
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"Even from the fire of fire sacrifices, fire particles polluted with smoke are rising and the fire is not burning with brilliance."
ShlokaShloka 16
अग्निष्ठेष्वग्निशलासुतथाब्रह्मस्थालीषुच ।
सरीसृपाणिदृश्यन्तेहन्येषुचपिपीलिकाः ।।6.10.16।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘गायों का दूध सूख गया है, बड़े-बड़े गजराज मदरहित हो गये हैं, घोड़े नये ग्रास से आनन्दित (भोजन से संतुष्ट) होने पर भी दीनतापूर्ण स्वर में हिनहिनाते हैं
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"In the cooking fire, in places of fire sacrifice, so also at places where offerings are made into fire, serpents are seen. Ants are seen in the Havis."
ShlokaShloka 17
गवांसयांसिस्कन्नानिविमदावीरकुञ्जराः ।
दीनमश्वाःप्रहेषन्तेनचग्रासाभिनन्दिनः ।।6.10.17।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘गायों का दूध सूख गया है, बड़े-बड़े गजराज मदरहित हो गये हैं, घोड़े नये ग्रास से आनन्दित (भोजन से संतुष्ट) होने पर भी दीनतापूर्ण स्वर में हिनहिनाते हैं
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"The udder of cows is dried up, the proud elephants have lost their ichor, the horses are pathetic and neighing. They are not even interested in fodder."
ShlokaShloka 18
खरोष्ट्राश्वतराराजभनभिन्नरोमास्स्रवन्तिच ।
नस्वभावेऽवतिष्ठन्तिविधानैरपिचिन्तिताः ।।6.10.18।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘राजन् ! गधों, ऊँटों और खच्चरों के रोंगटे खड़े हो जाते हैं। उनके नेत्रों से आँसू गिरने लगते हैं। विधिपूर्वक चिकित्सा की जाने पर भी वे पूर्णतः स्वस्थ हो नहीं पाते हैं
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"O King the donkeys and camels have shed their body hair and are crying. Even though they are treated for it in different ways they are not getting to be in normal natural form."
ShlokaShloka 19
वायसाःसङ्घशःक्रूराव्याहरन्तिसमन्ततः ।
समवेताश्चदृश्यन्तेविमानाग्रेषुसङ्घशः ।।6.10.19।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
लङ्कापुरी के ऊपर झुंड-के-झुंड गीध उसका स्पर्श करते हुए-से मड़राते रहते हैं। दोनों संध्याओं के समय सियारिने नगर के समीप आकर अमङ्गलसूचक शब्द करती हैं
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Wild crows are seen in flocks all over the top of aerial chariot sounding harsh gathered in groups.
ShlokaShloka 20
गृध्राश्चपरिलीयन्तेपुरीमुपरिपिण्डिताः ।
उपपन्नाश्चस्नध्येद्वेव्याहऱ्नत्यशिवंशिवाः ।।6.10.20।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
लङ्कापुरी के ऊपर झुंड-के-झुंड गीध उसका स्पर्श करते हुए-से मड़राते रहते हैं। दोनों संध्याओं के समय सियारिने नगर के समीप आकर अमङ्गलसूचक शब्द करती हैं
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"Even the eagles are collecting together and standing over the houses of the capital repeatedly in both the auspicious times of morning and evening and making inauspicious sounds."
ShlokaShloka 21
क्रव्यादानांमृगाणांचपुरीद्वारेषुसङ्घशः ।
श्रूयन्तेविपुलाघोषास्सविस्फूर्जितनिस्स्वनाः ।।6.10.21।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘नगर के सभी फाटकों पर समूह-के-समूह एकत्र हुए मांसभक्षी पशुओं के जोर-जोर से किये जानेवाले चीत्कार बिजली की गड़गड़ाहट के समान सुनायी पड़ते हैं
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At the entrance of the capital are heard thunderous sounds of carnivorous animals collected together sounding like thunder.
ShlokaShloka 22
तदेवंप्रस्तुतेकार्येप्रायश्चित्तमिदंक्षमम् ।
रोचतेयदिवैदेहीराघवायप्रदीयताम् ।।6.10.22।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘सीता का अपहरण तथा इससे होने वाला अपशकुनरूपी दोष यहाँ की सारी जनता, राक्षसराक्षसी तथा नगर और अन्तःपुर—सभी के लिये उपलक्षित होता है
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"Therefore, the task (of burning Lanka) has commenced. I have thought of this appropriate atonement. Restore Vaidehi to Rama."
ShlokaShloka 23
इदंचयदिवामोहाल्लोभाद्वाव्याहृतंमया ।
तत्रापिचमहाराज नदोषंकर्तुमर्हसि ।।6.10.23।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘सीता का अपहरण तथा इससे होने वाला अपशकुनरूपी दोष यहाँ की सारी जनता, राक्षसराक्षसी तथा नगर और अन्तःपुर—सभी के लिये उपलक्षित होता है
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"O great king You may know that I am not telling like this out of my delusion or greed. You ought not to find fault with me."
ShlokaShloka 24
अयंहिदोषस्सर्वस्यजनस्यास्योपलक्ष्यते ।
रक्षसांराक्षसीनांचपुरस्यान्तःपुरस्यच ।।6.10.24।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘सीता का अपहरण तथा इससे होने वाला अपशकुनरूपी दोष यहाँ की सारी जनता, राक्षसराक्षसी तथा नगर और अन्तःपुर—सभी के लिये उपलक्षित होता है
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All of us, the Rakshasas and Rakshasa women of the capital, even those in the harem, and all the common people are aware of this offence.
ShlokaShloka 25
श्रावणेचास्यमन्त्रस्यनिवृत्तास्सर्वमन्त्रिणः ।
अवश्यंचमयावाच्यंयद्दृष्टमपिवाश्रुतम् ।।6.10.25।।
सम्विधाययथान्यायंतद्भवान् कर्तुमर्हति ।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘यह बात आपके कानों तक पहुँचाने में प्रायः सभी मन्त्री संकोच करते हैं; परंतु जो बात मैंने देखी या सुनी है वह मुझे तो आपके आगे अवश्य निवेदन कर देनी चाहिये; अतः उसपर यथोचित विचार करके आप जैसा उचित समझें, वैसा करें’
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All your ministers have abstained from telling you out of fear of you. I must necessarily tell you (as brother) this which is seen and heard. You may determine that which is justifiable by determining the propriety. It is proper for me to submit to you.
ShlokaShloka 26
इतिस्ममन्त्रिणांमध्येभ्राताभ्रातरमूचिवान् ।
रावणंराक्षसांश्रेष्ठंपथ्यमेतद्विभीषणः ।।6.11.26।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
ऐसा कहकर देवसेना के नाशक और समराङ्गण में प्रचण्ड पराक्रम प्रकट करने वाले महाबली दशाननने अपने यथार्थवादी भाई विभीषण को तत्काल विदा कर दिया
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Brother Vibheeshana thus tendered advice to Ravana, the eminent king of Rakshasas in the presence of his ministers.
ShlokaShloka 27
हितंमहार्थंमृदुहेतुसंहितंव्यतीतकालायतिसम्प्रतिक्षमम् ।
निशम्यतद्वाक्यमुपस्थितज्वरःप्रसङ्गवानुत्तरमेतदब्रवीत् ।।6.10.27।।
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ऐसा कहकर देवसेना के नाशक और समराङ्गण में प्रचण्ड पराक्रम प्रकट करने वाले महाबली दशाननने अपने यथार्थवादी भाई विभीषण को तत्काल विदा कर दिया
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Foregoing the beneficial, meaningful, and gentle words of counsel of significance in the past, present and future also (given by Vibheeshana), Ravana seized with anger replied in this manner.
ShlokaShloka 28
भयंनपश्यामिकुतश्चिदप्यहंनराघवःप्राप्स्यतिजातुमैथिलीम् ।
सुरैस्सहेन्द्रैरपिसङ्गरेकथंममाग्रतस्स्थास्यतिलक्ष्मणाग्रजः ।।6.10.28।।
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ऐसा कहकर देवसेना के नाशक और समराङ्गण में प्रचण्ड पराक्रम प्रकट करने वाले महाबली दशाननने अपने यथार्थवादी भाई विभीषण को तत्काल विदा कर दिया
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"I do not perceive fear from anyone. Rama will not be able to get Mythili at any time. How can the elder brother of Lakshmana withstand me even if Indra and Devatas come (to his help) in battle"
ShlokaShloka 29
इत्येवमुक्त्वासुरसैन्यनाशनोमहाबलस्संयतिचण्डविक्रमः ।
दशाननोभ्रातरमाप्तवादिनंविसर्जयामासतदाविभीषणम् ।।6.10.29।।
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ऐसा कहकर देवसेना के नाशक और समराङ्गण में प्रचण्ड पराक्रम प्रकट करने वाले महाबली दशाननने अपने यथार्थवादी भाई विभीषण को तत्काल विदा कर दिया
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Then mighty tenheaded Ravana of formidable valour, a destroyer of Devatas' army in war, sent away Vibheeshana who had spoken words of good advice in that manner. ।।इत्यार्षेवाल्मीकीयेवामलीकीयेश्रीमद्रामायणेआदिकाव्येयुद्धकाण्डेदशमस्सर्गः।। This is the end of the tenth sarga of Yuddha Kanda of the first epic the holy Ramayana composed by sage Valmiki.