Bala Kanda

Sarga 14: Dasaratha performs aswamedhayaga on the bank of Sarayu according to vedic rites

बालकाण्डम् · सर्ग 14

55 shlokas

ShlokaShloka 1
अथ संवत्सरे पूर्णे तस्मिन्प्राप्ते तुरङ्गमे। सरय्वाश्चोत्तरे तीरे राज्ञो यज्ञोऽभ्यवर्तत।।1.14.1।।
हिन्दी अर्थ देखें
इधर वर्ष पूरा होने पर यज्ञसम्बन्धी अश्व भूमण्डल में भ्रमण करके लौट अया। फिर सरयू नदी के उत्तर तट पर राजा का यज्ञ आरम्भ हुआ
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After completion of one year when the sacrificial horse had returned, the sacrifice by the king (Dasaratha) commenced on the northern bank of river Sarayu.
ShlokaShloka 2
ऋश्यशृङ्गं पुरस्कृत्य कर्म चक्रुर्द्विजर्षभा:। अश्वमेधे महायज्ञे राज्ञोऽस्य सुमहात्मन:।।1.14.2।।
हिन्दी अर्थ देखें
महामनस्वी राजा दशरथ के उस अश्वमेध नामक महायज्ञ में ऋष्यशृंग को आगे करके श्रेष्ठ ब्राह्मण यज्ञ सम्बन्धी कर्म करने लगे
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The best of brahmins led by Rsyasringa performed the rituals of aswamedha organised by the exceedingly magnanimous king.
ShlokaShloka 3
कर्म कुर्वन्ति विधिवद्याजका वेदपारगा:। यथाविधि यथान्यायं परिक्रामन्ति शास्त्रत:।।1.14.3।।
हिन्दी अर्थ देखें
यज्ञ कराने वाले सभी ब्राह्मण वेदों के पारंगत विद्वान् थे; अतः वे न्याय तथा विधि के अनुसार सब कर्मों का उचित रीति से सम्पादन करते थे और शास्त्र के अनुसार किस क्रम से किस समय कौन-सी क्रिया करनी चाहिये, इसको स्मरण रखते हुए प्रत्येक कर्म में प्रवृत्त होते थे
Show English Translation
The chief priests, masters of the Vedas, conducted the rituals in consonance with traditions and scriptures. They officiated in conformity with duties laid down in the Vedas and according to law.
ShlokaShloka 4
प्रवर्ग्यं शास्त्रत: कृत्वा तथैवोपसदं द्विजा: चक्रुश्च विधिवत्सर्वमधिकं कर्म शास्त्रत:।।1.14.4।।
हिन्दी अर्थ देखें
ब्राह्मणों ने प्रवर्दी (अश्वमेध के अंगभूत कर्म विशेष) का शास्त्र (विधि, मीमांसा और कल्पसूत्र) के अनुसार सम्पादन करके उपसद नामक इष्टि विशेष का भी शास्त्र के अनुसार ही अनुष्ठान किया। तत्पश्चात् शास्त्रीय उपदेश से अधिक जो अतिदेशतः प्राप्त कर्म है, उस सबका भी विधिवत् सम्पादन किया
Show English Translation
Brahmins performed pravargya and upasada and other ceremonies as per the scriptures and traditions.
ShlokaShloka 5
अभिपूज्य ततो हृष्टास्सर्वे चक्रुर्यथाविधि। प्रातस्सवनपूर्वाणि कर्माणि मुनिपुङ्गवा:।।1.14.5।।
हिन्दी अर्थ देखें
तदनन्तर तत्तत् कर्मो के अंगभूत देवताओं का पूजन करके हर्ष में भरे हुए उन सभी मुनिवरों ने विधिपूर्वक प्रातःसवन आदि (अर्थात् प्रातः सवन, माध्यन्दिनसवन तथा तृतीय सवन) कर्म किये
Show English Translation
Thereafter the eminent ascetics, rejoicing in their hearts performed the worship (of celestial beings) and conducted the prescribed rituals starting with morning ablutions etc.
ShlokaShloka 6
ऐन्द्रश्च विधिवद्दत्तो राजा चाभिषुतोऽनघ:। माध्यन्दिनं च सवनं प्रावर्तत यथाक्रमम्।।1.14.6।।
हिन्दी अर्थ देखें
इन्द्रदेवता को विधि पूर्वक हविष्य का भाग अर्पित किया गया। पापनिवर्तक राजा सोम (सोमलता)* का रस निकाला गया। फिर क्रमशः माध्यन्दिनसवन का कार्य प्रारम्भ हुआ॥६॥ * इस विषय में सूत्रकार का वचन है- सोमं राजानं दृषदि निधाय… दृषद्भिरभिहन्यात् अर्थात् ‘राजा सोम (सोमलता) को पत्थर पर रखकर पत्थर से कूँचे।
Show English Translation
Havis was duly offered to Indra daily. The juice was extracted in the morning by pressing the soma plant. Midday ablutions were performed. All in proper sequence.
ShlokaShloka 7
तृतीयसवनं चैव राज्ञोऽस्य सुमहात्मन:। चक्रुस्तेशास्त्रतो दृष्ट्वा तथा ब्राह्मणपुङ्गवा:।।1.14.7।।
हिन्दी अर्थ देखें
तत्पश्चात् उन श्रेष्ठ ब्राह्मणों ने शास्त्र से देखभाल कर मनस्वी राजा दशरथ के तृतीय सवनकर्म का भी विधिवत् सम्पादन किया
Show English Translation
Those exceedingly noble and eminent brahmins performed third pressing of the soma, in conformity with the sastras.
ShlokaShloka 8
न चाहुतमभूत्तत्र स्खलितं वापि किञ्चन । दृश्यते ब्रह्मवत्सर्वं क्षेमयुक्तं हि चक्रिरे।।1.14.8।।
हिन्दी अर्थ देखें
ऋष्यशृंग आदि महर्षियों ने वहाँ अभ्यास काल में सीखे गये अक्षरों से युक्त-स्वर और वर्ण से सम्पन्न मन्त्रों द्वारा इन्द्र आदि श्रेष्ठ देवताओं का आवाहन किया
Show English Translation
There were no omissions in the offerings nor any lappes in the performance. Everything was done through recitation of mantras and in a wholesome way.
ShlokaShloka 9
न तेष्वहस्सु श्रान्तो वा क्षुधितो वापि दृश्यते। नाविद्वान्ब्राह्मणस्तत्र नाशतानुचरस्तथा।।1.14.9।।
हिन्दी अर्थ देखें
मधुर एवं मनोरम सामगान के लयमें गाये हुए आह्वान-मन्त्रों द्वारा देवताओं का आवाहन करके होताओं ने उन्हें उनके योग्य हविष्य के भाग समर्पित किये
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During the days (of sacrifice) none felt tired or hungry. There was no brahmin who was not learned or had less than a hundred followers (or disciples).
ShlokaShloka 10
ब्राह्मणा भुञ्जते नित्यं नाथवन्तश्च भुञ्जते। तापसा भुञ्जते चापि श्रमणा भुञ्जतेतथा।।1.14.10।।
हिन्दी अर्थ देखें
उस यज्ञ में कोई अयोग्य अथवा विपरीत आहुति नहीं पड़ी। कहीं कोई भूल नहीं हुई अनजान में भी कोई कर्म छूटने नहीं पाया; क्योंकि वहाँ सारा कर्म मन्त्रोच्चारण-पूर्वक सम्पन्न होता दिखायी देता था। महर्षियों ने सब कर्म क्षेमयुक्त एवं निर्विघ्न परिपूर्ण किये
Show English Translation
During that period brahmanas as well as those who have masters, (the sudras), ascetics and monks had enough to eat.
ShlokaShloka 11
वृद्धाश्च व्याधिताश्चैव स्त्रियो बालास्तथैव च । अनिशं भुञ्जमानानां न तृप्तिरुपलभ्यते।।1.14.11।।
हिन्दी अर्थ देखें
यज्ञ के दिनों में कोई भी ऋत्विज् थका-माँदा या भूखा-प्यासा नहीं दिखायी देता था। उसमें कोई भी ब्राह्मण ऐसा नहीं था, जो विद्वान् न हो अथवा जिसके सौसे कम शिष्य या सेवक रहे हों॥११॥
Show English Translation
The aged, the sick, women and also children ate there and knew no limit to their enjoyment.
ShlokaShloka 12
दीयतां दीयतामन्नं वासांसि विविधानि च। इति सञ्चोदितास्तत्र तथा चक्रुरनेकश:।।1.14.12।।
हिन्दी अर्थ देखें
उस यज्ञ में प्रतिदिन ब्राह्मण भोजन करते थे (क्षत्रिय और वैश्य भी भोजन पाते थे) तथा शूद्रों को भी भोजन उपलब्ध होता था। तापस और श्रमण भी भोजन करते थे
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"Give food, give, various kinds of clothes" echoed the organisers. And they (in charge of distribution) did.
ShlokaShloka 13
अन्नकूटाश्च बहवो दृश्यन्ते पर्वतोपमा:। दिवसे दिवसे तत्र सिद्धस्य विधिवत्तदा।।1.14.13।।
हिन्दी अर्थ देखें
बूढ़े, रोगी, स्त्रियाँ तथा बच्चे भी यथेष्ट भोजन पाते थे। भोजन इतना स्वादिष्ट होता था कि निरन्तर खाते रहने पर भी किसी का मन नहीं भरता था
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There, could be seen day after day heaps of nicely cooked food, looking like mountains.
ShlokaShloka 14
नानादेशादनुप्राप्ता: पुरुषास्स्त्रीगणास्तथा। अन्नपानैस्सुविहितास्तस्मिन्यज्ञे महात्मन:।।1.14.14।।
हिन्दी अर्थ देखें
‘अन्न दो, नाना प्रकार के वस्त्र दो’ अधिकारियों की ऐसी आज्ञा पाकर कार्यकर्ता लोग बारम्बार वैसा ही करते थे
Show English Translation
Men and women who had come from various countries to that sacrifice were entertained with food and drink by the magnanimous (king).
ShlokaShloka 15
अन्नं हि विधिवत्साधु प्रशंसन्ति द्विजर्षभा:। अहो तृप्ता: स्म भद्रं ते इति शुश्राव राघव:।।1.14.15।।
हिन्दी अर्थ देखें
वहाँ अन्न के बहुत से पर्वतों-जैसे ढेर देखे जा सकते हैं और प्रतिदिन विधिवत ब्राह्मणो ने वहाँ अनुष्ठान किया
Show English Translation
Brahmins having tasted the delicious food cooked in prescribed manner, praised saying "Ah We are fully satisfied. Prosperity to you". Such were the words heard by king Dasaratha.
ShlokaShloka 16
स्वलङ्कृताश्च पुरुषा ब्राह्मणान्पर्यवेषयन्। उपासते च तानन्ये सुमृष्टमणिकुण्डला:।।1.14.16।।
हिन्दी अर्थ देखें
महामनस्वी राजा दशरथ के उस यज्ञ में नाना देशों से आये हुए स्त्री-पुरुष अन्न-पान द्वारा भली-भाँति तृप्त किये गये थे
Show English Translation
While brahmins were being served with food by welldressed men, some others wearing pendents studded with shining jewels assisted them.
ShlokaShloka 17
कर्मान्तरे तदा विप्रा हेतुवादान्बहूनपि। प्राहुश्च वाग्मिनो धीरा: परस्परजिगीषया।।1.14.17।।
हिन्दी अर्थ देखें
श्रेष्ठ ब्राह्मण ‘भोजन विधिवत् बनाया गया है। बहुत स्वादिष्ट है’- ऐसा कहकर अन्न की प्रशंसा करते थे। भोजन करके उठे हुए लोगों के मुख से राजा सदा यही सुनते थे कि ‘हम लोग खूब तृप्त हुए। आपका कल्याण हो’
Show English Translation
In the interval between ceremonies, eloquent and sagacious brahmins were engaged in various disputations, desirous of victory.
ShlokaShloka 18
दिवसे दिवसे तत्र संस्तरे कुशला द्विजा:। सर्वकर्माणि चक्रुस्ते यथाशास्त्रं प्रचोदिता:।।1.14.18।।
हिन्दी अर्थ देखें
वस्त्र-आभूषणों से अलंकृत हुए पुरुष ब्राह्मणों को भोजन परोसते थे और उन लोगों की जो दूसरे लोग सहायता करते थे, उन्होंने भी विशुद्ध मणिमय कुण्डल धारण कर रखे थे।१८॥
Show English Translation
Every day in that sacrifice brahmins, skilful in rituals, persuaded (by sage Vasishta), performed all their duties as per tradition.
ShlokaShloka 19
नाषडङ्गविदत्रासीन्नाव्रतो नाबहुश्रुत:। सदस्यास्तस्य वै राज्ञो नावादकुशला द्विजा:।।1.14.19।।
हिन्दी अर्थ देखें
एक सवन समाप्त करके दूसरे सवन के आरम्भ होने से पूर्व जो अवकाश मिलता था, उसमें उत्तम वक्ता धीर ब्राह्मण एक-दूसरे को जीतने की इच्छा से बहुतेरे युक्तिवाद उपस्थित करते हुए शास्त्रार्थ करते थे
Show English Translation
Here (in this sacrificial pavillion), there was none who was not versed in six Vedangas, not true to vows, not learned in many sastras nor adept in discussions (on sastras).
ShlokaShloka 20
प्राप्ते यूपोच्छ्रये तस्मिन्षड्बैल्वा: खादिरास्तथा। तावन्तो बिल्वसहिता: पर्णिनश्च तथापरे।।1.14.20।। श्लेष्मातकमयस्त्वेको देवदारुमयस्तथा। द्वावेव विहितौ तत्र बाहुव्यस्तपरिग्रहौ।।1.14.21।।
हिन्दी अर्थ देखें
उस यज्ञ में नियुक्त हुए कर्मकुशल ब्राह्मण प्रतिदिन शास्त्र के अनुसार सब कार्यों का सम्पादन करते थे
Show English Translation
When the time came to erect sacrificial posts, six posts, each made of bilva, khadira, parni, sleshmataka and two of devadaru wood, with a distance of two outstretched hands between them were erected.
ShlokaShloka 21
प्राप्ते यूपोच्छ्रये तस्मिन्षड्बैल्वा: खादिरास्तथा। तावन्तो बिल्वसहिता: पर्णिनश्च तथापरे।।1.14.20।। श्लेष्मातकमयस्त्वेको देवदारुमयस्तथा। द्वावेव विहितौ तत्र बाहुव्यस्तपरिग्रहौ।।1.14.21।।
हिन्दी अर्थ देखें
राजा के उस यज्ञ में कोई भी सदस्य ऐसा नहीं था, जो व्याकरण आदि छहों अंगों का ज्ञाता न हो, जिसने ब्रह्मचर्यव्रत का पालन न किया हो तथा जो बहुश्रुत न हो। वहाँ कोई ऐसा द्विज नहीं था, जो वाद-विवाद में कुशल न हो
Show English Translation
When the time came to erect sacrificial posts, six posts each made of bilva and khadira wood and many made of parni wood along, one of sleshmataka and two of devadaru wood, with a distance of two outstretched hands between them were erected.
ShlokaShloka 22
कारितास्सर्व एवैते शास्त्रज्ञैर्यज्ञकोविदै:। शोभार्थं तस्य यज्ञस्य काञ्चनालङ्कृताऽभवन्।।1.14.22।।
हिन्दी अर्थ देखें
जब यूप खड़ा करने का समय आया, तब बेल की लकड़ी के छः यूप गाड़े गये। उतने ही खैर के यूप खड़े किये गये तथा पलाश के भी उतने ही यूप थे, जो बिल्व निर्मित यूपों के साथ खड़े किये गये थे
Show English Translation
All these posts were prepared by knowers of sastras and by those wellversed in the performance of sacrifices. They were decorated with gold to add elegance to the sacrifice.
ShlokaShloka 23
एकविंशतियूपास्ते एकविंशत्यरत्नय:। वासोभिरेकविंशद्भिरेकैकं समलङ्कृता:।।1.14.23।।
हिन्दी अर्थ देखें
बहेड़े के वृक्ष का एक यूप अश्वमेध यज्ञ के लिये विहित है। देवदारु के बने हुए यूप का भी विधान है; परंतु उसकी संख्या न एक है न छः। देवदारु के दो ही यूप विहित हैं। दोनों बाँहें फैला देने पर जितनी दूरी होती है, उतनी ही दूर पर वे दोनों स्थापित किये गये थे
Show English Translation
These twentyone sacrificial posts, each measuring twentyone 'aratni' height, were welldecorated wrapped in a piece of cloth.
ShlokaShloka 24
विन्यस्ता विधिवत्सर्वे शिल्पिभिस्सुकृता दृढा:। अष्टाश्रयस्सर्व एव श्लक्ष्णरूपसमन्विता:।।1.14.24।।
हिन्दी अर्थ देखें
यज्ञ कुशल शास्त्रज्ञ ब्राह्मणों ने ही इन सब यूपों का निर्माण कराया था। उस यज्ञ की शोभा को बढ़ाने के लिये उन सब में सोमा जड़ा गया था॥२४॥
Show English Translation
All those posts, strong with eight sides and finely finished surfaces, wellcarved by sculptors were duly erected.
ShlokaShloka 25
आच्छादितास्ते वासोभि: पुष्पैर्गन्धैश्च भूषिता:। सप्तर्षयो दीप्तिमन्तो विराजन्ते यथा दिवि।।1.14.25।।
हिन्दी अर्थ देखें
पूर्वोक्त इक्कीस यूप इक्कीस-इक्कीस अरनि* (पाँचसौ चार अंगुल) ऊँचे बनाये गये थे। उन सबको पृथक्-पृथक् इक्कीस कपड़ों से अलंकृत किया गया था॥२५॥ * तथा च सूत्रम्- ’चतुर्विंशत्यङ्गलयोऽरत्निः’ अर्थात् एक अरनि चौबीस अङ्गल के बराबर होता है।
Show English Translation
Decorated with flowers and sandal paste and covered with cloths, stood the bright sacrificial posts shining like seven sages in the sky.
ShlokaShloka 26
इष्टकाश्च यथान्यायं कारिताश्च प्रमाणत:। चितोऽग्निर्ब्राह्मणैस्तत्र कुशलैश्शुल्बकर्मणि ।।1.14.26।।
हिन्दी अर्थ देखें
कारीगरों द्वारा अच्छी तरह बनाये गये वे सभी सुदृढ़ यूप विधिपूर्वक स्थापित किये गये थे। वे सब-के-सब आठ कोणों से सुशोभित थे। उनकी आकृति सुन्दर एवं चिकनी थी
Show English Translation
The sacrificial fireplace was constructed with bricks with standard measurement by brahmins who were experts in the art of measuring land with a string or single strand.
ShlokaShloka 27
सचित्यो राजसिंहस्य सञ्चित: कुशलैर्द्विजै:। गरुडो रुक्मपक्षो वै त्रिगुणोऽष्टादशात्मक:।।1.14.27।।
हिन्दी अर्थ देखें
उन्हें वस्त्रों से ढक दिया गया था और पुष्पचन्दन से उनकी पूजा की गयी थी। जैसे आकाश में तेजस्वी सप्तर्षियों की शोभा होती है, उसी प्रकार यज्ञमण्डप में वे दीप्तिमान् यूप सुशोभित होते थे
Show English Translation
That sacrificial altar of the lion among kings, (Dasaratha), erected by welltrained brahmins was in the shape of the golden winged 'Garuda' it had three ranges and thrice as many fireplaces i.e eighteen in number.
ShlokaShloka 28
नियुक्तास्तत्र पशवस्तत्तदुद्दिश्य दैवतम्। उरगा: पक्षिणश्चैव यथाशास्त्रं प्रचोदिता:।।1.14.28।।
हिन्दी अर्थ देखें
सूत्र ग्रन्थों में बताये अनुसार ठीक माप से ईंटें तैयार करायी गयी थीं। उन ईंटों के द्वारा यज्ञ सम्बन्धी शिल्पि कर्म में कुशल ब्राह्मणों ने अग्नि का चयन किया था
Show English Translation
Animals, serpents and birds were kept ready after the sastras intended (for sacrifice) for those respective deities.
ShlokaShloka 29
शामित्रे तु हयस्तत्र तथा जलचराश्च ये। ऋत्विग्भिस्सर्वमेवैतन्नियुक्तं शास्त्रतस्तदा।।1.14.29।।
हिन्दी अर्थ देखें
राजसिंह महाराज दशरथ के यज्ञ में चयन द्वारा सम्पादित अग्नि की कर्मकाण्ड कुशल ब्राह्मणों द्वारा शास्त्र विधि के अनुसार स्थापना की गयी। उस अग्नि की आकृति दोनों पंख और पुच्छ फैलाकर नीचे देखते हुए पूर्वाभिमुख खड़े हुए गरुड़ की-सी प्रतीत होती थी। सोने की ईंटों से पंख का निर्माण होने से उस गरुड़ के पंख सुवर्णमय दिखायी देते थे। प्रकृत-अवस्था में चित्य-अग्नि के छः प्रस्तार होते हैं; किंतु अश्वमेध यज्ञ में उसका प्रस्तार तीन गुना हो जाता है। इसलिये वह गरुड़ाकृति अग्नि अठारह प्रस्तारों। से युक्त थी
Show English Translation
When the time came to sacrifice the animals, the chief priests, in accordance with tradition, tied up the horse and all the aquatic animals to the sacrificial posts.
ShlokaShloka 30
पशूनां त्रिशतं तत्र यूपेषु नियतं तदा। अश्वरत्नोत्तमं तस्य राज्ञो दशरथस्य च ।।1.14.30।।
हिन्दी अर्थ देखें
वहाँ पूर्वोक्त यूपों में शास्त्र विहित पशु, सर्प और पक्षी विभिन्न देवताओं के उद्देश्य से बाँधे गये थे
Show English Translation
Three hundred animals and the jewel of the horses (from the stables) belonging to king Dasaratha were bound to the sacrificial posts.
ShlokaShloka 31
कौसल्या तं हयं तत्र परिचर्य समन्तत:। कृपाणैर्विशशासैनं त्रिभि: परमया मुदा ।।1.14.31।।
हिन्दी अर्थ देखें
शामित्र कर्म में यज्ञिय अश्व तथा कूर्म आदि जलचर जन्तु जो वहाँ लाये गये थे, ऋषियों ने उन सबको शास्त्र विधि के अनुसार पूर्वोक्त यूपों में बाँध दिया
Show English Translation
Kausalya, with immense glee having gone round and worshipped that horse, severed it with three strokes of scimitar.
ShlokaShloka 32
पतत्रिणा तदा सार्धं सुस्थितेन च चेतसा। अवसद्रजनीमेकां कौशल्या धर्मकाम्यया।।1.14.32।।
हिन्दी अर्थ देखें
उस समय उन यूपों में तीन सौ पशु बँधे हुए थे तथा राजा दशरथ का वह उत्तम अश्वरत्न भी वहीं बाँधा गया था
Show English Translation
Kausalya, in her devotion to duty and with a happy state of mind, passed one night near that horse.
ShlokaShloka 33
होताऽध्वर्युस्तथोद्गाता हस्तेन समयोजयन्। महिष्या परिवृत्त्या च वावातां च तथापराम्।।1.14.33।।
हिन्दी अर्थ देखें
रानी कौसल्या ने वहाँ प्रोक्षण आदि के द्वारा सब ओर से उस अश्व का संस्कार करके बड़ी प्रसन्नता के साथ तीन तलवारों से उसका स्पर्श किया
Show English Translation
Hota, Adhvaryu and Udgata arranged Mahishi, Parivritti, Vavaata and another woman known as Palakali to touch (keep the company of) the sacrificial horse.
ShlokaShloka 34
पतत्रिणस्तस्य वपा मुद्धृत्य नियतेन्द्रिय:। ऋत्विक्परमसम्पन्न: श्रपयामास शास्त्रत:।।1.14.34।।
हिन्दी अर्थ देखें
तदनन्तर कौसल्या देवी ने सुस्थिर चित्त से धर्मपालन की इच्छा रखकर उस अश्व के निकट एक रात निवास किया
Show English Translation
The official priest, highly knowledgeable in scriptures and having restrained senses, removed the marrow from the horse and cooked it according to tradition.
ShlokaShloka 35
धूमगन्धं वपायास्तु जिघ्रति स्म नराधिप:। यथाकालं यथान्यायं निर्णुदन्पापमात्मन:।।1.14.35।।
हिन्दी अर्थ देखें
तत्पश्चात् होता, अध्वर्यु और उद्गाता ने राजा की (क्षत्रियजातीय) महिषी ‘कौसल्या’, (वैश्यजातीय स्त्री) ‘वावाता’ तथा (शूद्रजातीय स्त्री) ‘परिवृत्ति’- इन सबके हाथ से उस अश्वका स्पर्श कराया*॥३५॥ * जाति के अनुसार नाम अलग-अलग होते हैं। दशरथ के तो कौसल्या, कैकेयी और सुमित्रा तीनों क्षत्रिय जाति की ही थीं।
Show English Translation
The king at appropriate time and in agreement with the scriptures inhaled the odour of the smoke (from the burnt marrow) and absolved himself of his sins.
ShlokaShloka 36
हयस्य यानि चाङ्गानि तानि सर्वाणि ब्राह्मणा:। अग्नौ प्रास्यन्ति विधिवत्समन्त्राष्षोडशर्त्विज:।।1.14.36।।
हिन्दी अर्थ देखें
इसके बाद परम चतुर जितेन्द्रिय ऋत्विक्ने विधि पूर्वक अश्वकन्द के गूदे को निकाल कर शास्त्रोक्त रीति से पकाया॥३६॥
Show English Translation
The sixteen officiating priests (brahmins) offered all the horse's limbs with prayers as per the customs.
ShlokaShloka 37
प्लक्षशाखासु यज्ञानामन्येषां क्रियते हवि:। अश्वमेधस्य यज्ञस्य वैतसो भाग इष्यते।।1.14.37।।
हिन्दी अर्थ देखें
तत्पश्चात् उस गूदे की आहुति दी गयी। राजा दशरथ ने अपने पाप को दूर करने के लिये ठीक समय पर आकर विधि पूर्वक उसके धूएँ की गन्ध को सूंघा
Show English Translation
In other sacrifices oblations are offered with branches of a plaksha tree but in Aswamedha a branch of cane creeper is chosen instead.
ShlokaShloka 38
त्र्यहोऽश्वमेधस्सङ्ख्यात: कल्पसूत्रेण ब्राह्मणै:। 37 चतुष्टोममहस्तस्य प्रथमं परिकल्पितम्।।1.14.38।।
हिन्दी अर्थ देखें
उस अश्वमेध यज्ञ के अंगभूत जो-जो हवनीय पदार्थ थे, उन सबको लेकर समस्त सोलह ऋत्विज् ब्राह्मण अग्नि में विधिवत् आहुति देने लगे
Show English Translation
According to Kalpa sutra, aswamedha in conducted for three days. In the first day, chatushtoma is arranged.
ShlokaShloka 39
उक्थ्यं द्वितीयं संख्यातमतिरात्रं तथोत्तरम्। कारितास्तत्र बहवो विहिताश्शास्त्रदर्शनात्।।1.14.39।।
हिन्दी अर्थ देखें
अश्वमेध के अतिरिक्त अन्य यज्ञों में जो हवि दी जाती है, वह पाकर की शाखाओं में रखकर दी जाती है; परंतु अश्वमेध यज्ञ का हविष्य बेंत की चटाई में रखकर देने का नियम है
Show English Translation
On the second day Ukthya and on the third day Atiraatra were performed. Many sacrifices fixed according to the scriptures were also performed.
ShlokaShloka 40
ज्योतिष्टोमायुषी चैवमतिरात्रौ विनिर्मितौ। अभिजिद्विश्वजिच्चैवमप्तोर्यामो महाक्रतु:।।1.14.40।।
Show English Translation
Jyotishtoma and Ayuryaga in Atiratra, Abhijit, Viswajit and Aptoryama ceremonies constituting the great sacrifice were performed in the prescribed manner.
ShlokaShloka 41
प्राचीं होत्रे ददौ राजा दिशं स्वकुलवर्धन:। अध्वर्यवे प्रतीचीं तु ब्रह्मणे दक्षिणां दिशम्।।1.14.41।। उद्गात्रे च तथोदीचीं दक्षिणैषा विनिर्मिता। हयमेधे महायज्ञे स्वयंभूविहिते पुरा।।1.14.42।।
हिन्दी अर्थ देखें
कल्पसूत्र और ब्राह्मण ग्रन्थों के द्वारा अश्वमेध के तीन सवनीय दिन बताये गये हैं। उनमें से प्रथम दिन जो सवन होता है, उसे चतुष्टोम (‘अग्निष्टोम’) कहा गया है। द्वितीय दिवस साध्य सवन को ‘उक्थ्य’ नाम दिया गया है तथा तीसरे दिन जिस सवन का अनुष्ठान होता है, उसे ‘अतिरात्र’ कहते हैं। उसमें शास्त्रीय दृष्टि से विहित बहुत-से दूसरे-दूसरे क्रतु भी सम्पन्न किये गये
Show English Translation
In order to promote his dynasty, king Dasaratha gave away eastern region to Hotar, western region to Adhvaryu, southern region to Brahma and northern region to Udgata. These offerings were made in accordance with theprescriptions by Brahma long all.
ShlokaShloka 42
क्रतुं समाप्य तु तदा न्यायत: पुरुषर्षभ: । ऋत्विग्भ्यो हि ददौ राजा तां धरां कुलवर्धन:।।1.14.43।।
हिन्दी अर्थ देखें
ज्योतिष्टोम, आयुष्टोम यज्ञ, दो बार अतिरात्र यज्ञ, पाँचवाँ अभिजित् , छठा विश्वजित् तथा सातवें-आठवें आप्तोर्याम- ये सब-के-सब महाक्रतु माने गये हैं, जो अश्वमेध के उत्तर काल में सम्पादित हुए
Show English Translation
The king best among men and upholder of his dynasty, having concluded the sacrifice according to law, offered this entire earth as gift to priests.
ShlokaShloka 43
ऋत्विजस्त्वब्रुवन्सर्वे राजानं गतकल्मषम्। भवानेव महीं कृत्स्नामेको रक्षितुमर्हति।।1.14.44।।
हिन्दी अर्थ देखें
अपने कुल की वृद्धि करने वाले राजा दशरथ ने यज्ञ पूर्ण होने पर होता को दक्षिणा रूप में अयोध्या से पूर्व दिशा का सारा राज्य सौंप दिया, अध्वर्यु को पश्चिम दिशा तथा ब्रह्मणों को दक्षिण दिशा का राज्य दे दिया
Show English Translation
But all the priests said to the king purged of his sins, "O Lord of men you alone are capable of protecting this earth".
ShlokaShloka 44
न भूम्या कार्यमस्माकं न हि शक्तास्स्म पालने। रतास्स्वाध्यायकरणे वयं नित्यं हि भूमिप।।1.14.45।। निष्क्रयं किञ्चिदेवेह प्रयच्छतु भवानिति। 4
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इसी तरह उद्गाता को उत्तर दिशा की सारी भूमि दे दी। पूर्वकाल में भगवान् ब्रह्माजी ने जिसका अनुष्ठान किया था, उस अश्वमेध नामक महायज्ञ में ऐसी ही दक्षिणा का विधान किया गया है*॥४४॥ * ‘प्रजापतिरश्वमेधमसृजत (प्रजापति ने अश्वमेध यज्ञ का अनुष्ठान किया।)’ इस श्रुति के द्वारा यह सूचित होता है कि पूर्वकाल में ब्रह्माजी ने इस महायज्ञ का अनुष्ठान किया था। इसमें दक्षिणा रूप से प्रत्येक दिशा के दान का विधान कल्पसूत्र द्वारा किया गया है। यथा- ’प्रतिदिशं दक्षिणां ददाति प्राची दिग्धोतुर्दक्षिणा प्रतीच्यध्वर्योरुदीच्युद्गातुः॥
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"O ruler of the earth We are constantly engaged in the study of the Vedas. We are not capable of ruling the earth and we cannot do anything with its possession. Give some other charity in lieu of that.
ShlokaShloka 45
मणिरत्नं सुवर्णं वा गावो यद्वा समुद्यतम्। तत्प्रयच्छ नरश्रेष्ठ धरण्या न प्रयोजनम्।।1.14.46।।
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इस प्रकार विधि पूर्वक यज्ञ समाप्त करके अपने कुल की वृद्धि करने वाले पुरुषशिरो मणि राजा दशरथ ने ऋत्विजों को सारी पृथ्वी दान कर दी
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O best of men give us gems or gold or cows or whichever is readily available. We have no use with this earth".
ShlokaShloka 46
एवमुक्तो नरपतिर्ब्राह्मणैर्वेदपारगै:।।1.14.47।। गवां शतसहस्राणि दश तेभ्यो ददौ नृप:। 4 शतकोटीस्सुवर्णस्य रजतस्य चतुर्गुणम् ।।1.14.48।।
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यों दान देकर इक्ष्वाकु कुलनन्दन श्रीमान् महाराज दशरथ के हर्ष की सीमा न रही, परंतु समस्त ऋत्विज् उन निष्पाप नरेश से इस प्रकार बोले-
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Lord of men, the king having been thus addressed by brahmins who were wellversed in the Vedas, bestowed on them ten hundred thousand cows, a hundred crore of gold coins and four times as much in silver coins.
ShlokaShloka 47
ऋत्विजश्च ततस्सर्वे प्रददुस्सहिता वसु। ऋश्यशृङ्गाय मुनये वसिष्ठाय च धीमते।।1.14.49।।
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महाराज! अकेले आप ही इस सम्पूर्ण पृथ्वी की रक्षा करने में समर्थ हैं। हममें इसके पालन की शक्ति नहीं है; अतः भूमि से हमारा कोई प्रयोजन नहीं है
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All the priests collectively offered that wealth to sage Rsyasringa and Vasishta endowed with prudence.
ShlokaShloka 48
ततस्ते न्यायत: कृत्वा प्रविभागं द्विजोत्तमा:। सुप्रीतमनसस्सर्वे प्रत्यूचुर्मुदिता भृशम्।।1.14.50।।
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भूमिपाल! हम तो सदा वेदों के स्वाध्याय में ही लगे रहते हैं (इस भूमिका पालन हमसे नहीं हो सकता); अतः आप हमें यहाँ इस भूमि का कुछ निष्क्रय (मूल्य) ही दे दें॥४८॥
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Then those highly pleased brahmins, having distributed that wealth with equity, again said to the king.
ShlokaShloka 49
तत: प्रसर्पकैभ्यस्तु हिरण्यं सुसमाहित:। जाम्बूनदं कोटिसंख्यं ब्राह्मणेभ्यो ददौ तदा।।1.14.51।।
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‘नृपश्रेष्ठ! मणि, रत्न, सुवर्ण, गौ अथवा जो भी वस्तु यहाँ उपस्थित हो, वही हमें दक्षिणा रूप से दे दीजिये। इस धरती से हमें कोई प्रयोजन नहीं है’
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Thereafter, with earnestness king Dasaratha bestowed a crore of gold coins to brahmins who had come to see the sacrifice.
ShlokaShloka 50
दरिद्राय द्विजायाथ हस्ताभरणमुत्तमम्। कस्मैचिद्याचमानाय ददौ राघवनन्दन:।।1.14.52।।
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वेदों के पारगामी विद्वान् ब्राह्मणों के ऐसा कहने पर राजा ने उन्हें दस लाख गौएँ प्रदान की। दस करोड़ स्वर्ण मुद्रा तथा उससे चौगुनी रजत मुद्रा अर्पित की॥५० १/२॥
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Dasaratha then gave his excellent bracelet to a poor brahmin who solicited alms.
ShlokaShloka 51
तत: प्रीतेषु नृपतिर्द्विजेषु द्विजवत्सल:। प्रणाममकरोत्तेषां हर्षपर्याकुलेक्षण:।।1.14.53।।
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तब उस समस्त ऋत्विजों ने एक साथ होकर वह सारा धन मुनिवर ऋष्यशृंग तथा बुद्धिमान् वसिष्ठ को सौंप दिया॥५१ १/२॥
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When the brahmins were pleased, king Dasaratha who was fond of brahmins bowed to them with his eyes filled with delight.
ShlokaShloka 52
तस्याशिषोऽथ विधिवद्ब्राह्मणैस्समुदीरिता:। उदारस्य नृवीरस्य धरण्यां प्रणतस्य च ।।1.14.54।।
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तदनन्तर उन दोनों महर्षियों के सहयोग से उस धन का न्याय पूर्वक बँटवारा करके वे सभी श्रेष्ठ ब्राह्मण मन-ही-मन बड़े प्रसन्न हुए और बोले महाराज! इस दक्षिणा से हम-लोग बहुत संतुष्ट हैं’॥५२ १/२॥
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Brahmins uttered blessings upon the generous king when he prostrated before them according to procedure.
ShlokaShloka 53
तत: प्रीतमना राजा प्राप्य यज्ञमनुत्तमम्। पापापहं स्वर्नयनं दुष्करं पार्थिवर्षभै:।।1.14.55।।
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इसके बाद एकाग्रचित्त होकर राजा दशरथ ने अभ्यागत ब्राह्मणों को एक करोड़ जाम्बूनद सुवर्ण की मुद्राएँ बाँटीं॥५३ १/२॥
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Sacrifice destroys sins. It leads to heaven. It is incapable of being done by other monarchs. King Dasaratha was very much pleased after performing this great sacrifice.
ShlokaShloka 54
ततोऽब्रवीदृश्यशृङ्गं राजा दशरथस्तदा। कुलस्य वर्धनं त्वं तु कर्तुमर्हसि सुव्रत।।1.14.56।।
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सारा धन दे देने के बाद जब कुछ नहीं बच रहा, तब एक दरिद्र ब्राह्मण ने आकर राजा से धनकी याचना की। उस समय उन रघुकुलनन्दन नरेश ने उसे अपने हाथ का उत्तम आभूषण उतारकर दे दिया॥५४ १/२॥
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King Dasaratha then addressing Rsyasringa said "O Adherent of vows you can help the continuity of my race".
ShlokaShloka 55
तथेति च स राजानमुवाच द्विजसत्तम:। भविष्यन्ति सुता राजंश्चत्वारस्ते कुलोद्वहा:।।1.14.57।।
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तत्पश्चात् जब सभी ब्राह्मण विधिवत् संतुष्ट हो गये, उस समय उन पर स्नेह रखने वाले नरेश ने उन सबको प्रणाम किया। प्रणाम करते समय उनकी सारी इन्द्रियाँ हर्ष से विह्वल हो रही थीं॥५५ १/२॥
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Rsyasringa, the best of brahmins, addressing the king said, "O King Let it be. Four sons perpetuating your race will be born to you". इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिकाव्ये बालकाण्डे चतुर्दशस्सर्ग:।। Thus ends the fourteenth sarga of Balakanda of the holy Ramayana the first epic composed by sage Valmiki.