Bala Kanda
Sarga 32: Sarga 32
बालकाण्डम् · सर्ग 32
24 shlokas
ShlokaShloka 1
[Description of the four sons of Brahma and the dynasty of Kusanabha-- enraged Windgod turns the daughters of Kusanabha into humpedback ones.
ब्रह्मयोनिर्महानासीत्कुशो नाम महातपा:।
अक्लिष्टव्रतधर्मज्ञः सज्जनप्रतिपूजक:।।1.32.1।।
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(विश्वामित्रजी कहते हैं-) श्रीराम! पूर्वकाल में कुश नाम से प्रसिद्ध एक महातपस्वी राजा हो गये हैं। वे साक्षात् ब्रह्माजी के पुत्र थे। उनका प्रत्येक व्रत एवं संकल्प बिना किसी क्लेश या कठिनाई के ही पूर्ण होता था। वे धर्मके ज्ञाता, सत्पुरुषों का आदर करने वाले और महान् थे
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There was a great ascetic named Kusa, born to Brahma, as ascetic indefatigable in vows, knowldegeable in dharma and a respector of the virtuous.
ShlokaShloka 2
स महात्मा कुलीनायां युक्तायां सुगुणोल्बणान्।
वैदर्भ्यां जनयामास चतुरस्सदृशान् सुतान्।।1.32.2।।
कुशाम्बं कुशनाभं च अधूर्तरजसं वसुम्।
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उत्तम कुल में उत्पन्न विदर्भदेश की राजकुमारी उनकी पत्नी थी। उसके गर्भ से उन महात्मा नरेश ने चार पुत्र उत्पन्न किये, जो उन्हीं के समान थे
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That great soul, Kusa, married the princess of Vidarbha born in a noble family and a match for him. He begot four virtuous sons who resembled him. They were Kusamba, Kusanabha, Adhurtarajas and Vasu.
ShlokaShloka 3
दीप्तियुक्तान् महोत्साहान् क्षत्रधर्मचिकीर्षया।।1.32.3।।
तानुवाच कुश: पुत्रान् धर्मिष्ठान् सत्यवादिन:।
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Kusa addressed his four brilliant sons who were highly enthusiastic, pious, truthful and were wedded to duties of the warrior race:
ShlokaShloka 4
क्रियतां पालनं पुत्रा: धर्मं प्राप्स्यथ पुष्कलम्।।1.32.4।।
ऋषेस्तु वचनं श्रुत्वा चत्वारो लोकसम्मता:।
निवेशं चक्रिरे सर्वे पुराणां नृवरास्तदा।।1.32.5।।
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उनके नाम इस प्रकार हैं-कुशाम्ब, कुशनाभ, असूर्तरजस’ तथा वसु, ये सब-के-सब तेजस्वी तथा महान् उत्साही थे। राजा कुशने ‘प्रजारक्षणरूप’ क्षत्रिय-धर्मके पालन की इच्छा से अपने उन धर्मिष्ठ तथा सत्यवादी पुत्रों से कहा—’पुत्रो! प्रजाका पालन करो, इससे तुम्हें धर्म का पूरा-पूरा फल प्राप्त होगा’॥३-४॥ १. रामायणशिरोमणि नामक व्याख्या के निर्माता ने ‘अमूर्तिरजसम्’ पाठ माना है। महाभारत के अनुसार इनका नाम ‘अमूर्तरयस्’ या ‘अमूर्तरया’ था (वन ९५।१७)। यहाँ इनके द्वारा धर्मारण्य नामक नगर बसानेका उल्लेख है। यह नगर धर्मारण्य नामक तीर्थभूत वन में था। यह वन गया के आस-पास का ही प्रदेश है। अमूर्तरया के पुत्र गयने ही गया नामक नगर बसाया था। अतः धर्मारण्य और गया की एकता सिद्ध होती है। महाभारत वनपर्व (८४१८५) में गया के ब्रह्मसरोवर को धर्मारण्य से सुशोभित बताया गया है। (वन० ८२६४७) धर्मारण्य में पितृ-पूजन की महत्ता बतायी गयी है।
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"O my sons, govern with righteousness so that you will acquire immense merit'. Hearing the words of the rishi, the four sons who were the best among men and revered in the world constructed four cities as their abodes.
ShlokaShloka 5
कुशाम्बस्तु महातेजा: कौशाम्बीमकरोत्पुरीम् ।
कुशनाभस्तु धर्मात्मा पुरं चक्रे महोदयम्।।1.32.6।।
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अपने पिता महाराज कुश की यह बात सुनकर उन चारों लोकशिरोमणि नरश्रेष्ठ राजकुमारों ने उस समय अपने-अपने लिये पृथक्-पृथक् नगर निर्माण कराया
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The brilliant Kushamba and the righteous Kushanabha constructed the cities of Kaushanbi and Mahodaya (as their capital) respectively.
ShlokaShloka 6
अधूर्तरजसो राम धर्मारण्यं महीपति:।
चक्रे पुरवरं राजा वसुश्चक्रे गिरिव्रजम्।।1.32.7।।
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महातेजस्वी कुशाम्ब ने ‘कौशाम्बी’ पुरी बसायी (जिसे आजकल ‘कोसम’ कहते हैं)। धर्मात्मा कुशनाभने ‘महोदय’ नामक नगरका निर्माण कराया
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O Rama king Adhurtarajasa constructed Dharmaranya, the best of cities and king Vasu, the city of Girivrajam.
ShlokaShloka 7
एषा वसुमती राम वसोस्तस्य महात्मन:।
एते शैलवरा: पञ्च प्रकाशन्ते समन्तत:।।1.32.8।
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परम बुद्धिमान् असूर्तरजस ने ‘धर्मारण्य’ नामक एक श्रेष्ठ नगर बसाया तथा राजा वसुने ‘गिरिव्रज’ नगर की स्थापना की
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O Rama this place where we are (called Vasumati) belongs to the magnanimous king Vasu. This is surrounded by five great shining mountains.
ShlokaShloka 8
सुमागधी नदी रम्या मगधान् विश्रुताययौ।
पञ्चानां शैलमुख्यानां मध्ये मालेव शोभते।।1.32.9।।
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महात्मा वसु की यह ‘गिरिव्रज’ नामक राजधानी वसुमती के नामसे प्रसिद्ध हुई। इसके चारों ओर ये पाँच श्रेष्ठ पर्वत सुशोभित होते हैं*॥८॥ * महाभारत सभापर्व (२१-१-१०) में इन पाँचों पर्वतों के नाम इस प्रकार वर्णित हैं— (१) विपुल, (२) वराह, (३) वृषभ (ऋषभ), (४) ऋषिगिरि (मातङ्ग) तथा (५) चैत्यक।
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The delightful and renowned river Sumagadhi (known as Sona), flowing in the country of Magadha, looks beautiful like a garland amidst five great mountains.
ShlokaShloka 9
सैषा हि मागधी राम वसोस्तस्य महात्मन:।
पूर्वाभिचरिता राम सुक्षेत्रा सस्यमालिनी।।1.32.10।।
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यह रमणीय (सोन) नदी दक्षिण-पश्चिम की ओर से बहती हुई मगध देश में आयी है, इसलिये यहाँ ‘सुमागधी’ नाम से विख्यात हुई है। यह इन पाँच श्रेष्ठ पर्वतों के बीच में मालाकी भाँति सुशोभित हो रही है॥९॥
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Rama, this Magadhi river, of great Vasu flows from the east surrounded by fertile crops fields like a garland.
ShlokaShloka 10
कुशनाभस्तु राजर्षि: कन्याशतमनुत्तमम्।
जनयामास धर्मात्मा घृताच्यां रघुनन्दन।।1.32.11।।
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श्रीराम! इस प्रकार ‘मागधी’ नाम से प्रसिद्ध हुई यह सोन नदी पूर्वोक्त महात्मा वसु से सम्बन्ध रखती है। रघुनन्दन! यह दक्षिण-पश्चिम से आकर पूर्वोत्तर दिशा की ओर प्रवाहित हुई है। इसके दोनों तटों पर सुन्दर क्षेत्र (उपजाऊ खेत) हैं, अतः यह सदासस्य-मालाओं से अलंकृत (हरी-भरी खेती से सुशोभित) रहती है
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O scion of the Raghu family, the virtuous rajarshi Kusanabha begot one hundred beautiful daughters through a nymph named Ghritachi.
ShlokaShloka 11
तास्तु यौवनशालिन्यो रूपवत्य स्स्वलङ्कृता:।
उद्यानभूमिमागम्य प्रावृषीव शतह्रदा:।।1.32.12।।
गायन्त्यो नृत्यमानाश्च वादयन्त्यश्च सर्वश:।
आमोदं परमं जग्मुर्वराभरणभूषिता:।।1.32.13।।
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रघुकुल को आनन्दित करने वाले श्रीराम! धर्मात्मा राजर्षि कुशनाभ ने घृताची अप्सरा के गर्भ से परम उत्तम सौ कन्याओं को जन्म दिया
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Those welladorned, beautiful, young maidens in the pleasuregarden looked like lightnings in the rainy season. Bedecked with fine ornaments they were singing, dancing, playing on instruments and moving in all directions in great delight.
ShlokaShloka 12
अथ ताश्चारुसर्वाङ्ग्यो रूपेणाप्रतिमा भुवि।
उद्यानभूमिमागम्य तारा इव घनान्तरे।।1.32.14।।
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With beautiful limbs of unparalleled beauty on earth, they shone in the pleasuregarden like stars in the midst of clouds.
ShlokaShloka 13
तास्सर्वगुणसम्पन्ना रूपयौवनसंयुता:।
दृष्ट्वा सर्वात्मको वायुरिदं वचनमब्रवीत्।।1.32.15।।
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वे सब-की-सब सुन्दर रूप-लावण्य से सुशोभित थीं। धीरे-धीरे युवावस्था ने आकर उनके सौन्दर्य को और भी बढ़ा दिया। रघुवीर! एक दिन वस्त्र और आभूषणों से विभूषित हो वे सभी राजकन्याएँ उद्यानभूमि में आकर वर्षाऋतु में प्रकाशित होने वाली विद्युन्मालाओं की भाँति शोभा पाने लगीं। सुन्दर अलंकारों से अलंकृत हुई वे अंगनाएँ गाती, बजाती और नृत्य करती हुई वहाँ परम आमोद-प्रमोद में मग्न हो गयीं
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At the sight of the maidens embellished with all virtues and youth and beauty, the allpervading Windgod addressed them these words:
ShlokaShloka 14
अहं व: कामये सर्वा भार्या मम भविष्यथ।
मानुषस्त्यज्यतां भावः दीर्घमायुरवाप्स्यथ।।1.32.16।।
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उनके सभी अंग बड़े मनोहर थे। इस भूतल पर उनके रूप-सौन्दर्य की कहीं भी तुलना नहीं थी। उस उद्यान में आकर वे बादलों के ओट में कुछ-कुछ छिपी हुई तारिकाओं के समान शोभा पा रही थीं
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I request you all to be my wives. You will leave this feeling of mortality and attain a long life.
ShlokaShloka 15
चलं हि यौवनं नित्यं मानुषेषु विशेषत:।
अक्षय्यं यौवनं प्राप्ताः अमर्यश्च भविष्यथ।।1.32.17।।
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उस समय उत्तम गुणों से सम्पन्न तथा रूप और यौवन से सुशोभित उन सब राजकन्याओं को देखकर सर्वस्वरूप वायु देवता ने उनसे इस प्रकार कहा-
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Youth is always unstable, especially in human beings. If you marry me, you will be ever youthful like devatas.
ShlokaShloka 16
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा वायोरक्लिष्टकर्मण:।
अपहास्य ततो वाक्यं कन्याशतमथाब्रवीत् ।।1.32.18।।
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‘सुन्दरियो! मैं तुम सबको अपनी प्रेयसी के रूप में प्राप्त करना चाहता हूँ, तुम सब मेरी भार्याएँ बनोगी। अब मनुष्य भाव का त्याग करो और मुझे अंगीकार करके देवांगनाओं की भाँति दीर्घ आयु प्राप्त कर लो
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At the works of the untiringly blowing Windgod the lunged maidens laughed and said:
ShlokaShloka 17
अन्तश्चरसि भूतानां सर्वेषां त्वं सुरोत्तम ।
प्रभावज्ञा: स्म ते सर्वा: किमस्मानवमन्यसे।।1.32.19।।
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‘विशेषतः मानव-शरीर में जवानी कभी स्थिर नहीं रहती–प्रतिक्षण क्षीण होती जाती है। मेरे साथ सम्बन्ध हो जाने पर तुम लोग अक्षय यौवन प्राप्त करके अमर हो जाओगी’
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"O best among devatas you move within all living beings, we feel your impact. Why do you insult us?
ShlokaShloka 18
कुशनाभसुतास्सर्वा: समर्थास्त्वां सुरोत्तम।
स्थानाच्च्यावयितुं देवं रक्षामस्तु तपो वयम्।।1.32.20।।
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अनायास ही महान् कर्म करने वाले वायुदेव का यह कथन सुनकर वे सौ कन्याएँ अवहेलनापूर्वक हँसकर बोलीं-॥१८॥
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"O best among devatas we are daughters of Kusanabha, We are capable of pulling you down from your position. We are safeguarding our ascetic merit as virgins (we could curse you to save our ascetic merit)" of Kusnabha.
ShlokaShloka 19
माभूत्स कालो दुर्मेध: पितरं सत्यवादिनम्।
नावमन्यस्व धर्मेण स्वयं वरमुपास्महे।।1.32.21।।
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‘सुरश्रेष्ठ! आप प्राणवायु के रूप में समस्त प्राणियों के भीतर विचरते हैं (अतः सबके मनकी बातें जानते हैं; आपको यह मालूम होगा कि हमारे मन में आपके प्रति कोई आकर्षण नहीं है)। हम सब बहिनें आपके अनुपम प्रभाव को भी जानती हैं (तो भी हमारा आपके प्रति अनुराग नहीं है); ऐसी दशामें यह अनुचित प्रस्ताव करके आप हमारा अपमान किसलिये कर रहे हैं?
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O wicked one, do not dishonour our father who always speaks the truth. He will choose the bridegrooms righteously. Do not invite death (father may be the cause of your death).
ShlokaShloka 20
पिता हि प्रभुरस्माकं दैवतं परमं हि न:।
यस्य नो दास्यति पिता स नो भर्ता भविष्यति।।1.32.22।।
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‘देव! देवशिरोमणे! हम सब-की-सब राजर्षि कुशनाभ की कन्याएँ हैं। देवता होने पर भी आपको शाप देकर वायुपद से भ्रष्ट कर सकती हैं, किंतु ऐसा करना नहीं चाहतीं; क्योंकि हम अपने तप को सुरक्षित रखती हैं
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Our father is our lord. Our father is god to us. Whomsoever our father offers us shall become our husband".
ShlokaShloka 21
तासां तद्वचनं श्रुत्वा वायु: परमकोपन:।
प्रविश्य सर्वगात्राणि बभञ्ज भगवान् प्रभु:।।1.32.23।।
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‘दुर्मते! वह समय कभी न आवे, जब कि हम अपने सत्यवादी पिता की अवहेलना करके कामवश या अत्यन्त अधर्मपूर्वक स्वयं ही वर ढूँढ़ने लगें
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Having heard the words of those maidens, the most powerful and venerable Windgod became furious. He entered all the limbs of their bodies, twisted and distorted them.
ShlokaShloka 22
ता: कन्या वायुना भग्ना विविशुर्नृपतेर्गृहम्।
प्रापतन् भुवि सम्भ्रान्तास्सलज्जा स्सास्रलोचना:।।1.32.24।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘हम लोगों पर हमारे पिताजी का प्रभुत्व है, वे हमारे लिये सर्वश्रेष्ठ देवता हैं। पिताजी हमें जिसके हाथ में दे देंगे, वही हमारा पति होगा’
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Their bodies disfigured and shattered by the Windgod, the maidens with tears flowing from their eyes entered the palace and fell down on the ground, agitated and overtaken by shame.
ShlokaShloka 23
स च ता दयिता दीना: कन्या: परमशोभना:।
दृष्ट्वा भग्नास्तदा राजा सम्भ्रान्त इदमब्रवीत्।।1.32.25।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
उनकी यह बात सुनकर वायुदेव अत्यन्त कुपित हो उठे। उन ऐश्वर्यशाली प्रभु ने उनके भीतर प्रविष्ट हो सब अंगों को मोड़कर टेढ़ा कर दिया। शरीर मुड़ जानेके कारण वे कुबड़ी हो गयीं। उनकी आकृति मुट्ठी बँधे हुए एक हाथ के बराबर हो गयी वे भयसे व्याकुल हो उठीं॥२३ १/२॥
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The king saw his extremely beautiful beloved daughters distressed and shattered and spoke these words with bewilderment.
ShlokaShloka 24
किमिदं कथ्यतां पुत्र्य: को धर्ममवमन्यते।
कुब्जा: केन कृता: सर्वा वेष्टन्त्यो नाभिभाषथ।
एवं राजा विनिश्श्वस्य समाधिं सन्दधे तत:।।1.32.26।।
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वायुदेव के द्वारा कुबड़ी की हुई उन कन्याओं ने राजभवन में प्रवेश किया। प्रवेश करके वे लज्जित और उद्विग्न हो गयीं। उनके नेत्रों से आँसुओं की धाराएँ बहने लगीं
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"O daughters What has happened? Who has dishonoured virtue? Say it at once. Who has made you hunchbacked? Standing roud me, why are you dumb?" The king heaved a sigh and entered into a state of samadhi. इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिकाव्ये बालकाण्डे द्वात्रिंशस्सर्ग:।। Thus ends the thirtysecond sarga of Balakanda of the holy Ramayana the first epic composed by sage Valmiki.