Bala Kanda

Sarga 66: King Janaka honours Viswamitra, Rama and Lakshmana--narrates the story about the bow of Mahadeva--declares he would give Sita in marriage to Rama if he strings the bow.

बालकाण्डम् · सर्ग 66

26 shlokas

ShlokaShloka 1
तत: प्रभाते विमले कृतकर्मा नराधिप:। विश्वामित्रं महात्मानं आजुहाव सराघवम्।।1.66.1।।
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The day dawned bright and clear when the king (Janaka) performed his daily routine rites and welcomed the great Viswamitra with the two Raghavas (Rama and Lakshmana).
ShlokaShloka 2
तमर्चयित्वा धर्मात्मा शास्त्रदृष्टेन कर्मणा। राघवौ च महात्मानौ तदा वाक्यमुवाच ह।।1.66.2।।
हिन्दी अर्थ देखें
तदनन्तर दूसरे दिन निर्मल प्रभातकाल आने पर धर्मात्मा राजा जनक ने अपना नित्य नियम पूरा करके श्रीराम और लक्ष्मण सहित महात्मा विश्वामित्रजी को बुलाया और शास्त्रीय विधि के अनुसार मुनि तथा उन दोनों महामनस्वी राजकुमारों का पूजन करके इस प्रकार कहा-
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The virtuous Janaka paid respects to Viswamitra and the highsouled Rama and Lakshmana in accordance with the sastras and spoke:
ShlokaShloka 3
भगवन् स्वागतं तेऽस्तु किं करोमि तवानघ। भवानाज्ञापयतु मामाज्ञाप्यो भवता ह्यहम्।।1.66.3।।
हिन्दी अर्थ देखें
‘भगवन्! आपका स्वागत है निष्पाप महर्षे! आप मुझे आज्ञा दीजिये, मैं आपकी क्या सेवा करूँ; क्योंकि मैं आपका आज्ञापालक हूँ’
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"Welcome, O Venerable one O Irreproachable one what can I do for you? Worthy of being commanded, I seek your orders.
ShlokaShloka 4
एवमुक्तस्स धर्मात्मा जनकेन महात्मना। प्रत्युवाच मुनिर्वीरं वाक्यं वाक्यविशारद:।।1.66.4।।
हिन्दी अर्थ देखें
महात्मा जनक के ऐसा कहनेपर बोलने में कुशल धर्मात्मा मुनिश्रेष्ठ विश्वामित्र ने उनसे यह बात कही–
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At the words of the magnanimous Janaka, the virtuous sage wellversed in speech replied to the heroic king:
ShlokaShloka 5
पुत्रौ दशरथस्येमौ क्षत्रियौ लोकविश्रुतौ। द्रुष्टुकामौ धनु श्श्रेष्ठं यदेतत्वयि तिष्ठति।।1.66.5।।
हिन्दी अर्थ देखें
‘महाराज! राजा दशरथ के ये दोनों पत्र विश्वविख्यात क्षत्रिय वीर हैं और आपके यहाँ जो यह श्रेष्ठ धनुष रखा है, उसे देखनेकी इच्छा रखते हैं
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Dasaratha's sons, (Rama and Lakshmana), kshatriyas renowned in the world are eager to see that great bow in your possession.
ShlokaShloka 6
एतद्दर्शय भद्रं ते कृतकामौ नृपात्मजौ। दर्शनादस्य धनुषो यथेष्टं प्रतियास्यत:।।1.66.6।।
हिन्दी अर्थ देखें
‘आपका कल्याण हो, वह धनुष इन्हें दिखा दीजिये। इससे इनकी इच्छा पूरी हो जायगी फिर ये दोनों राजकुमार उस धनुष के दर्शन मात्र से संतुष्ट हो इच्छानुसार अपनी राजधानी को लौट जायँगे’
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Be blessed. Show this great bow to the princes. This is their desire. Once it is fulfilled, they will go back.
ShlokaShloka 7
एवमुक्तस्तु जनक: प्रत्युवाच महामुनिम्। श्रूयतामस्य धनुषो यदर्थमिह तिष्ठति।।1.66.7।।
हिन्दी अर्थ देखें
मुनिके ऐसा कहने पर राजा जनक महामुनि विश्वामित्र से बोले- ’मुनिवर! इस धनुष का वृत्तान्त सुनिये। जिस उद्देश्य से यह धनुष यहाँ रखा गया, वह सब बताता हूँ
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Thus addressed by the mighty ascetic Janaka replied, "I shall tell you how this bow came to be deposited here".
ShlokaShloka 8
देवरात इति ख्यातो निमेष्षष्ठो महीपति:। न्यासोऽयं तस्य भगवन् हस्ते दत्तो महात्मना।।1.66.8।।
हिन्दी अर्थ देखें
‘भगवन्! निमि के ज्येष्ठ पुत्र राजा देवरात के नाम से विख्यात थे। उन्हीं महात्मा के हाथ में यह धनुष धरोहर के रूपमें दिया गया था
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"O Adorable one there was a famous king named Devarata, sixth in line from Nimi. This bow was kept with him in trust by the exalted lord (Shiva).
ShlokaShloka 9
दक्षयज्ञवधे पूर्वं धनुरायम्य वीर्यवान्। रुद्रस्तु त्रिदशान् रो��ात्सलीलमिदमब्रवीत्।।1.66.9।।
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Earlier at the time of destruction of Daksha's sacrifice, Rudra endowed with great prowess lifted this bow sportively and spoke to the gods.
ShlokaShloka 10
यस्माद्भागार्थिनो भागान्नाकल्पयत मे सुरा:। वराङ्गाणि महार्हाणि धनुषा शातयामि व:।।1.66.10।।
हिन्दी अर्थ देखें
‘कहते हैं, पूर्वकाल में दक्षयज्ञ-विध्वंस के समय परम पराक्रमी भगवान् शङ्कर ने खेल-खेल में ही रोष पूर्वक इस धनुष को उठाकर यज्ञ-विध्वंस के पश्चात् देवताओं से कहा- ’देवगण! मैं यज्ञ में भाग प्राप्त करना चाहता था, किंतु तुम लोगों ने नहीं दिया। इसलिये इस धनुष से मैं तुम सब लोगों के परम पूजनीय श्रेष्ठ अंग-मस्तक काट डालूँगा’॥९-१०॥
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'O gods in your anxiety to partake your share of the sacrifie, you have failed to provide mine in the sacrificial offerings. Therefore, I shall sever your jewelled heads and beautiful limbs with this bow'.
ShlokaShloka 11
ततो विमनसस्सर्वे देवा वै मुनिपुङ्गव। प्रसादयन्ति देवेशं तेषां प्रीतोऽभवद्भव:।।1.66.11।।
हिन्दी अर्थ देखें
‘मुनिश्रेष्ठ! यह सुनकर सम्पूर्ण देवता उदास हो गये और स्तुतिके द्वारा देवाधिदेव महादेवजीको प्रसन्न करने लगे। अन्तमें उनपर भगवान् शिव प्रसन्न हो गये
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"O Eminent ascetic thereafter all the gods with agitated minds propitiated lord of the gods, Siva and he was pleased with them.
ShlokaShloka 12
प्रीतियुक्तस्स सर्वेषां ददौ तेषां महात्मनाम्। तदेतद्देवदेवस्य धनूरत्नं महात्मन:। न्यासभूतं तदा न्यस्तमस्माकं पूर्व के विभो।।1.66.12।।
हिन्दी अर्थ देखें
‘प्रसन्न होकर उन्होंने उन सब महामनस्वी देवताओं को यह धनुष अर्पण कर दिया। वही यह देवाधिदेव महात्मा भगवान् शङ्कर का धनुष-रत्न है, जो मेरे पूर्वज महाराज देवरात के पास धरोहर के रूपमें रखा गया था॥१२ १/२॥
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O Lord that gem of a bow belonging to Siva was given to the great gods who in turn got it deposited in trust with our ancestor.
ShlokaShloka 13
अथ मे कृषत: क्षेत्रं लाङ्गूलादुत्थिता मया। क्षेत्रं शोधयता लब्धा नाम्ना सीतेति विश्रुता।।1.66.13।।
Show English Translation
Thereupon while I was ploughing and cleaing the (sacrificial) ground, Sita, a wellknown name, was lifted up by the blade of the plough. Thus she was obtained by me.
ShlokaShloka 14
भूतलादुत्थिता सा तु व्यवर्धत ममात्मजा। वीर्यशुल्केति मे कन्या स्थापितेयमयोनिजा।।1.66.14।।
हिन्दी अर्थ देखें
‘एक दिन मैं यज्ञ के लिये भूमिशोधन करते समय खेत में हल चला रहा था। उसी समय हल के अग्रभागसे जोती गयी भूमि (हराई या सीता) से एक कन्या प्रकट हुई। सीता (हलद्वारा खींची गयी रेखा) से उत्पन्न होने के कारण उसका नाम सीता रखा गया। पृथ्वी से प्रकट हुई वह मेरी कन्या क्रमशः बढ़कर सयानी हुई
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Arisen from the earth and not from a mother's womb, she grew up as my daughter. I made a stipulation that (this shall be the means to win this maiden as a gift) this shall be given in marriage only to the prince whose prowess is fully tried.
ShlokaShloka 15
भूतलादुत्थितां तां तु वर्धमानां ममात्मजाम्। वरयामासुरागम्य राजानो मुनिपुंगव।।1.66.15।।
हिन्दी अर्थ देखें
‘अपनी इस अयोनिजा कन्या के विषय में मैंने यह निश्चय किया कि जो अपने पराक्रम से इस धनुष को चढ़ा देगा, उसी के साथ मैं इसका ब्याह करूँगा। इस तरह इसे वीर्यशुल्का (पराक्रमरूप शुल्कवाली) बनाकर अपने घर में रख छोड़ा है। मुनिश्रेष्ठ! भूतल से प्रकट होकर दिनों-दिन बढ़ने वाली मेरी पुत्री सीता को कई राजाओं ने यहाँ आकर माँगा॥१५ १/२॥
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O Eminent ascetic arisen from the earth and reared as my daughter, she has been sought after in marriage by many princes.
ShlokaShloka 16
तेषां वरयतां कन्यां सर्वेषां पृथिवीक्षिताम्। वीर्यशुल्केति भगवन् न ददामि सुतामहम्।।1.66.16।।
हिन्दी अर्थ देखें
‘परंतु भगवन्! कन्या का वरण करने वाले उन सभी राजाओं को मैंने यह बता दिया कि मेरी कन्या वीर्यशुल्का है। (उचित पराक्रम प्रकट करने पर ही कोई पुरुष उसके साथ विवाह करने का अधिकारी हो सकता है।) यही कारण है कि मैंने आजतक किसी को अपनी कन्या नहीं दी॥१६ १/२॥
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O Worshipful one all those monarchs sought this maiden but I did not offer my daughter saying that the 'marriage offer' could be made only through the tried and tested prowess of a suitor.
ShlokaShloka 17
ततस्सर्वे नृपतय स्समेत्य मुनिपुंगव। मिथिलामभ्युपागम्य वीर्यजिज्ञासवस्तदा।।1.66.17।।
हिन्दी अर्थ देखें
‘मुनिपुंगव! तब सभी राजा मिलकर मिथिला में आये और पूछने लगे कि राजकुमारी सीता को प्राप्त करने के लिये कौन-सा पराक्रम निश्चित किया गया॥१८ १/२॥
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O Preeminent among ascetics thereafter many kings together came to Mithila to test their prowess.
ShlokaShloka 18
तेषां जिज्ञासमानानां वीर्यं धनुरुपाहृतम्। न शेकुर्ग्रहणे तस्य धनुषस्तोलनेऽपि वा।।1.66.18।।
हिन्दी अर्थ देखें
‘मैंने पराक्रम की जिज्ञासा करने वाले उन राजाओं के सामने यह शिवजी का धनुष रख दिया; परंतु वे लोग इसे उठाने या हिलाने में भी समर्थ न हो सके॥१८ १/२॥
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The bow was brought and placed before those who were curious to test their strength but none was able to grasp or lift the bow.
ShlokaShloka 19
तेषां वीर्यवतां वीर्यमल्पं ज्ञात्वा महामुने । प्रत्याख्याता नृपतयस्तन्निबोध तपोधन।।1.66.19।।
हिन्दी अर्थ देखें
‘महामुने! उन पराक्रमी नरेशों की शक्ति बहुत थोड़ी जानकर मैंने उन्हें कन्या देने से इनकार कर दिया। तपोधन! इसके बाद जो घटना घटी, उसे भी आप सुन लीजिये॥१९ १/२॥
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O great ascetic I knew those mighty kings had little strength, so rejected them.
ShlokaShloka 20
तत: परमकोपेन राजानो नृपपुङ्गव। न्यरुंधन्मिथिलां सर्वे वीर्यसंदेहमागता:।।1.66.20।।
हिन्दी अर्थ देखें
‘मुनिप्रवर! मेरे इनकार करने पर ये सब राजा अत्यन्त कुपित हो उठे और अपने पराक्रम के विषय में संशयापन्न हो मिथिला को चारों ओर से घेरकर खड़े हो गये॥२० १/२॥
Show English Translation
O Mighty ascetic, thereafter all the kings doubting their own strength in stringing the bow were inflamed with anger and laid siege on Mithila.
ShlokaShloka 21
आत्मानमवधूतं ते विज्ञाय नृपपुङ्गवा:। रोषेण महताऽऽविष्टा: पीडयन्मिथिलां पुरीम्।।1.66.21।।
हिन्दी अर्थ देखें
‘मेरे द्वारा अपना तिरस्कार हुआ मानकर उन श्रेष्ठ नरेशों ने अत्यन्त रुष्ट हो मिथिलापुरी को सब ओर से पीड़ा देना प्रारम्भ कर दिया॥२१ १/२॥
Show English Translation
Those eminent kings felt humiliated. Inflamed with anger, they tormented the city of Mithila.
ShlokaShloka 22
ततस्संवत्सरे पूर्णे क्षयं यातानि सर्वश:। साधनानि मुनिश्रेष्ठ ततोऽहं भृशदु:खित:।।1.66.22।।
हिन्दी अर्थ देखें
‘मुनिश्रेष्ठ! पूरे एक वर्षतक वे घेरा डाले रहे। इस बीच में युद्ध के सारे साधन क्षीण हो गये इससे मुझेबड़ा दुःख हुआ॥२२ १/२॥
Show English Translation
O Best among ascetics thus one year passed. Everywhere in the city all the means of living were exhausted. I felt deeply sad over this situation.
ShlokaShloka 23
ततो देवगणान् सर्वान् तपसाऽहं प्रसादयम्। ददुश्च परमप्रीता श्चतुरङ्गबलं सुरा:।।1.66.23।।
हिन्दी अर्थ देखें
‘तब मैंने तपस्या के द्वारा समस्त देवताओं को प्रसन्न करने की चेष्टा की। देवता बहुत प्रसन्न हुएऔर उन्होंने मुझे चतुरंगिणी सेना प्रदान की॥२३ १/२॥
Show English Translation
Thereafter, I propitiated the gods by my austerities. Highly pleased, they gave me an army of four divisions (chariots, elephants, horses and infantry ).
ShlokaShloka 24
ततो भग्ना नृपतयो हन्यमाना दिशो ययु:। अवीर्या वीर्यसन्दिग्धा स्सामात्या: पापकर्मण:।।1.66.24।।
हिन्दी अर्थ देखें
‘फिर तो हमारे सैनिकों की मार खाकर वे सभी पापाचारी राजा, जो बलहीन थे अथवा जिनके बलवान् होने में संदेह था, मन्त्रियों सहित भागकर विभिन्न दिशाओं में चले गये॥२४ १/२॥
Show English Translation
Then those wicked kings who were exhausted were doubtful about their energy. They were beaten and defeated. They fled away along with their ministers in different directions.
ShlokaShloka 25
तदेतन्मुनिशार्दूल धनु: परमभास्वरम्। रामलक्ष्मणयोश्चापि दर्शयिष्यामि सुव्रत।।1.66.25।।
हिन्दी अर्थ देखें
‘मुनिश्रेष्ठ! यही वह परम प्रकाशमान धनुष है। उत्तम व्रत का पालन करने वाले महर्षे! मैं उसे श्रीराम और लक्ष्मण को भी दिखाऊँगा॥२५ १/२॥
Show English Translation
O Sage you are a tiger among asceties, you are faithful to your vows, I shall show this effulgent bow to your Rama and Lakshmana .
ShlokaShloka 26
यद्यस्य धनुषो राम: कुर्यादारोपणं मुने। सुतामयोनिजां सीतां दद्यां दाशरथेरहम्।।1.66.26।।
हिन्दी अर्थ देखें
‘मुने! यदि श्रीराम इस धनुष की प्रत्यञ्चा चढ़ा दें तो मैं अपनी अयोनिजा कन्या सीता को इन दशरथ कुमार के हाथमें दे दूँ’॥२६॥ इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे षट्षष्टितमः सर्गः॥६६॥ इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में छाछठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥६६॥
Show English Translation
O Sage if Rama could lift and string this bow I shall give my daughter Sita, not born from a woman, to him (son of Dasaratha)". इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिकाव्ये बालकाण्डे षट्षष्टितमस्सर्ग:।। Thus ends the sixtysixth sarga of Balakanda of the holy Ramayana the first epic composed by sage Valmiki.