Ayodhya Kanda
Sarga 100: Meeting of Bharata and Rama -- Rama enquires about his father and others -- about Bharata's rule at Ayodhya.
अयोध्याकाण्डम् · सर्ग 100
67 shlokas
ShlokaShloka 1
जटिलं चीरवसनं प्राञ्जलिं पतितं भुवि।
ददर्श रामो दुर्दर्शं युगान्ते भास्करंयथा।।2.100.1।।
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जटा और चीर-वस्त्र धारण किये भरत हाथ जोड़कर पृथ्वी पर पड़े थे, मानो प्रलयकाल में सूर्यदेव धरती पर गिर गये हों। उनको उस अवस्था में देखना किसी भी स्नेही सुहृद् के लिये अत्यन्त कठिन था। श्रीराम ने उन्हें देखा और जैसे-तैसे किसी तरह पहचाना। उनका मुख उदास हो गया था। वे बहुत दुर्बल हो गये थे। श्रीराम ने भाई भरत को अपने हाथ से पकड़कर उठाया और उनका मस्तक सूंघकर उन्हें हृदय से लगा लिया। इसके बाद रघुकुलभूषण भरत को गोद में बिठाकर श्रीराम ने बड़े आदर से पूछा –
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Rama beheld Bharata with matted locks and robes of bark fallen down on the ground with folded hands like the Sun at the time of dissolution of the world. It was really difficult to look at him.
ShlokaShloka 2
कथंचिदभिविज्ञाय विवर्णवदनं कृशम्।
भ्रातरं भरतं रामः परिजग्राह बाहुना।।2.100.2।।
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जटा और चीर-वस्त्र धारण किये भरत हाथ जोड़कर पृथ्वी पर पड़े थे, मानो प्रलयकाल में सूर्यदेव धरती पर गिर गये हों। उनको उस अवस्था में देखना किसी भी स्नेही सुहृद् के लिये अत्यन्त कठिन था। श्रीराम ने उन्हें देखा और जैसे-तैसे किसी तरह पहचाना। उनका मुख उदास हो गया था। वे बहुत दुर्बल हो गये थे। श्रीराम ने भाई भरत को अपने हाथ से पकड़कर उठाया और उनका मस्तक सूंघकर उन्हें हृदय से लगा लिया। इसके बाद रघुकुलभूषण भरत को गोद में बिठाकर श्रीराम ने बड़े आदर से पूछा –
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Rama found it extremely difficult to recognise Bharata with his emaciated body and pallid face. He held him in his arms and lifted him.
ShlokaShloka 3
आघ्राय रामस्तं मूर्ध्नि परिष्वज्य च राघवः।
अङ्के भरतमारोप्य पर्यपृच्छत्समाहितः।।2.100.3।।
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जटा और चीर-वस्त्र धारण किये भरत हाथ जोड़कर पृथ्वी पर पड़े थे, मानो प्रलयकाल में सूर्यदेव धरती पर गिर गये हों। उनको उस अवस्था में देखना किसी भी स्नेही सुहृद् के लिये अत्यन्त कठिन था। श्रीराम ने उन्हें देखा और जैसे-तैसे किसी तरह पहचाना। उनका मुख उदास हो गया था। वे बहुत दुर्बल हो गये थे। श्रीराम ने भाई भरत को अपने हाथ से पकड़कर उठाया और उनका मस्तक सूंघकर उन्हें हृदय से लगा लिया। इसके बाद रघुकुलभूषण भरत को गोद में बिठाकर श्रीराम ने बड़े आदर से पूछा –
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Born in the race of Raghu, Rama embraced Bharata and kissed him on his forehead. Placing him on his lap, he enquired thus with a composed mind:
ShlokaShloka 4
क्व नु तेऽभूत्पिता तात यदरण्यं त्वमागतः।
न हि त्वं जीवतस्तस्य वनमागन्तुमर्हसि।।2.100.4।।
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‘मैं दीर्घकाल के बाद दूर से (नाना के घर से) आये हुए भरत को आज इस वन में देख रहा हूँ; परंतु इनका शरीर बहुत दुर्बल हो गया है। तात! तुम क्यों वन में आये हो?
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O dear, now that you have come to the forest, where is our father king Dasaratha? You ought not come to the forest while he is living.
ShlokaShloka 5
चिरस्य बत पश्यामि दूराद्भरतमागतम्।
दुष्प्रतीकमरण्येऽस्मिन् किं तात वनमागतः।।2.100.5।।
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‘मैं दीर्घकाल के बाद दूर से (नाना के घर से) आये हुए भरत को आज इस वन में देख रहा हूँ; परंतु इनका शरीर बहुत दुर्बल हो गया है। तात! तुम क्यों वन में आये हो?
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You have come a long distance (from Ayodhya) to this forest, O Bharata It is a pity, dear brother, to see you after a long time, so emaciated. What brings you to the forest?
ShlokaShloka 6
कच्चिद्धारयते तात राजा यत्त्वमिहाऽगतः।
कच्चिन्न दीन स्सहसा राजा लोकान्तरं गतः।।2.100.6।।
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My dear (brother), now that you have come here, I trust, king Dasaratha is keeping good health and hope, he has not departed prematurely in despondency for the other world.
ShlokaShloka 7
कच्चित्सौम्य न ते राज्यं भ्रष्टं बालस्य शाश्वतम्।
कच्चिच्छुश्रूषसे तात पितरं सत्यविक्रमम्।।2.100.7।।
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‘सौम्य! तुम अभी बालक हो, इसलिये परम्परा से चला आता हुआ तुम्हारा राज्य नष्ट तो नहीं हो गया? सत्यपराक्रमी तात भरत! तुम पिताजी की सेवा-शुश्रूषा तो करते हो न?
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O gentle one, being young and inexperienced, I trust, you have not forfeited the kingdom for ever. Dear child, I trust, you are looking after father whose prowess is his truthfulness.
ShlokaShloka 8
कच्चिद्धशरथो राजा कुशली सत्यसंङ्गरः।
राजसूयाश्वमेधानामाहर्ता धर्मनिश्चयः।।2.100.8।।
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‘जो धर्म पर अटल रहने वाले हैं तथा जिन्होंने राजसूय एवं अश्वमेध-यज्ञों का अनुष्ठान किया है, वे सत्यप्रतिज्ञ महाराज दशरथ सकुशल तो हैं न?
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I trust king Dasaratha, who is true to his promise, a performer of Rajasuya and Ashwamedha sacrifices and a firm adherent of righteousness is in good health.
ShlokaShloka 9
स कच्चिद्ब्राह्मणो विद्वान् धर्मनित्यो महाद्युतिः।
इक्ष्वाकूणामुपाध्यायो यथावत्तात पूज्यते।।2.100.9।।
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‘तात! क्या तुम सदा धर्म में तत्पर रहनेवाले, विद्वान्, ब्रह्मवेत्ता और इक्ष्वाकुकुल के आचार्य महातेजस्वी वसिष्ठजी की यथावत् पूजा करते हो?
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O dear child I trust, the family preceptor of the Ikshvakus, Vasistha, the brahmin (versed in the Vedas), who is learned, ever fixed in virtues and effulgent is being honoured as usual.
ShlokaShloka 10
सा तात कच्चित्कौसल्या सुमित्रा च प्रजावती।
सुखिनी कच्चिदार्या च देवी नन्दति कैकयी।।2.100.10।।
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‘भाई! क्या माता कौसल्या सुख से हैं? उत्तम संतानवाली सुमित्रा प्रसन्न हैं और आर्या कैकेयी देवी भी आनन्दित हैं?
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Dear child I trust, Kausalya and Sumitra, mothers of an excellent progeny are happy. I trust, the noble queen Kaikeyi is happy too.
ShlokaShloka 11
कच्चिद्विनयसम्पन्नः कुलपुत्रो बहुश्रुतः।
अनसूयुरनुद्रष्टा सत्कृतस्ते पुरोहितः।।2.100.11।।
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‘जो उत्तम कुल में उत्पन्न, विनयसम्पन्न, बहुश्रुत, किसी के दोष न देखने वाले तथा शास्त्रोक्त धर्मो पर निरन्तर दृष्टि रखने वाले हैं, उन पुरोहितजी का तुमने पूर्णतः सत्कार किया है ?
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I trust, you continue to honour the family priest (Suyajna, son of Vasistha) who is endowed with modesty, born of high family, conversant in scriptures, free from envy and who can give you directions with regard to your duties.
ShlokaShloka 12
कच्चिदग्निषु ते युक्तो विधिज्ञो मतिमानृजुः।
हुतं च होष्यमाणं च काले वेदयते सदा।।2.100.12।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘तात! क्या तुम देवताओं, पितरों, भृत्यों, गुरुजनों, पिता के समान आदरणीय वृद्धों, वैद्यों और ब्राह्मणों का सम्मान करते हो?
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I trust, the sagacious priest who knows ritual precepts, who is upright and is employed to take care of your sacred fires, informs you always regarding what was offered and what is to be offered as oblation at appropriate time.
ShlokaShloka 13
कच्चिद्देवान्पित्रून् मातृ़र्गुरून्पितृसमानपि।
वृद्धांश्च तात वैद्यांश्च ब्राह्मणांश्चाभिमन्यसे।।2.100.13।।
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‘तात! क्या तुम देवताओं, पितरों, भृत्यों, गुरुजनों, पिता के समान आदरणीय वृद्धों, वैद्यों और ब्राह्मणों का सम्मान करते हो?
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Dear brother, I trust you continue to pay homage to gods, father, mothers, teachers, relations equal to your father, aged people, physicians and brahmins.
ShlokaShloka 14
इष्वस्त्रवरसम्पन्नमर्थशास्त्र विशारदम्।
सुधन्वानमुपाध्यायं कच्चित्त्वं तात मन्यसे।।2.100.14।।
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‘भाई! जो मन्त्ररहित श्रेष्ठ बाणों के प्रयोग तथा मन्त्रसहित उत्तम अस्त्रों के प्रयोग के ज्ञान से सम्पन्न और अर्थशास्त्र (राजनीति) के अच्छे पण्डित हैं, उन आचार्य सुधन्वा का क्या तुम समादर करते हो?
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I hope you treat with respect Sudhanva who is equipped with the most formidable arrows and other weapons propelled by mantras and a master in the science of statecraft.
ShlokaShloka 15
कच्चिदात्मसमा श्शूरा श्श्रुतवन्तो जितेन्द्रियाः।
कुलीनाश्चेङ्गितज्ञाश्च कृतास्ते तात मन्त्रिणः।।2.100.15।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘तात! क्या तुमने अपने ही समान शूरवीर, शास्त्रज्ञ, जितेन्द्रिय, कुलीन तथा बाहरी चेष्टाओं से ही मन की बात समझ लेने वाले सुयोग्य व्यक्तियों को ही मन्त्री बनाया है ?
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I hope, dear brother, you have appointed men who are brave, learned, selfcontrolled, of noble birth and skilled in guessing from hints.
ShlokaShloka 16
मन्त्रो विजयमूलं हि राज्ञां भवति राघव।
सुसंवृतो मन्त्रधरैरमात्यै श्शास्त्रकोविदैः।।2.100.16।।
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‘रघुनन्दन! अच्छी मन्त्रणा ही राजाओं की विजय का मूल कारण है। वह भी तभी सफल होती है, जब नीति-शास्त्रनिपुण मन्त्रिशिरोमणि अमात्य उसे सर्वथा गुप्त रखें
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O Bharata the wellguarded advice of ministers, learned in scriptures and capable of proper counselling, is the root of victory for kings, specially when the advice is kept in confidence.
ShlokaShloka 17
कच्चिन्निद्रावशं नैषीः कच्चित् कालेऽवबुध्यसे।
कच्चिच्चापररात्रेषु चिन्तियस्यर्थनैपुणम्।।2.100.17।।
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‘भरत! तुम असमय में ही निद्रा के वशीभूत तो नहीं होते? समय पर जाग जाते हो न? रात के पिछले पहर में अर्थसिद्धि के उपायपर विचार करते हो न?
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I trust you are not under the grip of sleep but wake up at appropriate times, I hope you always think of the means of judicious statecraft during the last part of the night.
ShlokaShloka 18
कच्चिन्मन्त्रयसे नैकः कच्चिन्न बहुभिस्सह।
कच्चित्ते मन्त्रितो मन्त्रो राष्ट्रं न परिधावति।।2.100.18।।
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‘(कोई भी गुप्त मन्त्रणा दो से चार कानों तक ही गुप्त रहती है; छः कानों में जाते ही वह फूट जाती है,अतः मैं पूछता हूँ-) तुम किसी गूढ़ विषय पर अकेले ही तो विचार नहीं करते? अथवा बहुत लोगों के साथ बैठकर तो मन्त्रणा नहीं करते? कहीं ऐसा तो नहीं होता कि तुम्हारी निश्चित की हुई गुप्त मन्त्रणा फूटकर शत्रु के राज्य तक फैल जाती हो?
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I hope you neither decide alone nor discuss with many. I trust a decision once made by you is not leaked in the kingdom.
ShlokaShloka 19
कच्चिदर्थं विनिश्चित्य लघुमूलं महोदयम्।
क्षिप्रमारभसे कर्तुं न दीर्घयसि राघव।।2.100.19।।
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‘रघुनन्दन! जिसका साधन बहुत छोटा और फल बहुत बड़ा हो, ऐसे कार्य का निश्चय करने के बाद तुम उसे शीघ्र प्रारम्भ कर देते हो न? उसमें विलम्ब तो नहीं करते?
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O Bharata, having determined on an endeavour involving a little effort and yielding great results, I trust you commence to execute it quickly without procrastination?
ShlokaShloka 20
कच्चित्तु सुकृतान्येव कृतरूपाणि वा पुनः।
विदुस्ते सर्वकार्याणि न कर्तव्यानि पार्थिवाः।।2.100.20।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘तुम्हारे सब कार्य पूर्ण हो जानेपर अथवा पूरे होनेके समीप पहुँचनेपर ही दूसरे राजाओंको ज्ञात होते हैं न? कहीं ऐसा तो नहीं होता कि तुम्हारे भावी कार्यक्रमको वे पहले ही जान लेते हों?
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I trust, other kings come to know of your endeavours only when your endeavours suceed or about to succeed. I hope, efforts intended to be made in future are not revealed to them beforehand.
ShlokaShloka 21
कच्चिन्नतर्कैर्युक्त्या वा ये चाप्यपरिकीर्तिताः।
त्वया वा तवामात्यैर्बुध्यते तात मन्त्रितम्।।2.100.21।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘तात! तुम्हारे निश्चित किये हुए विचारों को तुम्हारे या मन्त्रियों के प्रकट न करने पर भी दूसरे लोग तर्क और युक्तियों के द्वारा जान तो नहीं लेते हैं? (तथा तुमको और तुम्हारे अमात्यों को दूसरों के गुप्त विचारों का पता लगता रहता है न?)
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Dear brother, I hope others are not able to understand your determination or those of your ministers, either by conjecture or by inference or through other means without being revealed either by you or by your ministers.
ShlokaShloka 22
कच्चित्सहस्रान्मूर्खाणामेकमिच्छसि पण्डितम्।
पण्डितो ह्यर्थकृच्छ्रेषु कुर्यान्निश्रेयसं महत्।।2.100.22।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘क्या तुम सहस्रों मूल् के बदले एक पण्डित को ही अपने पास रखने की इच्छा रखते हो? क्योंकि विद्वान् पुरुष ही अर्थसंकट के समय महान् कल्याण कर सकता है
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I hope by setting aside a thousand fools, you prefer a single wise man. A wise man will be of immense help in difficult situations.
ShlokaShloka 23
सहस्राण्यपि मूर्खाणां युद्युपास्ते महीपतिः।
अथवाप्ययुतान्येव नास्ति तेषु सहायता।।2.100.23।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘यदि राजा हजार या दस हजार मूल् को अपने पास रख ले तो भी उनसे अवसर पर कोई अच्छी सहायता नहीं मिलती
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Even if the king seeks the assistance from thousands or tens of thousands of fools, they cannot render any help to him.
ShlokaShloka 24
एकोऽप्यमात्यो मेधावी शूरो दक्षो विचक्षणः।
राजानं राजपुत्रं वा प्रापयेन्महतीं श्रियम्।।2.100.24।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘यदि एक मन्त्री भी मेधावी, शूर-वीर, चतुर एवं नीतिज्ञ हो तो वह राजा या राजकुमार को बहुत बड़ी सम्पत्ति की प्राप्ति करा सकता है
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A single clearsighted minister who is prudent, brave and skilful can bring about great prosperity to a king or a prince.
ShlokaShloka 25
कच्चिन्मुख्या महात्स्वेव मध्यमेषु च मध्यमाः।
जघन्याश्च जघन��येषु भृत्याः कर्मसु योजिताः।।2.100.25।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘तात! तुमने प्रधान व्यक्तियों को प्रधान, मध्यम श्रेणी के मनुष्यों को मध्यम और छोटी श्रेणी के लोगों को छोटे ही कामों में नियुक्त किया है न?
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I hope you have employed highly competent servants for important tasks, mediocre servants in mediocre tasks and low people in inferior tasks.
ShlokaShloka 26
अमात्यानुपधातीतान्पितृपैतामहाञ्छुचीन्।
श्रेष्ठांछ्रेष्ठेषुकच्चित्वं नियोजयसि कर्मसु।।2.100.26।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘जो घूस न लेते हों अथवा निश्छल हों, बापदादों के समय से ही काम करते आ रहे हों तथा बाहर-भीतर से पवित्र एवं श्रेष्ठ हों, ऐसे अमात्यों को ही तुम उत्तम कार्यों में नियुक्त करते हो न?
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I hope you are assigning ministers, who are unyielding to bribery and other temptations, holding positions hereditarily and who are full of integrity and eminence, with superior tasks.
ShlokaShloka 27
कच्चिन्नोग्रेण दण्डेन भृशमुद्वेजितप्रजम्।
राष्ट्रं तवानुजानन्ति मन्त्रिणः कैकयीसुत।।2.100.27।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘कैकेयीकुमार! तुम्हारे राज्य की प्रजा कठोर दण्ड से अत्यन्त उद्विग्न होकर तुम्हारे मन्त्रियों का तिरस्कार तो नहीं करती?
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Are not the citizens of your kingdom agitated at severe punishment meted out to them reproaching your ministers?
ShlokaShloka 28
कच्चित्त्वां नावजानन्ति याजकाः पतितं यथा।
उग्रप्रतिग्रहीतारं कामयानमिव स्त्रियः।।2.100.28।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘जैसे पवित्र याजक पतित यजमान का तथा स्त्रियाँ कामचारी पुरुष का तिरस्कार कर देती हैं, उसी प्रकार प्रजा कठोरता पूर्वक अधिक कर लेने के कारण तुम्हारा अनादर तो नहीं करती?
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Just like a performer of sacrifice scorns at an outcaste or a woman scorns at a lustful lover, do the subjects not scorn you for collecting taxes more than what is due?
ShlokaShloka 29
उपायकुशलं वैद्यं भृत्यसंदूषणे रतम्।
शूरमैश्वर्यकामं च यो न हन्ति स हन्यते।।2.100.29।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘जो साम-दाम आदि उपायों के प्रयोग में कुशल, राजनीतिशास्त्र का विद्वान्, विश्वासी भृत्यों को फोड़ने में लगा हुआ, शूर (मरने से न डरने वाला) तथा राजा के राज्य को हड़प लेने की इच्छा रखने वाला है—ऐसे पुरुष को जो राजा नहीं मार डालता है, वह स्वयं उसके हाथ से मारा जाता है
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A learned person but skilled in contrivances, a warrior with passion for wealth and a man ever engaged in corrupting the minds of servants must be slain. A king who does not kill them is himself killed in due course.
ShlokaShloka 30
कच्चिद्धृष्टश्च शूरश्च मतिमान् धृतिमान् शुचिः।
कुलीनश्चानुरक्तश्च दक्षस्सेनापतिः कृतः।।2.100.30।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘क्या तुमने सदा संतुष्ट रहने वाले, शूरवीर, धैर्यवान्, बुद्धिमान्, पवित्र, कुलीन एवं अपने में अनुराग रखने वाले, रणकर्मदक्ष पुरुष को ही सेनापति बनाया है?
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I trust you have appointed a man who is cheerful, brave, sagacious, steadfast, honest, of a good family, loyal and efficient as the army chief.
ShlokaShloka 31
बलवन्तश्च कच्चित्ते मुख्या युध्दविशारदाः।
दृष्टापदाना विक्रान्तास्त्वया सत्कृत्यमानिताः।।2.100.31।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘तुम्हारे प्रधान-प्रधान योद्धा (सेनापति) बलवान्, युद्धकुशल और पराक्रमी तो हैं न? क्या तुमने उनके शौर्य की परीक्षा कर ली है? तथा क्या वे तुम्हारे द्वारा सत्कारपूर्वक सम्मान पाते रहते हैं ?
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I trust you honour and respect those prominent soldiers who are courageous, powerful, skilled in war and who have proven heroic exploits.
ShlokaShloka 32
कच्चिद्बलस्य भक्तं च वेतनं च यथोचितम्।
सम्प्राप्तकालं दातव्यं ददासि न विलम्बसे।।2.100.32।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘सैनिकों को देने के लिये नियत किया हुआ समुचित वेतन और भत्ता तुम समय पर दे देते हो न? देने में विलम्ब तो नहीं करते?
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I trust you distribute rations and wages to your army in due time without making delay.
ShlokaShloka 33
कालातिक्रमणाच्चैव भक्तवेतनयोर्भृताः।
भर्तुः कुप्यन्ति दुष्यन्ति सोऽनर्थ स्सुमहान् स्मृतः।।2.100.33।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘क्या उत्तम कुल में उत्पन्न मन्त्री आदि समस्त प्रधान अधिकारी तुमसे प्रेम रखते हैं? क्या वे तुम्हारे लिये एकचित्त होकर अपने प्राणों का त्याग करने के लिये उद्यत रहते हैं?
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It has been mentioned in the scriptures that if provisions and wages are not paid in stipulated time, the dependent attendants will be incensed with their masters and will turn hostile and become corrupt, leading to great calamity.
ShlokaShloka 34
कच्चित्सर्वेऽनुरक्तास्त्वां कुलपुत्राः प्रधानतः।
कच्चित्प्राणां स्तवार्थेषु सन्त्यजन्ति समाहिताः।।2.100.34।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘क्या उत्तम कुल में उत्पन्न मन्त्री आदि समस्त प्रधान अधिकारी तुमसे प्रेम रखते हैं? क्या वे तुम्हारे लिये एकचित्त होकर अपने प्राणों का त्याग करने के लिये उद्यत रहते हैं?
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I hope all men of a good family, especially those who belong to our race, are loyal to you and are ready to sacrifice their lives for your cause.
ShlokaShloka 35
कच्चिज्जानपदो विद्वान्दक्षिणः प्रतिभानवान्।
यथोक्तवादी दूतस्ते कृतो भरत पण्डितः।।2.100.35।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘भरत! तुमने जिसे राजदूत के पद पर नियुक्त किया है, वह पुरुष अपने ही देश का निवासी, विद्वान्, कुशल, प्रतिभाशाली और जैसा कहा जाय, वैसी ही बात दूसरे के सामने कहने वाला और सदसद्विवेकयुक्त है न?
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O Bharata, I hope you have chosen as your envoy an expert born in your own country, wellinformed, skilful and quick to understand one who repeats and reports (exactly) what has been told.
ShlokaShloka 36
कच्चिदष्टादशान्येषु स्वपक्षे दश पञ्च च।
त्रिभिस्त्रिभिरविज्ञातैर्वेत्सि तीर्थानि चारकैः।।2.100.36।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘शत्रुसूदन ! जिन शत्रुओं को तुमने राज्य से निकाल दिया है, वे यदि फिर लौटकर आते हैं तो तुम उन्हें दुर्बल समझकर उनकी उपेक्षा तो नहीं करते?
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I hope you collect information (of their secret efforts) intelligently through unrecognisable spies with three of them closely watching each of the eighteen officials (there are eighteen categories of officials in a kingdom) of the enemy's side and fifteen (officials) on your side.
ShlokaShloka 37
कच्चिद्व्यपास्तानहितान्प्रतियातांश्च सर्वदा।
दुर्बलाननवज्ञाय वर्तसे रिपुसूदन।।2.100.37।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘शत्रुसूदन ! जिन शत्रुओं को तुमने राज्य से निकाल दिया है, वे यदि फिर लौटकर आते हैं तो तुम उन्हें दुर्बल समझकर उनकी उपेक्षा तो नहीं करते?
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O slayer of foes, I hope you are always alert about your foes who were defeated by you and have come back. You should not ignore your enemies thinking they are weak.
ShlokaShloka 38
कच्चिन्न लौकायतिकान्ब्राह्मणांस्तात सेवसे।।
अनर्थकुशला ह्येते बालाः पण्डितमानिनः।।2.100.38।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘तात ! तुम कभी नास्तिक ब्राह्मणों का संग तो नहीं करते हो? क्योंकि वे बुद्धि को परमार्थ की ओर से विचलित करने में कुशल होते हैं तथा वास्तव में अज्ञानी होते हुए भी अपने को बहुत बड़ा पण्डित मानते हैं
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Dear brother, I hope you do not serve those brahmins who are atheists, who foolishly think of this world alone and fancy themselves as learned. They only bring disasters.
ShlokaShloka 39
धर्मशास्त्रेषु मुख्येषु विद्यमानेषु दुर्बुधाः।
बुद्धिमान्वीक्षिकीं प्राप्य निरर्थं प्रवदन्ति ते।।2.100.39।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘उनका ज्ञान वेद के विरुद्ध होने के कारण दूषित होता है और वे प्रमाणभूत प्रधान-प्रधान धर्मशास्त्रों के होते हुए भी तार्किक बुद्धि का आश्रय लेकर व्यर्थ बकवाद किया करते हैं
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While principal scriptures do exist, these superficial fellows take resort to the science of logic based on abstract reasoning, and indulge in futile talks.
ShlokaShloka 40
वीरैरध्युषितां पूर्वमस्माकं तात पूर्वकैः।
सत्यनामां दृढ द्वारां हस्त्यश्वरथसङ्कुलाम्।।2.100.40।।
ब्राह्मणैः क्षत्रियैर्वैश्यै स्स्वकर्मनिरतैस्सदा।
जितेन्द्रियैर्महोत्साहैर्वृतामार्यै स्सहस्रशः।।2.100.41।।
प्रासादैर्विविधाकारैर्वृतां वैद्यजनाकुलाम्।
कच्चित्सुमुदितां स्फीतामयोध्यां परिरक्षसि।।2.100.42।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘तात! अयोध्या वेद में अयोध्या को ईश्वर का नगर बताया गया है, "अष्टचक्रा नवद्वारा देवानां पूरयोध्या"और इसकी संपन्नता की तुलना स्वर्ग से की गई है। रामायण के अनुसार अयोध्या की स्थापना मनु ने की थी। यह पुरी सरयू के तट पर बारह योजन (लगभग १४४ कि.मी) लम्बाई अाैर तीन योजन (लगभग ३६ कि.मी.) चौड़ाई में बसी थी । कई शताब्दी तक यह नगर सूर्यवंशी राजाओं की राजधानी रहा। अयोध्या मूल रूप से मंदिरों का शहर है। " href="https://www.ramcharit.in/glossary/%e0%a4%85%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%a7%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be/" data-gt-translate-attributes='[{"attribute":"data-cmtooltip", "format":"html"}]' tabindex='0' role='link'>अयोध्या हमारे वीर पूर्वजों की निवास भूमि है; उसका जैसा नाम है, वैसा ही गुण है। उसके दरवाजे सब ओर से सुदृढ़ हैं। वह हाथी, घोड़े और रथों से परिपूर्ण है। अपने-अपने कर्मों में लगे हुए ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य सहस्रों की संख्या में वहाँ सदा निवास करते हैं। वे सब-के-सब महान् उत्साही, जितेन्द्रिय और श्रेष्ठ हैं। नाना प्रकार के राजभवन और मन्दिर उसकी शोभा बढ़ाते हैं। वह नगरी बहुसंख्यक विद्वानों से भरी है। ऐसी अभ्युदयशील और समृद्धिशालिनी नगरी अयोध्या वेद में अयोध्या को ईश्वर का नगर बताया गया है, "अष्टचक्रा नवद्वारा देवानां पूरयोध्या"और इसकी संपन्नता की तुलना स्वर्ग से की गई है। रामायण के अनुसार अयोध्या की स्थापना मनु ने की थी। यह पुरी सरयू के तट पर बारह योजन (लगभग १४४ कि.मी) लम्बाई अाैर तीन योजन (लगभग ३६ कि.मी.) चौड़ाई में बसी थी । कई शताब्दी तक यह नगर सूर्यवंशी राजाओं की राजधानी रहा। अयोध्या मूल रूप से मंदिरों का शहर है। " href="https://www.ramcharit.in/glossary/%e0%a4%85%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%a7%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be/" data-gt-translate-attributes='[{"attribute":"data-cmtooltip", "format":"html"}]' tabindex='0' role='link'>अयोध्या की तुम भलीभाँति रक्षा तो करते हो न?
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My dear brother I trust you are protecting the (impregnable) city of Ayodhya worthy of its name, formerly defended by our heroic ancestors, with its sturdy gates, its elephants, horses and chariots, its thousands of venerable, selfcontrolled and highly energetic brahmins, kshatriyas and vaisyas engaged in their respective professions, filled with palaces of various kinds, abounding in learned people and a prosperous city where everything is available in abundance.
ShlokaShloka 41
कच्चिच्चैत्यशतैर्जुष्ट स्सुनिविष्टजनाकुलः।
देवस्थानैः प्रपाभिश्च तटाकैश्चोपशोभितः।।2.100.43।।
प्रहृष्टनरनारीकस्समाजोत्सवशोभितः।
सुकृष्टसीमा पशुमान्हिंसाभिः परिवर्जितः।।2.100.44।।
अदेवमातृको रम्य श्श्वापदैः परिवर्जितः।
परित्यक्तो भयैस्सर्वैः खनिभिश्चोपशोभितः।।2.100.45।।
विवर्जितो नरैः पापैर्मम पूर्वै स्सुरक्षितः।
कच्चिज्जनपदस्स्फीतः सुखं वसति राघव।।2.100.46।।
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‘तात! अयोध्या वेद में अयोध्या को ईश्वर का नगर बताया गया है, "अष्टचक्रा नवद्वारा देवानां पूरयोध्या"और इसकी संपन्नता की तुलना स्वर्ग से की गई है। रामायण के अनुसार अयोध्या की स्थापना मनु ने की थी। यह पुरी सरयू के तट पर बारह योजन (लगभग १४४ कि.मी) लम्बाई अाैर तीन योजन (लगभग ३६ कि.मी.) चौड़ाई में बसी थी । कई शताब्दी तक यह नगर सूर्यवंशी राजाओं की राजधानी रहा। अयोध्या मूल रूप से मंदिरों का शहर है। " href="https://www.ramcharit.in/glossary/%e0%a4%85%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%a7%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be/" data-gt-translate-attributes='[{"attribute":"data-cmtooltip", "format":"html"}]' tabindex='0' role='link'>अयोध्या हमारे वीर पूर्वजों की निवास भूमि है; उसका जैसा नाम है, वैसा ही गुण है। उसके दरवाजे सब ओर से सुदृढ़ हैं। वह हाथी, घोड़े और रथों से परिपूर्ण है। अपने-अपने कर्मों में लगे हुए ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य सहस्रों की संख्या में वहाँ सदा निवास करते हैं। वे सब-के-सब महान् उत्साही, जितेन्द्रिय और श्रेष्ठ हैं। नाना प्रकार के राजभवन और मन्दिर उसकी शोभा बढ़ाते हैं। वह नगरी बहुसंख्यक विद्वानों से भरी है। ऐसी अभ्युदयशील और समृद्धिशालिनी नगरी अयोध्या वेद में अयोध्या को ईश्वर का नगर बताया गया है, "अष्टचक्रा नवद्वारा देवानां पूरयोध्या"और इसकी संपन्नता की तुलना स्वर्ग से की गई है। रामायण के अनुसार अयोध्या की स्थापना मनु ने की थी। यह पुरी सरयू के तट पर बारह योजन (लगभग १४४ कि.मी) लम्बाई अाैर तीन योजन (लगभग ३६ कि.मी.) चौड़ाई में बसी थी । कई शताब्दी तक यह नगर सूर्यवंशी राजाओं की राजधानी रहा। अयोध्या मूल रूप से मंदिरों का शहर है। " href="https://www.ramcharit.in/glossary/%e0%a4%85%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%a7%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be/" data-gt-translate-attributes='[{"attribute":"data-cmtooltip", "format":"html"}]' tabindex='0' role='link'>अयोध्या की तुम भलीभाँति रक्षा तो करते हो न?
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O Bharata, my country which is marked with hundreds of sanctuaries near villages where life of the people is made comfortable, where there are shrines, water distribution facilities and tanks, which is wellploughed and rich in cattlewealth, free from violence and independent of rain. It is enchanting. It is safe from wild animals. With fears expelled, free from sinful people, adorned with mines and wellprotected by my ancestors, it is prosperous and I hope people are living comfortably.
ShlokaShloka 42
कच्चित्ते दयितास्सर्वे कृषिगोरक्षजीविनः।
वार्तायां संश्रितस्तात लोको हि सुखमेधते।।2.100.47।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘तात! अयोध्या वेद में अयोध्या को ईश्वर का नगर बताया गया है, "अष्टचक्रा नवद्वारा देवानां पूरयोध्या"और इसकी संपन्नता की तुलना स्वर्ग से की गई है। रामायण के अनुसार अयोध्या की स्थापना मनु ने की थी। यह पुरी सरयू के तट पर बारह योजन (लगभग १४४ कि.मी) लम्बाई अाैर तीन योजन (लगभग ३६ कि.मी.) चौड़ाई में बसी थी । कई शताब्दी तक यह नगर सूर्यवंशी राजाओं की राजधानी रहा। अयोध्या मूल रूप से मंदिरों का शहर है। " href="https://www.ramcharit.in/glossary/%e0%a4%85%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%a7%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be/" data-gt-translate-attributes='[{"attribute":"data-cmtooltip", "format":"html"}]' tabindex='0' role='link'>अयोध्या हमारे वीर पूर्वजों की निवास भूमि है; उसका जैसा नाम है, वैसा ही गुण है। उसके दरवाजे सब ओर से सुदृढ़ हैं। वह हाथी, घोड़े और रथों से परिपूर्ण है। अपने-अपने कर्मों में लगे हुए ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य सहस्रों की संख्या में वहाँ सदा निवास करते हैं। वे सब-के-सब महान् उत्साही, जितेन्द्रिय और श्रेष्ठ हैं। नाना प्रकार के राजभवन और मन्दिर उसकी शोभा बढ़ाते हैं। वह नगरी बहुसंख्यक विद्वानों से भरी है। ऐसी अभ्युदयशील और समृद्धिशालिनी नगरी अयोध्या वेद में अयोध्या को ईश्वर का नगर बताया गया है, "अष्टचक्रा नवद्वारा देवानां पूरयोध्या"और इसकी संपन्नता की तुलना स्वर्ग से की गई है। रामायण के अनुसार अयोध्या की स्थापना मनु ने की थी। यह पुरी सरयू के तट पर बारह योजन (लगभग १४४ कि.मी) लम्बाई अाैर तीन योजन (लगभग ३६ कि.मी.) चौड़ाई में बसी थी । कई शताब्दी तक यह नगर सूर्यवंशी राजाओं की राजधानी रहा। अयोध्या मूल रूप से मंदिरों का शहर है। " href="https://www.ramcharit.in/glossary/%e0%a4%85%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%a7%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be/" data-gt-translate-attributes='[{"attribute":"data-cmtooltip", "format":"html"}]' tabindex='0' role='link'>अयोध्या की तुम भलीभाँति रक्षा तो करते हो न?
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I trust all those men who live on agriculture and cattlerearing are favourable to you. The world's prosperity, dear brother, grows on the profession of cattle rearing.
ShlokaShloka 43
तेषां गुप्तिपरीहारैः कच्चित्ते भरणं कृतम्।
रक्ष्या हि राज्ञा धर्मेण सर्वे विषयवासिनः।।2.100.48।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘रघुनन्दन भरत! जहाँ नाना प्रकार के अश्वमेध आदि महायज्ञों के बहुत-से चयन-प्रदेश (अनुष्ठानस्थल) शोभा पाते हैं, जिसमें प्रतिष्ठित मनुष्य अधिक संख्या में निवास करते हैं, अनेकानेक देवस्थान, पौंसले और तालाब जिसकी शोभा बढ़ाते हैं, जहाँ के स्त्री-पुरुष सदा प्रसन्न रहते हैं, जो सामाजिक उत्सवों के कारण सदा शोभासम्पन्न दिखायी देता है, जहाँ खेत जोतने में समर्थ पशुओं की अधिकता है, जहाँ किसी प्रकार की हिंसा नहीं होती, जहाँ खेती के लिये वर्षा के जल पर निर्भर नहीं रहना पड़ता (नदियों के जल से ही सिंचाई हो जाती है), जो बहुत ही सुन्दर और हिंसक पशुओं से रहित है, जहाँ किसी तरह का भय नहीं है, नाना प्रकार की खाने जिसकी शोभा बढ़ाती हैं, जहाँ पापी मनुष्यों का सर्वथा अभाव है तथा हमारे पूर्वजों ने जिसकी भलीभाँति रक्षा की है, वह अपना कोसल देश धन-धान्य से सम्पन्न और सुखपूर्वक बसा हुआ है न?
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I trust you nourish them and also afford portection and prevent adversities. A king must protect all those people living in his country in accordanc with righteousness.
ShlokaShloka 44
कच्चिस्त्रिय स्सान्त्वयसि कच्चित्ताश्च सुरक्षिताः।
कच्चिन्न श्रद्धास्यासां कच्चिद्गुह्यं न भाषसे।।2.100.49।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘रघुनन्दन भरत! जहाँ नाना प्रकार के अश्वमेध आदि महायज्ञों के बहुत-से चयन-प्रदेश (अनुष्ठानस्थल) शोभा पाते हैं, जिसमें प्रतिष्ठित मनुष्य अधिक संख्या में निवास करते हैं, अनेकानेक देवस्थान, पौंसले और तालाब जिसकी शोभा बढ़ाते हैं, जहाँ के स्त्री-पुरुष सदा प्रसन्न रहते हैं, जो सामाजिक उत्सवों के कारण सदा शोभासम्पन्न दिखायी देता है, जहाँ खेत जोतने में समर्थ पशुओं की अधिकता है, जहाँ किसी प्रकार की हिंसा नहीं होती, जहाँ खेती के लिये वर्षा के जल पर निर्भर नहीं रहना पड़ता (नदियों के जल से ही सिंचाई हो जाती है), जो बहुत ही सुन्दर और हिंसक पशुओं से रहित है, जहाँ किसी तरह का भय नहीं है, नाना प्रकार की खाने जिसकी शोभा बढ़ाती हैं, जहाँ पापी मनुष्यों का सर्वथा अभाव है तथा हमारे पूर्वजों ने जिसकी भलीभाँति रक्षा की है, वह अपना कोसल देश धन-धान्य से सम्पन्न और सुखपूर्वक बसा हुआ है न?
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I trust, you keep the women pacified and wellprotected, you do not believe their words and do not divulge any secrets to them.
ShlokaShloka 45
कच्चिन्नागवनं गुप्तं कच्चित्ते सन्ति धेनुकाः।
कच्चिन्न गणिकाश्वानां कुञ्जराणां च तृप्य���ि।।2.100.50।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘रघुनन्दन भरत! जहाँ नाना प्रकार के अश्वमेध आदि महायज्ञों के बहुत-से चयन-प्रदेश (अनुष्ठानस्थल) शोभा पाते हैं, जिसमें प्रतिष्ठित मनुष्य अधिक संख्या में निवास करते हैं, अनेकानेक देवस्थान, पौंसले और तालाब जिसकी शोभा बढ़ाते हैं, जहाँ के स्त्री-पुरुष सदा प्रसन्न रहते हैं, जो सामाजिक उत्सवों के कारण सदा शोभासम्पन्न दिखायी देता है, जहाँ खेत जोतने में समर्थ पशुओं की अधिकता है, जहाँ किसी प्रकार की हिंसा नहीं होती, जहाँ खेती के लिये वर्षा के जल पर निर्भर नहीं रहना पड़ता (नदियों के जल से ही सिंचाई हो जाती है), जो बहुत ही सुन्दर और हिंसक पशुओं से रहित है, जहाँ किसी तरह का भय नहीं है, नाना प्रकार की खाने जिसकी शोभा बढ़ाती हैं, जहाँ पापी मनुष्यों का सर्वथा अभाव है तथा हमारे पूर्वजों ने जिसकी भलीभाँति रक्षा की है, वह अपना कोसल देश धन-धान्य से सम्पन्न और सुखपूर्वक बसा हुआ है न?
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I trust, you protect the habitat of elephants and you have a large number of milch cows. I trust you are not contented with the existing number of female and male elephants and horses.
ShlokaShloka 46
कच्चिद्दर्शयसे नित्यं मनुष्याणां विभूषितम्।
उत्थायोत्थाय पूर्वाह्णे राजपुत्र महापथे।।2.100.51।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘रघुनन्दन भरत! जहाँ नाना प्रकार के अश्वमेध आदि महायज्ञों के बहुत-से चयन-प्रदेश (अनुष्ठानस्थल) शोभा पाते हैं, जिसमें प्रतिष्ठित मनुष्य अधिक संख्या में निवास करते हैं, अनेकानेक देवस्थान, पौंसले और तालाब जिसकी शोभा बढ़ाते हैं, जहाँ के स्त्री-पुरुष सदा प्रसन्न रहते हैं, जो सामाजिक उत्सवों के कारण सदा शोभासम्पन्न दिखायी देता है, जहाँ खेत जोतने में समर्थ पशुओं की अधिकता है, जहाँ किसी प्रकार की हिंसा नहीं होती, जहाँ खेती के लिये वर्षा के जल पर निर्भर नहीं रहना पड़ता (नदियों के जल से ही सिंचाई हो जाती है), जो बहुत ही सुन्दर और हिंसक पशुओं से रहित है, जहाँ किसी तरह का भय नहीं है, नाना प्रकार की खाने जिसकी शोभा बढ़ाती हैं, जहाँ पापी मनुष्यों का सर्वथा अभाव है तथा हमारे पूर्वजों ने जिसकी भलीभाँति रक्षा की है, वह अपना कोसल देश धन-धान्य से सम्पन्न और सुखपूर्वक बसा हुआ है न?
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O prince, I trust, you rise early daily and present yourself welladomed to the people on the thoroughfare.
ShlokaShloka 47
कच्चिन्न सर्वे कर्मान्ताः प्रत्यक्षास्तेऽविशङ्कया।
सर्वे वा पुनरुत्सृष्टा मध्यमेवात्र कारणम्।।2.100.52।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘उन वैश्यों को इष्ट की प्राप्ति कराकर और उनके अनिष्ट का निवारण करके तुम उन सब लोगों का भरण-पोषण तो करते हो न? क्योंकि राजा को अपने राज्य में निवास करने वाले सब लोगों का धर्मानुसार पालन करना चाहिये
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All the servants, I trust, do not present themselves to you directly. At the same time they do not remain out of sight with fear at a distance. The middle course is the best way for the welfare of every one.
ShlokaShloka 48
कच्चित्सर्वाणि दुर्गाणि धनधान्यायुधोदकैः।
यन्त्रैश्च परिपूर्णानि तथा शिल्पिधनुर्धरैः।।2.100.53।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘उन वैश्यों को इष्ट की प्राप्ति कराकर और उनके अनिष्ट का निवारण करके तुम उन सब लोगों का भरण-पोषण तो करते हो न? क्योंकि राजा को अपने राज्य में निवास करने वाले सब लोगों का धर्मानुसार पालन करना चाहिये
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Hope all the forts are adequately provided with wealth, foodgrains, weapons and water, with machines of war and craftsmen and archers.
ShlokaShloka 49
आयस्ते विपुलः कच्चित्कच्चिदल्पतरो व्ययः।
अपात्रेषु न ते कच्चित्कोशो गच्छति राघव।।2.100.54।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘जहाँ हाथी उत्पन्न होते हैं, वे जंगल तुम्हारे द्वारा सुरक्षित हैं न? तुम्हारे पास दूध देने वाली गौएँ तो अधिक संख्या में हैं न? (अथवा हाथियों को फँसाने वाली हथिनियों की तो तुम्हारे पास कमी नहीं है?) तुम्हें हथिनियों, घोड़ों और हाथियों के संग्रह से कभी तृप्ति तो नहीं होती?
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O Bharata, I trust, your revenues are abundant and expenditure much less. I trust you do not give away your treasure to undeserving persons.
ShlokaShloka 50
देवतार्थे च पित्रर्थेब्राह्मणाभ्यागतेषु च।
योधेषु मित्रवर्गेषु कच्चिद्गच्छति ते व्ययः।।2.100.55।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘जहाँ हाथी उत्पन्न होते हैं, वे जंगल तुम्हारे द्वारा सुरक्षित हैं न? तुम्हारे पास दूध देने वाली गौएँ तो अधिक संख्या में हैं न? (अथवा हाथियों को फँसाने वाली हथिनियों की तो तुम्हारे पास कमी नहीं है?) तुम्हें हथिनियों, घोड़ों और हाथियों के संग्रह से कभी तृप्ति तो नहीं होती?
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I trust, you are spending only on gods, ancestors, brahmins, guests, warriors and hosts of friends.
ShlokaShloka 51
कच्चिदार्यो विशुद्धात्मा क्षारित श्चापरकर्मणा।
अपृष्ट श्शास्त्रकुशलैर्न लोभाद्वध्यते शुचिः।।2.100.56।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘राजकुमार! क्या तुम प्रतिदिन पूर्वाह्नकाल में वस्त्राभूषणों से विभूषित हो प्रधान सड़क पर जा-जाकर नगरवासी मनुष्यों को दर्शन देते हो?
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I trust a man who is honest, purehearted and venerable, falsely accused of adultery is not slain out of avarice without consulting experts in scriptures.
ShlokaShloka 52
गृहीतश्चैव पृष्टश्च काले दृष्टस्सकारणः।
कच्चिन्न मुच्यते चोरो धनलोभान्नरर्षभ।।2.100.57।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘काम-काज में लगे हुए सभी मनुष्य निडर होकर तुम्हारे सामने तो नहीं आते? अथवा वे सब सदा तुमसे दूर तो नहीं रहते? क्योंकि कर्मचारियों के विषय में मध्यम स्थिति का अवलम्बन करना ही अर्थसिद्धि का कारण होता है
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O best among men I trust that a thief, caught redhanded and interrogated and has sufficient proof is not set free, out of greed for money.
ShlokaShloka 53
व्यसने कच्चिदाढ्यस्य दुर्गतस्य च राघव।
अर्थं विरागाः पश्यन्ति तवामात्या बहुश्रुताः।।2.100.58।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘क्या तुम्हारे सभी दुर्ग (किले) धन-धान्य, अस्त्रशस्त्र, जल, यन्त्र (मशीन), शिल्पी तथा धनुर्धर सैनिकोंसे भरे-पूरे रहते हैं?
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O Bharata, I trust that your ministers are wellinformed and look into all matters in times of hardship pertaining to whether a man is rich or poor without any bias to either.
ShlokaShloka 54
यानि मिथ्याभिशस्तानां पतन्त्यश्रूणि राघव।
तानि पुत्रान्पशून्घ्नन्ति प्रीत्यर्थमनुशासतः।।2.100.59।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘रघुनन्दन ! क्या तुम्हारी आय अधिक और व्यय बहुत कम है? तुम्हारे खजाने का धन अपात्रों के हाथ में तो नहीं चला जाता?
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O Bharata, the tears falling from the eyes of persons, who are falsely accused and punished for the pleasure of the king will destroy his progeny and cattle as well.
ShlokaShloka 55
कच्चिद्वृद्धांश्च बालांश्च वैद्यामुख्यांश्च राघव।
दानेन मनसा वाचा त्रिभिरेतैर्बुभूषसे।।2.100.60।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘नरश्रेष्ठ ! जो चोरी में पकड़ा गया हो, जिसे किसी ने चोरी करते समय देखा हो, पूछताछ से भी जिसके चोर होने का प्रमाण मिल गया हो तथा जिसके विरुद्ध (चोरी का माल बरामद होना आदि) और भी बहुत से कारण (सबूत) हों, ऐसे चोर को भी तुम्हारे राज्य में धन के लालच से छोड़ तो नहीं दिया जाता है?
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O Bharata, I trust you wish to thrive by treating the old, children and foremost of learned people with the three expedients namely gifts, affection and kind words.
ShlokaShloka 56
कच्चिद्गुरूंश्च वृद्धांश्च तापसान् देवतातिथीन्।
चैत्यांश्च सर्वान्सिध्दार्थान्ब्राह्मणांश्च नमस्यसि।।2.100.61।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘नरश्रेष्ठ ! जो चोरी में पकड़ा गया हो, जिसे किसी ने चोरी करते समय देखा हो, पूछताछ से भी जिसके चोर होने का प्रमाण मिल गया हो तथा जिसके विरुद्ध (चोरी का माल बरामद होना आदि) और भी बहुत से कारण (सबूत) हों, ऐसे चोर को भी तुम्हारे राज्य में धन के लालच से छोड़ तो नहीं दिया जाता है?
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I trust you pay homage to the preceptors, the aged ones, ascetics, gods and guests, to shrines and to accomplished brahmins.
ShlokaShloka 57
कच्चिदर्थेन वा धर्ममर्थं धर्मेण वा पुनः।
उभौ वा प्रीतिलोभेन कामेन च न बाधसे।।2.100.62।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘नरश्रेष्ठ ! जो चोरी में पकड़ा गया हो, जिसे किसी ने चोरी करते समय देखा हो, पूछताछ से भी जिसके चोर होने का प्रमाण मिल गया हो तथा जिसके विरुद्ध (चोरी का माल बरामद होना आदि) और भी बहुत से कारण (सबूत) हों, ऐसे चोर को भी तुम्हारे राज्य में धन के लालच से छोड़ तो नहीं दिया जाता है?
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I trust, righteousness for the sake of prosperity or prosperity for the sake of righteousness or both for the sake of sensual pleasure are not thwarted by you.
ShlokaShloka 58
कच्चिदर्थं च धर्मं च कामं च जयतां वर।
विभज्य काले कालज्ञ सर्वान्वरद सेवसे।।2.100.63।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘रघुकुलभूषण! यदि धनी और गरीब में कोई विवाद छिड़ा हो और वह राज्य के न्यायालय में निर्णय के लिये आया हो तो तुम्हारे बहुज्ञ मन्त्री धन आदि के लोभ को छोड़कर उस मामले पर विचार करते हैं न?
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O Bharata, the best among the victorious, conversant with timely actions and a bestower of boons you are the best of men. I trust, you allocate adequate time for attending to all the three expedients of life like dharma, artha and kama.
ShlokaShloka 59
कच्चित्ते ब्राह्मणा श्शर्म सर्वशास्त्रार्थकोविदाः।
आशंसन्ते महाप्राज्ञ पौरजानपदैस्सह।।2.100.64।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘गुरुजनों, वृद्धों, तपस्वियों, देवताओं, अतिथियों, चैत्य वृक्षों और समस्त पूर्णकाम ब्राह्मणों को नमस्कार करते हो न?
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O highly sagacious Bharata, those brahmins who can comprehend the meaning of all scriptures along with the inhabitants of the city and country, I trust, are seeking your happiness.
ShlokaShloka 60
नास्तिक्यमनृतं क्रोधं प्रमादं दीर्घसूत्रताम्।
अदर्शनं ज्ञानवतामालस्यं पञ्चवृत्तिताम्।।2.100.65।।
एकचिन्तनमर्थानामनर्थज्ञैश्च मन्त्रणम्।
निश्चितानामनारम्भं मन्त्रस्यापरिरक्षणम्।।2.100.66।।
मङ्गलाद्यप्रयोगं च प्रत्युत्थानं च सर्वतः।
कच्चित्वं वर्जयस्येतान्राजदोषांश्चतुर्दश।।2.100.67।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘गुरुजनों, वृद्धों, तपस्वियों, देवताओं, अतिथियों, चैत्य वृक्षों और समस्त पूर्णकाम ब्राह्मणों को नमस्कार करते हो न?
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I trust you eschew the fourteen faults of kings, like atheism, falsehood, anger, inattention, procrastination, evading the wise, indolence, gratification of all five senses, planning alone in the affairs of the kingdom, consultation with people who are proficient in worthless acts, failure to implement decisious, inability to keep the counsel secret and omission of auspicious practices and setting out against all the enemies at a time.
ShlokaShloka 61
दशपञ्चचतुर्वर्गान्सप्तवर्गं च तत्त्वतः।
अष्टवर्गं त्रिवर्गं च विद्यास्तिस्रश्च राघव।।2.100.68।।
इन्द्रियाणां जयं बुद्ध्या षाड्गुण्यं दैवमानुषम्।
कृत्यं विंशतिवर्गं च तथा प्रकृतिमण्डलम्।।2.100.69।।
यात्रादण्डविधानं च द्वियोनी सन्धिविग्रहौ।
कच्चिदेतान्महाप्राज्ञ यथावदनुमन्यसे।।2.100.70।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘गुरुजनों, वृद्धों, तपस्वियों, देवताओं, अतिथियों, चैत्य वृक्षों और समस्त पूर्णकाम ब्राह्मणों को नमस्कार करते हो न?
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O highly sagacious Bharata, I trust, having understood their true nature you are appropriately following the ten, five and four divisions, the seven divisions, the eight divisions, the three divisions, three kinds of knowledge, victory over the senses, the six qualities, evils arising from destiny and human agency, kritya, division of twenty, similarly Prakriti and Mandalas and two sources of Yatra and chastisement and of peace and war.
ShlokaShloka 62
मन्त्रिभिस्त्वं यथोद्दिष्टैश्चतुर्भिस्त्रिभिरेव वा।
कच्चित्समस्तैर्व्यस्तैश्च मन्त्रं मन्त्रयसे मिथः।।2.100.71।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘विजयी वीरों में श्रेष्ठ, समयोचित कर्तव्य के ज्ञाता तथा दूसरों को वर देने में समर्थ भरत! क्या तुम समय का विभाग करके धर्म, अर्थ और काम का योग्य समय में सेवन करते हो?
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I trust you deliberate in secrecy on your counsel with three or four counsellors, together and separately with each one, as laid down in sacred texts.
ShlokaShloka 63
कच्चित्ते सफला वेदाः कच्चित्ते सफलाः क्रियाः।
कच्चित्ते सफला दाराः कच्चित्ते सफलं श्रुतम्।।2.100.72।।
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‘विजयी वीरों में श्रेष्ठ, समयोचित कर्तव्य के ज्ञाता तथा दूसरों को वर देने में समर्थ भरत! क्या तुम समय का विभाग करके धर्म, अर्थ और काम का योग्य समय में सेवन करते हो?
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I trust, the Vedas you have studied are fruitful, the acts which you commenced are productive, your wife is fruitful (blessed with a son) and the scriptures you studied are useful.
ShlokaShloka 64
कच्चिदेषैव ते बुद्धिर्यथोक्ता मम राघव।
आयुष्या च यशस्या च धर्मकामार्थ संहिता।।2.100.73।।
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‘महाप्राज्ञ! सम्पूर्ण शास्त्रों के अर्थ को जानने वाले ब्राह्मण पुरवासी और जनपदवासी मनुष्यों के साथ तुम्हारे कल्याण की कामना करते हैं न?
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O Bharata, I trust your intellect is in conformity with what I said conducive to long life, and fame in accordance with righteousness, (legitimate) pleasure and prosperity.
ShlokaShloka 65
यां वृत्तिं वर्तते तातो यां च नः प्रपितामहाः।
तां वृत्तिं वर्तसे कच्चिद्याच सत्पथगा शुभा।।2.100.74।।
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‘नास्तिकता, असत्य-भाषण, क्रोध, प्रमाद, दीर्घसूत्रता, ज्ञानी पुरुषों का संग न करना, आलस्य, नेत्र आदि पाँचों इन्द्रियों के वशीभूत होना, राजकार्यों के विषय में अकेले ही विचार करना, प्रयोजन को न समझने वाले विपरीतदर्शी मूल् से सलाह लेना, निश्चित किये हुए कार्यों का शीघ्र प्रारम्भ न करना,गुप्त मन्त्रणा को सुरक्षित न रखकर प्रकट कर देना, माङ्गलिक आदि कार्यों का अनुष्ठान न करना तथा सब शत्रुओं पर एक ही साथ चढ़ाई कर देना—ये राजा के चौदह दोष हैं। तुम इन दोषों का सदा परित्याग करते हो न?
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I trust, you walk the auspicious path of truth (virtue) followed by our father and forefathers.
ShlokaShloka 66
कच्चित्स्वादु कृतं भोज्यमेको नाश्नासि राघव।
कच्चिदाशंसमानेभ्यो मित्रेभ्य स्सम्प्रयच्छसि।।2.100.75।।
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‘नास्तिकता, असत्य-भाषण, क्रोध, प्रमाद, दीर्घसूत्रता, ज्ञानी पुरुषों का संग न करना, आलस्य, नेत्र आदि पाँचों इन्द्रियों के वशीभूत होना, राजकार्यों के विषय में अकेले ही विचार करना, प्रयोजन को न समझने वाले विपरीतदर्शी मूल् से सलाह लेना, निश्चित किये हुए कार्यों का शीघ्र प्रारम्भ न करना,गुप्त मन्त्रणा को सुरक्षित न रखकर प्रकट कर देना, माङ्गलिक आदि कार्यों का अनुष्ठान न करना तथा सब शत्रुओं पर एक ही साथ चढ़ाई कर देना—ये राजा के चौदह दोष हैं। तुम इन दोषों का सदा परित्याग करते हो न?
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O Bharata, I trust you do not partake delicious food all by yourself, and you share it with your friends when they want it.
ShlokaShloka 67
राजा तु धर्मेण हि पालयित्वा महामतिर्दण्डधरः प्रजानाम्।
अवाप्य कृत्स्नां वसुधां यथावदितश्च्युत स्स्वर्गमुपैति विद्वान्।।2.100.76।।
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‘नास्तिकता, असत्य-भाषण, क्रोध, प्रमाद, दीर्घसूत्रता, ज्ञानी पुरुषों का संग न करना, आलस्य, नेत्र आदि पाँचों इन्द्रियों के वशीभूत होना, राजकार्यों के विषय में अकेले ही विचार करना, प्रयोजन को न समझने वाले विपरीतदर्शी मूल् से सलाह लेना, निश्चित किये हुए कार्यों का शीघ्र प्रारम्भ न करना,गुप्त मन्त्रणा को सुरक्षित न रखकर प्रकट कर देना, माङ्गलिक आदि कार्यों का अनुष्ठान न करना तथा सब शत्रुओं पर एक ही साथ चढ़ाई कर देना—ये राजा के चौदह दोष हैं। तुम इन दोषों का सदा परित्याग करते हो न?
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The highly sagacious and learned king, having acquired the entire earth and punishing the people in accordance with tradition and righteously ruling the kingdom, will ascend the his release (from this world). इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिकाव्ये अयोध्याकाण्डे शततमस्सर्गः।। Thus ends the hundredth sarga in Ayodhyakanda of the holy Ramayana, the first epic composed by sage Valmiki.