Ayodhya Kanda
Sarga 97: Rama's correction of Lakshmana's judgement -- Bharata's army encamped round Chitrakuta.
अयोध्याकाण्डम् · सर्ग 97
29 shlokas
ShlokaShloka 1
सुसंरब्धं तु सौमित्रिं लक्ष्मणं क्रोधमूर्छितम्।
रामस्तु परिसान्त्व्याथ वचनं चेदमब्रवीत्।।2.97.1।।
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‘लक्ष्मण! महाबली और महान् उत्साही भरत जब स्वयं यहाँ आ गये हैं, तब इस समय यहाँ धनुष अथवा ढाल-तलवार से क्या काम है ?
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Thereafter, Rama pacified Lakshmana, son of Sumitra who was violently agitated. He said to him who had swooned with rage:
ShlokaShloka 2
किमत्र धनुषा कार्यमसिना वा सचर्मणा।
महेष्वासे महाप्राज्ञे भरते स्वयमागते।।2.97.2।।
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‘लक्ष्मण! महाबली और महान् उत्साही भरत जब स्वयं यहाँ आ गये हैं, तब इस समय यहाँ धनुष अथवा ढाल-तलवार से क्या काम है ?
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When sagacious Bharata of great strength has come here, where is the need for a bow or a sword or a shield.
ShlokaShloka 3
पितुस्सत्यं प्रतिश्रुत्य हत्वा भरतमागतम्।
किं करिष्यामि राज्येन सापवादेन लक्ष्मण।।2.97.3।।
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‘लक्ष्मण! पिता के सत्य की रक्षा के लिये प्रतिज्ञा करके यदि मैं युद्ध में भरत को मारकर उनका राज्य छीन लूँ तो संसार में मेरी कितनी निन्दा होगी, फिर उस कलंकित राज्य को लेकर मैं क्या करूँगा?
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O Lakshmana, having sworn that I would make father's word true, what shall I do with the kingdom earned slanderously by slaying Bharata who has come (to see me)?
ShlokaShloka 4
यद्द्रव्यं बान्धवानां वा मित्राणां वा क्षये भवेत्।
नाहं तत्प्रतिगृह्णीयां भक्षान्विषकृतानिव।।2.97.4।।
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‘अपने बन्धु-बान्धवों या मित्रों का विनाश करके जिस धन की प्राप्ति होती हो, वह तो विषमिश्रित भोजन के समान सर्वथा त्याग देने योग्य है; उसे मैं कदापि ग्रहण नहीं करूँगा
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I shall never accept any wealth obtained by destroying kith and kin or friends which is akin to taking food prepared with poison.
ShlokaShloka 5
धर्ममर्थं च कामं च पृथिवीं चापि लक्ष्मण।
इच्छामि भवतामर्थे एतत् प्रतिशृणोमि ते।।2.97.5।।
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‘लक्ष्मण! मैं तुमसे प्रतिज्ञापूर्वक कहता हूँ कि धर्म, अर्थ, काम और पृथ्वी का राज्य भी मैं तुम्हीं लोगों के लिये चाहता हूँ
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O Lakshmana, on the oath of righteousness, I wish wealth and pleasure as well as this kingdom for the sake of you all.
ShlokaShloka 6
भ्रात्रूणां संग्रहार्थं च सुखार्थं चापि लक्ष्मण।
राज्यमप्यहमिच्छामि सत्येनाऽयुधमालभे।।2.97.6।।
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‘सौम्य लक्ष्मण! समुद्र से घिरी हई यह पृथिवी मेरे लिये दुर्लभ नहीं है, परंतु मैं अधर्म से इन्द्र का पद पाने की भी इच्छा नहीं कर सकता
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O Lakshmana, I desire this kingdom only for the unity and happiness of my brothers. I swear on the weapon I hold.
ShlokaShloka 7
नेयं मम मही सौम्य दुर्लभा सागराम्बरा।
न हीच्छेयमधर्मेण शक्रत्वमपि लक्ष्मण।।2.97.7।।
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‘सौम्य लक्ष्मण! समुद्र से घिरी हई यह पृथिवी मेरे लिये दुर्लभ नहीं है, परंतु मैं अधर्म से इन्द्र का पद पाने की भी इच्छा नहीं कर सकता
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O gentle Lakshmana, lordship of this earth with the sea as its garment is not difficult to obtain (for me). But I do not desire even Indrahood by unrighteous means.
ShlokaShloka 8
यद्विना भरतं त्वां च शत्रुघ्नं चापि मानद।
भवेन्मम सुखं किञ्चिद्भस्म तत्कुरुतां शिखी।।2.97.8।।
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‘मानद! भरत को, तुमको और शत्रुघ्न को छोड़कर यदि मुझे कोई सुख मिलता हो तो उसे अग्निदेव जलाकर भस्म कर डालें
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O protector of honour even if there were to be some happiness which I could enjoy without you, Bharata, and Satrughna, let it be reduced to ashes by fire.
ShlokaShloka 9
मन्येऽहमागतोऽयोध्यां भरतो भ्रातृवत्सलः।
मम प्राणात्प्रियतरः कुलधर्ममनुस्मरन्।।2.97.9।।
श्रुत्वा प्रव्राजितं मां हि जटावल्कलधारिणम्।
जानक्यासहितं वीर त्वया च पुरुषर्षभ।।2.97.10।।
स्नेहेनाऽक्रान्तहृदय श्शोकेनाकुलितेन्द्रियः।
द्रष्टुमभ्यागतो ह्येष भरतो नान्यथाऽगतः।।2.97.11।।
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‘वीर! पुरुषप्रवर! भरत बड़े भ्रातृभक्त हैं। वे मुझे प्राणों से भी बढ़कर प्रिय हैं। मुझे तो ऐसा मालूम होता है, भरत ने अयोध्या वेद में अयोध्या को ईश्वर का नगर बताया गया है, "अष्टचक्रा नवद्वारा देवानां पूरयोध्या"और इसकी संपन्नता की तुलना स्वर्ग से की गई है। रामायण के अनुसार अयोध्या की स्थापना मनु ने की थी। यह पुरी सरयू के तट पर बारह योजन (लगभग १४४ कि.मी) लम्बाई अाैर तीन योजन (लगभग ३६ कि.मी.) चौड़ाई में बसी थी । कई शताब्दी तक यह नगर सूर्यवंशी राजाओं की राजधानी रहा। अयोध्या मूल रूप से मंदिरों का शहर है। " href="https://www.ramcharit.in/glossary/%e0%a4%85%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%a7%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be/" data-gt-translate-attributes='[{"attribute":"data-cmtooltip", "format":"html"}]' tabindex='0' role='link'>अयोध्या में आने पर जब सुना है कि मैं तुम्हारे और जानकी के साथ जटा-वल्कल धारण करके वन में आ गया हूँ, तब उनकी इन्द्रियाँ शोक से व्याकुल हो उठी हैं और वे कुलधर्म का विचार करके स्नेहयुक्त हृदय से हमलोगों से मिलने आये हैं। इन भरत के आगमन का इसके सिवा दूसरा कोई उद्देश्य नहीं हो सकता
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O best among men, O valiant one I think Bharata who is affectionate towards his brothers and who is dearer to me than my life, must have returned to Ayodhya and has heard that I had been exiled along with you and Janaki, wearing barks and matted locks. Remembering the duties of the race with an afflicted mind and with agitated senses he has come here to see me. He has not come with any other intention.
ShlokaShloka 10
अम्बां च कैकयीं रुष्य परुषं चाप्रियं वदन्।
प्रसाद्य पितरं श्रीमार्नाज्यं मे दातुमागतः।।2.97.12।।
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‘वीर! पुरुषप्रवर! भरत बड़े भ्रातृभक्त हैं। वे मुझे प्राणों से भी बढ़कर प्रिय हैं। मुझे तो ऐसा मालूम होता है, भरत ने अयोध्या वेद में अयोध्या को ईश्वर का नगर बताया गया है, "अष्टचक्रा नवद्वारा देवानां पूरयोध्या"और इसकी संपन्नता की तुलना स्वर्ग से की गई है। रामायण के अनुसार अयोध्या की स्थापना मनु ने की थी। यह पुरी सरयू के तट पर बारह योजन (लगभग १४४ कि.मी) लम्बाई अाैर तीन योजन (लगभग ३६ कि.मी.) चौड़ाई में बसी थी । कई शताब्दी तक यह नगर सूर्यवंशी राजाओं की राजधानी रहा। अयोध्या मूल रूप से मंदिरों का शहर है। " href="https://www.ramcharit.in/glossary/%e0%a4%85%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%a7%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be/" data-gt-translate-attributes='[{"attribute":"data-cmtooltip", "format":"html"}]' tabindex='0' role='link'>अयोध्या में आने पर जब सुना है कि मैं तुम्हारे और जानकी के साथ जटा-वल्कल धारण करके वन में आ गया हूँ, तब उनकी इन्द्रियाँ शोक से व्याकुल हो उठी हैं और वे कुलधर्म का विचार करके स्नेहयुक्त हृदय से हमलोगों से मिलने आये हैं। इन भरत के आगमन का इसके सिवा दूसरा कोई उद्देश्य नहीं हो सकता
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Auspicious Bharata, angry with Kaikeyi and having spoken to her unpleasant, bitter words and having propitiated our father, has come here to offer me the kingdom.
ShlokaShloka 11
प्राप्तकालं यदेषोऽस्मान्भरतो द्रष्टुमिच्छति।
अस्मासु मनसाऽप्येष नाप्रियं किञ्चिदाचरेत्।।2.97.13।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘वीर! पुरुषप्रवर! भरत बड़े भ्रातृभक्त हैं। वे मुझे प्राणों से भी बढ़कर प्रिय हैं। मुझे तो ऐसा मालूम होता है, भरत ने अयोध्या वेद में अयोध्या को ईश्वर का नगर बताया गया है, "अष्टचक्रा नवद्वारा देवानां पूरयोध्या"और इसकी संपन्नता की तुलना स्वर्ग से की गई है। रामायण के अनुसार अयोध्या की स्थापना मनु ने की थी। यह पुरी सरयू के तट पर बारह योजन (लगभग १४४ कि.मी) लम्बाई अाैर तीन योजन (लगभग ३६ कि.मी.) चौड़ाई में बसी थी । कई शताब्दी तक यह नगर सूर्यवंशी राजाओं की राजधानी रहा। अयोध्या मूल रूप से मंदिरों का शहर है। " href="https://www.ramcharit.in/glossary/%e0%a4%85%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%a7%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be/" data-gt-translate-attributes='[{"attribute":"data-cmtooltip", "format":"html"}]' tabindex='0' role='link'>अयोध्या में आने पर जब सुना है कि मैं तुम्हारे और जानकी के साथ जटा-वल्कल धारण करके वन में आ गया हूँ, तब उनकी इन्द्रियाँ शोक से व्याकुल हो उठी हैं और वे कुलधर्म का विचार करके स्नेहयुक्त हृदय से हमलोगों से मिलने आये हैं। इन भरत के आगमन का इसके सिवा दूसरा कोई उद्देश्य नहीं हो सकता
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Finding the time appropriate, Bharata has come to see us. Even in his mind he would have never thought of causing any harm to us in any way.
ShlokaShloka 12
विप्रियं कृतपूर्वं ते भरतेन कदा नु किम्।
ईदृशं वा भयं तेऽद्य भरतं योऽत्र शङ्कसे।।2.97.14।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘माता कैकेयी के प्रति कुपित हो, उन्हें कठोर वचन सुनाकर और पिताजी को प्रसन्न करके श्रीमान् भरत मुझे राज्य देने के लिये आये हैं
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Why are you suspicious of Bharata? Has he done anything disagreeable to you any time in the past?
ShlokaShloka 13
न हि ते निष्ठुरं वाच्यो भरतो नाप्रियं वचः।
अहं ह्यप्रियमुक्त स्स्यां भरतस्याप्रिये कृते।।2.97.15।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘भरत का हम लोगों से मिलने के लिये आना सर्वथा समयोचित है वे हमसे मिलने के योग्य हैं। हमलोगों का कोई अहित करने का विचार तो वे कभी मन में भी नहीं ला सकते
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You must not speak any harsh or unpleasant words against Bharata. If you do, they will be deemed to be directed against me.
ShlokaShloka 14
कथं नु पुत्राः पितरं हन्युः कस्यां चिदापदि।
भ्राता वा भ्रातरं हन्यात्सौमित्रे प्राणमात्मनः।।2.97.16।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘भरत ने तुम्हारे प्रति पहले कब कौन-सा अप्रिय बर्ताव किया है, जिससे आज तुम्हें उनसे ऐसा भय लग रहा है और तुम उनके विषय में इस तरह की आशङ्का कर रहे हो?
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Whatever be the calamity, O Lakshmana, how will sons slay their father, or a brother kill his own brother who is as dear to him as his own life?
ShlokaShloka 15
यदि राज्यस्य हेतोस्त्वमिमां वाचं प्रभाषसे।
वक्ष्यामि भरतं दृष्ट्वा राज्यमस्मै प्रदीयताम्।।2.97.17।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘भरत के आने पर तुम उनसे कोई कठोर या अप्रिय वचन न बोलना। यदि तुमने उनसे कोई प्रतिकूल बात कही तो वह मेरे ही प्रति कही हुई समझी जायगी
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If you are saying all these words only for the sake of the kingdom, then I shall ask Bharata when I see him to offer this kingdom to you.
ShlokaShloka 16
उच्यमानोऽपि भरतो मया लक्ष्मण तद्वचः।
राज्यमस्मै प्रयच्छेति बाढमित्येव वक्ष्यति।।2.97.18।।
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‘सुमित्रानन्दन ! कितनी ही बड़ी आपत्ति क्यों न आ जाय, पुत्र अपने पिता को कैसे मार सकते हैं? अथवा भाई अपने प्राणों के समान प्रिय भाई की हत्या कैसे कर सकता है ?
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O Lakshmana if I earnestly exhort Bharata to offer this kingdom to you, then on hearing those words, he would say, 'Certainly so'.
ShlokaShloka 17
तथोक्तो धर्मशीलेन भ्रात्रा तस्य हिते रतः।
लक्ष्मणः प्रविवेशेव स्वानि गात्राणि लज्जया।।2.97.19।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘यदि तुम राज्य के लिये ऐसी कठोर बात कहते हो तो मैं भरत से मिलने पर उन्हें कह दूँगा कि तुम यह राज्य लक्ष्मण को दे दो
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Having heard the words uttered by his brother, Rama of virtuous disposition, Lakshmana who was devoted to his brother's welfare, shrank.
ShlokaShloka 18
तद्वाक्यं लक्ष्मण श्श्रुत्वा व्रीलितः प्रत्युवाच ह।
त्वां मन्ये द्रष्टुमायातः पिता दशरथ स्स्वयम्।।2.97.20।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘लक्ष्मण ! यदि मैं भरत से यह कहूँ कि ‘तुम राज्य इन्हें दे दो’ तो वे बहुत अच्छा’ कहकर अवश्य मेरी बात मान लेंगे’
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Hearing the words of Rama, Lakshmana was abashed and said I think it is our father, king Dasaratha who has come here personally to see you.
ShlokaShloka 19
व्रीलितं लक्ष्मणं दृष्ट्वा राघवः प्रत्युवाच ह।
एष मन्ये महाबाहुरिहास्मान्द्रष्टुमागतः।।2.97.21।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
अपने धर्मपरायण भाई के ऐसा कहने पर उन्हीं के हित में तत्पर रहने वाले लक्ष्मण लज्जावश मानो अपने अङ्गों में ही समा गये—लाज से गड़ गये
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Observing Lakshmana's abashment, Rama said I think the mightyarmed king Dasaratha has come to see all of us here.
ShlokaShloka 20
अथवा नौ ध्रुवं मन्ये मन्यमान स्सुखोचितौ।
वनवासमनुध्याय गृहाय प्रतिनेष्यति।।2.97.22।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
लक्ष्मण को लज्जित हुआ देख श्रीराम ने उत्तर दिया —’मैं भी ऐसा ही मानता हूँ कि हमारे महाबाहु पिताजी ही हमलोगों से मिलने आये हैं
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Or rather having thought of the adversities of dwelling in a forest and also by realising that both of us are accustomed to comforts, I think he has certainly come to take us back home.
ShlokaShloka 21
इमां वाप्येष वैदेहीमत्यन्तसुखसेविनीम्।
पिता मे राघव श्श्रीमान्वनादादाय यास्यति।।2.97.23।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
लक्ष्मण को लज्जित हुआ देख श्रीराम ने उत्तर दिया —’मैं भी ऐसा ही मानता हूँ कि हमारे महाबाहु पिताजी ही हमलोगों से मिलने आये हैं
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Our father, the prosperous Dasaratha, after withdrawing this princess Vaidehi who is brought up in luxury from the forest (to Ayodhya), will return.
ShlokaShloka 22
एतौ तौ सम्प्रकाशेते गोत्रवन्तौ मनोरमौ।
वायुवेगसमौ वीर जवनौ तुरगोत्तमौ।।2.97.24।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘मेरे पिता रघुकुलतिलक श्रीमान् महाराज दशरथ अत्यन्त सुख का सेवन करने वाली इन विदेहराजनन्दिनी सीता को भी वन से साथ लेकर ही घर को लौटेंगे
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O valiant warrior, you can see those two splendid horses of high pedigree, charming, swift and equal to wind in speed are shining (in the army).
ShlokaShloka 23
स एष सुमहाकायः कम्पते वाहिनीमुखे।
नागश्शत्रुञ्जयो नाम वृद्धस्तातस्य धीमतः।।2.97.25।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘मेरे पिता रघुकुलतिलक श्रीमान् महाराज दशरथ अत्यन्त सुख का सेवन करने वाली इन विदेहराजनन्दिनी सीता को भी वन से साथ लेकर ही घर को लौटेंगे
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There is that huge and aged elephant named Satrunjaya which belogns to our sagacious father proceeding at the head of the army.
ShlokaShloka 24
न तु पश्यामि तच्छत्रं पाण्डुरं लोकसत्कृतम् |
पितुर्दिव्यं महाबाहो संशयो भवतीह मे।।2.97.26।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘अच्छे घोड़ोंके कुलमें उत्पन्न हुए ये ही वे दोनों वायुके समान वेगशाली, शीघ्रगामी, वीर एवं मनोरम अपने उत्तम घोड़े चमक रहे हैं।
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I do not see, O long-armed one! that splendid white canopy of my father, well-respected by men. And this gives rise to doubts in my mind.
ShlokaShloka 25
वृक्षाग्रादवरोह त्वं कुरु लक���ष्मण मद्वचः।
इतीव रामो धर्मात्मा सौमित्रिं तमुवाच ह।।2.97.27।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘परम बुद्धिमान् पिताजी की सवारी में रहने वाला यह वही विशालकाय शत्रुजय नामक बूढ़ा गजराज है, जो सेना के मुहाने पर झूमता हुआ चल रहा है
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Get off the treetop, O Lakshmana, and do what I say said the righteous Rama.
ShlokaShloka 26
अवतीर्य तु सालाग्रात्तस्मात्स समितिञ्जयः।
लक्ष्मणः प्राञ्जलिर्भूत्वा तस्थौ रामस्य पार्श्वतः।।2.97.28।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘महाभाग! परंतु इसके ऊपर पिताजी का वह विश्वविख्यात दिव्य श्वेतछत्र मुझे नहीं दिखायी देता है—इससे मेरे मन में संशय उत्पन्न होता है
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Lakshmana, the conqueror of foes, descended from the top of the sala tree and stood by the side of Rama with folded palms.
ShlokaShloka 27
भरतेनापि सन्दिष्टा सम्मर्दो न भवेदिति।
समन्तात्तस्य शैलस्य सेना वासमकल्पयत्।।2.97.29।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
उधर भरत ने सेना को आज्ञा दी कि ‘यहाँ किसी को हमलोगों के द्वारा बाधा नहीं पहुँचनी चाहिये।’ उनका यह आदेश पाकर समस्त सैनिक पर्वत के चारों ओर नीचे ही ठहर गये
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Let not the hermitage be crowded commanded Bharata, and the army encamped around the mountain.
ShlokaShloka 28
अध्यर्धमिक्ष्वाकुचमूर्योजनं पर्वतस्य सा।
पार्श्वे न्यविशदावृत्य गजवाजिरथाकुला।।2.97.30।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
उधर भरत ने सेना को आज्ञा दी कि ‘यहाँ किसी को हमलोगों के द्वारा बाधा नहीं पहुँचनी चाहिये।’ उनका यह आदेश पाकर समस्त सैनिक पर्वत के चारों ओर नीचे ही ठहर गये
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Bharata's army full of horses, elephants and chariots covering a distance of more than one and a half yojanas encamped by the side of the mountain.
ShlokaShloka 29
सा चित्रकूटे भरतेन सेना धर्मं पुरस्कृत्य विधूय दर्पम्।
प्रसादनार्थं रघुनन्दनस्य विराजते नीतिमता प्रणीता।।2.97.31।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
उधर भरत ने सेना को आज्ञा दी कि ‘यहाँ किसी को हमलोगों के द्वारा बाधा नहीं पहुँचनी चाहिये।’ उनका यह आदेश पाकर समस्त सैनिक पर्वत के चारों ओर नीचे ही ठहर गये
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The army brought by Bharata, the great moralist, was shining around Chitrakuta mountain following dharma, and casting off all pride, in order to please Rama. इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिकाव्ये अयोध्याकाण्डे सप्तनवतितमस्सर्गः।। Thus ends the ninetyseventh sarga in Ayodhyakanda of the holy Ramayana, the first epic composed by sage Valmiki.