Ayodhya Kanda
Sarga 90: Bharadwaja welcomes Bharata and Vasistha -- Bharata discloses his intention to get back Rama.
अयोध्याकाण्डम् · सर्ग 90
22 shlokas
ShlokaShloka 1
भरद्वाजाश्रमं दृष्ट्वा क्रोशादेव नरर्षभः।
बलं सर्वमवस्थाप्य जगाम सह मन्त्रिभिः।।2.90.1।।
पद्भ्यामेव हि धर्मज्ञो न्यस्तशस्त्रपरिच्छदः।
वसानो वाससी क्षौमे पुरोधाय पुरोधसम्।।2.90.2।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
धर्म के ज्ञाता नरश्रेष्ठ भरत ने भरद्वाज-आश्रम के पास पहुँचकर अपने साथ के सब लोगों को आश्रम से एक कोस इधर ही ठहरा दिया था और अपने भी अस्त्रशस्त्र तथा राजोचित वस्त्र उतारकर वहीं रख दिये थे। केवल दो रेशमी वस्त्र धारण करके पुरोहित को आगे किये वे मन्त्रियों के साथ पैदल ही वहाँ गये
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Bharata, the knower of righteous ways and the best among men, saw the hermitage of Bharadwaja from a distance of one krosa and brought his entire army to a halt. He laid aside all his royal robes and weapons. Clad in silk garments, he went on foot along with his ministers, with the family priest Vasistha ahead of him.
ShlokaShloka 2
भरद्वाजाश्रमं दृष्ट्वा क्रोशादेव नरर्षभः।
बलं सर्वमवस्थाप्य जगाम सह मन्त्रिभिः।।2.90.1।।
पद्भ्यामेव हि धर्मज्ञो न्यस्तशस्त्रपरिच्छदः।
वसानो वाससी क्षौमे पुरोधाय पुरोधसम्।।2.90.2।।
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धर्म के ज्ञाता नरश्रेष्ठ भरत ने भरद्वाज-आश्रम के पास पहुँचकर अपने साथ के सब लोगों को आश्रम से एक कोस इधर ही ठहरा दिया था और अपने भी अस्त्रशस्त्र तथा राजोचित वस्त्र उतारकर वहीं रख दिये थे। केवल दो रेशमी वस्त्र धारण करके पुरोहित को आगे किये वे मन्त्रियों के साथ पैदल ही वहाँ गये
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Bharata, the knower of righteous ways and the best among men, saw the hermitage of Bharadwaja from a distance of one krosa and brought his entire army to a halt. He laid aside all his royal robes and weapons. Clad in silk garments, he went on foot along with his ministers, with the family priest Vasistha ahead of him.
ShlokaShloka 3
तत स्सन्दर्शने तस्य भरद्वाजस्य राघवः।
मन्त्रिणस्तानवस्थाप्य जगामानुपुरोहितम्।।2.90.3।।
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आश्रम में प्रवेश करके जहाँ दूर से ही मुनिवर भरद्वाज का दर्शन होने लगा। वहीं उन्होंने उन मन्त्रियों को खड़ा कर दिया और पुरोहित वसिष्ठजी को आगे करके वे पीछे-पीछे ऋषिके पास गये
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Then the scion of the Raghu race (Bharata) halted his ministers within sight of Bharadwaja's (hermitage) and went along following his priest Vasistha.
ShlokaShloka 4
वसिष्ठमथ दृष्ट्वैव भरद्वाजो महातपाः।
सञ्चचाऽलासनात्तूर्णं शिष्यानर्घ्यमिति ब्रुवन्।।2.90.4।।
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महर्षि वसिष्ठ को देखते ही महातपस्वी भरद्वाज आसन से उठ खड़े हुए और शिष्यों से शीघ्रतापूर्वक अर्घ्य ले आने को कहा
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On seeing Vasistha, the great ascetic Bharadwaja immediately left his seat and said to his disciples, Bring offerings of water.
ShlokaShloka 5
समागम्य वसिष्ठेन भरतेनाभिवादितः।
अबुद्ध्यत महातेजास्सुतं दशरथस्य तम्।।2.90.5।।
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फिर वे वसिष्ठ से मिले। तत्पश्चात् भरत ने उनके चरणों में प्रणाम किया। महातेजस्वी भरद्वाज समझ गये कि ये राजा दशरथ के पुत्र हैं
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After meeting Vasistha and greeted by Bharata, the radiant Bharadwaja could recognize he was the son of Dasaratha.
ShlokaShloka 6
ताभ्यामर्घ्यं च पाद्यं च दत्वा पश्चात्फलानि च।
आनुपूर्व्याच्छ धर्मज्ञः पप्रच्छ कुशलं कुले।।2.90.6।।
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धर्मज्ञ ऋषि ने क्रमशः वसिष्ठ और भरत को अर्घ्य, पाद्य तथा फल आदि निवेदन करके उन दोनों के कुल का कुशल-समाचार पूछा
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Offering them both in order arghya (welcomeoffering), water to wash their feet and fruits in accordance with the practice, he enquired Bharata about the welfare of the family.
ShlokaShloka 7
अयोध्यायां बले कोशे मित्रेष्वपि च मन्त्रिषु।
जानन् दशरथं वृत्तं न राजानमुदाहरत्।।2.90.7।।
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इसके बाद अयोध्या वेद में अयोध्या को ईश्वर का नगर बताया गया है, "अष्टचक्रा नवद्वारा देवानां पूरयोध्या"और इसकी संपन्नता की तुलना स्वर्ग से की गई है। रामायण के अनुसार अयोध्या की स्थापना मनु ने की थी। यह पुरी सरयू के तट पर बारह योजन (लगभग १४४ कि.मी) लम्बाई अाैर तीन योजन (लगभग ३६ कि.मी.) चौड़ाई में बसी थी । कई शताब्दी तक यह नगर सूर्यवंशी राजाओं की राजधानी रहा। अयोध्या मूल रूप से मंदिरों का शहर है। " href="https://www.ramcharit.in/glossary/%e0%a4%85%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%a7%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be/" data-gt-translate-attributes='[{"attribute":"data-cmtooltip", "format":"html"}]' tabindex='0' role='link'>अयोध्या , सेना, खजाना, मित्रवर्ग तथा मन्त्रिमण्डल का हाल पूछा। राजा दशरथ की मृत्यु का वृत्तान्त वे जानते थे; इसलिये उनके विषय में उन्होंने कुछ नहीं पूछा
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He enquired about the welfare of Ayodhya, of the army, treasury, friends and the ministers. But knowingly did not mention about Dasaratha's wellbeing (the knew Dasaratha was dead).
ShlokaShloka 8
वसिष्ठो भरतश्चैनं पप्रच्छतुरनामयम्।
शरीरेऽग्निषु वृक्षेषु शिष्येषु मृगपक्षिषु।।2.90.8।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
वसिष्ठ और भरत ने भी महर्षि के शरीर, अग्निहोत्र, शिष्यवर्ग, पेड़-पत्ते तथा मृग-पक्षी आदि का कुशल समाचार पूछा
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Vasistha and Bharata also enquired about his health and welfare of his sacred fires, his disciples, animals and birds and trees of the hermitage.
ShlokaShloka 9
तथेति तत्प्रतिज्ञाय भरद्वाजो महातपाः।
भरतं प्रत्युवाचेदं राघवस्नेहबन्धनात्।।2.90.9।।
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महायशस्वी भरद्वाज ‘सब ठीक है’ ऐसा कहकर श्रीराम के प्रति स्नेह होने के कारण भरत से इस प्रकार बोले-
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Saying, all is well, the great ascetic Bharadwaja, out of his affection for Rama, said to Bharata:
ShlokaShloka 10
किमिहाऽगमने कार्यं तव राज्यं प्रशासतः।
एतदाचक्ष्व मे सर्वं न हि मे शुद्ध्यते मनः।।2.90.10।।
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‘तुम तो राज्य कर रहे हो न? तुम्हें यहाँ आने की क्या आवश्यकता पड़ गयी? यह सब मुझे बताओ, क्योंकि मेरा मन तुम्हारी ओर से शुद्ध नहीं हो रहा है —मेरा विश्वास तुम पर नहीं जमता है
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Why have you come here when you ought to be ruling the kingdom? Tell me everything about this. My mind is not clear in this matter.
ShlokaShloka 11
सुषुवे यममित्रघ्नं कौसल्यानऽन्दवर्धनम्।
भ्रात्रा सह सभार्यो यश्चिरं प्रव्राजितो वनम्।।2.90.11।।
नियुक्तः स्त्रीनियुक्तेन पित्रा योऽसौ महायशाः।
वनवासी भवेतीह समाः किल चतुर्दश।।2.90.12।।
कच्छिन्न तस्यापापस्य पापं कर्तुमिहेच्छसि।
अकण्टकं भोक्तुमना राज्यं तस्यानुजस्य च।।2.90.13।।
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‘जो शत्रुओं का नाश करने वाला है, जिस आनन्दवर्धक पुत्र को कौसल्या ने जन्म दिया है तथा तुम्हारे पिता ने स्त्री के कारण जिस महायशस्वी पुत्र को चौदह वर्षों तक वन में रहने की आज्ञा देकर उसे भाई और पत्नी के साथ दीर्घकाल के लिये वन में भेज दिया है, उस निरपराध श्रीराम और उसके छोटे भाई लक्ष्मण का तुम अकण्टक राज्य भोगने की इच्छा से कोई अनिष्ट तो नहीं करना चाहते हो?’
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Rama, destroyer of enemies and enhancer of the delight of his mother Kausalya, has been banished to the forest for a long time along with his wife and brother. That illustrious one has been ordered by his father to live in the forest for fourteen years through the pursuasion of a woman. To enjoy the kingdom without obstacles do you intend to cause any harm to that irreproachable Rama and his brother?
ShlokaShloka 12
एवमुक्तो भरद्वाजं भरतः प्रत्युवाच ह।
पर्यश्रुनयनो दुःखाद्वाचा संसज्जमानया।।2.90.14।।
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‘जो शत्रुओं का नाश करने वाला है, जिस आनन्दवर्धक पुत्र को कौसल्या ने जन्म दिया है तथा तुम्हारे पिता ने स्त्री के कारण जिस महायशस्वी पुत्र को चौदह वर्षों तक वन में रहने की आज्ञा देकर उसे भाई और पत्नी के साथ दीर्घकाल के लिये वन में भेज दिया है, उस निरपराध श्रीराम और उसके छोटे भाई लक्ष्मण का तुम अकण्टक राज्य भोगने की इच्छा से कोई अनिष्ट तो नहीं करना चाहते हो?’
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At these words, Bharata, eyes filled with tears of grief, replied to Bharadwaja in a stumbling voice:
ShlokaShloka 13
हतोऽस्मि यदि मामेवं भगवानपि मन्यते।
मत्तो न दोषमाशङ्के नैवं मामनुशास्तु हि।2.90.15।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘जो शत्रुओं का नाश करने वाला है, जिस आनन्दवर्धक पुत्र को कौसल्या ने जन्म दिया है तथा तुम्हारे पिता ने स्त्री के कारण जिस महायशस्वी पुत्र को चौदह वर्षों तक वन में रहने की आज्ञा देकर उसे भाई और पत्नी के साथ दीर्घकाल के लिये वन में भेज दिया है, उस निरपराध श्रीराम और उसके छोटे भाई लक्ष्मण का तुम अकण्टक राज्य भोगने की इच्छा से कोई अनिष्ट तो नहीं करना चाहते हो?’
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When one so venerable like you too misunderstands me, I am gone. There is no danger for him from me. Do not rebuke me this way.
ShlokaShloka 14
न चैतदिष्टं माता मे यदवोचन्मदन्तरे।
नाहमेतेन तुष्टश्च न तद्वचनमाददे।।2.90.16।।
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भरद्वाजजी के ऐसा कहने पर दुःख के कारण भरत की आँखें डबडबा आयीं। वे लड़खड़ाती हुई वाणी में उनसे इस प्रकार बोले-
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I do not approve of whatever my mother said in my absence. I am not happy with those words and I do not accept them.
ShlokaShloka 15
अहं तु तं नरव्याघ्रमुपयातः प्रसादकः।
प्रतिनेतुमयोध्यां च पादौ तस्याभिवन्दितुम्।।2.90.17।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘भगवन् ! यदि आप पूज्यपाद महर्षि भी मुझे ऐसा समझते हैं, तब तो मैं हर तरह से मारा गया। यह मैं निश्चित रूप से जानता हूँ कि श्रीराम के वनवास में मेरी ओर से कोई अपराध नहीं हुआ है, अतः आप मुझसे ऐसी कठोर बात न कहें
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I have come to worship the feet of Rama, the best of men and persuade him to return to Ayodhya.
ShlokaShloka 16
त्वं मामेवंगतं मत्वा प्रसादं कर्तुमर्हसि।
शंस मे भगवन्रामः क्व सम्प्रति महीपतिः।।2.90.18।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘मैं तो उन पुरुषसिंह श्रीराम को प्रसन्न करके अयोध्या वेद में अयोध्या को ईश्वर का नगर बताया गया है, "अष्टचक्रा नवद्वारा देवानां पूरयोध्या"और इसकी संपन्नता की तुलना स्वर्ग से की गई है। रामायण के अनुसार अयोध्या की स्थापना मनु ने की थी। यह पुरी सरयू के तट पर बारह योजन (लगभग १४४ कि.मी) लम्बाई अाैर तीन योजन (लगभग ३६ कि.मी.) चौड़ाई में बसी थी । कई शताब्दी तक यह नगर सूर्यवंशी राजाओं की राजधानी रहा। अयोध्या मूल रूप से मंदिरों का शहर है। " href="https://www.ramcharit.in/glossary/%e0%a4%85%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%a7%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be/" data-gt-translate-attributes='[{"attribute":"data-cmtooltip", "format":"html"}]' tabindex='0' role='link'>अयोध्या में लौटा लाने और उनके चरणों की वन्दना करने के लिये जा रहा हूँ
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O venerable one in consideration of the circumstances I am in, be kind to me and tell me the whereabouts of Rama, lord of the earth.
ShlokaShloka 17
वशिष्ठादिभिः ऋत्विग्भिर्याचितो भगवांस्ततः।
उवाच तं भरद्वाजः प्रसादाद्भरतं वचः।2.90.19।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘मैं तो उन पुरुषसिंह श्रीराम को प्रसन्न करके अयोध्या वेद में अयोध्या को ईश्वर का नगर बताया गया है, "अष्टचक्रा नवद्वारा देवानां पूरयोध्या"और इसकी संपन्नता की तुलना स्वर्ग से की गई है। रामायण के अनुसार अयोध्या की स्थापना मनु ने की थी। यह पुरी सरयू के तट पर बारह योजन (लगभग १४४ कि.मी) लम्बाई अाैर तीन योजन (लगभग ३६ कि.मी.) चौड़ाई में बसी थी । कई शताब्दी तक यह नगर सूर्यवंशी राजाओं की राजधानी रहा। अयोध्या मूल रूप से मंदिरों का शहर है। " href="https://www.ramcharit.in/glossary/%e0%a4%85%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%a7%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be/" data-gt-translate-attributes='[{"attribute":"data-cmtooltip", "format":"html"}]' tabindex='0' role='link'>अयोध्या में लौटा लाने और उनके चरणों की वन्दना करने के लिये जा रहा हूँ
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Likewise besought by Vasistha and other priests, the venerable Bharadwaja was pleased to tell Bharata:
ShlokaShloka 18
त्वय्येतत्पुरुषव्याघ्र युक्तं राघववंशजे।
गुरुवृत्तिर्दमश्चैव साधूनामनुयायिता।।2.90.20।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘इसी उद्देश्यसे मैं यहाँ आया हूँ। ऐसा समझकर आपको मुझपर कृपा करनी चाहिये। भगवन् ! आप मुझे बताइये कि इस समय महाराज श्रीराम कहाँ हैं?’
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O best of men (Bharata) your conduct towards the preceptors, your selfrestraint and devotion to the virtuous are all in keeping with those born in the race of Raghu.
ShlokaShloka 19
जाने चैतन्मनस्थं ते दृढीकरणमस्त्विति।
अपृच्छं त्वां तथाऽत्यर्थं कीर्तिं समभिवर्धयन्।।2.90.21।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
इसके बाद वसिष्ठ आदि ऋत्विजों ने भी यह प्रार्थना की कि भरत का कोई अपराध नहीं है। आप इन पर प्रसन्न हों। तब भगवान् भरद्वाज ने प्रसन्न होकर भरत से कहा-
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I am aware of the feelings in your heart. Even then I enquired in order to confirm it and to further your fame.
ShlokaShloka 20
जाने च रामं धर्मज्ञं ससीतं सहलक्ष्मणम्।
असौ वसति ते भ्राता चित्रकूटे महागिरौ।।2.90.22।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘पुरुषसिंह ! तुम रघुकुल में उत्पन्न हुए हो। तुममें गुरुजनों की सेवा, इन्द्रियसंयम तथा श्रेष्ठ पुरुषों के अनुसरण का भाव होना उचित ही है
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I know your brother who is conversant with righteousness is living on Chitrakuta mountain with Sita and Lakshmana.
ShlokaShloka 21
श्वस्तु गन्तासि तं देशं वसाद्य सह मन्त्रिभिः।
एतन्मे कुरु सुप्राज्ञ कामं कामार्थकोविद।।2.90.23।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘तुम्हारे मन में जो बात है, उसे मैं जानता हूँ; तथापि मैंने इसलिये पूछा है कि तुम्हारा यह भाव और भी दृढ़ हो जाय तथा तुम्हारी कीर्ति का अधिकाधिक विस्तार हो
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O supremely sagacious prince gifted with the knowledge of kama (desire) and artha (wealth), tomorrow you go, but to night stay here with your ministers and fulfil my desire.
ShlokaShloka 22
ततस्तथेत्येवमुदारदर्शनः प्रतीतरूपो भरतोऽब्रवीद्वचः।
चकार बुद्धिं च तदा तदाश्रमे निशानिवासाय नराधिपाऽत्मजः।।2.90.24।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘मैं सीता और लक्ष्मणसहित धर्मज्ञ श्रीराम का पता जानता हूँ। ये तुम्हारे भ्राता श्रीरामचन्द्र महापर्वत चित्रकूट पर निवास करते हैं
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A man of liberal disposition, Bharata expressed his intention, saying, 'Be it so'. Then the prince made up him mind to spend the might in that hermitage. इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिकाव्ये अयोध्याकाण्डे नवतितमस्सर्गः।। Thus ends the ninetieth sarga in Ayodhyakanda of the holy Ramayana, the first epic composed by sage Valmiki.