Ayodhya Kanda
Sarga 80: Arrangements made for the journey to the forest.
अयोध्याकाण्डम् · सर्ग 80
17 shlokas
ShlokaShloka 1
अथ भूमिप्रदेशज्ञास्सूत्रकर्मविशारदाः।
स्वकर्माभिरताश्शूराः खनका यन्त्रकास्तथा।।2.80.1।।
कर्मान्तिकाः स्थपतयः पुरुष यन्त्रकोविदाः।
तथा वार्धकयश्चैव मार्गिणो वृक्षतक्षकाः।।2.80.2।।
कूपकारास्सुधाकारार्वंशकर्मकृतस्तथा।
समर्था ये च द्रष्टारः पुरतस्ते प्रतस्थिरे।।2.80.3।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
तत्पश्चात् ऊँची-नीची एवं सजल-निर्जल भूमि का ज्ञान रखने वाले, सूत्रकर्म (छावनी आदि बनाने के लिये सूत धारण करने) में कुशल, मार्ग की रक्षा आदि अपने कर्म में सदा सावधान रहने वाले शूर-वीर, भूमि खोदने या सुरङ्ग आदि बनाने वाले, नदी आदि पार करने के लिये तुरंत साधन उपस्थित करनेवाले अथवा जल के प्रवाह को रोकने वाले वेतन भोगी कारीगर, थवई, रथ और यन्त्र आदि बनाने वाले पुरुष, बढ़ई, मार्गरक्षक, पेड़ काटने वाले, रसोइये, चूनेसे पोतने आदि का काम करने वाले, बाँस की चटाई और सूप आदि बनाने वाले, चमड़े का चारजामा आदि बनाने वाले तथा रास्ते की विशेष जानकारी रखने वाले सामर्थ्यशाली पुरुषों ने पहले प्रस्थान किया
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Then surveyors, experts in measurment, energetic and zealous labourers, excavators, engineers, skilled workers, architects, craftsmen, carpenters, roadlevellers, woodcutters, welldiggers, whitewashers, basketmakers, competent supervisors were sent in advance.
ShlokaShloka 2
अथ भूमिप्रदेशज्ञास्सूत्रकर्मविशारदाः।
स्वकर्माभिरताश्शूराः खनका यन्त्रकास्तथा।।2.80.1।।
कर्मान्तिकाः स्थपतयः पुरुष यन्त्रकोविदाः।
तथा वार्धकयश्चैव मार्गिणो वृक्षतक्षकाः।।2.80.2।।
कूपकारास्सुधाकारार्वंशकर्मकृतस्तथा।
समर्था ये च द्रष्टारः पुरतस्ते प्रतस्थिरे।।2.80.3।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
तत्पश्चात् ऊँची-नीची एवं सजल-निर्जल भूमि का ज्ञान रखने वाले, सूत्रकर्म (छावनी आदि बनाने के लिये सूत धारण करने) में कुशल, मार्ग की रक्षा आदि अपने कर्म में सदा सावधान रहने वाले शूर-वीर, भूमि खोदने या सुरङ्ग आदि बनाने वाले, नदी आदि पार करने के लिये तुरंत साधन उपस्थित करनेवाले अथवा जल के प्रवाह को रोकने वाले वेतन भोगी कारीगर, थवई, रथ और यन्त्र आदि बनाने वाले पुरुष, बढ़ई, मार्गरक्षक, पेड़ काटने वाले, रसोइये, चूनेसे पोतने आदि का काम करने वाले, बाँस की चटाई और सूप आदि बनाने वाले, चमड़े का चारजामा आदि बनाने वाले तथा रास्ते की विशेष जानकारी रखने वाले सामर्थ्यशाली पुरुषों ने पहले प्रस्थान किया
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Then surveyors, experts in measurment, energetic and zealous labourers, excavators, engineers, skilled workers, architects, craftsmen, carpenters, roadlevellers, woodcutters, welldiggers, whitewashers, basketmakers, competent supervisors were sent in advance.
ShlokaShloka 3
स तु हर्षात्तमुद्देशं जनौघो विपुलः प्रयान्।
अशोभत महावेगस्समुद्र इव पर्वणि।।2.80.4।।
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तत्पश्चात् ऊँची-नीची एवं सजल-निर्जल भूमि का ज्ञान रखने वाले, सूत्रकर्म (छावनी आदि बनाने के लिये सूत धारण करने) में कुशल, मार्ग की रक्षा आदि अपने कर्म में सदा सावधान रहने वाले शूर-वीर, भूमि खोदने या सुरङ्ग आदि बनाने वाले, नदी आदि पार करने के लिये तुरंत साधन उपस्थित करनेवाले अथवा जल के प्रवाह को रोकने वाले वेतन भोगी कारीगर, थवई, रथ और यन्त्र आदि बनाने वाले पुरुष, बढ़ई, मार्गरक्षक, पेड़ काटने वाले, रसोइये, चूनेसे पोतने आदि का काम करने वाले, बाँस की चटाई और सूप आदि बनाने वाले, चमड़े का चारजामा आदि बनाने वाले तथा रास्ते की विशेष जानकारी रखने वाले सामर्थ्यशाली पुरुषों ने पहले प्रस्थान किया
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Like a swollen ocean on a fullmoon day the multitude of people proceeded joyfully with great speed to the appointed place.
ShlokaShloka 4
ते स्ववारं समास्थाय वर्त्मकर्मणि कोविदाः।
करणैर्विविधोपेतैः पुरस्तात्सम्प्रतस्थिरे।।2.80.5।।
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उस समय मार्ग ठीक करने के लिये एक विशाल जनसमुदाय बड़े हर्ष के साथ वनप्रदेश की ओर अग्रसर हुआ, जो पूर्णिमा के दिन उमड़े हुए समुद्र के महान् वेग की भाँति शोभा पा रहा था
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Those groups who were skilled in the construction of roads took up their places with every kind of tool and departed ahead of others.
ShlokaShloka 5
लतावल्ली श्च गुल्मांश्च स्थाणूनश्मन एव च।
जनायांचक्रिरे मार्गं छिन्दन्तो विविधान्द्रुमान्।।2.80.6।।
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वे मार्ग-निर्माण में निपुण कारीगर अपना-अपना दल साथ लेकर अनेक प्रकार के औजारों के साथ आगे चल दिये
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Clearing and cutting branches of various trees and creepers, shrubs, plants branchless trees and hewing boulders, the road was paved by the king's men.
ShlokaShloka 6
अवृक्षेषु च देशेषु केचिद्वृक्षानरोपयन्।
केचित्कुठारैष्टङ्कैश्च दात्रैश्चिन्दन्क्वचित्क्वचित्।।2.80.7।।
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जिन स्थानों में वृक्ष नहीं थे, वहाँ कुछ लोगों ने वृक्ष भी लगाये। कुछ कारीगरों ने कुल्हाड़ों, टंकों (पत्थर तोड़ने के औजारों) तथा हँसियों से कहीं-कहीं वृक्षों और घासों को काट-काटकर रास्ता साफ किया।
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Some of them, planted saplings in places where there were none, while some others severed trees here and there with axes, hatchets and sickles.
ShlokaShloka 7
अपरे वीरणस्तम्भान्बलिनो बलवत्तराः।
विधमन्ति स्म दुर्गाणि स्थलानि च ततस्ततः।।2.80.8।।
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जिन स्थानों में वृक्ष नहीं थे, वहाँ कुछ लोगों ने वृक्ष भी लगाये। कुछ कारीगरों ने कुल्हाड़ों, टंकों (पत्थर तोड़ने के औजारों) तथा हँसियों से कहीं-कहीं वृक्षों और घासों को काट-काटकर रास्ता साफ किया।
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Some other stronger men, plucked the strongrooted tufts of fragrant grass. Here and there they made impassable terrains even.
ShlokaShloka 8
अपरेऽपूरयन्कूपान्पांसुभि श्श्वभ्रमायतम्।
निम्नभागान्स्ततः केचित्समान्श्चक्रु स्समन्ततः।।2.80.9।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
उन्होंने जहाँ पुल बाँधने के योग्य पानी देखा, वहाँ पुल बाँध दिये। जहाँ कँकरीली जमीन दिखायी दी, वहाँ उसे ठोक-पीटकर मुलायम कर दिया और जहाँ पानी बहने के लिये मार्ग बनाना आवश्यक समझा,वहाँ बाँध काट दिया। इस प्रकार विभिन्न देशों में वहाँ की आवश्यकता के अनुसार कार्य किया
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Some filled wells and chasms with loose soil, while others made low level grounds plain and wide on all sides.
ShlokaShloka 9
बबन्धुर्बन्धनीयांश्च क्षोद्यान्सञ्चुक्षुदुस्तदा।
बिभिदुर्भेदनीयांश्च तांस्तान्देशान्नरा स्तदा।।2.80.10।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
उन्होंने जहाँ पुल बाँधने के योग्य पानी देखा, वहाँ पुल बाँध दिये। जहाँ कँकरीली जमीन दिखायी दी, वहाँ उसे ठोक-पीटकर मुलायम कर दिया और जहाँ पानी बहने के लिये मार्ग बनाना आवश्यक समझा,वहाँ बाँध काट दिया। इस प्रकार विभिन्न देशों में वहाँ की आवश्यकता के अनुसार कार्य किया
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People threw bridges at places that needed to be bridged. They pulverised stones that obstructed the path and split open big stones to drain out water.
ShlokaShloka 10
अचिरेणैव कालेन परिवाहान्बहूदकान्।
चक्रुर्बहुविधाकारान् सागरप्रतिमान्बहून्।।2.80.11।।
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उन्होंने जहाँ पुल बाँधने के योग्य पानी देखा, वहाँ पुल बाँध दिये। जहाँ कँकरीली जमीन दिखायी दी, वहाँ उसे ठोक-पीटकर मुलायम कर दिया और जहाँ पानी बहने के लिये मार्ग बनाना आवश्यक समझा,वहाँ बाँध काट दिया। इस प्रकार विभिन्न देशों में वहाँ की आवश्यकता के अनुसार कार्य किया
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In a short time they constructed many water reservoirs of different shapes capable of holding large volumes of water like the sea.
ShlokaShloka 11
निर्जलेषु च देशेषु खानयामासुरुत्तमान्।
उदपानान्बहुविधान्वेदिकापरिमण्डितान्।।2.80.12।।
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छोटे-छोटे सोतो को, जिनका पानी सब ओर बह जाया करता था, चारों ओर से बाँधकर शीघ्र ही अधिक जलवाला बना दिया। इस तरह थोड़े ही समय में उन्होंने भिन्न-भिन्न आकार-प्रकार के बहुत-से सरोवर तैयार कर दिये, जो अगाध जल से भरे होने के कारण समुद्र के समान जान पड़ते थे
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In arid places, various good drinkingwaterwells surrounded by dykes were dug.
ShlokaShloka 12
ससुधाकुट्टिमतलः प्रपुष्पितमहीरुहः।
मत्तोद्घुष्ट द्विजगणः पताकाभिरलङ्कृतः।।2.80.13।।
चन्दनोदकसंसिक्तो नानाकुसुमभूषितः।
बह्वशोभत सेनायाः पन्था स्सुरपथोपमः।।2.80.14।।
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निर्जल स्थानों में नाना प्रकार के अच्छे-अच्छे कुएँ और बावड़ी आदि बनवा दिये, जो आस-पास बनी हुई वेदिकाओं से अलंकृत थे
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The highway for the army was paved smooth, with its surface decorated with mosaic. It was lined with blossoming trees with flocks of birds intoxicated with singing. It was decked with banners and sprinkled with sandal water and a strewn with flowers of every kind. Like the path of gods, the highway shone with brilliance.
ShlokaShloka 13
आ���्ञाप्याथ यथाऽज्ञप्ति युक्तास्तेऽधिकृता नराः।
रमणीयेषु देशेषु बहुस्वादुफलेषु च।।2.80.15।।
यो निवेशस्त्वभिप्रेतो भरतस्य महात्मनः।
भूयस्तं शोभयामासुर्भूषाभिर्भूषणोपमम्।।2.80.16।।
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Those authorised ordered the artisans to perform their respective tasks. Thereafter, they selected lovely tracts of land filled with trees bearing varieties of sweet fruits as restingplace for great Bharata and decorated them so splendidly, that they looked like ornaments themseleves.
ShlokaShloka 14
नक्षत्रेषु प्रशस्तेषु मुहूर्तेषु च तद्विदः।
निवेशान् स्थापयामासुर्भरतस्य महात्मनः।।2.80.17।।
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Men wellversed in the study of planetary positions relating to auspicious constellations and auspicious times arranged different restingplaces at different times during the sojourn of great Bharata.
ShlokaShloka 15
बहुपांसुचयाश्चापि परिखापरिवारिताः।
तत्रेन्द्रकीलप्रतिमाः प्रतोलीवरशोभिताः।।2.80.18।।
प्रासादमालावितता स्सौधप्राकारसंवृताः।
पताकाशोभिता स्सर्वे सुनिर्मितमहापथाः।।2.80.19।।
विसर्पद्भिरिवाऽकाशे विटङ्काग्रविमानकैः।
समुच्छ्रितैर्निवेशास्ते बभुश्शक्रपुरोपमाः।।2.80.20।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
मार्ग बन जाने पर जहाँ-तहाँ छावनी आदि बनाने के लिये जिन्हें अधिकार दिया गया था, कार्य में दत्त-चित्त रहने वाले उन लोगों ने भरत की आज्ञा के अनुसार सेवकों को काम करने का आदेश देकर जहाँ स्वादिष्ट फलों की अधिकता थी उन सुन्दर प्रदेशों में छावनियाँ बनवायीं और जो भरत को अभीष्ट था, मार्ग के भूषणरूप उस शिविर को नाना प्रकार के अलंकारों से और भी सजा दिया
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They heaped sand and dug moats around the restingplace. It was adorned with wellbuilt highways and broad thoroughfares, lined with mansions surrounded by walls as high as mount Indrakeela. The peaks of those tall residences decorated with flags which looked as if spreading into the sky. (Thus the restingplace) shone like the abode of Indra.
ShlokaShloka 16
जाह्नवीं तु समासाद्य विविधद्रुमकाननाम्।
शीतलामलपानीयां महामीनसमाकुलाम्।।2.80.21।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
मार्ग बन जाने पर जहाँ-तहाँ छावनी आदि बनाने के लिये जिन्हें अधिकार दिया गया था, कार्य में दत्त-चित्त रहने वाले उन लोगों ने भरत की आज्ञा के अनुसार सेवकों को काम करने का आदेश देकर जहाँ स्वादिष्ट फलों की अधिकता थी उन सुन्दर प्रदेशों में छावनियाँ बनवायीं और जो भरत को अभीष्ट था, मार्ग के भूषणरूप उस शिविर को नाना प्रकार के अलंकारों से और भी सजा दिया
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The reached Ganga with its cool and limpid waters abounding in large fishes, its bank lined with groves of various trees.
ShlokaShloka 17
सचन्द्रतारागणमण्डितं यथा नभः क्षपायाममलं विराजते।
नरेन्द्रमार्गस्स तथा व्यराजत क्रमेण रम्यः शुभशिल्पिनिर्मितः।।2.80.22।।
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वास्तु-कर्म के ज्ञाता विद्वानों ने उत्तम नक्षत्रों और मुहूर्तों में महात्मा भरत के ठहरने के लिये जो-जो स्थान बने थे, उनकी प्रतिष्ठा करवायी
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The lovely royal road constructed in an orderly fashion by eminent craftsmen looked splendid like the clear sky decorated with by the Moon and clusters of stars. इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिकाव्ये अयोध्याकाण्डे अशीतितमस्सर्गः।। Thus ends the eightieth sarga in Ayodhyakanda of the holy Ramayana, the first epic composed by sage Valmiki.