Ayodhya Kanda
Sarga 51: Lakshmana tells Guha about events which might overtake Ayodhya after Rama's exile
अयोध्याकाण्डम् · सर्ग 51
24 shlokas
ShlokaShloka 1
तं जाग्रतमदम्भेन भ्रातुरर्थाय लक्ष्मणम्।
गुहः सन्तापसन्तप्तो राघवं वाक्यमब्रवीत्।।2.51.1।।
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लक्ष्मण को अपने भाई के लिये स्वाभाविक अनुराग से जागते देख निषादराज गुह को बड़ा संताप हुआ। उसने रघुकुलनन्दन लक्ष्मण से कहा-
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Deeply moved to see Lakshmana, scion of the Raghus, keeping awake all night without any pretence for his brother's sake, Guha spoke.
ShlokaShloka 2
इयं तात सुखा शय्या त्वदर्थमुपकल्पिता।
प्रत्याश्वसिहि साध्वस्यां राजपुत्र यथासुखम्।।2.51.2।।
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‘तात! राजकुमार! तुम्हारे लिये यह आराम देने वाली शय्या तैयार है, इस पर सुखपूर्वक सोकर भलीभाँति विश्राम कर लो
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O dear prince this comfortable bed has been arranged for you. Rest happily on this bed.
ShlokaShloka 3
उचितोऽयं जनस्सर्वः क्लेशानां त्वं सुखोचितः।
गुप्त्यर्थं जागरिष्यामः काकुत्स्थस्य वयं निशाम्।।2.51.3।।
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‘यह (मैं) सेवक तथा इसके साथ के सब लोग वनवासी होने के कारण सब प्रकार के क्लेश सहन करने के योग्य हैं (क्योंकि हम सबको कष्ट सहने का अभ्यास है), परंतु तुम सुख में ही पले हो, अतः उसी के योग्य हो (इसलिये सो जाओ)। हम सब लोग श्रीरामचन्द्रजी की रक्षा के लिये रातभर जागते रहेंगे
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We are used to all kinds of suffering and you, to comfort. We will keep vigil during the night for the protection of Rama, descendant of the Kakutsthas.
ShlokaShloka 4
न हि रामात्प्रियतमो ममास्ति भुवि कश्चन।
ब्रवीम्येतदहं सत्यं सत्येनैव च ते शपे।।2.51.4।।
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‘मैं सत्य की ही शपथ खाकर तुमसे सत्य कहता हूँ कि इस भूतल पर मुझे श्रीराम से बढ़कर प्रिय दूसरा कोई नहीं है
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For me, there is none dearer than Rama in this world. I speak the truth. I swear by truth.
ShlokaShloka 5
अस्य प्रसादादाशंसे लोकेस्मिन् सुमुहद्यशः।
धर्मावाप्तिं च विपुलामर्थावाप्तिं च केवलम्।।2.51.5।।
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‘इन श्रीरघुनाथजी के प्रसाद से ही मैं इस लोक में महान् यश, विपुल धर्म-लाभ तथा प्रचुर अर्थ एवं भोग्य वस्तु पाने की आशा करता हूँ
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I am seeking supreme fame in this world through the attainment of dharma and acquisition of abundant artha by the grace of Rama alone.
ShlokaShloka 6
सोऽहं प्रियसखं रामं शयानं सह सीतया।
रक्षिष्यामि धनुष्पाणि स्सर्वतो ज्ञातिभि स्सह।।2.51.6।।
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अतः मैं अपने बन्धु-बान्धवों के साथ हाथ में धनुष लेकर सीतासहित सोये हुए प्रियसखा श्रीराम की सब प्रकार से रक्षा करूँगा
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I along with my kinsmen, bow in hand, will protect my dear friend, Rama with Sita from every side.
ShlokaShloka 7
न हि मेऽविदितं किञ्चिद्वनेऽस्मिंश्चरतस्सदा।
चतुरङ्गं ह्यपिबलं सुमहत्प्रसहेमहि।।2.51.7।।
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‘इस वन में सदा विचरते रहने के कारण मुझसे यहाँ की कोई बात छिपी नहीं है। हमलोग यहाँ शत्रु की अत्यन्त शक्तिशालिनी विशाल चतुरङ्गिणी सेना को भी अनायास ही जीत लेंगे’
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Wandering about in this forest all the time there is nothing unknown to me (here). We can withstand even a vast army of four divisions.
ShlokaShloka 8
लक्ष्मणस्तं तदोवाच रक्ष्यमाणास्त्वयानघ।
नात्र भीता वयं सर्वे धर्ममेवानुपश्यता।।2.51.8।।
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यह सुनकर लक्ष्मण ने कहा—’निष्पाप निषादराज ! तुम धर्म पर ही दृष्टि रखते हुए हमारी रक्षा करते हो,इसलिये इस स्थान पर हम सब लोगों के लिये कोई भय नहीं है। फिर भी जब महाराज दशरथ के ज्येष्ठ पुत्र सीता के साथ भूमि पर शयन कर रहे हैं, तब मेरे लिये उत्तम शय्यापर सोकर नींद लेना, जीवनधारण के लिये स्वादिष्ट अन्न खाना अथवा दूसरे-दूसरे सुखों को भोगना कैसे सम्भव हो सकता है ?
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Lakshmana said to Guha, O sinless one when all of us are under your righteous protection we have nothing to fear.
ShlokaShloka 9
कथं दशरथौ भूमौ शयाने सह सीतया।
शक्या निद्रा मया लब्धुं जीवितं वा सुखानि वा।।2.51.9।।
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यह सुनकर लक्ष्मण ने कहा—’निष्पाप निषादराज ! तुम धर्म पर ही दृष्टि रखते हुए हमारी रक्षा करते हो,इसलिये इस स्थान पर हम सब लोगों के लिये कोई भय नहीं है। फिर भी जब महाराज दशरथ के ज्येष्ठ पुत्र सीता के साथ भूमि पर शयन कर रहे हैं, तब मेरे लिये उत्तम शय्यापर सोकर नींद लेना, जीवनधारण के लिये स्वादिष्ट अन्न खाना अथवा दूसरे-दूसरे सुखों को भोगना कैसे सम्भव हो सकता है ?
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When Rama, son of Dasaratha, sleeps on the ground with Sita how can I sleep or live or enjoy pleasures?
ShlokaShloka 10
यो न देवासुरैः सर्वैः शक्यः प्रसहितुं युधि।
तं पश्य सुखसंविष्टं तृणेषु सह सीतया।।2.51.10।।
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‘देखो! सम्पूर्ण देवता और असुर मिलकर भी युद्ध में जिनके वेग को नहीं सह सकते, वे ही श्रीराम इस समय सीता के साथ तिनकों के ऊपर सुखसे सो रहे हैं
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Look at that Rama whom all the gods and demons cannot face in war sleeps so comfortably on the grass with Sita.
ShlokaShloka 11
यो मन्त्रतपसा लब्धो विविधैश्च पराश्रमैः।
एको दशरथस्येष्टः पुत्रः सदृशलक्षणः।।2.51.11।।
अस्मिन् प्रव्राजिते राजा न चिरं वर्तयिष्यति।
विधवा मेदिनी नूनं क्षिप्रमेव भविष्यति।।2.51.12।।
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‘गायत्री आदि मन्त्रों के जप, कृच्छ्रचान्द्रायण आदि तप तथा नाना प्रकार के पराक्रम (यज्ञानुष्ठान आदि प्रयत्न) करने से जो महाराज दशरथ को अपने समान उत्तम लक्षणों से युक्त ज्येष्ठ पुत्र के रूप में प्राप्त हुए हैं, उन्हीं इन श्रीराम के वन में आ जाने से अब राजा दशरथ अधिक कालतक जीवन धारण नहीं कर सकेंगे। जान पड़ता है, निश्चय ही यह पृथ्वी अब शीघ्र विधवा हो जायगी
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This favourite son of Dasaratha who has similar traits like his father was born after he rigorously practised austerities accompanied by (Vedic) mantras. When he is banished, the king will not live long. Surely this land will soon be widowed.
ShlokaShloka 12
विनद्य सुमहानादं श्रमेणोपरताः स्त्रियः।
निर्घोषोपरतं चातो मन्ये राजनिवेशनम्।।2.51.13।।
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‘गायत्री आदि मन्त्रों के जप, कृच्छ्रचान्द्रायण आदि तप तथा नाना प्रकार के पराक्रम (यज्ञानुष्ठान आदि प्रयत्न) करने से जो महाराज दशरथ को अपने समान उत्तम लक्षणों से युक्त ज्येष्ठ पुत्र के रूप में प्राप्त हुए हैं, उन्हीं इन श्रीराम के वन में आ जाने से अब राजा दशरथ अधिक कालतक जीवन धारण नहीं कर सकेंगे। जान पड़ता है, निश्चय ही यह पृथ्वी अब शीघ्र विधवा हो जायगी
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All the women having cried so much must have quietened down out of sheer exhaustion. That is why perhaps the sounds from the royal palace have ceased.
ShlokaShloka 13
कौशल्या चैव राजा च तथैव जननी मम।
नाशंसे यदि जीवन्ति सर्वे ते शर्वरीमिमाम्।।2.51.14।।
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‘तात! रनिवासकी स्त्रियाँ बड़े जोर से आर्तनाद करके अधिक श्रम के कारण अब चुप हो गयी होंगी। मैं समझता हूँ, राजभवन का हाहाकार और चीत्कार अब शान्त हो गया होगा
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I doubt whether all of them -- the king, Kausalya and my mother -- can survive this night.
ShlokaShloka 14
जीवेदपि हि मे माता शत्रुघ्नस्यान्ववेक्षया।
तद्दुःखं यत्तु कौशल्या वीरसूर्विनशिष्यति।।2.51.15।।
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‘महारानी कौसल्या, राजा दशरथ तथा मेरी माता सुमित्रा—ये सब लोग आज की राततक जीवित रहेंगे या नहीं, यह मैं नहीं कह सकता
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My mother may live looking forward to Satrughna. But, alas Kausalya may die, separated from her valiant son.
ShlokaShloka 15
अनुरक्तजनाकीर्णा सुखालोकप्रियावहा।
राजव्यसनसंसृष्टा सा पुरी विनशिष्यति।।2.51.16।।
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‘शत्रुघ्न की बाट देखने के कारण सम्भव है मेरी माता जीवित रह जाय, परंतु यदि वीरजननी कौसल्या श्रीराम के विरह में नष्ट हो जायँगी तो यह हमलोगों के लिये बड़े दुःखकी बात होगी
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That city (of Ayodhya) is full of loyal people. It brings them happiness. It is dear to them. It will perish due to the sad demise of the king.
ShlokaShloka 16
कथं पुत्रं महात्मानं ज्येष्ठं प्रियमपश्यतः।
शरीरं धारयिष्यन्ति प्राणा राज्ञो महात्मनः।।2.51.17।।
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‘जिसमें श्रीराम के अनुरागी मनुष्य भरे हुए हैं तथा जो सदा सुखका दर्शनरूप प्रिय वस्तु की प्राप्ति कराने वाली रही है, वह अयोध्यापुरी राजा दशरथ के निधनजनित दुःख से युक्त होकर नष्ट हो जायगी
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How can the noble king survive unable to see his highsouled, beloved, eldest son?
ShlokaShloka 17
विनष्टे नृपतौ पश्चात्कौसल्या विनशिष्यति।
अनन्तरं च माताऽपि मम नाशमुपैष्यति।।2.51.18।।
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‘अपने ज्येष्ठ पुत्र महात्मा श्रीराम को न देखने पर महामना राजा दशरथ के प्राण उनके शरीर में कैसे टिके रह सकेंगे
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Subsequent to the death of the king, Kausalya will die and my mother will follow her.
ShlokaShloka 18
अतिक्रान्तमतिक्रान्तमनवाप्य मनोरथम्।
राज्ये राममनिक्षिप्य पिता मे विनशिष्यति।।2.51.19।।
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‘महाराज के नष्ट होने पर देवी कौसल्या भी नष्ट हो जायँगी। तदनन्तर मेरी माता सुमित्रा भी नष्ट हुए बिना नहीं रहेंगी
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Past is past (irreversible). My father, brooding over his desire of installing Rama as king unfulfilled, will perish.
ShlokaShloka 19
सिद्धार्थाः पितरं वृत्तं तस्मिन्कालेऽप्युपस्थिते।
प्रेतकार्येषु सर्वेषु संस्करिष्यन्ति भूमिपम्।।2.51.20।।
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(महाराज की इच्छा थी कि श्रीराम को राज्य पर अभिषिक्त करूँ) अपने उस मनोरथ को न पाकर श्रीराम को राज्यपर स्थापित किये बिना ही ‘हाय! मेरा सब कुछ नष्ट हो गया, नष्ट हो गया’ ऐसा कहते हुए मेरे पिताजी अपने प्राणों का परित्याग कर देंगे
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Those who will remain present around the king, my father, at the time of his death and perform the funeral rites have their desires fulfilled (for they could attend the king's obsequies).
ShlokaShloka 20
रम्यचत्वरसंस्थानां सुविभक्तमहापथाम्।
हर्म्यप्रासादसम्पन्नाम् गणिकावरशोभिताम्।।2.51.21।।
रथाश्वगजसम्बाधां तूर्यनादविनादिताम्।
सर्वकल्याणसम्पूर्णां हृष्टपुष्टजनाकुलाम्।।2.51.22।।
आरामोद्यानसम्पन्नां समाजोत्सवशालिनीम्।
सुखिता विचरिष्यन्ति राजधानीं पितुर्मम।।2.51.23।।
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‘उनकी उस मृत्यु का समय उपस्थित होने पर जो लोग रहेंगे और मेरे मरे हुए पिता रघुकुलशिरोमणि दशरथ का सभी प्रेतकार्यों में संस्कार करेंगे, वे ही सफल मनोरथ और भाग्यशाली हैं
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They will roam about happily in the capital city of my father with its lovely squares, wellaligned broad highways, its mansions and palaces, full of chariots, elephants, horses. It will be echoing with the sound of trumpets. It will be full of the welfare of all. It will be graced by the fairest of courtesans. Filled with wellnourished and contented people, the city dotted with several pleasuregardens and parks, will look splendid with community festivals and fairs.
ShlokaShloka 21
अपि जीवेद्दशरथो वनवासात्पुनर्वयम्।
प्रत्यागम्य महात्मानमपि पश्येम सुव्रतम्।।2.51.24।।
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‘(यदि पिताजी जीवित रहे तो) रमणीय चबूतरों और चौराहों के सुन्दर स्थानों से युक्त, पृथक्-पृथक् बने हुए विशाल राजमार्गों से अलंकृत, धनिकों की अट्टालिकाओं और देवमन्दिरों एवं राजभवनों से सम्पन्न, श्रेष्ठ वाराङ्गनाओंसे सुशोभित, रथों, घोड़ों और हाथियों के आवागमन से भरी हुई, विविध वाद्यों की ध्वनियों से निनादित, समस्त कल्याणकारी वस्तुओं से भरपूर, हृष्ट-पुष्ट मनुष्यों से सेवित, पुष्पवाटिकाओं और उद्यानों से विभूषित तथा सामाजिक उत्सवों से सुशोभित हुई मेरे पिता की राजधानी अयोध्यापुरी में जो लोग विचरेंगे, वास्तव में वे ही सुखी हैं
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Will the king be still alive? Will we see the noble king again on our return from exile after the fulfilment of his vows?
ShlokaShloka 22
अपि सत्यप्रतिज्ञेन सार्धं कुशलिना वयम्।
निवृत्ते वनवासेऽस्मिन्नयोध्यां प्रविशेमहि।।2.51.25।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘(यदि पिताजी जीवित रहे तो) रमणीय चबूतरों और चौराहों के सुन्दर स्थानों से युक्त, पृथक्-पृथक् बने हुए विशाल राजमार्गों से अलंकृत, धनिकों की अट्टालिकाओं और देवमन्दिरों एवं राजभवनों से सम्पन्न, श्रेष्ठ वाराङ्गनाओंसे सुशोभित, रथों, घोड़ों और हाथियों के आवागमन से भरी हुई, विविध वाद्यों की ध्वनियों से निनादित, समस्त कल्याणकारी वस्तुओं से भरपूर, हृष्ट-पुष्ट मनुष्यों से सेवित, पुष्पवाटिकाओं और उद्यानों से विभूषित तथा सामाजिक उत्सवों से सुशोभित हुई मेरे पिता की राजधानी अयोध्यापुरी में जो लोग विचरेंगे, वास्तव में वे ही सुखी हैं
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Will we ever be able, after completion of the exile, to enter the city of Ayodhya along with Rama who is true to his promise?
ShlokaShloka 23
परिदेवयमानस्य दुखार्तस्य महात्मनः।
तिष्ठतो राजपुत्रस्य शर्वरी साऽत्यवर्तत।।2.51.26।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘(यदि पिताजी जीवित रहे तो) रमणीय चबूतरों और चौराहों के सुन्दर स्थानों से युक्त, पृथक्-पृथक् बने हुए विशाल राजमार्गों से अलंकृत, धनिकों की अट्टालिकाओं और देवमन्दिरों एवं राजभवनों से सम्पन्न, श्रेष्ठ वाराङ्गनाओंसे सुशोभित, रथों, घोड़ों और हाथियों के आवागमन से भरी हुई, विविध वाद्यों की ध्वनियों से निनादित, समस्त कल्याणकारी वस्तुओं से भरपूर, हृष्ट-पुष्ट मनुष्यों से सेवित, पुष्पवाटिकाओं और उद्यानों से विभूषित तथा सामाजिक उत्सवों से सुशोभित हुई मेरे पिता की राजधानी अयोध्यापुरी में जो लोग विचरेंगे, वास्तव में वे ही सुखी हैं
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While that noble prince (Lakshmana), tormented with grief, stood thus wailing, the night passed off.
ShlokaShloka 24
तथा हि सत्यं ब्रुवति प्रजाहिते
नरेन्द्रपुत्रे गुरुसौहृदाद्गुहः।
मुमोच बाष्पं व्यसनाभिपीडितो
ज्वरातुरो नाग इव व्यथातुरः।।2.51.27।।
हिन्दी अर्थ देखेंहिन्दी अर्थ
‘क्या वनवास की इस अवधि के समाप्त होने पर हमलोग सत्यप्रतिज्ञ श्रीराम के साथ कुशलपूर्वक अयोध्यापुरी में प्रवेश कर सकेंगे?’
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Out of great friendship with Guha, Lakshmana thus told the true story of prince (Rama) in the interest of his subject (Guha). (On hearing it) Guha was deeply afflicted with grief and pain and began shedding tears like an elephant suffering from fever. इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिकाव्ये अयोध्यकाण्डे एकपञ्चाश स्सर्गः।। Thus ends the fiftyfirst sarga of Ayodhyakanda of the holy Ramayana, the first epic composed by sage Valmiki.